घोड़े खड़े-खड़े क्यों सोते हैं?

पृथ्वी पर रहने वाले हर प्राणी के लिए भोजन और नींद बहुत जरूरी हैं। जहां भोजन से ऊर्जा मिलती है, वहीं नींद भी शरीर को तरोताजा रखने में सहायता प्रदान करती है। लेकिन बहुत से ऐसे विचित्र प्राणी है, जो अपनी इस नींद को भी अलग तरीके से पूरा करते हैं। इन विचित्र प्राणियों में से एक प्राणी घोड़ा भी है, जो कब सोता है पता ही नहीं चलता। तो क्या घोड़े सोते नहीं है? अगर सोते है तो कब और कैसे सोते है, आज हम आपको इसी विषय पर जानकारी देंगे।

दरअसल हर प्राणी की तरह घोड़े भी सोते है, लेकिन वे अपनी नींद खड़े-खड़े ही पूरी करते है। इसके पीछे बहुत से ख़ास कारण हैं। दरअसल घोड़े के शरीर का वजन ज्यादा होता है और उन्हें उठने में समय लगता है। इसीलिए सुरक्षा की दृष्टि से घोड़े खड़े-खड़े नींद लेते हैं। साथ ही उनके शरीर की संरचना भी कुछ इस प्रकार की होती है कि वे खड़े-खड़े नींद निकाल सकते हैं। घोड़ों के पैर की हड्डियों की बनावट कुछ इस तरह कि है कि वे जब नींद पूरा करते है तो उनकी हड्डियाँ जम जाती है और वे गिरे बिना अपनी नींद पूरी कर लेते हैं।

साथ ही घोड़े सोते समय अपने किसी न किसी पैर को अन्य पैरों की तुलना में ज़मीन से थोड़ा ऊपर रखते हैं। ऐसा वो बारी-बारी से करते हैं। जिससे उनके किसी भी एक पैर पर किसी तरह का दबाव या वजन नहीं आता और उन्हें नींद पूरी करने में कोई परेशानी नहीं होती। घोड़ों के खड़े होकर नींद पूरी करने के पीछे उनके स्वास्थ्य से जुड़ा एक अन्य कारण भी हैं। दरअसल जब भी घोड़े पेट के बल सोते है तो उन्हें पेट पर वजन पड़ता है और वे पेट से संबंधित बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। यह पेट की बीमारी कभी-कभी घोड़ों की मौत का कारण भी बन जाती हैं। ऐसे में घोड़े ज्यादातर खड़े होकर नींद पूरी करते हैं।

अब आप सोच रहें होंगे कि कोई अपनी पूरी नींद खड़े होकर कैसे निकाल सकता हैं। तो आपको बता दे कि घोड़े रात और दिन मिलाकर कुल 3 या 4 घंटो की नींद ही लेते हैं। इतना ही नहीं उनकी यह नींद एक साथ नहीं पूरी होती। वे 10 या 20 मिनट की झपकी के रूप में अपनी नींद को पूरा करते हैं। घोड़ों की नींद से जुड़ी एक विशेष बात और हैं। दरअसल जब घोड़े अस्तबल या किसी सुरक्षित स्थान पर होते है तो वे आराम से पेट के बल लेटकर या बैठकर अपनी नींद पूरा करते हैं। लेकिन इस समय अस्तबल में उपस्थित कोई न कोई घोड़ा ज़रुर खड़ा होता हैं। इस प्रक्रिया को हर घोड़ा बारी-बारी से करता हैं।

आग क्या है?

fire

आपने आग की भीषण लपटों को तो देखा ही होगा। लेकिन इन भीषण लपटों को देखकर एक सवाल आपके दिमाग में ज़रूर उठता होगा, कि आखिर आग है क्या और आग कैसे लगती हैं? इतना ही नहीं यह सवाल भी दिमाग में उठता है, कि आखिर आग की उत्पत्ति के पीछे के कारण क्या हैं। तो आज हम आपके इन ही सवालों को हल करने का प्रयास करेंगे।

