वनस्पति:

जमीन पर प्राकृतिक रूप से किसी जगह पर पैदा हुए पेड़ व पौधे तथा वे पेड़-पौधे जिनकी पैदावार के लिए मानव प्रयत्न की आवश्यकता पड़ती है, इन सबको ही वनस्पति कहा जाता है।

साधारण शब्दों में, सभी पेड़, पौधे, खेतों में उगने वाले या उगाये जाने वाले फूल, पादप आदि वनस्पति में सम्मिलित है। जहाँ ये सब पाये जाते हैं; ऐसे क्षेत्र विशेष को वनस्पतिलोक या वनस्पतिजगत भी कहा जाता है।

वनस्पति को कुछ हिस्सों में वर्गीकृत किया जा सकता है, जैसे- 

प्राकृतिक वनस्पति- इसमें वे सभी वनस्पतियाँ सम्मिलित की जाती है, जो किसी स्थान पर अपने आप उग आती है। इसमें मनुष्य द्वारा कोई प्रयास नही किये जाते, न बीज डाला जाता है, न देखरेख की जाती है। इसके बावजूद भी प्रकृति की गोद में ये स्वतः पैदा होती है। इसी कारण इसे प्राकृतिक वनस्पति कहा जाता है। घास वनस्पति इसका उदाहरण है। घास वनस्पतियाँ प्रचुरता में पायी जाती हैं।

मानव जनित वनस्पति- इसमें वे सभी पैदावार शामिल की जाती है, जिनको उगाने के लिए मनुष्य द्वारा मेहनत की जाती है, प्रयास किये जाते हैं (जैसे-बीज बोना, पानी देना, हल चलाना, कटाई करना आदि) तथा देखरेख की जाती है। इसे मानव जनित वनस्पति कहते हैं। जैसे- कृषि व उद्यान वनस्पति। 

स्थानीय वनस्पति- इसे देशी वनस्पति भी कहा जा सकता है। यह केवल स्थान विशेष पर उगने वाली वनस्पति होती है। यह प्राकृतिक भी हो सकती है और मानव-जनित भी, क्योंकि किसी स्थान विशेष या किसी देश की जलवायु व मिट्टी मे पाये जाने वाले गुणों के कारण ही पैदा होती है।

प्रत्येक जगह (देश व राज्य) में पायी जाने वाली प्राकृतिक भिन्नता व मृदा की उर्वरकता के गुणों की भिन्नता के कारण वनस्पति में भी भिन्नता पायी जाती है।

कवक

कवक को फंफूद भी कहा जाता है। इनमें हरितलवक का अभाव पाया जाता है। इनमें ऊत्तक भी नही पाये जाते हैं। इनमें जनन क्रिया बीजाणुओं के माध्यम से सम्पन्न होती है। ये मृत जीवों व अवशिष्ट कार्बनिक पदार्थों व कचरे आदि को विनष्ट करने में अत्यधिक सहयोगी होते हैं, क्योंकि ये अपमार्जन का कार्य करते हैं।

इनमे सामान्य पादपों की भाँति तना, पत्तियाँ व जड़ आदि नही पायी जाती तथा पर्णहरित न होने के कारण इनमे अपना भोजन स्वयं निर्मित करने की क्षमता नही पायी जाती। ये भिन्न-भिन्न स्त्रोतों से अपने भोजन की पूर्ति करते हैं, जिस कारण इन्हें विविधपोषी भी कहा जाता है।

कवक तीन प्रकार के होते हैं- 

सहजीवी- ये कवक अपने पास की वनस्पति के साथ-साथ पैदा होकर बड़े होते हैं व उन्हीं से अपने भोजन की पूर्ति करते हैं तथा इनका जीवन उसी पर निर्भर करता है। 

परजीवी- ऐसे कवक दूसरे जीव-जन्तुओं व पादपों से अपने भोजन की पूर्ति करते है तथा इनका जीवन दूसरे जीव-जन्तुओं व पादपों की जीवित अवस्था पर निर्भर करता है।

मृतोपजीवी- ऐसे कवक मरे हुए जीव-जन्तुओं एवम् मृत पौधों व सड़े हुए पदार्थों से अपने भोजन की पूर्ति करते हैं|