अनेक बार ऐसा देखा जाता है की ठन्डे प्रदेशों में पानी के पाइप गहरी ठण्ड के मौसम में फट जाते हैं। इसका सीधा सा कारण पानी अणुओं की संरचना है। पानी जब ठण्ड के कारण जम जाता है तो अपने तरल व्यास से कुछ ज़्यादा फैलता भी है। इसका सीधा सीधा दबाव पाइप की दीवारों पर पड़ता है। जब ये दबाव पाइप की क्षमता से बाहर, तो ज़ाहिर है, के पाइप फट जाता है।

हम अपने चारों ओर पानी को देखते ही हैं और इसीलिए पानी की ये प्रवृत्ति हमें शायद उतनी अजीब न लगती हो परन्तु, जम जाने पर फैलने की पानी की प्रवृत्ति एक रासायनिक विचित्रता ही है। अधिकतर तरल पदार्थ जमने पर फैलते नहीं, और हमारी आधुनिक दुनिया की अनेक संरचनायें इसी बात पर निर्भर भी करती हैं।

किसी तरल पदार्थ के अणु ठन्डे हो जाने पर धीमे हो जाते हैं। वैज्ञानिक भाषा में, तापमान केवल अणुओं की काइनेटिक ऊर्जा का ही एक माप है। इस तरह धीमा हो जाने से, अणुओं को एक साथ आने का मौका मिलता है, और तरल की सघनता या गाढ़ापन बढ़ जाता है। पानी के साथ भी यही होता है। पानी जब ठंडा होना शुरू होता है तब उसकी सघनता भी तीव्र गति से बढ़ती है, पर ऐसा सिर्फ 3.98 डिग्री सेल्सियस तक ही होता है, उसके बाद पानी फिर से फैलना शुरू करता है।

ठंड में पाइप इसलिए फट जाते हैं क्यूंकि उनके अंदर बेहता हुआ पानी, ठंडा होकर जम जाता है, और पाइप जो इतने लचीले या नरम नहीं होते के इस फैलाव के साथ बदल सकें या तो फट जाते हैं, या जोड़ो पर से अलग हो जाते हैं। ऐसा अधिकतर ऐसे ही प्रदेशों में देखा जाता है जहां तापमान 4 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता हो, या फिर उन पाइप्स के साथ ऐसा होता है जो इंसुलेटेड न हों। पाइप्स के फटने के कारणों के अतिरिक्त इसके प्रभाव भी साधारणतया देखे जा सकते हैं, और दीवारों की सीलन इत्यादि, बिजली की तारों को भी नुक्सान पहुंचा सकती है।

इन्ही बातों को ध्यान में रख कर ऐसी कई जगहों पर पानी की पाइप्स को हीट स्ट्रिप्स से ढका जा रहा है। पानी का बहाव भी जमने की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है। इसलिए पाइप के किसि वाल्व को खोल कर पानी को बहने देने से भी पानी के जमने और पाइप के फटने से बचाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त नए शहरों में इंसुलेटेड पाइप्स का भी काफी इस्तेमाल किया जा रहा है।