अगर बात करें आग की तो आग दहनशील वस्तुओं या पदार्थों का तेज़ ऑक्सीकरण हैं जिसके अंदर से तेज़ प्रकाश, तीव्र ऊष्मा के साथ पानी और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होते हैं। जब भी कभी ऑक्सीजन की मौजूदगी में कोई जलने लायक पदार्थ, ऊष्मा के संपर्क में आता है, तो आग उत्पन्न हो जाती हैं। लेकिन ऊष्मा, ऑक्सीजन और जलने लायक पदार्थ में से किसी एक के भी लुप्त होने से आग नहीं जल सकती। अर्थात, आग के जलने के लिए तीनों कारकों की आवश्यकता होती हैं। आग का लगना एक क्रमबद्ध प्रक्रिया होती हैं। जिसके लिए तीनों कारकों का होना जरूरी हैं। जितनी देर तक और जब तक ये तीनों कारक मौजूद होंगे आग जलती रहेगी। अगर आग लगने के लिए उपयुक्त तीनों कारक जैसे- ऑक्सीजन, ज्वलनशील पदार्थ और ऊष्मा में से किसी एक को भी अलग कर दिया जाए तो आग बुझ जाएगी।

अब आप सोच रहे होंगे की आखिर जब आग लगेगी तो हम किस तरह से आग लगने के लिए उपयुक्त तीनों कारकों में से एक को हटाए। अगर आप आग को बुझाना चाहते है तो कार्बन डाइऑक्साइड की मदद से आग पर पूरी तरह काबू पा सकते है। अगर किसी बंद कमरे या बिल्डिंग में आग लगती है, तो कार्बन डाइऑक्साइड का ही उपयोग करते हैं। दरअसल कार्बन डाइऑक्साइड गैस आग लगने के तीन कारकों में से एक ऑक्सीजन को ख़त्म कर देती हैं, इस स्थिति में आग बुझ जाती हैं।

वहीं आप पानी का उपयोग करके भी आग को बुझा सकते हैं। अब आपके मन में यह विचार आ रहा होगा कि पानी भी तो ऑक्सीजन और हाइड्रोजन से मिलकर बना हैं तथा दोनों ही ज्वलनशील होते हैं। फिर पानी कैसे आग बुझाता हैं? आपको बता दे कि पानी एक अणु होता है जो कि हाइड्रोजन के दो परमाणु और ऑक्सीजन के एक परमाणु से मिलकर बना होता हैं। लेकिन यह अज्वलनशील प्रवृत्ति का होता हैं। जिसके चलते आग बुझाने के लिए इसका उपयोग किया जाता हैं। तो आपको समझ में आ गया होगा कि आग क्या है और इसकी उत्पत्ति कैसे होती हैं।

गेंद नीचे गिरकर उछलती क्यों है ?

foot ball

आप सब ने कभी न कभी क्रिकेट तो खेला होगा, अगर नहीं खेला तो देखा तो होगा ही। जहां हर टीम में 11-11 खिलाड़ी होते हैं। एक टीम फील्डिंग तो एक बैटिंग करती हैं। लेकिन आज हम आपको क्रिकेट का ज्ञान नहीं बल्कि क्रिकेट से जुड़ी एक ख़ास चीज के बारे में बताने जा रहे हैं। क्रिकेट की यह ख़ास चीज कुछ और नहीं बल्कि खेल में उपयोग की जाने वाली गेंद हैं। यह गेंद खेल के समय गेंदबाज़ द्वारा फेंकी जाती हैं। लेकिन इस गेंद से जुड़ा एक सवाल शायद सभी के मन में होगा, कि आखिर गेंद नीचे गिरकर उछलती क्यों है? गेंद चाहे तो सीधी जा सकती हैं, लेकिन इसके नीचे गिरकर उछलने का कारण क्या हैं। तो चलिए जानते हैं गेंद के उछलने की वजह।

दरअसल हमारे आस पास घटित होने वाली हर घटना के पीछे कुछ ना कुछ वैज्ञानिक कारण होता हैं। चाहे वो पेड़ से फल का गिरना, दूध का उबलना या फिर हल्की वस्तुओं का पानी में तैरना। उसी तरह गेंद का ज़मीन पर गिरकर उछलने के पीछे भी वैज्ञानिक कारण हैं। इस घटना में न्यू-टन की गति का तीसरा नियम लागू होता हैं। जिसके अनुसार हर क्रिया के समान या फिर उसके विपरीत एक प्रतिक्रिया होती है। अगर इसे सीधे शब्दों में समझा जाए तो, जब किसी पदार्थ द्वारा किसी अन्य पदार्थ पर बल लगाया जाता है, तो अन्य पदार्थ द्वारा भी सामान या विपरीत दिशा में बल लगाया जायेगा।

