रदरफोर्ड का जन्म 30 अगस्त 1871 को न्यूजीलैंड में हुआ। इनका पूरा नाम अर्नेस्ट रदरफोर्ड था। विज्ञान में अत्यधिक रूचि के कारण इनके द्वारा किये गए प्रयोगों, विधियों व तथ्यों के स्पष्टीकरण के फलस्वरूप इन्हें नाभिकीय भौतिकी के जनक के रूप में जाना जाने लगा।

प्रसिद्ध रसायन विशेषज्ञ अर्नेस्ट रदरफोर्ड  द्वारा सन् 1911 में परमाणु के संरचनात्मक विषय पर प्रतिरूप पेश किया।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सौर मण्डल में केन्द्र भाग में सूर्य केन्द्रक की भाँति स्थित रहता है व बाकी ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते रहते है, उसी प्रकार नाभिक भी केन्द्र भाग में स्थित रहता है व इलेक्ट्रॉन इसके चारों ओर घूमते रहते हैं। इस कारण रदरफोर्ड द्वारा बनाये गए परमाणु मॉडल को “सौर मण्डल प्रणाली परमाणु मॉडल” के नाम से भी जाना जाता है।

अपने प्रयोग में उन्होंने सोने के एक पतली पट्टी पर अल्फा कणों की बौछार कर के यह पाया कि कुछ कण इसके आर-पार होकर इसमें में सीधे गुजरे, कुछ कण इससे टकराकर अपनी चाल से डगमगा कर मार्ग से विचलित हो गए तथा थोड़े से कण इससे टकराकर वापिस आ गए।

अर्नेस्ट रदरफोर्ड द्वारा अपने प्रयोगों द्वारा यह बताया गया कि परमाणु का कुछ भाग खाली (खोखला) होता है, जिसमे से अल्फ़ा कण आर-पार हो जाते हैं।

परमाणु में विद्युत के धन आवेश युक्त कण पाये जाते हैं, जिन्हें प्रोटॉन कहते हैं, जिससे कारण अल्फ़ा कण अपने रास्ते से हट कर रास्ता बदल लेते हैं।

परमाणु का नाभिक कठोर होता है तथा आकार में छोटा होने के कारण कुछ अल्फ़ा कण इससे टकराकर वापिस मुड़ जाते है।

रदरफोर्ड द्वारा परमाणु के मध्य भाग में स्थित केन्द्रक के बारे में भी चर्चा की गयी। परमाणु में पाया जाने वाला विद्युत का धन आवेश एक निश्चित स्थान पर केन्द्रित रहता है, जिसे परमाणु का केन्द्रक या नाभिक कहा जाता है। धनावेशित प्रोटॉन नाभिक में ही मौजूद रहते हैं।

नाभिक परमाणु के मध्य भाग में स्थित होता है, तो स्पष्टतः तुलनात्मक रूप से नाभिक आकार में परमाणु से काफी छोटा होता है। चूँकि नाभिक में प्रोटॉन पाये जाते हैं तो नाभिक विद्युत के धन आवेश से युक्त रहता है।

नाभिक के बाहरी ओर ऋणावेशित कण इलेक्ट्रॉन गतिमान अवस्था में रहते हैं। इलेक्ट्रॉन तीव्रता से नाभिक की परिक्रमा करते रहते हैं।

कमियाँ- विद्युत गति के सिद्धान्त के अनुसार जब कोई विद्युत आवेश वाले कण लगातार गतिशीलता बनाए रखते हैं तो विकिरण प्रभाव के कारण धीरे-धीरे उन कणों की ऊर्जा में कमी आती है तथा गति निम्न स्तर में आ जाती है।

रदरफोर्ड के मॉडल में बताया गया कि नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन निरन्तर घूमते रहते है। विद्युत गति के सिद्धान्त के अनुसार इलेक्ट्रॉन में ऊर्जा की कमी आनी चाहिए तथा कमजोर होकर इलेक्ट्रॉन को नाभिक में प्रवेश कर जाना चाहिए। जिससे ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन की टक्कर धनात्मक प्रोटॉन से होने से इनका स्वयं ही विनाश हो जाएगा। फलस्वरूप परमाणु भी विनष्ट हो जाएगा।

जबकि तथ्य यह है कि परमाणु का इस प्रकार से नष्ट होना असम्भव है।

उपर्युक्त विवरण से यह बात सामने आई है कि रदरफोर्ड के मॉडल में परमाणु के स्थिरता व स्थायित्व के सम्बन्ध में कोई स्पष्टीकरण नही किया गया।

निष्कर्ष- ऊपर दिया गया पूरा व्याख्यान पढ़ने पर निष्कर्ष यह निकलता है कि थॉमसन द्वारा परमाणु संरचना के सम्बन्ध में इलेक्ट्रॉन की स्थिति की तुलना तरबूज या पुडिंग से करने वाली अवधारणा से रदरफोर्ड संतुष्ट नही थे।

अपनी इस असन्तुष्टि को दूर करने के लिए उन्होंने स्वयं प्रयोग किये व परमाणु मॉडल सामने लाये, ताकि परमाणु की संरचना सम्बन्धी कोई अलग से आवश्यक ज्ञान प्राप्त हो सके।

वे इसमें काफी हद तक कामयाब भी रहे। उन्होंने परमाणु में नाभिक की उपस्थिति को स्पष्ट किया तथा प्रोटॉन पर विद्युत के धन आवेश की भी व्याख्या की और इलेक्ट्रॉन द्वारा नाभिक की परिक्रमा करने के तथ्य को भी साबित किया|