क्या है, क्लोन?

सीधे शब्दों में कहा जाए तो एक क्लोन भी अणु, कोशिका, पादप व जन्तु या मानव की एकदम समान आनुवांशिक प्रतिकृति है। उदाहरण के तौर पर ट्यूमर उत्परिवर्तित कोशिका का क्लोन है। एक कोशिकीय जीव की संतति जैसे कि जीवाणु प्रोटोजोआ व खमीर जो कि अलैंगिक प्रजनन करते हैं,  अपने जनक के क्लोन होते हैं। अधिकतर उच्चवर्गीय जीव जैसे कि स्तनधारियों में समान अथवा समरूप युग्मनज एक दूसरे के क्लोन होते हैं।

भारत में भैंस का क्लोन:

हरियाणा प्रदेश के करनाल जिले के नेशनल डेयरी फ़ार्म इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने 1998 में भैंस का क्लोन तैयार करने में सफलता प्राप्त की। विश्व में पहली बार विकसित भैंस के इस क्लोन की सफलता के बाद मनचाही संख्या में रोगरहित, स्वस्थ और श्रेष्ठ किस्म की भैंस प्राप्त की जा सकी। भारत में क्लोनिंग का प्रयोग मुर्रा प्रजाति की भैंसों पर किया जा रहा है।

भारतीय वैज्ञानिकों ने परखनली में पहला भैंसा 1992 में ही विकसित कर लिया था, जिसका नाम “प्रथम” रखा गया।

इसी प्रकार डी. एन. ए. या अन्य जैव सामग्री तथा कोशिकाएं प्राप्त करने के लिए सम्बन्धित व्यक्ति की अनुमति लेना जरूरी होगा। अगर इस जैव सामग्री से कोई व्यापारिक लाभ उठाया जाना सम्भव हो सका तो उसमे उस व्यक्ति को भी लाभ में हिस्सा मिलेगा, जिससे जैव सामग्री प्राप्त की गयी थी। 

इस बारे में पेटेंट के लिए आवेदन करने पर यह बताना होगा कि जैव सामग्री कहाँ से ली गयी है। समिति की इन सिफारिशों पर विचार विमर्श करने बाद यदि स्वीकृति मिलती है तभी इन्हें लागू किया जाएगा।

क्लोनिंग से हानि:

क्लोनिंग की प्रक्रिया अत्यंत खर्चीली है। धनवान लोग ही क्लोनिंग से होने वाले फायदों को प्राप्त कर सकेंगे।

क्लोनिंग से बड़े पैमाने पर भ्रूण हत्या होगी। डॉली का क्लोन तैयार करने वाली डॉक्टर इयॉन विल्युर के आँकड़ो के अनुसार 277 केन्द्रकों के संयोग से 27 भ्रूणों को 13 भेड़ों में ट्रांसफर किया गया, लेकिन केवल एक भेड़ ही बच्चे को जन्म दे सकी।

सन्तानोत्पत्ति में नर की भूमिका समाप्त हो जाने का खतरा पैदा हो जाएगा। क्लोनिंग के लिए जिस कोशिका से केन्द्रक लिया जाता है, वह नर या मादा में से किसी का भी हो सकता है, मगर क्लोनिंग के लिए मादा का डिम्ब कोशिका अति आवश्यक है। इससे नर की आवश्यकता है। इससे नर की आवश्यकता पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाएगा।

भारत में मानव क्लोनिंग पर प्रतिबन्ध:

भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन के सलाहकार डॉ. एम. एस. वालियानाथ की अध्यक्षता में एक समिति की स्थापना की थी। इस समिति ने भारत में मानव क्लोनिंग पर पाबन्दी लगाने की सिफारिश की। समिति की सिफारिशों के अनुसार जीव थैरेपी भी तभी की जा सकेगी, जब रोगी की जान बचाने का कोई ओर तरीका न बचा हो। मृत भ्रूण या गर्भपात वाले भ्रूण भी अनुसंधान के लिए तभी इस्तेमाल किये जा सकेंगे, जब माता-पिता से इसकी अनुमति प्राप्त कर ली गयी हो। 

क्लोनिंग के उपयोग:

इस तकनीक को पालतू पशुओं में अपनाकर उन पशुओं की संख्या में काफी वृद्धि की जा सकती है, जो आनुवंशिक रूप से कुछ खतरनाक व घातक बीमारियों जैसे कि बी.एस.आई. (बोवाईन स्पोंजिफार्म ऐंसेफेलाइटिस), गायों में पागलपन की बीमारी व आई.एफ. एम. डी. (खुरपका), मुंहपका रोग के लिए प्रतिरोधी हैं। 

लुप्त प्राणियों व जीवों की नस्लों को बचाने के लिए व उनका अस्तित्व कायम रखने के लिए और उनकी संख्या में निरन्तर बढ़ोतरी करने के लिए क्लोनिंग उपयोगी है।

अनुसंधान के क्षेत्र में भी उपयोग किया जा सकता है। यदि क्लोन किये गए पशुओं का अनुसंधान के लिए प्रयोग किया जाए तो अनुसंधान के आंकड़ों में उचित सांख्यिकीय समरूपता लायी जा सकती है।

मानव की मृत कोशिका के नव निर्माण के लिए भी क्लोनिंग उपयोगी सिद्ध हो सकती है। ऐसा करने से मानव शरीर के स्पेयर पार्ट्स बनाये जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई मानव पार्किन्सन रोग, पेशीय खिंचाव, मधुमेह व हृदय रोग से ग्रस्त हो तो क्रमशः टी-कोशिका, तन्त्र कोशिका व पेशियां प्रभावित होती हैं। ऐसी बीमारियों का इलाज सिर्फ इन प्रभावित कोशिकाओं को स्वस्थ कोशिकाओं से बदलकर ही किया जा सकता है।

निःसन्तान दम्पतियों द्वारा अपनी संतति पैदा करने के लिए पति या पत्नी में से किसी एक का क्लोन बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त यदि किसी दम्पति के एक सदस्य में किसी घातक आनुवांशिक बीमारी के जीन्स मौजूद हों तो दूसरे सदस्य (जो कि आनुवांशिक रूप से स्वस्थ हो) का क्लोन बनाकर ऐसे दम्पतियों को सन्तान सुख उपलब्ध करवाया जा सकता है।