उसी तरह जब गेंदबाज़ द्वार गेंद को ज़मीन पर फेंकने पर गेंद नीचे गिरती है, तो वह आकार में थोड़ी परिवर्तित हो जाती है, और अपनी असल स्थिति को प्राप्त करने के लिए वह उस दिशा में आगे बढती हैं। जिसके लिए वह ज़मीन में धंसने का प्रयास करती हैं। और जैसा की न्यू-टन का तीसरा नियम है कि अगर कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु पर दबाव बनाने का प्रयास करती है तो सामान या विपरीत प्रतिक्रिया होती है। उसी तरह जब गेंद ज़मीन से टकराती है तो ज़मीन के द्वारा विपरीत दिशा में गेंद पर दबाव बनाया जाता है। जिससे गेंद ऊपर की ओर उछलती हैं। गेंद का नीचे गिरकर उछलना ठीक उसी प्रकार होता है जिस प्रकार रॉकेट के आसमान में छोड़े जाने पर वह पीछे ज़मीन पर बल लगाकर क्रिया करता है, जिसके बाद ज़मीन भी विपरीत दिशा में रॉकेट को ऊपर की ओर धकेलकर प्रतिक्रिया करती हैं। तो आपने देखा न कैसे हमारे जीवन की हर एक घटना में विज्ञान अपनी भूमिका निभाता हैं।

डबल रोटी में छेद क्यों होते हैं?

bread

डबल रोटी वैसे तो हर घर में सुबह की चाय के साथ या फिर नाश्ते के रूप में उपयोग की जाती हैं। यह इतनी नरम और स्पंजी होती है कि इसे खाने में एक अलग ही तरह का स्वाद आता हैं। मिस्त्र से शुरू हुई डबल रोटी एक ऐसा खाद्य पदार्थ बन गई है जिसे संसार के हर कोने में हर तरह के लोग अपने भोजन में उपयोग करते हैं। लेकिन इसे खाने के साथ इससे जुड़ा एक सवाल ज़रूर सबके मन में उठता होगा। यह सवाल है कि आखिर डबल रोटी में छेद क्यों होते हैं?

सबसे पहले तो यह जानना ज़रुरी है कि डबल रोटी बनाई कैसे जाती है? दरअसल हर देश में अलग तरह के पदार्थों से डबल रोटी का निर्माण किया जाता हैं। कहीं डबल रोटी आलू के आटे से बनती है, तो कहीं चावल के आटे से। कहीं मटर के आटे से तो, कहीं जों के आटे से। लेकिन ज्यादातर जगहों पर डबल रोटी का निर्माण मैदे या गेहूं के आटे से किया जाता हैं। यही गेहूं के आटे और मैदे की डबल रोटी अधिक प्रचलित भी हैं।

आइए अब जानते है कि डबल रोटी में छेद क्यों होते हैं? दरअसल जब डबल रोटी को बनाने के लिए मैदा पानी के साथ गूंधा जाता है, तो इसमें थोड़ी सी मात्रा में खमीर को भी मिलाया जाता हैं। यह खमीर गूंधे हुए मैदे की नमी और गर्मी के चलते फैलने लगता हैं। यह इतनी तेजी के साथ बढ़ता है, कि इस प्रक्रिया में बुलबुले के रूप में कुछ गैस भी उत्पन्न होती हैं। जो मैदे से बनी डबल रोटी का आयतन बढ़ाने में सहायक होती हैं। लेकिन जैसे ही डबल रोटी को भट्टी में सेका जाता है, गैसे के ये बुलबुले फूट जाते है और इनमे भरी गैस निकल जाती हैं। गैस के निकलने के कारण ही डबल रोटी में छेद हो जाते हैं। बता दे कि डबल रोटी में उपस्थित यह गैस ही उसे अन्दर से अच्छी तरह सेकने में सहायक होती हैं।

