“पेड़ों ने पत्ते झाड़े अक्टूबर के पिछवाड़े” ये कविता मेरी पसंदीदा कविताओं में से है वह भी इतना  की मैंने बचपन में पढ़ा था और आज भी नहीं भूला | इस पंक्ति का अर्थ मुझे पहले भी पता था और आज भी लेकिन एक बात बात मुझे पहले नहीं पता थी , वह यह की आखिर पेड़ पतझड़ के मौसम अपने पत्ते क्यों झाड़ देतें है ?

लेकिन इस बात से अधिक मुझे दूसरी बात ने परेशान कर के रखा था | वह यह की – हम सब जानते है की पेड़ अपना भोजन पत्तियों से बनातें है तो जब तक पत्तियां है तो ठीक है लेकिन इनके झड़ जाने के बाद पेड़ अपना भोजन कैसे बनाते है और बिना भोजन के खुद को जीवित को जीवित कैसे रखतें है ?

इन दोनों सवालों ने मुझे बहुत परेशान कर के रखा था, आखिरकार दिमाग की इस हलचल को शांत करने के लिए मैंने थोड़ी खोजबीन की और जो बात पता चली वो बड़े कमाल की थी, जो मै आगे लिखने वाला हूँ |

जैसा की आप जानतें है की पतझड़ के पहले सूरज की ठाठ वाला  गर्मी का मौसम आता है और हम जानतें है की पेड़ों के भोजन के लिए पानी, धूप और पत्तिओं में पाए जाने वाले क्लोरोफिल की आवश्यकता होती है और इस मौसम में सारी चीजें उपलब्ध होती है जिससे पत्तियां अत्यधिक भोजन बना पातीं है और कुछ संचित कर लेते हैं |

इसके बाद “धुप – अब सबसे सुन्दर ” वाला मौसम यानि सर्दी आती है तो सूरज की धूप का अंतराल काफी कम हो जाता है, जिससे पेड़ भोजन नहीं बना पाते, और इस कारण वो कमजोर होने लगतें है |

इस स्थित में अपना जीवन बचाने के लिए पेड़ वह काम करतें है जो हम सभी को करना बहुत अच्छा लगता है | और वो काम है “आराम” जिससे उन्हें कम से कम ऊर्जा की जरूरत पड़े|

तो आप कहेंगे की इसका पत्तियों के झड़ने से क्या सम्बन्ध? दररसल पेड बहुत सारे पानी की मात्रा अपनी पत्तियों में छोटे- छोटे छिद्रों के माध्यम से निकाल देतें है और पानी के इस क्षरण से बचने के लिए पेड़ पत्तियों और जल वाहक नलिकाओं के उस बिंदु को बंद कर देतें है जहां से पत्तों में पानी जाता है |

और इस कारण पत्तियों को भी पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता और कुछ समय उपरांत वह मृत होकर गिर जाती है | लेकिन पेड़ खुद को जीवित बचा लेता है।