जीवों का अस्तित्व पृथ्वी के लिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिससे पर्यावरण में सामंजस्य बना रह सके| जीव विज्ञान, विज्ञान के लिए आवश्यक अध्ययन का विषय है, जिसके अंतर्गत पृथ्वी पर उपस्थ्ति सभी जीवधारियों या संजिवो का अध्ययन किया जाता है, यह विज्ञान की एक शाखा है, जिसे जीव विज्ञानं या बायोलॉजी कहा जाता है|

बायो का अर्थ है- जीवन, एवं लोगोस का अर्थ है- अध्ययन| इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले १८०१ ई. में लेमार्क, जो की फ्रांस से थे व् ट्रेविरेनस, जो की जर्मनी के वैज्ञानिक थे, के द्वारा किया गया था| अरस्तु को बायोलॉजी या जीव विज्ञानं का जनक माना जाता है, क्योकि उनके समय में विज्ञान की इस शाखा का अत्यधिक विकास हुआ, जिसमे अरस्तु ने जीवों एवं पादपो के सम्बन्ध में अपने महत्वपूर्ण विचार रखे|

अरस्तु ने सभी जीवों को २ भागों में बांटा, एक जन्तु एवं दूसरा वनस्पति| किन्तु आधुनिक युग में लिनियस का वर्गीकरण सर्वमान्य है, उसने भी जीवो का विभाजन २ भागों में किया, एक तो पादप जगत एवं दूसरा जन्तु जगत| इसके अंतर्गत जीवो को उनकी शारीरिक रचना, बनावट, रूप, एवं कार्य प्रणाली व् रहन-सहन के आधार पर उनका वर्गीकरण किया गया है|

सभी जीवों के वर्गीकरण के लिए उनके जगत, उपजगत, वर्ग, उपवर्ग, वंश, व् जाति के आधार पर अलग-अलग खंडो में रखा जाता है| पहले के समय में द्विजगत विभाजन को जीवो के वर्गीकरण का आधार माना जाता था, परन्तु व्हीटकर ने १९६९ ई में जीवधारियो के वर्गीकरण की ५ प्रणालिया प्रस्तावित की, अत: उसी को आधार मानकर जीवो का वर्गीकरण किया गया|

मुख्य रूप से जीवो को वर्गीकरण के आधार पर ५ भागों में बांटा गया है, जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-

मोनेरा

इस समूह में सभी प्रकार के जीवाणु, बैक्टीरिया, सायन एवं आर्की बैक्टीरिया आदि को सम्मिलित किया गया है, सूक्ष्म तन्तु वाले जीवाणु भी इसी श्रेणी का एक हिस्सा है|

प्रॉटिस्टा

इस श्रेणी के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के जलीय जीव, यूकेरियोटिक जीव, एक कोशिकीय जीव आदि शामिल है| जन्तु एवं पौधे के मध्य वाला युग्लिना भी इसी जगत का हिस्सा माना जाता है|

पादप

इस श्रेणी में सभी प्रकार के पौधे व् पादप सम्मिलित किये गये है| इसमें बहुकोशिकीय जीव, रंगीन एवं प्रकाश संश्लेषी पादप, शैवाल, बीज, पुष्पी एवं अपुष्पी आदि सभी को इसी जगत का हिस्सा माना जाता है|

कवक

इस श्रेणी में परपोषी जीव एवं यूकेरियोटी जीव शामिल किये गये है| ये मृतजीवी या परजीवी हो सकते है, एवं इतरपोषी कहे जाते है|

जन्तु

इस जगत को मेटाजोआ जगत भी कहा जाता है, इसमें सभी प्रकार के उपभोक्ता, संभोजी जन्तु, यूकेरियोटिक जीव आदि को शामिल किया गया है| जेलिफ़िश, मछली, स्टार फिश, पक्षी, सरीसृप, स्तनधारी कृमि, हायड्रा आदि सभी जीव इसी जगत का हिस्सा है|

जीवधारियो के वर्गीकरण की आवश्यकता

जब कोई भी चीज या प्राणियों की संख्या अत्यधिक हो तो उसका वर्गीकरण उसे समझने के लिए सुगम बना देता है और मनुष्य की प्राकृतिक प्रवृति एवं जानने की जिज्ञासा ने पादप जगत एवं जन्तु जगत को उनके जाती, वंश, व्यवहार, रचना आदि के आधार पर वर्गीकृत करना उचित समझा| हजारों की संख्या में पाए जाने वाले पादप एवं जीवों को पूरी दुनिया में एक पहचान प्राप्त हो सके इसलिए जीवधारियो का यह वर्गीकरण अनिवार्य था| अनेक वैज्ञानिकों ने अपनी तरह से जीव जगत का विभाजन किया किन्तु सबसे कारगर विभाजन लिनियस का माना गया जिन्होंने १७५३ ई में द्विनाम पद्धति का सुझाव सामने रखा एवं अपनी बुक सिस्टेमा नेचर में जीवधारियो के वर्गीकरण की एक नियोजित व्यवस्था एवं प्रणाली को तैयार किया|

जीवो की द्विनाम पद्धति का सिदान्त

लिनियस द्वारा अविष्कृत इस द्विनाम पद्धति के अनुसार प्रत्येक जीव के नाम के लिए लैटिन भाषा का खास योगदान माना जाता है| इसके अंतर्गत किसी जीव के नाम का अग्रिम शब्द उसके वंश का नाम होता है, एवं दूसरा शब्द उसकी जाति को दर्शाता है| इन दोनों के पश्चात उस खोजकर्ता का नाम उद्घृत किया जाता है जिसने उस जीव विशेष के जाती एवं वंश के बारे में खोज की है एवं संसार को उससे परिचित करवाया है|

उदहारण के रूप में आप समझ सकते है, जैसे मनुष्य का वैज्ञानिक नाम होमो सेपियन्स लिन है, इसमें होमो मानव जगत के वंश का नाम है, जिसकी वास्तविक जाती सेपियन्स है एवं लिन संक्षिप्त रूप है वैज्ञानिक लिनियस का, जिन्होंने सबसे पहले मानव के वैज्ञानिक नाम के सिदान्त का प्रतिपादन किया है| इसी प्रकार हर जीव, पौधे, पादप सभी का वंश एवं जाती के आधार पर वैज्ञानिक नाम निश्चित किया गया है, जिससे उनके बारे में समझना आसान हो सके एवं सम्पूर्ण विश्व में एक ही नाम से उसे जाना एवं पुकारा जाये|

लिनियस ने जीवों के लक्षणों के आधार पर उनका वर्गीकरण करना उचित समझा, हालाँकि इससे पहले द्विजग्त वर्गीकरण प्रणाली चालित थी, जब तक की वैज्ञानिको ने उन ५ प्रणालियों का वर्गीकरण नहीं किया| कुछ वैज्ञानिको के अनुसार यह वर्गीकरण तार्किक नहीं है एवं कृत्रिम प्रतीत होता है, किन्तु इसपर अभी विचार विमर्श किया जाना है|