अब आप सोच रहे होंगे कि डबल रोटी की तरह केक में भी छोटे-छोटे छेद होते है, और वह छेद भी खमीर की वजह से ही होते होंगे। तो आपको बता दें कि यह बिलकुल गलत हैं। हालांकि केक में भी छोटे-छोटे छेद का कारण गैस ही होती हैं। किन्तु वह खमीर नहीं बल्कि बैकिंग सोडा से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड गैस होती हैं। उम्मीद है, आपको डबल रोटी में छेद होने के पीछे की वजह समझ आई होगी। साथ ही आपको यह भी पता चल गया होगा कि क्यों डबल रोटी इतनी स्पंजी और स्वादिष्ट लगती हैं।

लोहे पर जंग कैसे लगता है?

iron rod

अक्सर आपने देखा होगा की जब भी हम लोहे या किसी धातु से बने सामानों को हवा में छोड़ देते है तो उसमे जंग लगने लगती हैं। धीरे-धीरे यह जंग धातु को पूरी तरह खराब कर देती हैं। लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर विचार किया है कि आखिर हवा में रखने पर धातु खराब कैसे हो जाती हैं? और किस कारण लोहे पर जंग लगती हैं? अगर नहीं तो यह लेख आपको इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी देगा।

दरअसल लोहे में जंग लगना एक तरह की रासायनिक क्रिया हैं। जब किसी धातु से बनी कोई सामग्री हवा के संपर्क मे आती है, तो उसपर जंग लगना शुरू हो जाती हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि यह सब होता कैसे हैं? तो आपको बता दे कि हवा में अम्ल, ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड, जैसी कई गैस होती हैं। जब इनसे धातु या उससे बनी वस्तु की प्रतिक्रिया होती है, तो उसपर एक यौगिक की परत बनने लगती हैं। जिससे धीरे-धीरे धातु खराब होने लगती हैं।

जंग का रासायनिक नाम आयरन ऑक्साइड होता है जिसका निर्माण लोहे और नमी वाली हवा में मौजूद ऑक्सीजन से मिलकर होता हैं। अर्थात जब लोहे या उससे बनी सामग्री हवा में उपस्थित ऑक्सीजन और पानी के साथ प्रतिक्रिया करती है, तो उसपर एक अवांछित परत का निर्माण होने लगता है। यह भूरे रंग की परत ही आयरन ऑक्साइड होती है। नमी वाली हवा की उपस्थिति में ऑक्सीजन बार-बार लोहे के साथ प्रतिक्रिया करता हैं। जिससे कुछ समय बाद लोहे से बनी सामग्री पूरी तरह खराब हो जाती हैं।

अब आप सोच रहे होंगे कि लोहे को जंग लगने से कैसे बचाया जा सकता हैं ? तो आपके इस सवाल का जवाब भी हमारे पास हैं। जैसा आपने पढ़ा है कि जब हवा में नमी होती है तब लोहा ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया करता हैं, जो जंग लगने का कारण है। अगर लोहे को नमी वाली हवा में न रखा जाए, तो उसे जंग की चपेट में आने से बचाया जा सकता है। इसके साथ ही अगर लोहे को पानी और ऑक्सीजन दोनों में से किसी एक से भी दूर रखा जाए तो भी हम लोहे को जंग लगने से बचा सकते हैं। इसके अलावा लोहे से बने सामानों पर पेंट कर, उससे बनी वस्तुओं में मिश्रित धातु का उपयोग कर और लोहे पर ग्रीस या तेल लगाकर भी उसे जंग लगने से बचाया जा सकता हैं। बता दे कि लोहे की तरह ही अन्य धातुओं को भी हवा में मौजूद नमी और गैसों के कारण हानि पहुँचती हैं। ऐसे में अन्य धातुओं को जंग लगने से बचाने के लिए उन्हें भी नमी वाली हवा के संपर्क से दूर रखना चाहिए।

पानीपत का युद्ध Panipat ka Yudh

भारत का इतिहास अत्यधिक बड़ा व विविधताओं वाला है| प्राचीन होने के कारण यह रुचिकर है और प्रसिद्ध भी| आज के इस लेख में हम पानीपत के युद्ध के बारे में बताएँगे|

