असहयोग आन्दोलन के असफल होने के बाद अंग्रेजों को यह भली भांति समझ आ गया कि भारतीय जनता अब उनसे नाराज है अत: 1927 ई. में गाँधी जी को उस समय के वायसराय लार्ड इरविन ने दिल्ली आमंत्रित किया जिसमे उसने यह खुलासा किया कि ब्रिटिश सरकार भारत में कुछ क़ानूनी सुधार लाना चाहती है जिसके अंतर्गत एक कमीशन बनाया गया है जिसका नेतृत्व ‘सर जॉन साइमन’ द्वारा किया जायेगा इसलिए इसका नाम साइमन कमिशन रखा गया|

इस कमीशन में केवल ब्रिटिश सदस्य थे जो ब्रिटेन के संसंद के निर्वाचित लोग थे| भारत से जुडी वैधानिक समस्याओं को हल करने के लिए इसका प्रावधान बनाया गया किन्तु एक भी भारतीय को इसमें शामिल नहीं किया गया जिससे इसके भारत में आते ही इसका हर वर्ग द्वारा जबर्दस्त विरोध किया गया|

सभी ब्रिटिश सदस्य सम्मिलित होने के कारण इसको ‘श्वेत या सफ़ेद कमीशन’ भी कहा जाता है जिसमे कुल सात सदस्य थे|

क्या थे कारण साइमन कमीशन के भारत आने के?

ब्रिटिश सरकार का यह कहना था कि उन्होंने साइमन को इसलिए भारत भेजा है ताकि भारत की प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारा जा सके किन्तु इसके पीछे वास्तविक मंशा कुछ और लग रही थी क्योकि 1919 के अधिनियम के समय सरकार ने दस वर्षो के बाद आयोग स्थापना की बात कही थी जिसके चलते 1931 ई. में वैधानिक सुधार का प्रावधान लाया जाना था जबकि साइमन कमीशन 1927 ई. में ही घोषित कर दिया गया|

इसके अलावा ब्रिटेन की सरकार भारत में होने वाले दंगे एवं विद्रोह से भयभीत होने लगी थी जिसे दबाने के लिए साइमन कमीशन के नाम पर एक भुलावा भेजा गया|

ब्रिटेन में 1929 का समय वोट का था अत: उन्हें यह भय था कि यदि मजदूर वर्ग जीत गया तो भारत पर उसका अधिकार चलेगा|

साइमन कमीशन की घोषणा के बाद की स्थिति:

साइमन कमीशन की घोषणा के पश्चात् भारत के हरेक वर्ग में आक्रोश एवं गुस्सा फ़ैल गया| कांग्रेस ने भी मद्रास अधिवेशन में साइमन कमीशन का हर तरफ से बहिष्कार करने का निर्णय लिया|

हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग, एवं अन्य संस्थाओं ने भी इस कमीशन की किसी शर्त को नहीं माना एवं पूर्णत: इसे अस्वीकार कर दिया|

भारत में जगह-जगह ‘साइमन गो बेक’ के नारे लगने लगे एवं लोगों ने काले झंडे दिखाकर अपना रोष प्रकट किया| इन्ही संघर्षों के दौरान एक विशाल जूलुस निकला गया जिसका नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे एवं पुलिस ने उनपर तेजी से लाठियां बरसानी शुरू करदी जिससे मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई|

लालाजी की हत्या से आक्रोशित होकर क्रांतिकारी भगतसिंह एवं उनके एक साथी बटुकेश्वर दत्त ने कोर्ट में बम फेंका एवं लालाजी की मौत के लिए जिम्मेदार ब्रिटिश जवान सांडर्स को दिन दहाड़े गोली मारदी|

सम्पूर्ण भारत विद्रोह एवं आदोलन की अग्नि से जल उठा था एवं अनेकों हत्याए की गई| विद्रोह को दबाने का पूरा प्रयास किया गया किन्तु वह असफल रहा|

इतने भयंकर विरोध के बाद भी साइमन कमीशन ने 1930 ई. में अपनी रिपोर्ट पेश की| जो इस प्रकार थी:-

रिपोर्ट में यह कहा गया कि सभी भारत के सभी प्रान्तों में द्वैध शासन खत्म करके इसे मंत्रियों के हवाले कर दिया जाए|

अधिक से अधिक भारतीय जनता को मत देने का अधिकार प्राप्त हो एवं प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली को अपनाया जाये|

भारत में संघीय शासन को लागू करके प्रान्तों को स्वतंत्र शासन लागू करने का अधिकार दिया जाए|

कमीशन ने यह भी मांग की कि व्यवस्थापिका को फिर से गठित किया जाए जिसमे संघ एवं देशी रियासतों के सदस्य शामिल किये जाए| साइमन कमीशन ने भारत के शासन एवं संविधान से सम्बंधित समस्यों को तो प्रकाशित कर दिया किन्तु उस समय जनता जिस तरह आजादी को लेकर आक्रोशित थी उस सम्बन्ध में कोई भी प्रावधान नहीं दिया जिससे इसका केवल विरोध हुआ|