वर्तमान समय में इस बात से कोई भी अनभिज्ञ नही है कि ब्रह्माण्ड के निर्माण करने में सहयोगी द्रव्य (पदार्थ) का सृजन अणुओं से होता है तथा अणुओं का निर्माण परमाणुओं से होता है। यह सृजन की एक श्रृंखला की भाँति है, एक से दूसरे का निर्माण व दूसरे से तीसरे का निर्माण।

किसी भी द्रव्य की कोई भी अवस्था द्रव या ठोस या गैस या प्लाज्मा, प्रत्येक का सृजन परमाणु से होता है।

परमाणु

परमाणु इतने छोटे कण होते हैं कि इनको तोड़ा नही जा सकता अथवा इनके टुकड़े नही किये जा सकते। परमाणु से ही अणु अस्तित्व में आते हैं। बिना परमाणु के अणुओं का निर्माण नही हो सकता।

परमाणु में रासायनिक विशेषतायें पाई जाती है। इनका निर्माण भी कुछ इससे भी अत्यन्त छोटे-छोटे कणों से मिलकर होता है। ये कण प्रोटॉन, न्यूट्रॉन व इलेक्ट्रॉन हैं। इन्हें परमाण्विक कण भी कहते हैं।

परमाणु संरचना के संबंध में बात की जाए तो परमाणु के आंतरिक दो भाग होते हैं-

1- नाभिक

2- नाभिक का बाह्य क्षेत्र

नाभिक- यह परमाणु के अन्दर बिल्कुल मध्य में पाया जाता है। चूँकि यह परमाणु का एक हिस्सा है तो सम्भवतः बहुत छोटा होता है। केन्द्र में स्थित होने के कारण इसे केन्द्रक भी कहा जाता है।

इसमें परमाणु निर्माण में सहयोगी दो कण न्यूट्रॉन व प्रोटॉन पाये जाते हैं।

न्यूट्रॉन की खोज सर जेम्स चैडविक ने की थी। उन्होंने यह बात साबित कि थी कि न्यूट्रॉन नाभिक के भीतर पाये जाने वाले ऐसे कण हैं, जो आवेश विहीन होते हैं। सभी तत्वों के परमाणुओं में ये प्रोटॉन के साथ पाये जाते हैं, परन्तु एकमात्र हाइड्रोजन के परमाणु के नाभिक में प्रोटॉन अकेला पाया जाता है, न्यूट्रॉन नही पाये जाते।

प्रोटोस से उद्भव हुआ शब्द प्रोटॉन को महान वैज्ञानिक रदरफोर्ड ने खोजा था। यह भी नाभिक के अन्दर स्थित रहते हैं। इन्हें प्राणु भी कहा जाता है। ये विद्युत के धन आवेश से परिपूर्ण होते हैं।

नाभिक का बाह्य क्षेत्र- नाभिक के बाहरी हिस्से में ऋण आवेश से भरे हुए इलेक्ट्रॉन बादलों की भाँति मँडराते रहते हैं। सर जे.जे.थॉमसन द्वारा इलेक्ट्रॉन को खोजा गया था। ये जब प्रोटॉन व न्यूट्रॉन के साथ मिलते हैं तो परमाणु अस्तित्व में आता है।

परमाणु क्रमांक- एक परमाणु में पाये जाने वाले सभी प्रोटॉन की संख्या को ही परमाणु क्रमांक कहा जाता है।

परमाणु द्रव्यमान- किसी भी परमाणु का द्रव्यमान इसके नाभिक में ही केंद्रित रहता है।  अतः यह समझना सरल ही है कि नाभिक में  पाये जाने वाले न्यूट्रॉन व प्रोटॉन के योग से प्राप्त संख्या ही परमाणु द्रव्यमान संख्या कहलाती है।

समस्थानिक- एक तत्व में प्रोटॉन समान संख्या में हो, परन्तु न्यूट्रॉन असमान संख्या में हो अर्थात् परमाणु क्रमांक में समानता व परमाणु द्रव्यमान में असमानता पाई जाती है तो ऐसे तत्व को समस्थानिक कहा जाता है।

समभारिक- यह समस्थानिक से विपरीत है।  तत्वों के परमाणु द्रव्यमान एक जैसे हो, परन्तु  परमाणु क्रमांक अलग-अलग हो तो इन्हें समभारिक कहा जाता है।

परमाणु के अस्तित्व व संरचना के संबंध में कुछ महान विज्ञान विशेषज्ञों द्वारा अलग-अलग तथ्य प्रस्तुत किये गए व तर्क रखे गए।

जॉन डॉल्टन द्वारा यह कहा गया कि सृष्टि में विद्यमान प्रत्येक द्रव्य का निर्माण अत्यन्त सूक्ष्म कणों से होता है। ये कण ही परमाणु हैं।

परमाणु स्वतः उत्पन्न होते हैं, इनको न बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। यह अविभाज्य होता है, अतः इसे काटा या तोड़ा भी नहीं जा सकता।

रदरफोर्ड द्वारा परमाणु मॉडल के सम्बन्ध में कहा गया कि नाभिक सूर्य की तरह है तथा इलेक्ट्रॉन अन्य ग्रहों की भाँति इसके चारों तरफ घूमते रहते हैं तथा नाभिक अत्यन्त कठोर होता है।

थॉमसन द्वारा पेश किये गए परमाणु मॉडल में तरबूज का उदाहरण देते हुए परमाणु को गोल आकृति वाला तथा इसके धनावेशित कणों को तरबूज के बीज के समान थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बिखरा हुआ बताया गया।