पानीपत के युद्ध इतिहास में अपनी अलग छवि के नाम से प्रसिद्ध है| अभी तक के इतिहास में पानीपत के तीन युद्ध हुए है| प्रथम व द्वितीय युद्ध सन 1500 इस्वी के काल में और सन 1700 इस्वी के काल में तीसरा व अन्तिम युद्ध पानीपत के मैदान में हुआ| प्रत्येक युद्ध अपना अलग महत्व एवं भूमिका रखता है| पानीपत के तीन युद्ध ये है:

प्रथम युद्ध- बाबर एवं इब्राहीम लोदी के मध्य  

द्वितीय युद्ध- बैरम खान एवं हेमू के मध्य

तृतीय युद्ध- मराठा एवं अहमदशाह अब्दाली के मध्य

पानीपत का प्रथम युद्ध- बाबर व् इब्राहीम लोदी:

21 अप्रैल 1526 को आज के समय में हरियाणा कहे जाने वाले राज्य के एक छोटे से गाँव पानीपत में बाबर और इब्राहीम लोदी के मध्य लड़ा गया| इसी युद्ध के फलस्वरूप भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना की शुरूआत हुई|

इस युद्ध में पहली बार बारूद एवं आग से बने हथियारों का प्रयोग किया गया था एवं काफी बड़े पैमाने पर नए शस्त्रों का इस्तेमाल किया गया|

बाबर काबुल का एक शक्तिशाली शासक था जिसका पूरा नाम जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर था| इब्राहीम लोदी उस समय दिल्ली सल्तनत पर राज कर रहा था|

हरियाणा राज्य के कई हिन्दू राजा इस युद्ध में शामिल हुए एवं ग्वालियर के कई राजा इब्राहीम लोदी की तरफ से युद्ध में सम्मिलित हुए|

बाबर ने इस युद्ध में तुलुगुमा युद्ध पद्धति अपनाई, जो अन्य युद्ध नीतियों में से एक उत्तम युद्ध प्रणाली मानी जाती है|

इब्राहीम लोदी की सेना में लगभग एक लाख लोग सम्मिलित थे, जबकि बाबर की सेना में 20,000 के करीब सैनिक मौजूद थे एवं यह काफी बड़ा अंतराल था फिर भी इस युद्ध में जीत बाबर की हुई|

युद्ध का परिणाम:

सेना के एक विशाल अंतराल होने के बावजूद मुग़ल साम्राज्य एवं दिल्ली सल्तनत के बीच हुए इस युद्ध में बाबर अपनी कूटनीति एवं युद्ध नीति के कारण विजयी हुआ|

इस युद्ध के बाद बाबर ने दिल्ली सल्तनत पर कब्जा कर लिया एवं मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक के रूप में जाना जाने लगा|

पानीपत का द्वितीय युद्ध- बैरम खान एवं हेमू:

5 नवम्बर 1556 ई. को पानीपत के मैदान ने फिर से एक विशाल युद्ध देखा, जो कि अकबर के सेनापति बैरम खान एवं आदिलशाह के सेनापति हेमू जिसका पूरा नाम हेमचन्द्र विक्रमादित्य के मध्य लड़ा गया|

युद्ध की पृष्ठभूमि:

1556 में मुग़ल साम्राज्य के द्वितीय शासक हुमायूँ की मृत्यु के बाद उसके पुत्र अकबर ने बहुत ही कम आयु तेरह वर्ष में मुग़ल सत्ता अपने हाथ में ली, किन्तु उस समय उनकी आयु मात्र 13 वर्ष थी, इसलिए बैरम खान उनके सरंक्षक के रूप में सामने आया|

हेमू उस समय अफगान शासक आदिलशाह के सेनापति के पद पर कार्यरत था एवं हुमायु की मृत्यु का लाभ उठाते हुए उत्तर भारत पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया एवं दक्षिण के तरफ भी कई युद्ध जीते|

6 अक्तूबर के दिन हेमू ने दिल्ली की लड़ाई में 3000 मुग़ल सैनिको को मौत के घाट उतार दिया, जिससे मुगलों में आक्रोश उत्पन्न हो गया एवं बैरम खान ने हेमू को ईट का जवाब पत्थर से देने की ठानी| हालंकि अकबर इस युद्ध के पक्ष में नहीं था|

