क्या होता है इन्द्रधनुष?

प्रकृति के सबसे अद्भुत नज़ारो में से इंद्रधनुष संभवतः सबसे अनूठा है। अधिकतर वर्षा के पश्चात् दिखाई देने वाला ये विहंगम दृश्य हमेशा पुलकित कर देता है। इसके पीछे का विज्ञान भी इसके जितना ही विलक्षण और चकित कर देने वाला है। इंद्रधनुष की स्थिति सूर्य की स्थिति के अनुसार बदलती है। इंद्रधनुष संध्या में पूर्व दिशा तथा प्रात:काल में पश्चिम दिशा में दिखाई देते हैं।

इसमें दिखाई देने वाले क्रमशः लाल, नारंगी, पीले, हरे, आसमानी नीले, नीले, तथा बैंगनी रंग श्वेत प्रकाश के घटक हैं। इंद्रधनुष की रचना दरअसल केवल प्रकाश किरणों का खेल मात्र है। आधुनिक समय में रेने डेकार्टे नाम के फ्राँसिसी वैज्ञानिक ने प्रकाश के सिद्धांतों के आधार पर इंद्रधनुष की प्रक्रिया को समझाया था।

जब सूर्य का श्वेत प्रकाश बादलों में मौजूद जल की अति सूक्ष्म बूँदों पर पड़ता है तो सूर्य की किरणों का विक्षेपण या डिस्पर्शन हो जाता है। और यही इंद्रधनुष की रंगीन छटा का कारण बनता है। वर्षा के बाद हवा में जल की सूक्ष्म बूँदें रह जाती हैं। इसलिए जब वर्षा के तुरंत बाद सूर्य दिखाई देता है तो उसकी किरणें इन बूंदों से अपवर्तित तथा परावर्तित होने लगती हैं। और इसी से उत्पन्न हुई विक्षेपण की स्थिति में इंद्रधनुष दिखाई देता है।

इंद्रधनुष के दिखाई देने के लिए, सूर्य की स्थिति दर्शक के ठीक पीछे होनी चाहिए। और इसीलिए संध्या में जब सूर्यास्त के समय सूर्य पश्चिम में होता है, तब इंद्रधनुष पूर्व में और इसी तरह सूर्योदय के समय पश्चिम में दिखाई देता है।

कभी कभी खेत खलीहानों में चलने वाले पानी के स्प्रींकलरों और तेज़ धूप में पानी के पाइपों के मुँह पर भी छोटे छोटे इंद्रधनुष दिखाई दे जाते हैं। रंगों के वृतों का आकार या चौड़ाई हवा में मौजूद जल की बूँदों के छोटे या बड़े आकार के कारण होती है।

इसका सिद्धांत भी वर्षा की बूंदो जैसा ही है। विभिन्न मौसमी कारणों और सूर्य की स्थिति अनुसार तीन तथा चार आंतरिक परावर्तन से भी इंद्रधनुषों का बनना संभव है। परंतु ऐसे इंद्रधनुष कभी कबार ही दिखाई देते हैं। सूर्य के बादलों में छिपे रहने पर भी इंद्रधुनष दिखयी देते हैं, पर ये सदैव सूर्य की दिशा में ही होते हैं, उसके उलट नहीं।

एक और सम्भावना चन्द्रमा की किरणों के विक्षेपण से भी इंद्रधनुष बनने की है। ऐसा तब होता है जब जल की सूक्ष्म बूंदों से चन्द्रमा की तीव्र किरणों का विक्षेपण सूर्य की ही तरह हो। ऐसा अपेक्षाकृत उन अँधेरे इलाकों में देखा जा सकता है जहां कृत्रिम प्रकाश का अभाव हो।


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