साईकिल एक साधारण सा वाहन है, जिसे चलाने के लिए न तो पेट्रोल-डीजल या अन्य किसी ईंधन की आवश्यकता पड़ती है और न ही इसमें कोई मशीनरी होती है। यूँ तो साईकिल का आविष्कार कई सौ साल पहले 19वीं सदी में ही हो गया था, पर तब भिन्न-भिन्न सरल रचना वाली साईकिल का निर्माण किया गया था। धीरे-धीरे साईकिल के प्रारूप व संरचना में कई तरह के बदलाव आते गए तथा साईकिल का विकास होता गया।

19वीं व 20वीं सदी की शुरुआत व मध्य तक तो साईकिल का प्रयोग बहुतायत से होता था, परन्तु 20 वीं सदी के अन्त में तथा 21वीं सदी के शुरू होने पर धीरे-धीरे साईकिल का उपयोग होना कम हो गया। इसका कारण यही था कि अन्य मशीनरी युक्त वाहन जैसे कार व मोटरसाइकिल का प्रचलन चल पड़ा था और कहीं कुछ नौजवानों में साईकिल के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण भी पनपने लगा।

आइए अब साईकिल के आविष्कार की कहानी के बारे में बात करते हैं।

जर्मनी में सन् 1816 में फ़्रांस के रहने वाले एक आविष्कारक “जिन थेसन” ने साईकिल की तरह ही लगने वाले एक वाहन का निर्माण किया, जिसमें चार पहिये होते थे तथा इसे चलाने के लिए इन्सान को खुद चलना व दौड़ना पड़ता था। इस बात से यह अंदाजा लगाया ही जा सकता है कि इसे चलाना अत्यन्त कठिन कार्य रहा होगा।

सन् 1817 में “कार्ल डरेस” ने “डेण्डि हॉर्स” नाम की एक साईकिल जैसे वाहन का आविष्कार किया था। इसमें आगे-पीछे पहिये लगे होते थे। इसे गति देने के लिए इसपर बैठने वाले व्यक्ति को अपने पैरों से जमीन पर धक्का देना पड़ता था तथा फिर उस वाहन के आगे बढ़ने के साथ अपने पैर हवा में उठाने पड़ते ताकि रगड़ न लग सके तथा बार-बार इसी प्रक्रिया का दोहराव किया जाता। 

वर्तमान समय में जिस प्रकार की साइकिल का उपयोग किया जा रहा है, उसके आविष्कारक का नाम है- “किर्कपेट्रिक मैकमिलन।” इन्होंने सन् 1839 में आधुनिक साईकिल का मॉडल तैयार किया था।

सर्वप्रथम मैकमिलन के द्वारा ही लोहे की तारों वाले पहिये, लकड़ी के पैडल तथा हैंडल से समायोजित की जाने वाली साईकिल का निर्माण किया गया था।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि मैकमिलन द्वारा साईकिल का आविष्कार करने से पहले भी साईकिल जैसे ही दिखने वाले कुछ दुपहिया वाहनों का आविष्कार किया जा चुका था।

1863 में “पियरे लेलमेंट” ने एक साईकिल जैसी दिखने वाली मशीन का आविष्कार किया। यह साईकिल वर्तमान में चलने वाली साईकिल की भांति थी। इसमें ख़ासियत यह थी कि गति देने के लिए पैडल जोड़े गए थे। पियरे को भी पैडल युक्त साईकिल का आविष्कारक माना जाता है।

सन् 1866 में साईकिल की बनावट में अतिरिक्त परिवर्तन करते हुए ‘वेलोसिपिडे” नाम की एक साईकिल निर्मित की गयी, जिसके आगे वाले पहिये का आकार पीछे वाले पहिये की तुलना में अधिक बड़ा कर दिया गया था। इस आविष्कार में आर्थिक तौर पर बहुत कार्य किया गया, परंतु पहिये के बड़ा होने के कारण चालक को इसपर बैठना तथा चलाना कष्टदायी होता था। अतः यह आविष्कार ज्यादा समय तक चल नही पाया।

सन् 1885 में “जॉन केम्प स्टारले” द्वारा “रोवर सेफ्टी साईकिल” बनाई गयी थी।  यह एक समान आकार के दो पहियों वाली साईकिल थी। दोनों पहियों की गतिशीलता को जोड़ने के लिए इसमें चेन भी लगाई गयी थी। सन् 1895 में इन्होंने अपने से पूर्व निर्मित साईकिल में हुई खामियों तथा उससे होने वाली परेशानियों को ख्याल में रखते हुए नई विशेषताओं व डिजाइन वाली अलग-अलग साईकिल का भी आविष्कार किया था।

सन् 1890 “सेफ्टी बाइक” नाम की साईकिल का आविष्कार सामने लाया गया था। इसका ऐसा नाम रखने का एकमात्र कारण यही था कि चालन की दृष्टि से यह काफी सुरक्षा प्रदायी थी। 

सन् 1893 में “फ्लायर” नाम की एक साधारण सी साईकिल का प्रारूप भी पेश किया गया था।

नवयुवकों व नवयुवतियों में साईकिल को लेकर निम्न धारणा बनने लगी, जिससे साईकिल के प्रयोग में काफी कमी आई। यह दौर कुछ समय तक जारी रहा, परन्तु आज के समय में बीते 3-4 वर्षों में साईकिल चलाने का दौर लौट कर आ गया है। नौजवानों में फिर से साईकिल चलाने की प्रवृति व शौक पैदा ही गया है तथा झिझक खत्म हो गयी है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि साईकिल चलाना उत्तम स्वास्थ्य के लिए एक कारगार उपाय है। साईकिल से पूर्ण शारीरिक क्रिया होती है।

इसे हम व्यायाम का एक साधन भी कह सकते हैं। साईकिल चलाने के दौरान चालक के पैर  पैडल मारने के कारण लगातार घूमते है तथा इसमें शारीरिक ऊर्जा भी लगती है और कसरत भी हो जाती है। इससे शरीर के निचले भाग में रक्तप्रवाह उचित रूप से होता है तथा नसों व मांसपेशियों में भी मजबूती आती है।

इस प्रकार समय व्यतीत होने के साथ साईकिल के नए-नए आविष्कार होते गए। हर विकास की सीढ़ी में साईकिल के अलग-अलग आविष्कारक सामने आये, जिन्होंने अपनी साईकिल की रचना को विश्व के सामने प्रस्तुत किया। आज बाज़ार में प्रत्येक के शौक, पसन्द व जरूरत के अनुसार कई तरह की साईकिल उपलब्ध हो जाती है|