जन्तु उत्तक अथवा जन्तुओ के शरीर में उपस्थित उत्तको के प्रमुख नाम एवं वर्णन इस प्रकार है:-

उपकला उत्तक

जन्तुओ में पाया जाने वाला यह उत्तक जन्तुओ को अंदरूनी आघात से बचाता है एवं उन्हें नमी प्रदान करने में सहायक होता है| उपकला उत्तक जन्तुओ के भीतरी भागो, बाहरी भागो या स्वतंत्र सतहों में मुख्य रूप से पाए जाते है| यह शरीर के कुछ महत्वपूर्ण भागों जैसे ह्रदय, वृक्क, फेफड़ा, जनन ग्रन्थियो की सतह, यकृत एवं त्वचा की बाहरी सतहों आदि पर पाया जाता है|

इस उत्तक में रुधिर कोशिकाओ की न्यूनता होती है जिसके कारण इस उत्तक से सम्बन्धित कोशिकाओं को पोषण प्राप्त करने हेतु लसिका (Lymph) पर निर्भर रहना पड़ता है जो विसरण (डिफ्यूजन) द्वारा इसे पोषक तत्व प्रदान करते है| उपकला उत्तक के भेदों के अंतर्गत साधरण, रोमश, स्तम्भकार, परिवर्तनशील, स्तरित, एवं रजककनकित आदि भाग सम्मिलित किये गये है|

संयोजी उत्तक

यह उत्तक जन्तुओ के शरीर के सभी अंगो एवं दूसरे उत्तको को आपस में जोड़ने या संयुक्त करने का कार्य करता है| तरल संयोजी उत्तको के अंतर्गत रुधिर एवं लसिका सम्मिलित है, जो संवहन का कार्य करने में सहायक होते है| मुख्य रूप से रुधिर उत्तक दो प्रकार के होते है, लाल रुधिर कणिकाए एवं श्वेत या सफेद रुधिर कणिकाए| दोनों का जन्तुओ के शरीर में अहम् योगदान रहता है, जैसे लाल रक्त कणिकाओ का ओक्सिजन के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण योगदान है, एवं श्वेत कणिकाओ, शरीर को विभिन्न प्रकार के रोगों से लड़ने में सहायता प्रदान करती है|

इसी प्रकार अस्थि उत्तक जो की संयोजी उत्तक के अंतर्गत आता है, एवं अस्थिकोशिका को इसके निर्माण के लिए प्रमुख माना जाता है| संयोजी उत्तक शरीर की मृत कोशिकाओ एवं उत्तको को नष्ट करके उसकी प्रतिपूर्ति करता है एवं शरीर के ताप को बनाये रखने में सहायता करता है| यह उत्तक जन्तुओ के शरीर के भागों की रक्षा करने में अंत्यत सहायक माना गया है|

पेशी उत्तक:

शरीर के पेशियों का निर्माण करने में इस उत्तक का महत्वपूर्ण योगदान रहता है| पेशी उत्तक में संकुचन की क्षमता होती है इसी कारण इसे संकुचनशील उत्तक कहकर भी पुकारा जाता है जिसमे लाल तंतु विद्यमान रहते है| मनुष्य शरीर में ६३९ मांसपेशिया पाई जाती है| मुख्य रूप से पेशी उत्तक के ३ प्रकार है:-

अरेखित:

शरीर के जो अंग अनेछिक रूप से क्रियान्वित होते है, वहां पर यह उत्तक विद्यमान रहता है| यह उन अंगो पर अपना नियन्त्रण स्थापित करता है जो अपने आप संचालित होते है, जैसे मलाशय, आहार नली, मूत्राशय, रक्त नलिकाए आदि| इस सभी अंगो एवं क्रियाओ पर मानव का नियन्त्रण नहीं होता, ये प्राक्रतिक चलायमान है|

रेखित:

यह पेशी उत्तक शरीर को विभिन्न प्रकार की गतिविधिया एवं इच्छानुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करता है| इस पेशीयो में तन्तु के सिरे आपस में रूपांतरित होकर एक दूसरे रूप में अस्थियो से जुड़े रहते है किन्तु यदि जीवों के शरीर का पूर्ण रूप से परिक्षण किया जाए तो यह पेशी तन्तु बंडल के रूप में जुड़े हुए प्रतीत होते है|

हदयक:

यह पेशी उत्तक रेखित के तरह या उस से मिलता-जुलता है| यह पेशी उत्तक दिल की दीवारों पर उपस्थित रहता है, जो ह्दय को गति प्रदान करने में सहायक होती है| इनका कार्य ह्दय के स्वास्थ्य को बनाये रखना है और यह प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती रहती है|

तंत्रिका उत्तक

इस उत्तक का प्रमुख कार्य शरीर में होने वाली सभी क्रियाओ पर नियन्त्रण रखना है, फिर चाहे वह एच्छिक हो या अनेछिक| यह उत्तक २ प्रकार के विशेष कोशिकाओ से निर्मित होता है, जिसमे एक को तंत्रिका कोशिका एवं दूसरे को न्यूरोग्लिया कहा जाता है| न्यूरोग्लिया, दिमाग के हिस्से में मौजूद रहती है एवं मस्तिष्क के क्रियान्वन पर प्रभाव डालती है, इसी कारण तंत्रिका उत्तक को चेतना उत्तक भी कहा जाता है|