अंतत: पानीपत के प्रथम युद्ध के 30 वर्ष बाद फिर से एक और युद्ध का ऐलान किया गया| दोनों सेनाएं 5 नवम्बर को पानीपत के मैदान में आमने-सामने आई एवं इस युद्ध में भी मुगलों का सैनिक बल कम था|

युद्ध के परिणाम:

इस युद्ध में बैरम खान विजयी हुआ एवं हेमू को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा| हेमू का सिर धड से अलग करके दिल्ली के दरवाजे पर टांग दिया गया एवं बाकी शरीर को दिल्ली के पुराने दुर्ग पर लटका दिया गया, जिससे अन्य विद्रोहियों के मन मे मुगलों के प्रति भय पैदा हो सके|

अकबर ने एक बार फिर दिल्ली सल्तनत को अपने हाथ में लिया और साथ ही अन्य विद्रोहियों को पकड़कर उन्हें भी मौत की सजा सुनाई गई|

युद्ध के कुछ समय बाद हेमू के पिता को भी अलवर से गिरफ्तार करके उन्हें भी मार दिया गया|

पानीपत का तृतीय युद्ध- मराठा एवं अहमदशाह अब्दाली:

यह युद्ध मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ एवं दुर्रानी साम्राज्य के शासक एवं संस्थापक अहमदशाह अब्दाली के बीच 14 जनवरी 1761 ई. में लड़ा गया|

अहमदशाह अब्दाली अफगान शासक था, जो कई बार भारत आ चुका था| इसी समय पंजाब का सूबेदार किसी लड़ाई में बूरी तरह परास्त हुआ, जिससे दिल्ली साम्राज्य ने पंजाब को अफगान के हवाले कर दिया और अब्दाली ने पिछले सूबेदारों को हटाकर अपने अधिकारयों को उनका पद दे दिया एवं अफगान लौट गया|

अब्दाली की गैर मौजूदगी का लाभ उठाकर मराठो ने पंजाब पर हमला कर दिया एवं लाहौर पर कब्जा कर लिया| इसी बात से नाराज होकर अब्दाली ने मराठा साम्राज्य से युद्ध करने की योजना बनाई|

इस युद्ध में पेशवा बालाजी बाजीराव ने अपने सेनापति सदाशिव राव के नेतृत्व में विशाल सेना भेजी एवं 14 जनवरी को दोनों सेनाएं पानीपत के मैदान में आमने-सामने इकठी हुई|

युद्ध के परिणाम:

इस युद्ध में काफी नुक्सान के साथ मराठों की बुरी तरह से हार हुई| इस हार का कारण ये था कि अब्दाली का सैनिक बल मजबूत था और उत्तरी भारत के सभी मुस्लिम शक्ति ने अब्दाली का साथ दिया| इसके अलावा मराठाओं द्वारा पंजाब पर आक्रमण करने की वजह से वहाँ के सिख व् राजपूत सैनिकों ने भी मराठा के विरुद्ध होकर लड़ाई लड़ीं व मराठा सेना के मध्य संगठन शक्ति व समता की कमी भी पराजय का कारण बनी|  

निष्कर्ष:

युद्ध की विजय या पराजय सेनानायक व सैनिकों की कुशलता, बुद्धिमता व युद्धनीति पर निर्भर करती है| ऊपर दिए गए उल्लेख में यह तथ्य तो सिद्ध हो ही गया कि केवल सैनिकों की संख्या अधिक होने से विजय हासिल नहीं की जा सकती|  

हमारा इतिहास काफी गौरवपूर्ण रहा है| हालांकि कभी कहीं नुकसान झेलना पड़ा तो कहीं लाभ भी हुआ| इतिहास के कुछ पन्ने भयभीत व निराश करने वाले हैं तो कुछ गर्व महसूस करवाने वाले| परन्तु हार व जीत का सिलसिला हमेशा से चलता आया है और चलता रहेगा|   

तुगलक वंश एवं दिल्ली सल्तनत Tughlak Vansh Evm Delhi Saltnat

तुगलक वंश ने दिल्ली सल्तनत पर काफी समय तक शासन किया एवं इसमें तीन शासक ऐसे हुए जिन्हें आज भी उनकी नीतियों एवं कार्यों के कारण जाना जाता है| तुगलक वंश का शासन काल 1320 से लेकर 1414 तक माना गया है|

