जनन के द्वारा ही नए पादपों का विकास व जन्म होता है। लैंगिक व अलैंगिक जनन दोनों से ही पादप की भिन्न-भिन्न व नई प्रजातियां पैदा की जा रही हैं।

पादपों में लैंगिक जनन

पुष्पी पादपों में जनन के लिए दो अंग होते हैं-

स्त्रीकेसर– यह  मादा जननांग है। इसे अण्डप भी कहते हैं। इसके तीन भाग है- अण्डाशय, वर्तिकाग्र, वर्तिका। यह पुष्प के केंद्र में स्थित रहता है। वर्तिकाग्र द्वारा परागकणों को ग्रहीत करता है तथा वर्तिका से होते हुए ये परागकण अण्डाशय तक पहुँचते हैं।

पुंकेसर– यह नर जननांग है। इसी में परागकण निर्मित व परिपक्व होते हैं। पूर्ण परिपक्वता के बाद परागकण का आवरण फट जाता है तथा बाहर आ जाते है। परागकण जिस आवरण से ढके रहते हैं उसे परागकोश कहते हैं। हवा या पानी या जीवों के माध्यम से पादपों तक पहुंच कर उन्हें निषेचित करते हैं।

इसके अलावा पुष्पधर, बाह्यदल व पंखुड़ियाँ पुष्प के अन्य भाग हैं।

सभी पुष्प एक समान नहीं होते है। इनकी प्रवृति में भी भिन्नता पाई जाती है।

एकलिंगी पुष्प– कुछ पादप या पुष्प ऐसे होते हैं, जिनमें नर या मादा जननांग दोनों में से कोई एक ही जननांग स्थित होता है।

द्विलिंगी पुष्प– ऐसे पादप या पुष्प जिनमें नर जननांग व मादा जननांग दोनों ही स्थित होते हैं।

पादपों में अलैंगिक जनन

विखण्डन– इसका तात्पर्य है विभाजित होना। इसमें द्विविखण्डन व बहुविखंडन शामिल हैं। द्विविखण्डन में मुख्य कोशिका पूरी तरह विकसित होने के निकट पहुंचकर दो भागों में विभाजित हो जाती है तथा फिर स्वयं खत्म होकर दो नए पादपों को पैदा करती है। बहुविखंडन में मुख्य कोशिका बहुत विभाजित होकर बहुत से नए पादपों को पैदा करती है।

मुकुलन–  इसमें मुख्य पादप पर एक नया छोटा पादप विकसित हो जाता है तथा धीमी गति से वृद्धि करते हुए समय आने पर उस मुख्य पादप से अलग होकर नए पादप के रूप में विकसित होता रहता है।

बीजाणु का निर्माण– बीज व अणु से मिलकर बना शब्द बीजाणु के द्वारा ही नए पादप पनपते हैं। पादपों की प्रत्येक किस्म में बीजाणु का निर्माण होता है।

पुनःजनन– इसका अर्थ है दुबारा से जन्म होना। जब किसी पादप का कोई हिस्सा जैसे पत्ते, तना या टहनी टूट कर अलग हो जाती है तो प्राकृतिक रूप से अपने आप नई पैदावार होती है। यह अलैंगिक जनन है क्योंकि इसमें बिना किसी जनन क्रिया के नई उत्पत्ति होती है।

कायिक प्रवर्धन– यह प्रचलित प्रक्रिया है। इस में किसी पादप का कोई हिस्सा निकालकर या तोड़कर अलग कर लिया जाता है तथा फिर उन्हें आवश्यक निश्चित मिट्टी, हवा पानी आदि की सहायता से उपजाऊ स्थान में नए पादपों के विकास की क्रिया की जाती है। कायिक प्रवर्धन की भी अलग-अलग विधियाँ होती है- कलम लगाना, जड़ें लगाना, कतरन लगाना आदि सम्मिलित हैं।

कलम लगाना (Grafting)–  एक पादप का कोई हिस्सा (शाखा, पत्ती, टहनी) जिसपर बीज लगे हों, को तोड़कर नई जगह में उपजाऊ मिट्टी में डाल दिया जाता है तथा पर्याप्त हवा व पानी के द्वारा विकसित होते होते वह नए पौधे का रूप ले लेता है।

जड़ें लगाना  (Layering)– पादप की कुछ जड़ों को उस से अलग करके नई जगह पर मिट्टी में डाल दिया जाना है तथा कुछ समय पश्चात जड़ें पनपने लगती है तथा नए पौधे के रूप में विकसित होती जाती है।

कतरन लगाना (Cutting)– इस क्रिया में दो भिन्न-भिन्न पादपों का कोई तना उससे अलग कर लिये जाते हैं, अथवा काट लिए जाते हैं, जिनमें से एक तने को जड़ सहित व दूसरे तने को जड़ रहित अलग किया जाता है। दोनों तनों को आपस में मिलाकर जोड़ दिया जाता है व कुछ समय के लिए प्लास्टिक की एक पतली परत से ढक दिया जाता है। कुछ दिनों में ये दोनों तने आपस में क्रिया कर नए पादप का रूप लेने लगते हैं। दो भिन्न-भिन्न पादपों के तनों से बना यह नया पादप दोनोँ पुराने पादपों के गुणों से भरा हुआ होता है।