• उष्मागतिकी रसायन विज्ञान की वह शाखा है जिसमें हम ऊष्मा(heat) के प्रवाह(flow) का अध्ययन करते है।
  • ऊष्मा का प्रवाह एक पिंड(body) से दूसरे पिंड में हो सकता है।
  • ऊष्मा का प्रवाह पिंड से वातावरण में हो सकता है।
  • ऊष्मा का प्रवाह वातावरण से पिंड की ओर हो सकता है।
  • ऊष्मागतिकी का शून्यक नियम(zeroth law of thermodynimics)

शून्यक नियम पहले दूसरे और तीसरे नियम के बाद ही खोजा गया था।लेकिन शून्यक नियम इन तीनो नियमो का आधार है इसी कारण इसे चौथा नियम ना कह कर शून्यक नियम कहा गया है। इसके अनुसार ऊष्मा या ताप की गति हमेशा उच्च से निम्न ताप की तरफ प्रवाहित होती है इसे हम उष्मीय सम्यवस्था भी कह सकते है।

उदाहरण:मान लीजिए यदि दो पिंड एक thermal equilibirum(जहा ऊष्मा परिवर्तन न हो) और दोनों का ताप 15℃ हो और तीसरा पिंड आ जाये जिसका ताप 30℃ हो तो कुछ ही समय बाद तीनो का तापमान 20℃ हो जायेगा।

  • ऊष्मागतिकी का पहला नियम(1st law ऑफ़ thermodyamics)-

इसे ऊर्जा संरक्षण का नियम भी कहा जाता है।इसके अनुसार ऊर्जा को ना तो बनाया जा सकता है और न ही इसे नष्ट किया जा सकता है।लेकिन इसे एक माध्यम से दूसरे माध्यम में परिवर्तित किया जा सकता है।

उदाहरण:कोयले का इंजन (कोयले का उष्मीय ऊर्जा से यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित होना)

पहले नियम का सूत्र:

[∆Q=∆U+W]

Q=दी गयी ऊष्मीय ऊर्जा।

U=आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि।

W=किया गया कार्य।

अगर पिंड से उष्मीय ऊर्जा Q ली जाये तो कार्य धनात्मक(positive) होगा।

अगर पिंड खुद उष्मीय ऊर्जा ले तो कार्य ऋणात्मक(negative) होगा।

  • उष्मागतिकी का दूसरा नियम(second law of thermodynamics)-

दूसरा नियम ऊर्जा संरक्षण के नियम पर जोर देता है जो यह कहता है कि ऊष्मा गर्म माध्यम से ठंडे माध्यम की तरफ प्रवाहित होती है पर वो यह स्पष्ट नही कर पाया की ऊष्मा ठंडे माध्यम से गर्म माध्यम की ओर प्रवाहित क्यों नही हो पाती।

उष्मागतिकी के दूसरे नियम के दो कथन है:

  • केल्विन प्लांक का कथन(kelvin planck’s statment)

किसी भी cyclic process में ऐसा इंजन नही बना है जो की पूरी ऊर्जा को कार्य में परिवर्तित कर सके और 100% उत्पादन दे सके ऊर्जा का कुछ न कुछ भाग आंतरिक ऊर्जा वृद्धि में खर्च जरूर होगा।

  • क्लाउसिस का कथन(clausis statment )

  ऊष्मा हमेशा गर्म माध्यम से ठंडे माध्यम की तरफ बिना किसी बाहरी सहायता के तो बह सकती है लेकिन ऊष्मा कभी भी किसी भी ठंडे माध्यम से गर्म माध्यम की तरफ बिना किसी बाहरी सहायता के नही बह सकती।

  • उष्मागतिकी का तीसरा नियम(third law of thermodynamics)

ऊष्मागतिकी के तीसरे नियम के अनुसार एक पूर्ण क्रिस्टल(perfect crystal) की एंट्रोपी(entropy)पूर्ण शुन्य तापमान पर 0 होती है।

आइये यह जाने कि एंट्रोपी,पूर्ण क्रिस्टल और पूर्ण शुन्य तापमान क्या है??

एन्ट्रापी(entropy)- उस ऊर्जा का परिमाण जो यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित नहीं हो सकती ।

पूर्ण शुन्य तापमान(aboslute zero temprature)-तापमान -273.15 जहा पर अणुओं की गतिविधि बेहद कम और धीरे हो।

पूर्ण क्रिस्टल(perfect crystal)-वह क्रिस्टल जिसमे सभी अणु एक जैसी आकृति,आकार,आयाम के हो और उनके बीच गतिविधि भी बेहद कम हो।

उष्मीय ऊर्जा प्रयोग किये जाने वाले यंत्रो जैसे की वाष्प इंजन,अन्तर्दहन इंजन,बायलर,रेफ्रिजरेटर,वाष्प टरबाइन इत्यादि जैसे उपकरणों की दक्षता(efficiency)मापने के लिए उष्मीय दक्षता(thermal efficiency) को उपयोग में लाया जा सकता है।

nth=benifit/cost

nth=उष्मीय दक्षता(therml efficiency)

उष्मागतिकी के पहले नियम के अनुसार कभी भी आउटपुट ऊर्जा इनपुट से ज्यादा नही हो सकती।

अगर खपत को उसके द्वारा किये गए कार्य से तुलना करनी हो तो ऐसे कर सकते है मान लीजिए किसी इंजन में ईंधन जलता है उससे न केवल बिजली बन रही है बल्कि उस पूरी प्रक्रिया में ईंधन भी जल ही रहा है और गर्मी भी पैदा हो रही है जितनी ज्यादा गर्मी होगी उतनी ही बिजली बनाने की क्षमता को कम करेगी