अलग-अलग निर्माता माचिस को अलग-अलग तरीके से बनाते हैं। लेकिन माचिस बनाने की मूल प्रक्रिया तकरीबन एक जैसी ही रहती है। माचिस की तिल्लियां बनाने के लिये लकड़ी ऐसी होनी चाहिए की जिस पर भिन्न-भिन्न रासायनिक तत्वों को आसानी से लगाया जा सके, और वह उन्हें कुछ हद्द तक सोख भी ले। साथ ही साथ लकड़ी की कठोरता भी इतनी होनी चाहिए कि वह उस पर जलाने के लिए लगाए जाने वाले दबाव को सहन कर सके और टूटे ना। केवल इसी प्रकार की लकड़ी को ही छोटी-छोटी तिल्लियों के रूप में काटा जाता है। आमतौर पर, माचिस की तिल्लियां बनाने के लिए या तो सफ़ेद देवदार की लकड़ी या फिर ऐस्पेन की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है।

माचिस की तिल्लियों को आकार दिये जाने के बाद उन्हें अमोनियम नाइट्रेट में डुबाया जाता है, जिससे की वह माचिस की तिल्लियां उसे सोख लें। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि माचिस की तिल्लियां ऊपरी रसायन (जो की जलाया जाता है) के ख़त्म होते ही बुझ ना जाए। दरअसल, माचिस की तिल्लियों के निर्माण की प्रक्रिया में माचिस की तिल्लियों के ऊपरी भाग को गर्म पैराफिन वैक्स में डुबाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि इस पैराफिन वैक्स में डूबी हुई लकड़ी की नोक को जब सिंथेटिक सतह पर रगडा जाता है तब इस रगड़ के कारण उसे आग पकड़ने में आसानी होती है। इसके बाद अमोनियम फॉस्फेट माचिस की तिल्लियां को जलते रहने में मदद करता है।

इन छोटी सी माचिस की तिल्लियों का सिरा दो भागों में बंटा होता है – नोक और उसका अंदरूनी भाग। नोंक में तो फॉस्फोरस सेस्क्यूफल्फाइड और पोटेशियम क्लोराइट का मिश्रण होता है। फॉस्फोरस सेस्क्यूफल्फाइड किसी कठोर सतह से रगड़ खाने पर बहुत आसानी से जल उठता है। और पोटेशियम क्लोराइट जलाने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है। नोंक पर साथ ही साथ कुछ चूरा किया हुआ कांच भी होता है जिससे की माचिस की तिल्लिययों की उपभोग दर को नियंत्रण में रखा जा सके। इसके अतिरिक्त, ऐसा भी हो सकता है की नोंक को सफ़ेदी देने के लिए इसमें थोडा सा जिंक ऑक्साइड भी मिलाया गया हो। नोंक के आधार में सल्फर, रोजिन और थोड़ी सी मात्रा में पैराफिन वैक्स होता है जो माचिस की तिल्लियां को जलने में मदद करता है। आधार को रंग देने के लिए इसमें कईं बार ऐसा रंग भी डाला जाता है जो पानी में घुल सके।

माचिस का डिब्बा बनाने के लिए कार्डबोर्ड का प्रयोग किया जाता है। माचिस की तिल्लियों का उत्पादन अनेक चरणों में होता है। सबसे पहले तो माचिस की तिल्लियों को काटा जाता है, फिर उन्हें एक विशिष्ट तरीके से व्यवस्थित किया जाता है तथा इसके बाद इन्हें इकट्ठा किया जाता है। जब भी माचिस की तिल्लियों की ज़रुरत होती है, तो इन्हें एक पंक्चर हुए बेल्ट में लगा दिया जाता है। और जब माचिस की तिल्लियां सूख जाती हैं, तो वह बेल्ट उन तिल्लियों को ‘बंडलिंग ज़ोन’ में ले जाता है। इस बंडलिंग ज़ोन में एक बहुत से दांतों वाला पहिया घूमता रहता है, जो इन तिल्लियों को बेल्ट में से निकाल कर एक कंटेनर में डाल देता है। इस कंटेनर में इनका सही माप किया जाता है ताकि इन्हें माचिस के डिब्बे में आसानी से डाला जा सके। कंटेनर में से, इन तिल्लियों को, गत्ते के डिब्बों के अंदरूनी भाग में डाला जाता है। ये गत्ते के डिब्बे कंटनेर के नीचे लगी एक ट्रांसपोर्ट लाइन पर निरंतर चलते रहते हैं। एक बार में करीबन १० माचिस के डिब्बे भरे जाते हैं। संक्षेप में कहें तो बेल्ट माचिस के उत्पादन की प्रक्रिया को पूरा करता है, जहाँ माचिस की तिल्लियों को टैंक में डाला जाता है, सुखाया जाता है और फिर माचिस के डब्बों में भरा जाता है।

माचिस के डिब्बों के उत्पादन की प्रक्रिया में, सबसे पहले माचिस के डिब्बों के अंदरूनी और बाहरी हिस्सों को काटा जाता है, फिर उस पर प्रिंट किया जाता है और फिर उन्हें एक साथ जोड़ा जाता है। माचिस के डिब्बों का बाहरी भाग एक अलग ट्रांसपोर्ट लाइन पर चलता है, जो की प्राथमिक बेल्ट के समानांतर होता है। दोनों ही बेल्ट जल्दी ही रुक जाते हैं। उसके बाद माचिस के डिब्बे के अंदरूनी भाग को उसके बाहरी भाग के अंदर डाल दिया जाता है। और यह माचिस के डब्बे के अंदरूनी भाग को बाहरी भाग में डालने की प्रक्रिया, प्रत्येक एक सेकंड में एक बार दोहराई जाती है। माचिस की भरी हुई डिब्बियां फिर किसी परिवहन की मदद से एक मशीन तक पहुंचाई जाती हैं। यह मशीन इन माचिस की डिब्बियों को अच्छे से जमा कर एक बड़े गत्ते के डिब्बे में बंद कर देती है, जिससे की इन्हें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके।