विज्ञान के क्षेत्र में आइंस्टीन का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने कई ऐसे अविष्कार किये जिसने काफी हद तक हमरी जिज्ञासा को शांत करने का काम किया। गुरुत्वाकर्षण लहरे या तरंगे भी एक ऐसी ही खोज है, दरअसल गुरुत्वाकर्षण तरंगों को परिभाषा इस तरह दी जा सकती है कि “अंतरिक्ष काल की वक्रता में ऐसी लहर जो कि प्रकाश की गति पर तरंगों के रूप में फैलने का काम करती है, यह तरंगे ऐसी गुरुत्वाकर्षण संबंधी क्रियाकलापों से उत्पन्न होती हैं जो उनके स्रोत से बाहर की और संचरित करती हैं। सर्वप्रथम 1893 में पहली बार गुरुत्वाकर्षण की सम्भावना ऑलिवर हेवीसइड ने की थी उन्होंने गुरुत्वाकर्षण और विद्युत में इनवर्स-स्क्वायर नियम के बीच समानता दर्शाते हुए इसकी चर्चा की थी।

मगर इस सिद्धांत को सापेक्ष रूप 1916 में अलबर्ट आइंस्टीन ने दिया जब उन्होंने सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत में दर्शाया कि गुरुत्वाकर्षण लहरे गुरुत्वाकर्षण विकिरण के रूप में ऊर्जा का परिवहन करती है। यह विद्युत चुम्बकीय विकिरण के जैसे ही उज्जवल उर्जा का एक रूप है। मगर वहीं न्यूटन ने अपने सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण के नियमों में गुरुत्वाकर्षण की तरंगें मौजूद नहीं हो सकती, क्योंकि धारणा के अनुसार भौतिक आवागमन अनंत गति पर होता है।

आइंस्टाइन ने अपने साधारण सापेक्षतावाद सिद्धांत में अंतरिक्ष और समय दोनो एक ही सिक्के के दो पहलु बताए, उनके अनुसार यह दोनों एक दुसरे से काफी हद तक बंधे हुए हैं, इसे ही काल अन्तराल कहा जाता है। इसे एक चादर के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है, चादर के चार आयाम है जोकि अंतरिक्ष के तीन आयाम(लंबाई, चौड़ाई और गहराई) तथा चौथे आयाम के रूप में समय को रखा जा सकता है। हालांकि यह सिर्फ समझने के लिए है वास्तविकता इससे काफी भिन्न होती है।

गुरुत्वाकर्षण बल के संदर्भ में हमारी मान्यता है कि यह सिर्फ वस्तुओं को खींचने का ही बल माना जाता है। मगर आइंस्टाइन ने इसके विपरीत एक थ्योरी दी उनके अनुसार गुरुत्वाकर्षण काल-अंतराल को मोड़ देता है, उसे विकृत कर देता है और इसी प्रभाव को हम आकर्षण बल के रूप में देखते हैं। दरअसल एक अत्याधिक द्रव्यमान वाला पिंड काल-अंतराल को इस तरह से मोड़ देता है कि इस मुड़े हुये काल अंतराल से गुजरते हुये अन्य पिंड की गति अपने आप ही त्वरित हो जाती है। जैसे हम एक कस कर तनी हुई चादर के बिच में एक भारी गेंद रख देने पर उसमें झोल उत्पन्न हो जाता है। अब चूँकि चादर में झोल आ चूका है ऐसी स्थिति में जब हम चादर पर कुछ कंचे डालते हैं तो वे अपने आप गति प्राप्त कर लेते हैं।

यदि साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत को गणित के सहारे समझा जाए तो उसके अनुसार यदि किसी अत्यधिक भार वाले पिंड की गति मे त्वरण आता है, तो वह अंतरिक्ष मे हिचकोले या लहरे उत्पन्न करेगा यह लहरें उस पिंड से दूर गति करती हैं। इन लहरों को ही काल-अंतराल मे उत्पन्न तरंगे कहा जाता है, इन तरंगो का ही गति के साथ काल-अंतराल मे संकुचन और विस्तार संभव हो पाता है। इस घटना को आप किसी शांत जल मे पत्थर डालने से जल की शांत सतह को मोड़ रही लहरो के जैसे मान सकते है।

