पादप को प्राणी जगत का एक बड़ा एवं महत्वपूर्ण अंग माना जाता है| अब तक हुई खोजों के अनुसार ३ लाख से अधिक पादपों की विभिन्न प्रजातियों की खोज की गई है जिसमे से अधिकांशत: बीज युक्त पौधे है, किन्तु फिर भी खोजकर्ता ऐसा मानते है कि पादप जगत इतना विशाल है की सभी प्रजातियों की खोज करना अत्यधिक कठिन है|

पादपो के अध्ययन करने की प्रक्रिया को वनस्पति विज्ञान कहा जाता है| पादप जगत के अंतर्गत शैवाल, वृक्ष, मास, छोटे से लेकर बड़े पेड़, फ़र्न, कवक पादप आदि सम्मिलित किये गये है| इनमे से अधिकांशत: पादप प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते है किन्तु कुछ कवक पादप परजीवी हो सकते है| कवक एवं जीवाणु को पादप जगत में सम्मिलित नहीं किया गया है किन्तु ग्रीन शैवाल को पादप जगत का हिस्सा माना जाता है|

पादप को प्राथमिक उत्पाद भी कहा जाता है, इनमे भी प्राण होते है, जो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया जा चूका है| हरे पौधे के कारण वातावरण में आक्सीजन की पूर्ति होती है, एवं विभिन्न प्रकार के पादपो द्वारा जीव-जन्तु एवं मनुष्य अपना भरण पोषण करते है, इसलिए पादपो को जीवन का आधार माना गया है|

पादपो का वर्गीकरण

पादप वर्गीकरण के सिधांत के अंतर्गत पौधे के नाम, भौगोलिक लक्षण, आकृति एवं शारीरिक लक्षण, पहचान एवं रासायनिक संगठन के आधार पर पौधे का वर्गीकरण किया जाता है| इसके अंतर्गत कोशिका सरंचना भी सम्मिलित है क्योकि पादपो में भी कोशिका पाई जाती है|

पादपो का वर्गीकरण वनस्पति विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है| वर्गिकी शब्द का इस्तेमाल सर्वप्रथम A.P केंडोले ने अपनी पुस्तक में १८३४ ई में किया था जो की एक फ्रेंच वनस्पतिशास्त्री थे| पादप जगत के अंतर्गत पौधे का वर्गीकरण करने हेतु कुछ इकाईया निश्चित की गई है, जिससे पौधे को वर्गिकी के आधार पर ठीक श्रेणी में रखा जा सके एवं खोजकर्ताओ के लिए यह प्रक्रिया आसान हो सके|

वर्गीकरण की इकाई के अंतर्गत पौधे का जगत, प्रभाग, उपभाग, संवर्ग, उपसंवर्ग, कुल, उपकुल, गण, उपगण, जाति, उपजाति, वंश, उपवंश, किस्म, उपकिस्म, ट्राइब, सब ट्राइब, फ़ोर्मा, एवं स्लोन आदि के आधार पर पौधे का वर्गीकरण करके उसे उसके जैसे समूह में वर्गीकृत किया जाता है|

पादप जगत के महत्वपूर्ण वर्ग

पादप जगत के अंदर वैसे तो लाखों प्रजातिया शामिल है, किन्तु मोटे तौर पर शैवाल, ब्रायोफाईट, टेरिडोफाईट एवं अनावृतबीजी और आवृतबीजी आते है, जिनका विवरण इस प्रकार है:-

शैवाल

शैवालों में पत्तियाँ, तना व् जड़ आदि कुछ नही पाया जाता, इसलिए ये निम्न श्रेणी के पादप माने जाते है, किन्तु इनमे क्लोरोफिल पाया जाता है, इसलिए ये अपना भोजन स्वंय बनाते है| शैवालों की ३०,००० से अधिक प्रजातिया मानी गई है जिन्हें मुख्य रूप से ८ उपवर्गों में विभक्त किया गया है, जिनके नाम है:- साइनोफाईटा, युग्लिनोफाईटा, क्लोरोफाईटा, फियोफाईटा, रोड़ोफाईटा, कैरोफाईटा, पाईरोफाईटा एवं क्राईसोफाईटा|

धरती का ऐसा कोई भाग नहीं, जहाँ शैवाल नहीं पाए जाते| सागर, झीलों तालाबों आदि में उपस्थित पौधो को भी शैवाल कहा जाता है| ये विभिन्न रंगो के होते है जैसे नीला, हरा, लाल एवं नारंगी| कुछ शैवाल सूक्ष्म व् एक कोशिकीय होते है, जबकि कुछ शैवाल बड़े एवं बहुकोश्किया होते है|

शैवाल में लेंगिक व् अलेंगीक दोनों प्रकार से जनन क्रिया सम्पन्न होती है| इनमे जनन की अद्भुत क्षमता होती है और बहुत कम समय में ये तेजी से अपनी संख्या बढ़ा लेते है| जैसे बरसात के दिनों में जनन के दौरान हरे रंग के शैवाल का तालाबो में अत्यधिक नजर आता है| कई बार ये कुछ जलीय जीवो के उपर भी विकसित होने लगते है जैसे घोंघा|

ब्रायोफाईटा

वैज्ञानिको का ऐसा मानना है की ब्रायोफाईटा का जन्म हरे शैवाल से हुआ होगा| मुख्य रूप से ब्रायोफाईटा को ३ भागों में विभक्त किया गया है:-

हीपेटीसी:

इसके अंतर्गत कुछ प्रजातिया गीले स्थानों पर विकसित होती है एवं अधिकांशत: पानी के अंदर उगती है| इस वर्ग में ८,५०० के आसपास प्रजातिया सम्मिलित की गई है, जिनके अलग-अलग कुल व् वंश के आधार पर उनका वर्गीकरण किया गया है|

एंथोसिरोटी:

इस वर्ग के अंतर्गत आने वाले पौधे बीजाणु से प्रस्फुटित होकर उपर की दिशा में निकलते है| इसमें पादप का प्रमुख अंग युग्मक जनक होता है, इसमें पुन्धानी उपर से गुब्बारे के तरह गोल व् फूली हुई होती है, एवं नीचे से पतली होती है|

मससाई:

मॉस की लगभग 14,००० के आसपास प्रजातिया मानी गई है, जिनके ६५० वंश है| इनके ३ उपवर्ग होते है, जिन्हें स्फेग्नोब्रिया, एंडोब्रिया एवं युब्रिया कहा जाता है|

टेरीडोफाईटा

इनकी उत्पत्ति करोड़ो वर्ष पहले से मानी जा रही है| इसे मुख्य रूप से 4 भागों में विभाजित किया गया है, जिनके नाम है: साइलोफाईटा, लेपिडोफाईटा, केलेमोफाईटा, एवं टेरीफाईटा|

अनावृतबीजी

जिन पौधो के बीज नग्न अवस्था में होते है, उन्हें अनावृतबीजी पौधे कहा जाता है| इस प्रकार के पौधो के समूह को सिकाडोफिटा कहा जाता है|

आवृतबीजी

जो पौधे अपने बीजों में बंद रहते है, उन्हें आवृतबीजी कहते है| इनमें फूल, पत्तिया, जड़, तना आदि सभी पाए जाते है| ये मुख्य रूप से दो प्रकार के होते है: द्विबीजपत्री एवं एक बीजपत्री|