शरीर को पर्याप्त ऊर्जा देने एव् जीवित रहने के लिए सभी प्राणियों के लिए भोजन आवश्यक होता है एवं इसी से सभी जीवों को पोषण प्राप्त होता है और जिन पदार्थो से भोजन प्राप्त होता है उम्हे पोषक पदार्थ कहते है| जीव-जन्तु अपना भोजन स्वय नहीं बना सकते इसलिए उन्हें निर्मित भोजन की आवश्यकता होती है| जैसे एक जीव दूसरे जीव को खाकर पोषण प्राप्त करता है, और यह प्रक्रिया सतत चलती रहती है|

जन्तुओ में पोषण के प्रकार

जन्तुओ द्वारा भोजन ग्रहण करने के आधार पर जंतुओं में पोषण को तीन भागों में विभाजित किया गया है, जो इस प्रकार है:-

पूर्णभोजी पोषण

इस श्रेणी के अतर्गत ऐसे जीव आते है, जो अपना भोजन ठोस या द्रव के रूप में ग्रहण करते है, मनुष्य भी उनमे से एक प्राणी है| इन जीवों को प्राणी सम्भोजी भी कहा जाता है| इस प्रक्रिया में प्राणी कार्बनिक पदार्थो को ग्रहण करता है एवं उसके शरीर की कोशिकाओं द्वारा उसका अवशोषण किया जाता है| भोजन प्रणाली के विभिन्न चरणों द्वारा शरीर में इसका अवशोषण करके मल के रूप में बाहर त्याग कर दिया जाता है| इसके अंतर्गत मेढक, मनुष्य एवं अमीबा आदि जीव आते है| इसके 4 प्रकार होते है:

शाकाहारी:

इसमें आने वाले जीव – जन्तु, पादप या उनके भागों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हुए उनसे पोषण प्राप्त करते है, जैसे गाय, हाथी, घोडा, बकरी, भैंस आदि|

माँसाहारी:

इसमें शामिल जीव पोषण प्राप्त करने हेतु दूसरे जीवों को मारकर उनका मॉस खाते है| जैसे शेर, चीता, बाघ आदि|

सर्वाहरी:

इसमें आने वाले जीव शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों प्रकार के हो सकते है, इसलिए उन्हें सर्वाहरी कहा जाता है| जैसे कि, मनुष्य|

अपमार्जक:

इसके अंदर शामिल जीव मृत जीवों को खाकर अपना भरण-पोषण करते है एवं पर्यावरण को साफ़ रखने में सहायता करते है| गिद्ध, सियार आदि इसके उदहारण है|

परजीवी पोषण

जैसा कि शब्द से स्पष्ट हो रहा है, पर का अर्थ होता है, दूसरा एवं जीवी अर्थात जीव, ऐसे जीव जो दूसरे जीवो के द्वारा पोषण प्राप्त करते है या दूसरे प्राणी के शरीर के सम्पर्क में रहकर कार्बनिक पदार्थो द्वारा भोजन प्राप्त करते है, उसे परजीवी पोषण कहा जाता है| जो जीव इन परजीवियों का लक्ष्य होता है या जिनसे ये परजीवी पोषण या अपना भोजन प्राप्त करते है, उसे पोषी जीव कहा जाता है| परजीवी पोषी जीव को मार तो नहीं सकते किन्तु काफी हद तक उन्हें बाहरी एवं भीतरी रूप से नुकसान पंहुचा सकते है| बैक्टीरिया, कवक, कृमि जैसे फिताकृमी आदि इसके विशेष उदहारण है|

मृतोपजीवी पोषण

इस श्रेणी के अंतर्गत ऐसे जीव आते है जो मृत पादपों एवं जीवो के मृत शरीर एवं सड़े-गले पदार्थो का अपघटन करके उनसे पोषण प्राप्त करते है एवं उन्हें नष्ट कर देते है अर्थात ये पर्यावरण के लिए अपघटन का महत्वपूर्ण कार्य करते है जिससे वायु दूषित न हो एवं सक्रमण न फ़ैल सके| ये मृतजीवी जीव कठोर पदार्थो का अपघटन करके उन्हें सरल पदार्थो में परिवर्तित कर देते है एवं यह प्रकृति की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है| साधारण शब्दों में कहा जा सकता है कि ये जीव अकार्बनिक पदार्थो को कार्बनिक में बदल देते है| अधिकांशत: ये गीली लकड़ी, सड़े हुए पत्ते एवं मृत एवं सड़े हुए जीवो की लाश आदि को निशाना बनाते है|

जन्तुओ में पोषण प्रणाली के महत्वपूर्ण चरण

प्रत्येक प्राणी में भोजन एवं पोषण के कई चरण सम्मिलित होते है| एककोशिकीय जीवों में भोजन प्रणाली के चरण उनकी एक कोशिका के द्वारा ही सम्पन्न किये जाते है| सभी जन्तुओ में मुख्य रूप से ये चरण ५ की संख्या में खत्म होते है, जिनका विवरण इस प्रकार है:-

अंतग्रहण:

जन्तुओ में भोजन प्रणाली का यह पहला चरण माना जाता है, इसके अंतर्गत भोजन आहार नाल तक जाता है, इसे अंत:ग्रहण अर्थात अंदर ग्रहण करना कहा जाता है|

पाचन:

भोजन प्रणाली के दूसरे चरण के अंतर्गत भोजन ग्रहण करने के पश्चात पाचन का कार्य शुरू होता है| इसमें जिस स्वरूप में भोजन ग्रहण किया जाता है, जैसे तरल, ठोस आदि भोजन के कठोर एवं अघुलनशील स्वरूप  सरल एवं छोटे व् घुलनशील स्वरूप में बदला जाता है, जिसके अंतर्गत शरीर के भीतर मौजूद विभिन्न प्रकार के एन्ज्याम्स एवं पाचक रस रासायनिक प्रक्रिया द्वारा भोजन को पचाने का कार्य करते है|

अवशोषण:

भोजन प्रणाली के तीसरे चरण के अंतर्गत भोजन को पचाने के पश्चात रक्त द्वारा उसका सारा रस अवशोषित कर लिया जाता है, जिसके अंतर्गत शरीर को पर्याप्त ऊर्जा एवं शक्ति मिलती है|

स्न्वांगीकरण:

भोजन प्रणाली के चोथे चरण के फलस्वरूप भोजन को शरीर के सभी हिस्सों तक पहुचाया जाता है, जिससे सभी हिस्सों को पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त  मिल सके|

बहिष्करण:

इस चरण के अंतर्गत भोजन का बहिष्कार या उसे मल के रूप में शरीर से बाहर निकालना बहिष्करण कहलाता है, यह भोजन प्रणाली का सबसे अंतिम चरण है| इसके पश्चात जीव पुन: भोजन प्रणाली के चरण दोहराने की तैयारी में जुट जाता है एवं यह प्रक्रिया मृत्यु तक लगातार चलती रहती है|