बोर के परमाणु मॉडल में इलेक्ट्रॉन की नाभिक के बाहर गतिशीलता के बारे में चर्चा करते हुए इसमें लगने वाले अपकेंद्रिय बल के विषय को प्रकट किया गया। नाभिक के बाहर भिन्न-भिन्न ऊर्जा युक्त कक्षाओं का उल्लेख किया गया।

अणु

द्रव्य जिन कणों से निर्मित होता है, वे कण अणु हैं। अणु का सृजन परमाणु से होता है।

एक से अधिक परमाणु के मध्य आकर्षक बल पैदा होने से उनमें रासायनिक बंध का निर्माण होता है, जिससे वे एक-दूसरे से जुड़ कर अणु का निर्माण करते हैं। यह स्वतन्त्र स्थिति में मौजूद रहता है। इसमें द्रव्य के सभी रासायनिक व भौतिक गुण विद्यमान रहते हैं। परमाणु के विपरीत अणु अविभाज्य नही होते हैं। इनका विभाजन किया जा सकता है।

द्रव्य की अवस्था में भिन्नता के कारण अणुओं की स्थिति में भी भिन्नता पाई जाती है। ठोस में पाये जाने वाले अणु एक-दूसरे के बिल्कुल साथ-साथ जुड़े हुए रहते हैं, जिस कारण ये यहाँ से वहाँ गति नही कर सकते। अणुओं की इस स्थिति के कारण ही इनमे कठोरता व निश्चित आकृति पाई जाती है।

द्रव में पाये जाने वाले अणु ठोस की अपेक्षा एक-दूसरे से कुछ दूरी पर स्थित रहते हैं, इस कारण इनमे एक से दूसरी जगह पर जाने के लिए थोड़ा रास्ता मिल जाता है तथा ये गतिमान अवस्था में रहते हैं। अणुओं की यह स्थिति द्रव को वजन तो प्रदान करती है, परन्तु इनका कोई आकार नही होता।

गैस के अणु अत्यन्त दूरी पर स्थित होते हैं, जिसके कारण इनमें तीव्रता से गति करने के क्षमता होती है। इसके अणु अत्यधिक क्रियाशील होते हैं। अणुओं में दूरस्थता के कारण गैस का कोई निश्चित आकार नही होता है।

परमाणुकता- चूँकि अणुओं का अस्तित्व परमाणु से होता है तो अणु में पाई जाने वाली परमाणु की संख्या की अणु की परमाणुकता कहा जाता है।

ये भी दो तरह के होते हैं-

समपरमाणुक- ऐसे तत्वों में पाये जाने वाले अणुओं में जो परमाणु पाये जाते हैं, वे एक ही प्रकृति वाले तथा एक ही प्रकार के होते हैं। जैसे- h2।

विषमपरमाणुक- ऐसे तत्वों में पाये जाने वाले तत्वों के अणुओं के परमाणु अलग-अलग प्रकार के होते हैं। परमाणु संख्या में समानता न होने के कारण ही इसे विषमपरमाणुक कहा जाता है। जैसे h2so4।

एक ही प्रकार के परमाणु वाले अणुओं से निर्मित द्रव्य को तत्व कहा जाता है।

एक से अधिक अलग-अलग प्रकार से परमाणुओं से बने अणु युक्त द्रव्य को यौगिक कहा जाता है। इसमें परमाणु संयोजन का एक निश्चित अनुपात होता है।

अनिश्चित अनुपात में परस्पर मिलकर रासायनिक क्रिया द्वारा अलग-अलग परमाणुओं से युक्त अणुओं वाले द्रव्य को मिश्रण कहा जाता है।

इसे उदाहरण द्वारा सरलता से समझा जा सकता है, जैसे हाइड्रोजन के दो परमाणु व ऑक्सीजन का एक परमाणु को एक-दूसरे से मिलाने पर जल प्राप्त होता है। इसमें हाइड्रोजन व ऑक्सीजन एक निश्चित अनुपात में रहते हैं। अतः जल एक यौगिक है।

अणुओं से सम्बंधित कुछ गणनाओं के बारे में  व्याख्या निम्न प्रकार से है

आण्विक द्रव्यमान- जैसा कि नाम से पता लग रहा है कि अणुओं के द्रव्यमान को आण्विक द्रव्यमान कहा गया है। चूँकि अणु बहुत से परमाणुओं से मिलकर बने होते हैं तो किसी अणु का द्रव्यमान ज्ञात करने के लिए उसमे पाये जाने वाले सभी परमाणुओं के द्रव्यमान का योग कर दिया जाता है।

सूत्र इकाई द्रव्यमान- किसी यौगिक में स्थित बहुत से अणु मिलकर सामूहिक रूप से एक वृहताकार अणु का निर्माण करते हैं। ये यौगिक धनायन व ऋणायन से युक्त होते हैं। इनमे पाये हाने वाले अणुओं का द्रव्यमान ज्ञात करने के लिए इनके परमाणुओं के द्रव्यमान की गणना की जाती है। इसे सूत्र इकाई द्रव्यमान कहते हैं।

तुल्यंकी भार- किसी भी द्रव्य में पाये जाने वाले अणुओं के भार व इसके तत्वों की संयोजकता के अनुपात से प्राप्त संख्या को तुल्यंकी भार कहा जाता है।