प्रतिजैविक या एंटीबायोटिक, ऐसी दवाइयां या औषधियां होती है, जो रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्म जीवों को विनिष्ट करने का कार्य करती है। प्रतिजैविक, शरीर के अंदर पैदा हुए रोगाणुओ को विकसित होने से रोकती है, इसके साथ ही शरीर को स्वस्थ बनाने में भी सहायता करती है।

जीवाणु और रोगाणु, शरीर में विभिन्न रोग उपन्न करते है, जिससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता शिथिल हो जाती है, और शरीर दिनोदिन कमजोर पड़ता जाता है, अत: प्रतिजैविक या एंटीबायोटिक औषधियों का सेवन करना अनिवार्य हो जाता है।

प्रतिजैविक का इतिहास:

ऐसा माना गया है कि प्रतिजैविक शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम १९४२ में किया गया था। इसमें पेंसिलियम, बीटालेक्टाम आदि प्रतिजैविक दवाइयां शामिल है। बड़े पैमाने पर प्रतिजैविक औषधियों को २ भागो में बांटा गया है:-

  • इसमें सर्वप्रथम वे प्रतिजैविक औषधियां आती है, जो रोगाणु को जड़ से मारती है, जिन्हें जीवाणु नाशक औषधि कहा जाता है।
  • दूसरी प्रतिजैविक औषधियों वे होती है, जो जीवाणु एवं बैकटीरिया के विकास को प्रभावित करके उनकी संख्या बढने से रोकते है।

प्रतिजैविक औषधियों के प्रभाव:

प्रतिजैविक औषधियों के अच्छे एवं बुरे दोनों प्रभाव होते है, आइये इसपर थोडा प्रकाश डालते है:-

  • प्रतिजैविक औषधियां शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर होने से बचाती है, कई बार प्रतिजैविक औषधियों ने मानव के लिए जीवनदायिनी संजीविनी का कार्य किया है।
  • प्रतिजैविक औषधियों के प्रतिकूल प्रभावों के अतर्गत, प्रतिजैविक औषधियों के अत्यधिक सेवन से दस्त, मिचली, एवं बुखार आदि हो सकते ही।
  • प्रतिजैविक औषधियों का अधिक सेवन करने से शरीर पर इसका असर धीरे-धीरे कम होने लगता है।