मिश्रण के बारे में पूर्व में चर्चा की जा चुकी है। अब मिश्रण के प्रकार के बारे में भी व्याख्या की जानी चाहिए। मिश्रण दो प्रकार के होते हैं-
# समांगी या समांग मिश्रण
# असमांगी या असमांग या विषमांग मिश्रण

समांग मिश्रण

समांग मिश्रण वे होते हैं जिनमें एक से ज्यादा तत्व या यौगिक एक दूसरे में इस प्रकार समा जाते हैं कि उनको प्रत्यक्ष रूप से देखा नही जा सकता है।
इनमेँ पाये जाने वाले विभिन्न अवयव आपस में समाहित होकर एक ही अंग बन जाते हैं, जिस कारण उनकी अलग-अलग रूपों में पहचान नही की जा सकती। समांग मिश्रण में पाये जाने वाले तत्वों के गुणों का प्रत्येक अंश में एक ही स्वरुप हो जाता है अर्थात् विलयन के प्रत्येक अंश में तत्व की सान्द्रता एक जैसी होती है।

इसमें अलग अलग तत्वों का भौतिक रूप से विभाजन करना सम्भव नही होता है।
जैसे- चीनी और पानी का घोल। इसमें चीनी विलेय पदार्थ है और पानी विलायक है। जब ये आपस में घुल जाते है तो यह चीनी और पानी का विलयन बन जाता है व घुलने के बाद चीनी के कणों को देखा नही जा सकता। अर्थात् पानी के भीतर चीनी पूरी तरह से घुल कर ये दोनों एक अंग बन जाते है, तो ये समांग मिश्रण कहलाते हैं।

कणों के आकार के आधार पर विलयन को समांगी मिश्रण में सम्मिलित किया जाता है।

विलयन

इसमें कण अत्यन्त छोटे होते हैं व हल्के होते हैं। इन्हें प्रत्यक्ष आँखों से देखना तो असम्भव है ही व साथ में साधारण माइक्रोस्कोप से भी इन्हें नही देखा जा सकता।

विलयन भी तीन प्रकार के होते हैं-
संतृप्त विलयन- इसमें निश्चित मात्रा में विलेय एक निश्चित तापमान तक ही विलायक में घुल सकता है। जब तापमान को स्थाई रखा जाए और विलेय की मात्रा को बढ़ाया जाए तो वह घुलना बन्द हो जाता है। इसे ही संतृप्त विलयन कहते हैं।

असंतृप्त विलयन- इसमें विलायक का तापमान बढ़ाकर उसमे विलेय की मात्रा भी बढ़ाई जा सकती है और वह घुलनशीलता कायम रखता है। इसमें तापमान स्थाई नही रख सकते। इसे असंतृप्त विलयन कहते हैं।

अतिसंतृप्त विलयन- संतृप्त व असंतृप्त के बाद एक स्थिति ऐसी आती है कि तापमान बढ़ाये जाने के बाद भी उसमें विलेय का घुलना बन्द हो जाता है। इस स्थिति में विलेय व तापमान दोनों को नही बढ़ाया जा सकता है। इसे ही अतिसंतृप्त विलयन कहते हैं।

उपर्युक्त उदाहरण में चीनी एक ठोस द्रव्य(पदार्थ) है और पानी तरल, परन्तु मिश्रण में विलेय व विलायक में एक का ठोस व दूसरे का द्रव (तरल) होना आवश्यक नही हैं। विलेय किसी भी अवस्था ठोस, द्रव और गैस में हो सकता है, उसी प्रकार विलायक भी ठोस, द्रव या गैस के रूप में हो सकता है।

असमांगी मिश्रण

इसे विषमांग मिश्रण भी कहते हैं। एक से अधिक तत्वों या द्रव्यों के आपस में मिलने से ये पूरी तरह से एक-दूसरे में घुलकर एकीकृत नही हो पाते हैं, जिस कारण उनके कणों को प्रत्यक्ष रूप से अलग-अलग देखा जा सकता है। इनके तत्वों को परस्पर मिश्रित हुआ नही देख सकते।

इसमें तत्वों के सान्द्रता में समता नही पाई जाती अर्थात् भिन्न-भिन्न अंशों में तत्वों के अवयव समान मात्रा में उपस्थित नही होते हैं। किसी स्थान पर अधिक होते हैं और किसी पर कम। इनके तत्वों में घुलनशीलता का गुण नही होने के कारण इनके कणों को भौतिक रूप से अलग किया जाना भी सम्भव होता है।

इस मिश्रण में भी भिन्न-भिन्न द्रव्य की अवस्थाएँ होती है। ठोस, द्रव या गैस किसी भी रूप में हो सकती है। उदाहरण के लिए, पानी में कोई भी चिकना द्रव जैसे तेल मिलाने से वह उसमें पूरी तरह से घुल नही पाता है तथा सतह पर तैरने लगता है। हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि पानी में कोई चिकना द्रव डाला गया है तथा वह सतह पर दिखाई भी देता है।

कणों के आकार के आधार पर निलम्बन व कोलॉइड को असमांगी मिश्रण में सम्मिलित किया जाता है।

निलम्बन

इसमें कण अधिक भारी होते हैं और बड़े होते हैं। इस कारण ये कण अधिक समय तक हलचल में न रहकर धीरे-धीरे सतह पर जम जाते हैं। ये साफ़ दिखाई देते हैं। जैसे- हवा में उड़ती हुई धूल।

कोलॉइड- इसके कण अधिक बड़े नही होते हैं। इन्हें देखने के लिए माइक्रोस्कोप की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि इन्हें प्रत्यक्ष आँखों से नही देखा जा सकता। जैसे- धुंआ, धुंध।

मिश्रण में पाये जाने वाले द्रव्यों की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं के आधार पर उनके तत्वों में पृथक्करण की विधियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। जैसे-
किसी विलायक में अघुलनशील प्रकृति का ठोस द्रव्य मिलने पर उसे निस्पंदन विधि द्वारा अलग-अलग किया जाता है अर्थात् छानकर पृथक्करण किया जाता है। जैसे- जल में रेत का मिलना।

किसी द्रव पदार्थ में ठोस के मिलने पर जो विलयन बनता है तो उसमे वाष्पीकरण या आसवन विधि द्वारा पृथक्करण किया जाता है।

दो ठोस द्रव्यों के परस्पर मिलने पर बने मिश्रण में ऊधर्वपातन विधि द्वारा उनके तत्वों को अलग-अलग किया जाता है