मानव को ज्ञात सबसे कठोर, सबसे बहुमूल्य, और शायद सबसे आकर्षक तत्वों में हीरों का स्थान सबसे पहला है। क्या आप जानते हैं की केवल एक हीरा ही दुसरे हीरे पर निशान छोड़ सकता है? क्या आप जानते हैं की हीरे 1300 डिग्री सेल्सियस तक के उच्च तापमान को भी बिना किसी नुक्सान के आसानी से झेल जाते हैं?

हीरे की रचना की शुरुआत धरती के मेंटल नाम की परत में होती है। इस परत यानि मेंटल का तापमान 2000 से 7000 डिग्री फैरनहाइट तक गर्म हो सकता है। हज़ारों डिग्री फारेनहाइट के तापमान और बेशुमार दबाव के इस वातावरण में कार्बन के कण आपस में श्लेषित होने या जुड़ने लगते हैं। और यही चिपके हुए कण धीरे धीरे, यानि कई हजार वर्षों के लम्बे समय में, पहले छोटे छोटे क्रिस्टल, और फिर बड़े होते होते हीरों का रूप ले लेते हैं।

हालाँकि हीरे बहुत सुन्दर और सौम्य दिखयी देते हैं, ये काफि कठोर बल्कि प्रकृति में पायी जाने वाली सबसे कठोरतम वस्तुओं में से सबसे पहले हैं। उचित ही है के अंग्रेज़ी शब्द डायमंड मूलतः ग्रीक भाषा से आया है जिसमें इसका अर्थ ‘अविजित’ या ‘न जीता जा सकने वाला’ है।

धरती की गहराईयों से ये बहुमूल्य हीरे क्रस्ट यानि सतह तक पहुँचने के लिए भी काफी लम्बा सफर तय करते हैं। धरती की गहराइयों से उठने वाले ज्वालामुखीय उद्भेदनों के दौरान ये हीरे धीरे धीरे खिसकते हुए, ऊपर आते रहते हैं, और आंतरिक स्खलन के साथ साथ धरती की सबसे ऊपरी परत तक पहुँच जाते हैं, और यहां किसी न किसी खदान में ढूंढ लिए जाते हैं।

इन खदानो को किम्बरलाइट और लैमपोराइट पाइप भी कहा जाता है, और हीरे के व्यापारी और खोजी सदैव इनकी खोज में रहते हैं। हीरे हमारी दुनिया में लाखों वर्षों से हैं। कार्बन डेटिंग की तकनीक से जांचे गए सभी नमूनों में सबसे पुराना हीरा लगभग 32 करोड़ साल पुराना पाया गया है।

यद्यपि सभी तरह के साहित्य में और संसार की सभी संस्कृतियों में भी हीरों को बहुमूल्य समझा जाता है, इनका धन के रूप में इस्तेमाल कुछ ही शताब्दियों से शुरू हुआ है, भारत और पूर्वी सभ्यताएं चिरकाल से ही बहुमूल्य रत्नों का इस्तेमाल करती आयी हैं, और यहां सोने के अलावा हीरे बहुत लम्बे समय से संपत्ति के सूचक रहे हैं। कई प्राचीन सभ्यताओं के अवशेषों में हीरे पाए गए हैं, और ऐसा माना जाता है के लगभग सभी संस्कृतियों ने हीरों के इन गुणों को पहचान कर इनका मूल्याङ्कन काफी बढ़ा चढ़ा दिया है ।