सूक्ष्मदर्शी में लगे लेंस में ही ऐसी क्षमता पायी जाती है, जिससे अति सूक्ष्म वस्तु को आसानी से देख पाना सम्भव होता है।

वैसे तो अलग-अलग प्रकार के सूक्ष्मदर्शी पाये जाते हैं। परन्तु मुख्य रूप से-

किसी भी सूक्ष्मदर्शी का प्रयोग प्रत्यक्ष रूप से न दिखाई देने वाली अत्यन्त छोटी वस्तु या सूक्ष्म जीव या जीव-संरचना को स्पष्ट रूप से देखने के लिए किया जाता है।

सूक्ष्मदर्शी में मुख्य रूप से अवलोकन हेतु धातु की एक गोल व लम्बी नली लगी होती है। इस नली के एक तरफ उत्तल लेंस लगा होता है, जिसे अभिदृश्यक लेंस कहा जाता है। यह कम फोकस दूरी वाला छोटा लेंस होता है। उस नली के दूसरी तरफ एक अन्य नली जुडी हुई होती है, जिसके दूसरे भाग पर भी एक उत्तल लेंस लगा होता है, इसे नेत्रिका या अभिनेत्र लेंस भी कहा जाता है। यह अधिक फोकस दूरी वाला बड़ा लेंस होता है।

सूक्ष्मदर्शी के संरचना में यह विशेषता पायी जाती है कि एक नली के साथ जुड़ी हुई दूसरी नली को इसके भीतर ही अंदर या बाहर अर्थात् छोटा-बड़ा करने की सुविधा होती है। साधारण शब्दों में, सूक्ष्मदर्शन के दौरान अपनी सुविधानुसार अभिदृश्यक लेंस व अभिनेत्र लेंस के मध्य पायी जाने वाली दूरी में समायोजन किया जा सकता है।

अभिदृश्यक व अभिनेत्र लेंस के बिना सूक्ष्मदर्शी का कोई अस्तित्व नही रह जाता, क्योंकि इन दोनों लेंस के कारण ही न दिखाई पड़ने वाली वस्तुओं या जीवों को वृहत् रूप में देखना सम्भव हो सकता है।

इनके अलावा इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी व परमाण्विक बल सूक्ष्मदर्शी की संरचना में ऐसे किसी लेंस का उपयोग नही किया जाता। इनमें विद्युत धाराओं के माध्यम से सूक्ष्म वस्तु या जीवों के चित्रण द्वारा अवलोकन किया जाता है। इनमें सुक्ष्मदर्शन हेतु विद्युत तरंगों की मुख्य भूमिका होती है|