संसार की प्राचीन सभ्यताओं में से एक मानी जाने वाली सिन्धु सभ्यता का अपना विशेष महत्त्व है एवं सिन्धु नदी के किनारे बसे होने के कारण इसका नाम सिन्धु घाटी सभ्यता पड़ा एव इसे “Indus Civilization” भी कहा जाता है|

इसका काल 2300 ईसापूर्व से 1700 ईसापूर्व माना गया है एवं सर्वप्रथम इसकी खोज का श्रेय “राय बहादुर दयाराम साहनी” को दिया जाता है, जिन्होंने इसका पता लगाया था|

इसके प्रमुख केन्द्रों की सूची में धोलावीरा, राखीगडी, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल, एवं मोहनजोदड़ो आदि सम्मिलित है|

रेडियो कार्बोन C14 विधि द्वारा इसका काल 2350 ईसापूर्व से 1750 ईसापूर्व माना गया है जो सभी विशेग्यो द्वारा मान्य समय है एवं इस सभ्यता को Pre-historic श्रेणी में रखा गया है|

सिन्धु घाटी सभ्यता एक विकसित एवं विशाल सभ्यता रही है एवं खुदाई के दौरान मिले अवशेष एवं उस समय के नगर-निर्माण की कला वहा के लोगों की समझ एवं बुद्धिमता को भली भांति दर्शाती है|

इसी काल में सबसे पहले कांस्य धातु का इस्तेमाल किया गया इसलिए इसे कांस्य सभ्यता युग भी कहा जाता है किन्तु लोहे के प्रयोग के कोई निशान नहीं मिले|

सिन्धु सभ्यता का नगर निर्माण कार्य:

आयताकार खंडो में बंटे हुए सिन्धु सभ्यता के मकान अत्यंत विशाल एवं सुसज्जित थे|

यहाँ के मकान एक जाल की तरह फैले हुए एवं एक दूसरे को समकोण पर मिलते हुए थे|

मोहनजोदड़ो एवं हडप्पा में खुदाई के दौरान विशाल स्नानघर एवं इमारते मिली है जो उस समय के वैभव एवं प्रतिष्ठा का प्रतीक है|

मोहनजोदड़ो में अब तक मिला सबसे विशाल स्नानघर आकार में 11.88 मी. लम्बा, 2.43 मी. गहरा, एवं 7.01 मी. चौड़ा है| ऐसा माना गया है कि यह जगह किसी विशेष धार्मिक रिवाज के लिए प्रयुक्त की जाती होगी, इसके साइड में एक बड़ा कुआँ, एवं कपड़े बदलने की अलग से जगह निर्मित की गयी है|

विशाल स्नानघर के साथ यहाँ अनाज रखने के लिए 45.71 मी. लम्बा एवं 15.23 मी. चौड़ा विशाल गोदाम मिला है|

इसके साथ-साथ नगर की खुदाई के दौरान यह भी पता लगा कि प्रत्येक घर में अलग कुँए होते थे एवं भवन निर्माण पक्की ईंटो द्वारा किया जाता था, सड़के भी पक्की होती थी एवं नालियों को बड़ी-बड़ी सिल्लियों से ढक कर रखा जाता था|

सिन्धु सभ्यता का आर्थिक जीवन एवं कृषि:

सिन्धु घाटी सभ्यता कृषि प्रधान सभ्यता रही थी एवं पशुपालन भी आम था किन्तु घोड़े रखने का प्रमाण कही नहीं मिला|

मिटटी काफी उपजाऊ थी एवं वर्षा पर्याप्त मिलने के कारण फसले अच्छी होती थी एवं वहाँ के लोगों का कृषि ज्ञान भी प्रचुर था|

सिन्धु नदी में हर वर्ष बाढ़ आती थी एवं उससे निपटने के लिए सिन्धु लोग अनेक प्रयास करते थे|

ये लोग मिटटी के बर्तन बनाने में अत्यधिक कुशल थे जिसका पता खुदाई में मिले विभिन्न प्रकार के भांड से मिलता है|

चित्रकारी में भी सिन्धु लोगों की विशेष रूचि रही होगी क्योकि कई शिलाओं पर जानवरों की एवं पेड़-पौधों की आकृतिया उकेरी गई है|

यहाँ शहद का इस्तेमाल करना भी आम था एवं प्राक्रतिक मिठास पाने हेतु शुद्ध शहद का प्रयोग किया जाता था|

सिन्धु घाटी के लोग यातायात के लिए बैलगाड़ी का प्रयोग करते थे|

यहाँ मातृदेवी की पूजा के सबूत मिलते है एवं एक नृतकी की कांस्य का मूर्ति मिलना यह दर्शाता है कि नारी को उच्च स्थान प्राप्त था|

इसके साथ शिव पूजा एवं सूर्य पूजा के प्रमाण भी मिले है किन्तु कही भी कोई मंदिर नहीं मिला|

दीवारों पर कूबड़ वाले सांड के चित्र पाए गये है जो शायद इन लोगों के लिए पवित्र रहा होगा|

सिन्धु लोग शिकार करना, मछली पकड़ना, एवं अन्य खेल मनोरंजन के लिए खेलते थे|

कही ज्यादा हथियार नहीं मिले इसका अर्थ है कि हिंसा को पसंद नहीं किया जाता था|