किसी भी जीव विशेष के जन्म एवं विकास हेतु उसके जनकों के गुणों का महत्वपूर्ण योगदान रहता है| पृथ्वी पर पाए जाने वाले अनगणित जीवों में अनेक प्रकार की विविधता पाई जाती है, जीवो के आपसी अन्तर एवं डी.एन.ए. में उपस्थित मूल अन्तर को विभिन्नता कहा जाता है, जबकि एक ही वंश में उत्पन्न हुए समान जीवों के गति करने के क्रम को वंशागति कहा जाता है|

वंशागत लक्ष्ण एवं वंशागत नियम:

इसके अंतर्गत माता-पिता या जनको से प्राप्त हुए कुछ विशेष लक्षणों का समावेश होता है जो आने वालो पीढियों या संतानों को अपने पूर्वजो से उपहारस्वरूप प्राप्त होते है| कई बार ये लक्ष्ण अच्छे या कई बार कोई विकार भी हो सकते है|

मेंडल, जिन्हें आनुवंशिकी विज्ञानं का पिता कहा जाता है, उन्होंने वंशागति के अंतर्गत कुछ महत्वपूर्ण नियमो का प्रतिपादन किया जिसमे उन्होंने मटर के पौधे को अपने प्रयोग के लिए चुना|

मेंडल के वंशागति के नियम इस प्रकार है:

1# मेंडल के अनुसार वंशागत नियम को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक इसके जनक होते है अत: यह इस बात पर निर्भर करता है कि माता-पिता या जनक अपनी सन्तति में समान रूप से अपने आनुवंशिक गुणों का स्थानान्तरण करते है या नहीं|

2# वंशागत लक्षणों का दूसरा आधार जनक से प्राप्त डी.एन.ए होता है जिससे ये लक्ष्ण काफी हद तक प्रभावित होते है|

3# वंशागत लक्षणों के लिए हरेक सन्तान में दो विकल्प मौजूद रहते है|

वंशागत लक्षणों के प्रकार:

ये मुख्य रूप से दो प्रकार के होते है;

प्रभावी लक्ष्ण:

जनको से प्राप्त जो लक्ष्ण सन्तान में प्रभावी एवं स्पष्ट रूप से दिखाई देते है उन्हें प्रभावी वंशागत लक्ष्ण कहा जाता है| जैसे:- मेंडल के प्रयोग के अनुसार F1 पीढ़ी में लम्बे पौधे T का स्पष्ट रूप से दिखाई देना प्रभावी लक्ष्ण माना जायेगा|

अप्रभावी लक्ष्ण:

जनको से उतराधिकार में मिले जो वंशागत लक्ष्ण छुपे हुए रहते है एवं स्पष्ट दिखाई नहीं देते उन्हें अप्रभावी लक्ष्ण कहा जाता है|

जीनोटाईप लक्ष्ण:

इसके अंतर्गत इसे लक्षणों या सूचनाओं का समूह आता है एक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थान्तरित होता है एवं जिसे बाह्य रूप से देखा नहीं जा सकता किन्तु परीक्षण के द्वारा इसका पता लगाया जा सकता है|

उदाहरण के लिए:

आँखों के रंग एवं बालो की लम्बाई एवं रंग, कद-काठी, एवं विभिन्न प्रकार के आनुवंशिक रोगों हेतु ये लक्ष्ण या गुणसूत्र जिम्मेवार होते है| यदि किसी जीव में इन गुणों का बदलाव करना हो तो जीन्स में परिवर्तन या गुनसुत्रो का पुन; विकास करके यह परिवर्तन किया जा सकता है|

फिनोटाईप लक्ष्ण:

इन लक्षणों के अंतर्गत इसे लक्ष्ण आते है जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते है एवं बिना किसी परीक्षण के इन लक्षणों का पता लगाया जा सकता है| जैसे: आँखों का रंग, एक जैसी आवाज एवं कुछ रोग आदि इसके उदाहरण है|

मेंडल के वंशागति के नियम:

आनुवंशिकता के नियमो का प्रतिपादन करने के साथ-साथ मेंडल ने वंशागति के भी महत्वपूर्ण नियमो का उल्लेख किया है, जो इस प्रकार है:-

.एकल क्रॉस वंशागति एवं विसंयोजन नियम:

इस नियम के अनुसार जीवों के लक्षणों के निर्धारित करने का कार्य उसमे उपस्थित आन्तरिक कारको का होता है जो जोड़ी के रूप में विद्यमान रहते है| आन्तरिक कारक एक युग्मक में एक हे जोड़े के रूप में मौजूद रहते है|

.स्वतंत्र वंशागति का नियम:

इस नियम के अनुसार आन्तरिक कारको की एक से अधिक जोड़ी उपस्थित रह सकती है एवं ये युग्मको में स्वतंत्र रूप से उपस्थित रह सकते है|

विकास या Evolution:

पृथ्वी पर पाए जाने वाले अधिकांश जीव-जन्तु यहाँ तक कि मनुष्य भी विकास के क्रम से गुजर कर आये हुए प्राणियों में से एक है| वर्तमान युग मे दिखाई देने वाले प्राणी किसी समय में जटिल एवं परिस्थति के अनुसार विभिन्न परिवर्तनों द्वारा निर्मित एवं विकसित हुए है, इनमे बदलाव के इसी क्रम को जीवो का विकास या जैव विकास कहा जाता है|

