सादा भोजन हम सभी को पसंद है, पर कभी न कभी हम सभी तीखे भोजन से अपन स्वाद बदलना चाहते हैं, फिर चाहे वह पिज़्ज़ा पर छिड़के कुछ चिल्ली फलैक्स हों या बिरियानी में परोसी हुई तीखी मिर्च! अधिकतर लोग न केवल इस तीखेपन और जलन को बर्दाश्त कर सकते हैं, पर इसका आनंद भी लेते हैं।

मिर्च का तीखापन या जलन का एहसास जो मिर्च खाने पर होता है, केवल कुछ केमिकल्स का जोड़ तोड़ है। कुछ ख़ास केमिकल्स और हमारे दिमाग़ की सूंघने और स्वाद ग्रहण करने की शक्ति ही मिर्च को उसका ये विशिष्ट स्वाद देते हैं । हमारे दिमाग़ की सूंघने की और गंध पहचान पाने की क्षमता को केमोसेंसेज़ कहा जाता है। ये केमोसेंसेज़ पर्यावरण में मौजूद, विभिन्न केमिकल्स का स्वाद और खुशबू पहचान सकते हैं। खुशबू दरअसल हमारी नाक की नली के पास में आये किसी पदार्ध का वह छिड़काव है, जिसे हमारी नाक पहचान सकती है। ये खुशबु हम तक हमारी नाक या गले के ज़रिये पहुँचती है। और यद्यपि ये कह पाना मुश्किल है के क्यों कोई केमिकल किसी ख़ास तरह महकता है, हमारे दिमाग़ में इन खुशबुओं का एक ग्रंथालय है।

और तीखापन कोई स्वाद नहीं बल्कि मिर्च में मौजूद कैप्सेसिन (Capsaicin ) नाम के केमिकल के प्रति हमारे शरीर की प्रतिक्रिया है। कैप्सेसिन नाम का ये केमिकल आँखों, फेफड़ों और त्वचा के लिए नुक्सानदायक है, और तीखापन कैप्सेसिन के द्वारा हमारी जीभ को पहुंचाए गए नुकसान की प्रतिक्रिया है। शुद्ध कैप्सेसिन इतना घातक हो सकता है, के उसके साथ प्रयोग करते हुए, पूरे लैबसूट को पहनने की सलाह दी जाती है। कैप्सेसिन की अधिक मात्रा जानलेवा भी हो सकती है।  अभी तक लैब के चूहों पर किये गए प्रयोगों में पाया गया है के यदि किसी भोज्य पदार्थ के एक किलो ग्राम में 118.8 मि ग्रा कैप्सेसिन पाया  जाये तो वह पदार्थ औसतन 50% चूहों की मृत्यु का कारण बन सकता है। तीखेपन को स्कोलविल हीट यूनिट या SHU में मापा जाता है, और आज तक का कीर्तिमान ईयान रॉथवेल नाम के एक ब्रिटिश डॉक्टर के नाम है जिसने छः करोड़ स्कोलविल हीट यूनिट वाली ‘दी विडोवर’ नाम की सॉस को खा कर ये कीर्तिमान बनाया।

मिर्च के इस तीखेपन का एक पुराना इलाज दूध रहा है क्यूंकि दूध में मौजूद केसिन, कैप्सेसिन को घोल कर हटा देती है। और क्यूंकि कैप्सेसिन पानी में घुलनशील नहीं है पानी पीने से मिर्च के तीखेपन पर बहुत ज़्यादा असर नहीं देखा जाता।