सृष्टि में हर ओर अनगिनत द्रव्य पाये जाते हैं।
इन द्रव्यों की प्रकृति, प्रकार व इनके मध्य  होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के सम्बन्ध में बहुत से विख्यात रसायन विशेषज्ञों व वैज्ञानिकों द्वारा कई प्रकार के तर्क व तथ्य प्रस्तुत किये गए।

इस लेख में हम इंग्लैंड के प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर जॉन डॉल्टन की द्रव्य के सम्बन्ध में रखे गए विचारों की व्याख्या करेंगे। डॉल्टन का जन्म इंग्लैंड के इगल्सफ़ील्ड में सन् 1766 में हुआ था। उन्होंने अल्पायु में ही शिक्षक के पद पर कार्य करना प्रारम्भ कर दिया था। विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ वे, विज्ञान में अधिक रुचि होने के कारण इसके सम्बन्ध में नये-नये  ज्ञान को जुटाने व प्रयोगों में व्यस्त रहते थे।

डॉल्टन द्वारा परमाणुओं के सम्बन्ध में जिस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया, उसे  “डॉल्टन का परमाणु सिद्धांत” या “डॉल्टन का परमाणुवाद नियम” के नाम से जाना जाने लगा तथा वर्तमान काल में भी इसी नाम से जाना जाता है। यह सिद्धान्त रासायनिक संयोजन के कुछ नियमों की भी पुष्टि करता है। रासायनिक संयोजन के नियमों के आधार पर ही डॉल्टन ने परमाणु सम्बन्धी कुछ तर्क प्रस्तुत किये।

द्रव्यों के सम्बन्ध में डॉल्टन का यह मत था कि सभी द्रव्य बहुत से छोटे-छोटे कणों से निर्मित हुए होते हैं। इन सूक्ष्म कणों को डॉल्टन ने परमाणु नाम दिया।

परमाणु की प्रकृति के बारे में व्याख्या करते हुए ये कहा कि द्रव्यों में जब संयोजन के द्वारा इनके तत्वों से यौगिक व मिश्रण बनते है तो  किसी भी रासायनिक संयोजन के दौरान होने वाली अभिक्रियाओं से इनमे उपस्थित परमाणुओं को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही किसी भी विधि के द्वारा नए परमाणुओं का सृजन किया जा सकता है।

रासायनिक संयोजन में होने वाली रासायनिक अभिक्रिया के पूर्व व पश्चात भी तत्वों में परमाणुओं की संख्या अपरिवर्तित रहती है।

परमाणु में अविभाजन का गुण होता है अर्थात् परमाणु को बांटा नही जा सकता। किसी भी रासायनिक या भौतिक क्रिया की सहायता से भी परमाणु के टुकड़े नही किये जा सकते।

समान द्रव्यों के समान तत्वों में पाये जाने वाले परमाणुओं की आकृति व द्रव्यमान में भी समानता पाई जाती है। इसी के विपरीत असमान तत्वों में भिन्न-भिन्न आकृति व द्रव्यमान वाले परमाणु उपस्थित रहते हैं।

रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग लेने वाली सबसे छोटी इकाई परमाणु ही होते हैं।

द्रव्यों के रासायनिक संयोजन के दौरान अलग-अलग तत्वों के परमाणु सदैव पूर्णांकों के अनुपात में परस्पर क्रिया कर यौगिक का सृजन करते हैं।

निष्कर्ष- उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि डॉल्टन का परमाणुवाद का नियम द्रव्यों के रासायनिक संयोजन के सभी नियमों को प्रदर्शित नही करता है। यह केवल द्रव्यमान संरक्षण निश्चित अनुपात व गुणित अनुपात के नियम की आधार पर कुछ बिन्दु प्रस्तुत करता है। इसमें तत्वों की भिन्नता के कारण उनमे पाई जाने वाली परमाणु की भिन्नता की भी व्याख्या की गई है।

द्रव्य की इस आधारभूत विचारधारा से अवगत कराता है कि द्रव्य का निर्माण असंख्य परमाणु के मेल से होता है, जो आकार में अत्यन्त छोटे होते हैं। डॉल्टन ने अपने इस सिद्धान्त में  अणुओं के सम्बन्ध में कोई विचार शामिल नही किया