शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द होना प्रत्यक्ष रूप से यही संकेत देता है कि शरीर के किसी आंतरिक या बाह्य भाग में कोई गड़बड़ या परेशानी है। बिना किसी शारीरिक समस्या के दर्द की समस्या पैदा नही होती है। यह समस्या आम भी हो सकती है और गंभीर भी।

मनुष्य के शरीर में अनगिनत नसों का जाल फैला हुआ होता है। एड़ी से लेकर चोटी तक की नसों का जुड़ाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मस्तिष्क तक होता है, जिसके कारण शरीर के किसी भाग में दर्द होने पर नसों के माध्यम से यह संकेत मस्तिष्क तक पहुँचता है तथा हमें दर्द का अनुभव होता है।

नसों के इस उलझे हुए जाल के कारण कई बार ऐसा भी होता है कि तकलीफ तो शरीर के किसी एक भाग में होती है, परन्तु दर्द का अहसास उस भाग के अलावा दूसरे भाग में भी होता है। 

शरीर में दर्द होने के अनगिनत कारण हो सकते हैं, जिनमें से कुछ ये हैं- कहीं चोट लगने, हड्डी टूटने या खिसकने, नसों में दबाव, मांसपेशियों में खिंचाव, कटाव या आघात, रोग आदि। दर्द आंतरिक रूप से या बाह्य रूप से या दोनों तरह से हो सकता है।

समय सीमा के आधार पर दर्द दो प्रकार के हो सकते हैं- 

स्थायी दर्द- वह दर्द जो जल्दी से खत्म नही होता है और किसी गम्भीर समस्या के कारण पैदा होता है। कई बार तो यह लाइलाज भी हो जाता है, जो कि मनुष्य के जीवित रहते हुए सदैव ही बना रहता है।

अस्थायी दर्द- ऐसा दर्द जो स्थिर न हो और कुछ अवधि के बाद खत्म हो जाता है। इसका उपचार भी सम्भव होता है या कई बार बिना उपचार के स्वतः ही सही हो जाता है। जैसे- घाव, सरदर्द, पेटदर्द आदि।  

असाधारण स्थिर दर्द की समस्या में व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए।

कई बार शरीर के किसी अंग में दर्द होता है तो वह नसों में खून के बहाव को भी प्रभावित करता है, जिससे रक्त चाप निम्न या उच्च हो जाता है। कई बार रक्त चाप सीमा से अधिक हो जाने पर नस के फटने जैसी गम्भीर स्थिति भी पैदा हो जाती है और जानलेवा भी हो सकती है। 

दर्द को ठीक करने के लिए अलग-अलग चिकित्सा पद्धतियों जैसे होम्योपैथी, एलोपैथी, आयुर्वेद, एक्युप्रेशर, सुजोक आदि में विभिन्न प्रकार के उपायों को अपनाया जाता है। प्रत्येक मनुष्य अपनी बौद्धिक क्षमता व इच्छा के आधार पर दर्द के निवारण के लिए किसी भी प्रकार की चिकित्सा पद्धति का चुनाव कर सकता है|