द्रव्य की क्रमानुसार पाँच अवस्थाएँ- ठोस, द्रव, गैस व प्लाज़्मा है।
इन अवस्थाओं में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। कुछ रासायनिक परिवर्तन होते हैं और कुछ भौतिक।
जब किसी द्रव्य के रासायनिक गुणों व स्तरों में बदलाव आता है तो इसे रासायनिक परिवर्तन कहते हैं। फलों का पकना, मोमबत्ती का जलना आदि रासायनिक परिवर्तन के उदाहरण हैं।
द्रव्यों के भौतिक गुणों जैसे- रंग, आकार, घनत्व आदि में बदलाव पैदा होने को भौतिक परिवर्तन कहते हैं।

संगलन

संगलन एक प्रक्रिया है। जैसा कि नाम से ही ज्ञात हो रहा है संगलन अर्थात् गलने की क्रिया। द्रव्य की ठोस अवस्था का पिघलकर या गलकर द्रव अवस्था बनना ही संगलन कहलाता है। इसके कई उदाहरण लिए जा सकते हैं, जिनमें सबसे सरल है- बर्फ का पानी के रूप में परिवर्तन। इस प्रक्रिया में द्रव्यों द्वारा गुप्त ऊष्मा का अवशोषण भी किया जाता है।

गलनांक

यह कोई प्रक्रिया नही है, अपितु ताप का एक निश्चित स्तर (बिन्दु) है। जब कोई ठोस एक निश्चित तापमान मिलने के बाद द्रव अवस्था में आना प्रारम्भ होता है तो वह ताप उस द्रव्य का गलनांक (melting point) कहलाता है अर्थात् वह ताप जिसकी ऊर्जा से ठोस गलकर या पिघलकर अपनी अवस्था से परिवर्तित होकर द्रव अवस्था में आता है, गलनांक होता है। द्रव्य की ठोस अवस्था का गलनांक ठोस में पाये जाने वाले अणुओं के मध्य आकर्षण बल की मात्रा अर्थात् आकर्षण बल की अधिकता या न्यूनता की ओर इंगित करता है।

ऊधर्वपातन

जब एक द्रव्य अपनी प्रथम अवस्था से द्वितीय अवस्था का त्याग करते हुए उसमें न आकर सीधे तृतीय अवस्था में पहुंच जाता है और इसके विपरीत तृतीय अवस्था से सीधे प्रथम अवस्था में आता है तो यह ऊधर्वपातन कहलाता है। दूसरे शब्दों में, जब कोई द्रव्य अपनी ठोस अवस्था में होता है तथा ठोस से वह द्रव अवस्था में रूपांतरित हुए बिना सीधे गैस अवस्था में परिवर्तित हो जाता है और फिर गैस से वह द्रव न बनकर सीधे ठोस बन जाता है, तो इस प्रक्रिया को ही ऊधर्वपातन कहते हैं।

वाष्पीकरण

यह एक प्रक्रिया है। इसे समझना भी अत्यन्त सरल है, क्योंकि इसके नाम में ही इसका अर्थ स्पष्ट हो रहा है। द्रव को जब ऊष्मीय ऊर्जा दी जाती है तो वह अत्यधिक गर्म होने लगता है। फिर गर्म होते-होते एक स्थिति ऐसी आती है कि द्रव में पाये जाने वाले अणु अत्यधिक ऊर्जा से युक्त होने लगते है, जिससे वे उबलते हुए भाप (वाष्प) के रूप में धीरे-धीरे उड़ने लगता है व द्रव कम होने लगता है, जिसे वाष्पीकरण कहते हैं।

क्वथनांक

द्रव्य की प्रथम द्रव अवस्था में जब ऊर्जा पहुँचाई जाती है अर्थात् द्रव को गर्म किया जाता है तो इसमें उबाल आने लगते है। ताप के जिस स्तर पर उबाल आने आरम्भ होते है, वह स्तर (बिन्दु) ही क्वथनांक कहलाता है। अधिक ऊर्जा मिलने के कारण द्रव के अणुओं में गतिशीलता अधिक हो जाती है। यह कोई प्रक्रिया नही है, अपितु गलनांक की भाँति यह भी द्रव को उबालने के लिए आवश्यक निश्चित ताप का स्तर है। पानी 100° सेल्सियस ताप पर उबलने लगता है, जिसे इस प्रकार भी लिखा जा सकता है कि पानी का क्वथनांक 100° C होता है।

संघनन

द्रव्य की गैस अवस्था का द्रव अवस्था में परिवर्तन होना ही संघनन कहलाता है। यह वाष्पीकरण की विपरीत क्रिया है। आसमान में वाष्प के रूप में बादल होते हैं। जब ये बादल (वाष्प) पानी (द्रव) के रूप में गिरने लगते हैं तो इसे संघनन कह सकते हैं। बर्फ़बारी, वर्षा, ओंस आदि संघनन के ही उदाहरण हैं। संघनन प्रक्रिया में भी द्रव्यों द्वारा गुप्त ऊष्मा का अवशोषण किया जाता है।

जमना

जमना एक क्रिया है। द्रव का रूपांतरण ठोस में होना, जैसे- पानी को अत्यधिक ठण्डा करने पर वह बर्फ का रूप ले लेता है। ताप के जिस स्तर पर द्रव का रूप ठोस में बदलने लगता है, उस ताप के स्तर को हिमांक कहा जाता है।
जब कोई द्रव्य तरल (द्रव)रूप में होता है तो उसके अणुओं के मध्य कुछ खाली स्थान होता है। जब वह हिमांक पर होता है तो उसके अणुओं के मध्य आकर्षण बल अधिक होने लगता है तथा खाली स्थान भी कम होते होते वह धीरे-धीरे ठोस का रूप ले लेता है। इसे ही जमना कहते हैं।

गुप्त ऊष्मा

द्रव्य की अवस्था में अन्तः परिवर्तन के लिए स्थिर तापमान के बावजूद द्रव्य द्वारा कुछ निश्चित ताप ऊर्जा (ऊष्मा या ताप) अवशोषित कर ली जाती है, इसे ही गुप्त या सुषुप्त ऊष्मा कहते हैं। ठोस अवस्था का रूपांतरण द्रव में करने के लिए इसे गर्म करके ऊर्जा दी जाती है, तब ठोस धीरे-धीरे गलना शुरू होता है, परन्तु पूरी तरह नही गलता है। इस गलनांक पर जब तापमान में कोई परिवर्तन नही किया जाता तो अवस्था परिवर्तन के दौरान द्रव्य द्वारा स्वतः ही कुछ ऊर्जा अपने भीतर समाहित कर ली जाती है, इस अवशोषित (उत्सर्जित) ऊर्जा ही संगलन की गुप्त ऊष्मा कहलाती है।
इसके विपरीत गैस से ठोस अवस्था के परिवर्तन के दौरान जब द्रव्य द्वारा कुछ ऊष्मा का उत्सर्जन कर लिया जाता है तो यह संघनन की गुप्त ऊष्मा कहलाती है