हम सब को गिरगिट की एक खासियत पता है की यह अपने आस पास के वातावरण के हिसाब से अपना रंग बदल लेता है- अगर वह पेड़ पर होता है तो अपना रंग पेड़ की शाखा के जैसा भूरा या फिर हरी पत्तियों के बीच हरा  इत्यादि कर लेता है   | लेकिन यहएक गलतफहमी  है की वह अपना रंग अपने आस-पास के वातावरण के हिसाब से बदल लेते है ,  वास्तव में यह मामला नहीं है ।

शोध में पता चला है की जब एक गिरगिट शांत होता है तो उसका रंग हरा होता है जो की आसानी से पत्तेदार परिवेश में संम्मिलित हो जाता है।शोध्कर्ताओं के एक प्रयोग के दौर एक आश्चर्य जनक तथ्य सामने आएं की एक नर गिरगिट अपना रंग किसी मादा गिरगिट की उपस्थित में या फिर किसी नर प्रतिदव्न्दी की उपस्थित में अपने भाव प्रकट करने के लिए करता है ।

पर मुख्य मुद्दा यह है की ये अपना रंग कैसे बदलते है ?

कई सालों पहले से हमें एक कही-सुनी बात पर विस्वाश करतें आएं है की गिरगिट के शरीर में कुछ लाल तो कुछ पीले रंग इत्यादि कोशिकाओं में  मौजूद होतें  है जिनका समायोजन वे स्वयं अपने अनुसार कर लेते है । |इसी तरीके से यह मान लिया गया की गिरगिट भी पीले, लाल , हरे किसी भी रंग में ढलने  के लिए कोशिका में मौजूद रंगों का क्षेत्र बढ़ा या घटा देतें है । परन्तु भौतिक विज्ञानी और जीवविज्ञानी  ने साथ मिलकर एक शोध किया जिसके मुताबिक यह बात गलत है, उन्होंने बताया की गिरगिट के शरीर की कोशिकाओं  में कोई भी हरे रंग का रंजक नहीं पाया जाता । उन्होने  बताया की यह मूलतः दो अलग तंत्र जो की [वर्णक रंग है और संरचनात्मक रंग] से मिलकर तैयार होता है|

पीले रंग के कोशिकाओं में  नीचे १३० नैनो मीटर की अतयंत महीन क्रिस्टल को समाहित किये हुई कोशिकाएं होती है  और जब इसमें प्रकाश पड़ता है तो अपने समायोजन के कारण अलग -अलग समय पर ये अलग -अलग रंग परावर्तित और अवशोषित करतीं है इसी प्रकार से गिरगिट अपने रंगों का परिवर्तन अपनी इन महीन कोशिकाओं को नए-नए तरीके से समायोजित कर बदलता रहता है ।

वैज्ञानिकों ने शांत अवस्था में और उत्तेजित अवस्था के दो गिरगिटों की तुलना की और पाया की उत्तेजित अवस्था में क्रिस्टलों का समायोजन अधिक दूरी पर होता है इस कारण इस अवस्था में यह पीले और लाल रंग के हो जातें है ।