खिलजियो के अंत के साथ ही दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश का राज शुरू हुआ एवं इसके अनेक महान शासकों में से तीन प्रमुख शासक थे:-

गयासुद्दीन तुगलक

मुहम्मद बिन तुगलक

फिरोज शाह तुगलक

गयासुद्दीन तुगलक 1320-1325

तुगलक गाजी या गाजी मालिक के नाम से प्रसिद्ध गयासुद्दीन तुगलक ने तुगलक वंश की स्थापना की| गयासुद्दीन का शासनकाल 5 वर्ष तक चला एवं यह पहला ऐसा सुल्तान था जिसने अपने नाम के साथ ‘गाजी’ की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है काफ़िरो को मारने वाला|

गयासुद्दीन ने कुल 29 वार मंगोल सेना द्वारा किये गये आक्रमण को विफल कर दिया एवं उन्हें दिल्ली में प्रवेश करने से रोके रखा एवं कैदियों के प्रति सख्त रुख अपनाया| गयासुद्दीन तुगलक के शासनकाल में तुगलकाबाद किले का निर्माण कार्य शुरू हुआ एवं उसने 1323 में अपने बेटे मुहम्मद बिन तुगलक को गद्दी का भार सौंप दिया|

गयासुद्दीन तुगलक द्वारा किये गये सुधार:
गयासुद्दीन ने कई आर्थिक सुधार किये जिसमे उसने ‘रस्म-ए-मियान’ यानी सख्ती एवं नरमी के बीच का संतुलन वाली नीति अपनाई|

उसने उपज में से लिए जाने वाले लगान कर को कम कर दिया एवं जमीदारों को उनके पुराने अधिकार वापस लौटा दिए|

इसने कई नहरों का निर्माण करवाया जो सिंचाई कार्य में काम आती थी एवं नहरे बनवाने का श्रेय सर्वप्रथम गयासुद्दीन तुगलक को दिया जाता है| इसके साथ ही इसने कई बाग़, किले, एवं सड़के भी बनवाई|

गयासुद्दीन के समय में डाक व्यवस्था काफी अच्छे स्तर पर थी एवं उसने अलाउद्दीन द्वारा लागू कठोर नीतियों में नरमी अपनाई|

चूँकि गयासुद्दीन एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था एवं कठोर इस्लाम धर्म में यकीन रखता था अत: वह अपनी जनता से भी ऐसी ही कामना रखता था|

मृत्यु:

1325 में गयासुद्दीन तुगलक बंगाल अभियान से लौट रहा था एवं रास्ते में विश्राम के लिए एक लकड़ी से बने महल में रुका जिसकी नीव काफी कमजोर थी एवं वह ध्वस्त हो गया जिसमे दबने के कारण गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु हो गई|

मुहम्मद बिन तुगलक 1325-1351

गयासुद्दीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गद्दी पर विराजमान हुआ उसका वास्तविक नाम जूना खान था एवं गद्दी पर बैठने के बाद उसे मुहम्मद बिन तुगलक की उपाधि धारण की| तुगलक वंश के सभी शासकों में मुहम्मद बिन तुगलक सबसे अधिक शिक्षित एवं योग्य शासक के रूप में जाना जाता है|

कई इतिहासकार उसे पागल या सनकी शासक के रूप में देखते है क्योकि इसने कुछ इसे काम किये जो अजीब प्रतीत होते थे| गद्दी पर बैठने के बाद मुहम्मद ने कई व्यक्तियों को अनेक उपाधियों से शोभित किया| जैसे इसने मालिक कबूल को ‘वजीर-ए-मुमालिक’ का पद देकर उसे ‘खान-ए-जहाँ’ की उपाधि से शोभित किया|

मुहम्मद बिन तुगलक ने बिना किसी पक्षपात के सभी योग्य अधिकारीयों को उनकी कार्यक्षमता एवं दक्षता के आधार पर पद सौंपे| जूना खान कई प्रकार की कलाओं में निपुण था एवं उसे चिकित्सा, खगोल शास्त्र, ज्योतिष विज्ञानं, गणित आदि कलाओं एव् विषयों में रूचि थी|

