कवक जगत पौधो का एक बड़ा समूह है, जिसके अंतर्गत ऐसे पौधे शमिल किये गये है जो सड़े गले पदार्थो एवं कार्बनिक चीजों से अपना भोजन प्राप्त करते है| इन्हें अपमार्जक भी कहा जाता है, क्योकि ये कचरे में पनपते है एवं उसे साफ़ कर देते है|

समान्य तौर से कवक जगत के जीवो में अन्य पौधो की भांति पर्णहरित तत्व नही पाया जाता, इसलिए ये प्रकाश द्वारा अपना भोजन नहीं बना सकते| ये परजीवी एवं मृतजीवी होते है एवं दूसरो पर निर्भर रहते है| इनमे संवहन उत्तक भी नहीं पाया जाता, इनमे तना, पत्तिया भी नहीं पाई जाती| कवक जगत का अध्ययन करने की प्रक्रिया को माइकोलोजी कहा जाता है|

कवक द्वारा इकठा किया हुआ भोज्य पदार्थ ग्लाइकोजेन के रूप में संचित रहता है व् कवको की कोशिका भित्ति काईटिन नामक पदार्थ से निर्मित होती है| कवको की संख्या पृथ्वी पर बहुत ज्यादा मानी गई है, ये उन सभी स्थानों पर विकसित हो जाते है जहाँ कार्बनिक पदार्थ उपस्थित हो, चाहे जीवित रूप में अथवा मृत रूप में| गोबर पर पैदा होने वाले कवकीय पौधे को कोप्रोफिलीस कवक कहा जाता है|

कवक की उत्पति:

कवक की उत्पति का इतिहास काफी पुराना है| वैज्ञानिको के अनुसार जबसे यह पृथ्वी अस्तित्व में आई होगी तबसे कवक का विकास भी हुआ होगा| कवक की कई हजार प्रजातिया पहचानी जा चुकी है, जिनकी संख्या ९०,००० तक आंकी गई है, तथापि इनपर अभी भी शोध कार्य जारी है| ये जल में, मिटटी में, लकड़ी के उपर, रेत में, चट्टानों में, यहाँ तक की लाइकेन जैसी कठोर सरंचना के उपर, अनेक प्रकार के जीवों के शरीर आदि सभी जगहों में पाए जाते है|

कवक को विकसित होने के लिए अधिक व्यवस्था की आवश्यकता नहीं होती, ये नम स्थानों एवं कम प्रकाश में तेजी से फलते फूलते है| इनका उपरी हिस्सा छत्र नुमा होता है, जैसे कुकरमुत्ता या मशरुम कवक का एक अच्छा उदहारण है|

पोषण के आधार पर कवक जगत को ३ भागों में विभाजित किया गया है, जो इस प्रकार है:-

सहजीवी:

इसके अंतर्गत ऐसे प्रकार के कवक आते है जो अपने साथ विकसित होने वाले पौधे के लिए सहायक होते है एवं ये एक दूसरे को विकसित एवं भरण पोषण के लिए मदद करते है एवं लाभ पहुचाते है| लाइकेन इसका अच्छा उदहारण है|

परजीवी:

इन कवको को हानिकारक माना जाता है, क्योकि ये सदा दूसरे जीवो एवं पौधो पर आश्रित होते है, एवं अपना भोजन प्राप्त करने के लिए ये दूसरो को हानि भी पंहुचा सकते है, जैसे, आस्टिलागो एवं पाक्सीनिया

मृतोपजीवी:

इस श्रेणी के अंतर्गत आने वाले कवक अपना भोजन हमेशा मृत कार्बनिक पदार्थो से ग्रहण करते है एवं उनपर ही आश्रित होते है| उदहारण के लिए मोर्चेला, राइजोपस आदि सम्मिलित है|

कवक जगत के विभिन्न वर्ग:

फाईकोमाईसिटिज:

इस प्रकार के कवक गीले एवं आद्र स्थानों पर पाए जाते है| जैसे- सदी हुई लकड़ी, अथवा सीलन युक्त स्थान आदि| इनमे अलेंगिक जनन प्रक्रिया द्वारा जनन होता है, एवं युग्मको के मिलने से युग्माणु निर्मित होते है|

एस्कोमाईसिटिज (Ascomycetes Fungi)

इस प्रकार के कवक एक कोशिकी या बहुकोश्किय दोनों ही हो सकते है| इन्हें थैली कवक भी कहा जाता है| न्यूरोसपेरा इसका अच्छा उदहारण है, जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के रासायनिक प्रयोगों के अंतर्गत किया जाता है| इनमे भी अलेंगिक जनन पाया जाता है|

बेसीडियोमाईसिटिज (Basidiomycete Fungi)

ये कवक विभिन्न प्रकार के पौधो पर परजीवियों के रूप में विकसित होते है, इनमे अलेंगिक बीजाणु नहीं पाए जाते| इनके साधरण उदहारण मशरूम, पफबॉल आदि है| इनमे द्विकेंद्र्क सरंचना का निर्माण होता है, जिससे आगे चलकर बेसिडियम का निर्माण होता है|

ड्यूटीरोमासिटिज (Deuteromycota Fungi)

इस प्रजाति को अपूर्ण कवक की सूचि में रखा गया है, क्योकि इसकी लेंगिक प्रावस्था के आलावा और कुछ ज्ञात नहीं हो पाया है|

लाइकेन (Lichen):

लाइकेन को कवक के सहजीवी के रूप में जाना जाता है, क्योकि यह कवक के विकसित होने में सहायता करता है|

कवक का आर्थिक महत्व:

लाभ:

कवक अपमार्जन का कार्य करते है जो विभिन्न प्रकार के मृत अवशेषों को नष्ट करने का कार्य करने के लिए जाने जाते है| काई प्रकार के कवक सब्जी बनाने के लिए काम में लिए जाते है| पेंसिलियम, एस्प्रजीलिस जैसे कवको का पनीर उत्पादन में इस्तेमाल किया जाता है|

यीस्ट कवक का प्रयोग विभिन्न प्रकार के ब्रेड बनाने एवं बेकरी से सम्बन्धित वस्तुओ में किया जाता है| कवक द्वारा विभिन्न तरह के अम्ल प्राप्त किये जा सकते है जिनका कारगर उपयोग किया जाता है| इनसे कई तरह के एन्ज्याम्स भी प्राप्त किये जाते है|

कवक से प्रतिरोधी दवाइयों का निर्माण किया जाता है जो मनुष्य के प्राण बचाने में सहायक होते है|

हानि:

कई कवक जैसे मशरुम की कुछ प्रजातिया जहरीली होती है, जिनसे प्राणियों को खतरा रहता है| विभिन्न प्रकार के पौधो व् फसलो में रोग उत्पन्न करने में कवक अहम भूमिका निभाते है| कवक द्वारा जन्तुओ एवं मानव में भी फेफड़ो, नाख़ून आदि से सम्बन्धित रोग पैदा हो सकते है यदि पर्याप्त जानकारी का आभाव हो तो ये रोग गम्भीर रूप भी धारण कर सकते है|