इन गुरुत्वाकर्षण तरंगो को उत्पन्न करने की कई विधि है। इन तरंगो को उत्पन्न करने के लिए भार का उपयोग किया जाता है क्योंकि जितना अधिक भारी और घना पिंड होता है वह उतनी अधिक ऊर्जावान तरंग उत्पन्न कर सकता है। पृथ्वी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से त्वरित होकर एक वर्ष मे सूर्य की परिक्रमा करती है। प्रथ्वी की गति बहुत धीमी है इसकी वजह पृथ्वी का द्रव्यमान का कम होना है। क्योंकि इसकी वजह से उत्पन्न गुरुत्वाकर्षण तरंग को पकड़ पाना लगभग असंभव ही है।

लेकिन वहीं अगर हम दो अत्याधिक द्रव्यमान वाले पिंड को लेते हैं, जैसे न्युट्रान तारे जोकि महाकाय तारो के अत्याधिक घनत्व वाले अवशेष केंद्रक होते है, यह अपनी गति से ऐसी गुरुत्वाकर्षण तरंगो का निर्माण कर सकते है जिन्हे हम आसानी से पकड़ सकते हैं।

इसी कड़ी में 1974 मे खगोलशास्त्री जोसेफ़ टेलर एवं रसेल ह्ल्स ने एक ’युग्म न्युट्रान तारों की खोज की। इन दोनों तारों का द्रव्यमान अत्याधिक था इसी की वजह से यह घने तारे एक दूसरे की परिक्रमा अत्याधिक तीव्र गति से करते हैं यह लगभग 8 घंटे में परिक्रमा पूरी कर लेते हैं। इस तीव्र गति की परिक्रमा के फलस्वरूप थोड़ी मात्रा मे गुरुत्वाकर्षण तरंग के रूप मे ऊर्जा का उत्सर्जन करते हैं। इस ऊर्जा उत्सर्जन का कारण तारो की परिक्रमा गति है, इसी के कारण उर्जा उत्पन्न होती है। जिससे गुरुत्वाकर्षण की ऊर्जा के ह्रास से उन तारो की परिक्रमा की गति भी कम हो रही थी। इससे उन तारो की कक्षा की दूरी भी कम हो रही थी और उनकी परिक्रमा का समय भी कम हो रहा था। समय के साथ उनकी कक्षा की दूरी मे आने वाली कमी की गणना की गयी और यह कमी साधारण सापेक्षतवाद के सिद्धांत से गणना की गयी कमी से सटिक रूप से मेल खाती थी।

मगर हमेशा यह सवाल उठता रहा है कि क्या गुरुत्वाकर्षण तरंगे वाक़ई दिखती हैं? इसी सिद्धांत की प्रमाणिकता की जांच के लिए यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने एक नई जांच शुरु की है। और इसी के लिए अंतरिक्षयान लीज़ा पाथफ़ाइंडर अंतरिक्ष में भेजा गया है।

दरअसल सापेक्षता के सिद्धांत का प्रतिपादन अलबर्ट आइंस्टाइन ने आज से क़रीब सौ साल पहले इसका अनुमान लगाया था। बता दें लीज़ा पाथफ़ाइंडर को फ्रांस के कोरू अंतरिक्ष बेस से छोड़ा गया है। यह यान पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर ऐसी जगह के लिए उड़ान भरने को तैयार है जहां कोई गुरुत्वाकर्षण ताक़त काम नहीं करती है। इस यान में एक यंत्र लगाया गया है, यह यंत्र ही अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षक लहरों का पता करेगी। आइंस्टाइन के अनुसार ऐसी लहरें दो ब्लैक होल के मिलने से और किसी तारे के फटने से पैदा होने की वजह से निर्मित होती है। इस मिशन से गुरुत्वाकर्षण तरंगों के बारे में जानने के लिए आगे होने वाले बड़े मिशन में मदद मिलेगी।

आइंस्टाइन की इस थ्योरी की स्पष्टता के बाद अनुमान लगाया जा रहा है कि कई और रहस्य से पर्दा हटाया जा सकेगा, इस सिद्धांत की प्रमाणिकता विज्ञान में एक क्रांति ले कर आएगी।