मुहम्मद बिन तुगलक ने नस्ल भेदभाव को पूरी तरह समाप्त कर दिया किन्तु फिर भी उसे इतिहास में वह योग्य स्थान नहीं प्राप्त हो पाया जिसका वह सच्चा हकदार था|

मुहम्मद बिन तुगलक की नीतियाँ:

दिल्ली सल्तनत का सबसे ज्यादा विस्तार मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में हुआ उस समय दिल्ली साम्राज्य 23 भागों में विभाजित था जिसके अंतर्गत गुजरात, बिहार, लाहौर, कन्नौज, दिल्ली, उड़ीसा, मुल्तान, कश्मीर, जाजनगर, एवं बलूचिस्तान सम्मिलित थे|

कर वृद्धि एवं सांकेतिक मुद्रा चलवाना:

तुगलक ने दोआब क्षेत्रों के करो में वृद्धि कर दी किन्तु प्रक्रति ने उसका साथ नहीं दिया एवं उस वर्ष अकाल की स्थिति पैदा हो गई जिससे दोआब वसूल करने के लिए जनता को विवश किया गया जिससे जनता में क्रोध पैदा होने लगा|

इसके साथ मुहम्मद बिन तुगलक ने दोकानी नामक मुद्रा का प्रचलन करवाया जिसे सांकेतिक मुद्रा भी कहा जाता है एवं इसी कृत्य के लिए तुगलक को सबसे ज्यादा अपमान झेलना पड़ा| उसने ताम्बे एवं पीतल के सिक्के चलवा दिए जिनकी कीमत चांदी के सिक्को के बराबर मानी जानी थी|

इस योजना के बाद लोगों ने घरों में ही नकली टकसाल बनानी आरम्भ करदी एवं जल्द ही उसे रद्द कर दिया गया|

राजधानी परिवर्तन:

इसने दिल्ली से अपनी राजधानी को देवगिरी में परिवर्तित कर दिया जिसका नाम इसने कुतुबबाद रखा एवं इस कार्य के लिए भी इसे काफी आलोचना झेलनी पड़ी|  

मृत्यु:

गुजरात में चल रहे विद्रोह को खत्म करके सिंध की और बढ़ते हुए रास्ते में सुल्तान गंभीर रूप से बीमार होंने के कारण मार्च 1351 को मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु हो गई|

फिरोजशाह तुगलक 1351-1388:

फिरोजशाह तुगलक भी तुगलक वंश का अच्छा शासक माना जाता है एवं यह 45 वर्ष की उम्र में दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बना| इसने शरियत के नियमो को राज्य में लागू किया एवं सभी अनावश्यक करों को खत्म कर दिया|

फिरोजशाह तुगलक के महत्वपूर्ण कार्य:

4 करों को छोडकर फिरोजशाह ने 24 करों को खत्म कर दिया| सिंचाई पर सुल्तान ने केवल एक कर लगाया जो उपज का 1/10 भाग वसूलना था|

किसानों को सिंचाई में दिक्कत न ही इसलिए इसने 5 बड़ी नहरों का निर्माण करवाया एवं 1200 उद्यानों का निर्माण करवाया|

नये नगर बनाये गये एवं एक सरकारी अस्पताल का निर्माण करवाया गया जहाँ मुफ्त चिकित्सा प्रदान करवाई जाती थी|

इस समय दास प्रथा का काफी प्रचलन था एवं दासों की संख्या 2 लाख के पास पहुँच गई थी| केवल दासों की देखभाल हेतु ‘दीवान-ए-बन्दगान’ की स्थापना की गई|

गरीब लाचार एवं विधवा महिलाओ के लिए ‘दीवान-ए-खैरात’ नामक समुदाय की स्थापना की गई जो हर तरह से उनकी सहायता करता था|

सम्राट अशोक द्वारा स्थापित शिलालेखों को दिल्ली में लाकर स्थापित किया गया एवं आन्तरिक व्यापार को बढ़ाने हेतु कई योजनाये बनाई गई|

मृत्यु:

सितम्बर 1388 में फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु हो गई एवं इसकी मौत के बाद मोहम्मद खान दिल्ली की गद्दी पर बैठा किन्तु वह अधिक समय तक शासन नहीं कर पाया एवं जल्द ही उसकी हत्या कर दी गई|