खाने की बहुत कम दूसरी चीज़ें ऐसी हैं जो शहद की तरह पौष्टिक और स्वादिष्ट हों। शहद इससे भी बढ़कर, औषधीय गुणों से भी भरा हुआ है। स्वादिष्ट होने के साथ साथ विटामिन-बी, कई तरह के खनिज और साथ ही इसमें एन्टी-ऑक्सिडॆंट्स भी काफी मात्रा पाई जाती है। शहद मानव इतिहास में इस्तेमाल होने वाली सबसे पुरानी दवाइयों में भी गिना जाता है और आज भी इलाज के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है।

शहद दरअसल मधुमक्खियों द्वारा संसाधित फूलों का रस है, जिसे वे अनेक प्राकृतिक एन्ज़ाइम मिला कर अपने छत्तों में सहेज कर रखती हैं। मधुमक्खियाँ ये शहद मूलतः अपने खुद के इस्तेमाल के लिए बनाती हैं और यही उनका मूल भोजन भी है। एक आम आकार के छत्ते में रहनेवाली मधुमक्खियाँ जाड़ों के लिए 10 से 15 किलो शहद पर आराम से जी सकती हैं। लेकिन ग्रीष्म और बसंत ऋतुओं के दौरान यदि मौसम अच्छा हो, तो एक ही छत्ते में लगभग 25 किलो तक शहद पाया जा सकता है। यही अतरिक्त शहद या तो भालू या दुसरे जानवर खाते हैं, या इसे इंसान इकट्ठा कर लिया करते हैं।

मधुमक्खियाँ शहद बनाने के लिए काफ़ी मेहनत भी करती हैं। फूलों को ढूंढ कर पहले अपनी सूंड से उनका रस अपने पेट में भर कर छत्ते तक लाती हैं। और यहाँ इस रस को एक दूसरी श्रेणी की मधुमक्खियों के सामने उगल देती हैं। अब ये मधुमक्खियां इस रस को कई मिनटों तक धीरे धीरे चबा कर अपने मुँह की ग्रंथियों से निकलते हुए एन्ज़ाइमस को इसमें मिलने देती हैं।

यही कच्चा शहद मधुमोम से बने छत्ते के नली जैसे षट्कोणीय खानों में संसाधित होने के लिए भर का छोड़ दिया जाता है। और उसमें से पानी को सुखाने के लिए पंख फड़फड़ाकर धीमी हवा दी जाती है। मधुमक्खियां इस काम में इतनी माहिर होती हैं, के पानी की एकदम सही मात्रा तक पहुँचने तक वे रूकती नहीं, और लगभग 15 से 18 प्रतिशत के बीच तक लाकर इस गाढ़े हो चुके रस को मोम की एक बहुत महीन परत से ढक कर छोड़ देती हैं। इस तरह रखा हुआ ये शहद कई सौ सालों तक भी अपने गुण बनाये रखता है।

शहद से जुड़ा एक प्रसिद्द किस्सा मिस्त्र में सुनाया जाता है जहां एक चोर ने एक पिरामिड में घुस कर काफी धन तो बटोर लिया पर वापिस निकलने का रास्ता भूल गया। कहते हैं की वहाँ उसे बादशाह की कब्र में दफनाया गया शहद से भरा एक 3 हज़ार साल पुराना बर्तन मिला, और सिर्फ उस शहद को ही खाकर वह तब तक जीवित रहा जब तक की दो महीने बाद उसे ढूंढ न लिया गया।