जैव विकास की प्रक्रिया अत्यधिक प्राचीन है, यह जीव विज्ञानं का एक अग्रिम अध्ययन का विषय है, जिसके अंतर्गत जीवों के क्रमिक विकास, उनमे हुए बदलाव एवं उनके पूर्वजो के बारे में जानकारी प्राप्त करना एवं उनका अध्ययन करना सम्मिलित है|

विकास की प्रक्रिया से सम्बन्धित सिदान्त:

जैव विकास से सम्बन्धित प्रक्रिया के उपलक्ष्य में जे.बी. लैमार्क ने सर्वप्रथम अपनी बुक “फिलासोफिक जूलोजीक” में 1809 ई. में प्रस्तुत किया, जिसे आधुनिक समय में उपार्जित लक्षणों का वंशागति सिदान्त या लैमार्कवाद भी कहा जाता है| लैमार्क के समान ही डार्विन ने भी जैव विकास के सम्बन्ध में कई जानकारियों को उजागर किया जिसे डार्विनवाद या प्राक्रतिक जीवों का विकास भी कहा जाता है|

लैमार्कवाद:

फ्रांसिसी वैज्ञानिक लैमार्क ने अपने जैव विकास की जानकारी के सम्बन्ध में यह माना कि जीवो की शारीरिक सरंचना एवं उनके व्यवहार पर वातावरण का काफी योगदान रहता है| वातावरण के अच्छे एवं बुरे प्रभाव के कारण जीवों के देहिक अंगो का प्रयोग कम या ज्यादा हो सकता है, जिससे जिन अंगो का जीव द्वारा ज्यादा उपयोग किया जाता है, वे अंग अधिक प्रभावी, विकसित एवं मजबूत हो जाते है जबकि अन्य अंगो का योगदान कम होने के कारण उनका विकास इतना नहीं हो पाता है| जीवों में अपने अंगों में होने वाले इन्ही बदलावों को लैमार्क ने उपार्जित लक्ष्ण या गुण कहा| उनके अनुसार ये लक्ष्ण वंशागत होते है एवं एक जनको से संतानों में स्थानातरित हो सकते है|

लैमार्क के इन विचारो का कई वैज्ञानिको ने खंडन किया है, उनका मानना है कि कायिक लक्षण जनन कोशिका में परिवर्तन नहीं कर सकते अत: इनका वंशागत स्थानान्तरण सम्भव नहीं हो सकता| उदाहरण के लिए:

जैसे किसी लौहार का हाथ एवं उसकी मांसपेशियों की मजबूती होना स्वाभाविक है किन्तु उसके पुत्र में ये गुण पहले से होंगे यह सम्भव नही हो सकता अत: ये गुण वंशागत नहीं कहे जा सकते|

डार्विनवाद:

डार्विनवाद के नाम से प्रसिद्ध इस सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाले मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक थे, जिन्होंने अलग-२ कार्य करके समान निष्कर्ष निकला, जिसमे से एक का नाम चार्ल्स रोबर्ट डार्विन एवं दूसरे का नाम अल्फ्रेड रस्सेल वेल्स था|

डार्विन ने अपने जैव विकास के सन्दर्भ में अपने विचारों एवं सिद्धांत को अपनी बुक The Origin of Species में प्रकाशित किया है| डार्विन के अनुसार प्रत्येक जीव अपनी संख्या को अधिक से अधिक बढ़ाना चाहता है एवं करीब-२ सभी जीवों में प्रजनन की क्षमता विद्यमान होती है| हर जीव अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने एवं आने वाली पीढियों के विकास के लिए संघर्ष करता हुआ नजर आता है, इसमें से कुछ जीव दूसरे जीवों से कमजोर एवं अप्रभावी होते है, जो संघर्ष की इस दौड़ में हार जाते है|

जिन जीवों में अधिक प्रभावी गुण विद्यमान होते है वही विजेता कहलाते है अत: प्रकृति अपने लिए योग्य एवं प्रभावी जीवों का स्वयं चयन करती है जिससे की विकास का क्रम सतत बना रहे एवं वह कमजोर जीवो को नष्ट कर देती है| इस प्रकार गुनी जीव अपनी संख्या को बढाते हुए प्रक्रति के विकास एवं जैव विकास में अहम भूमिका निभाते है| डार्विन एवं वेल्स दोनों वैज्ञानिको ने इस सम्बन्ध में समान मत प्रस्तुत किये|

डार्विनवाद के पश्चात् नवडार्विनवाद के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया जो डार्विनवाद से सर्वथा भिन्न था|

उत्परिवर्तनवाद:

इस सिद्धांत के अनुसार जीवों के लक्षणों एवं उनमे होने वाले विभिन्न परिवर्तन आकस्मिक एवं स्थायी होते है| इस विचार को देने वाले वैज्ञानिक का नाम ह्यूगोडीब्रिज है, जिसने 1901 ई. में इसे प्रतिपादित किया एवं इसी को नव-डार्विनवाद के नाम से जाना जाता है|

पुनरावर्तन:

इसके अनुसार प्रत्येक जीव अपने पूर्वजो के इतिहास की पुनरावृति करता है, इस सिद्धांत को प्रस्तुत करने वाले वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैकल थे, जो की एक जर्मन वैज्ञानिक थे|