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सहोपकारिता को साधारण भाषा में सहजीवन भी कहा जाता है। सहोपकारिता के अंतर्गत जीव-जन्तु, एवं पेड़ पौधे आपसी सांझेदारी से एक दूसरे के साथ निवास करते है। वे एक दूसरे के साथ स्थान, भोजन, और दूसरी आवशयक वस्तुओं का आदान-प्रदान करते है, इसके साथ ही वे एक दूसरे की सुरक्षा एवं स्वास्थ्य का भी ध्यान रखते है।

सहोपकारिता या सहजीवन को हम उदाहरण के रूप में भली-भांति समझ सकते है, जैसे कि:-

  • लाइकेन नामक एक पौधा जो विशाल वृक्षों, चट्टानों, एवं प्राचीन दीवारों पर पाया जाता है, जिसमे विभिन्न प्रकार के कवक एवं शैवाल आपसी समझ से सहजीवी बनकर निवास करते है। वे एक जगह पर रह्ते और बढ़ते हुए आपस में निवास स्थान, सुरक्षा एवं भोजन का आदान-प्रदान भी करते है।
  • बहुत बार सहोपकारिता के अंतर्गत कुछ जीव अपने साथी के शरीर के अंगो की सफाई का कार्य करते है। रैसे(wrasse) मछली इसका एक अच्छा उदाहरण है, ये मछली, समुंद्र में विशाल शिकारी जीवों के शरीर पर से पैरासाइट और डेड स्किन सेल्स को खा जाती है, हालाँकि इसमें खतरा भी रहता है।
  • बहुत प्रकार के सहजीवी जीव, सहोपकारिता के अंतर्गत प्राणियों के आहार नली एवं पाचन कोशिकाओ में रहते है, और भोजन और अन्य अपशिष्ट पदार्थो को पचाने में सहायता करते है। दीमक इसका एक अच्छा उदाहरण है, दीमक के शरीर में इफुन्सोरिया नामक जीवाणु रहते है, जो लकड़ी जैसे पदार्थ को पचाने में मदद करते है, इन जीवाणुओं के बिना दीमक का कोई अस्तित्व नहीं है।

सहोपकारिता में पारस्परिक मेल-जोल और आन्तरिक निर्भरता की महत्वपर्ण भूमिका होती है।