हम और आप जब भी राजस्थान या रेगिस्तान की बात करतें है तो सबसे पहले जो बात ध्यान में आती है वह है ऊंट यानी रेगिस्तान के जहाज की सवारी की  | रेगिस्तान जहां पर  इंसान और सामान्य गाड़ियां हार जातीं है वही ऊंट ६५ घंटे की रफ्तार से दौड़ता है | चिलचलाती धुप में हमें हर १० मिनट में पानी चाहिए होता है वहीँ ऊंट मजे से अपनी पीठ पर बोझ लेकर चलता रहता है | इसलिए आज मै आपको इस तथ्य से अवगत करने का प्रयास करूँगा की आखिर ऊंट को ही रेगिस्तान का जहाज क्यों खा जाता है ?

ऊंट एक चलता -फिरता अजूबा है | जैसे ही कोई ऊंट ५ वर्ष से बड़ा होना शुरू होता है तो उसके पास कई आश्चर्यजनक छमताएँ आना शुरू हो जाती है जिसकी वजह से हम इसे रेगिस्तान का जहाज कहतें है | जैसे ही यह पांच वर्ष की उम्र पार कर लेता है तो इसकी पीठ में कूबड़ का निर्माण होना शुरू हो जाता है, एक ऊंट एक बार में सौ से डेढ़ सौ लीटर पानी पी लेता है और रेगिस्तान की लम्बी यात्राओं के लिए निकल पड़ता है | रेगिस्तान में पानी की उपलब्धता पहली कठिनाई होती है जिसे ऊंट आसानी से पार कर लेता | दूसरी समस्या आती है रेगिस्तान की गर्मी, जिसे झेल पाना सब के बस की बात नहीं , इस कठिनाई से लड़ने के लिए ऊंट के पास एक खास औजार होता है, वह है उसकी मोटी चमड़ी जो सूर्य के प्रकाश को परवर्तित कर देती है और इस तरह ऊंट रेगिस्तान की गर्मी से निजात पा लेता है |

अगली समस्या होती है रेगिस्तान में चलने वाली रेतभरी हवाएं |

इसके सामने के  लिए भी ऊंट के पास पर्याप्त साधन होतें है, और वह है ऊंट की तीन परत वाली पलकें और इसके कानों में उपस्थित घने बाल | आप पूंछेंगे कैसे ? जब रेगिस्तान में रेतीली हवाएं चलतीं है तो ऊंट की तीन परत वाली पलकें धूल और रेत से आँखों की सुरक्षा करतीं है और कानों में उपस्थित घने बाल उसके कान को बंद करके रखतें है जिससे ऊंट बिना रुके लगातार चलते रहतें है |

और इससे भी रोचक बात यह है की ऊंट अपने नाक भी आसानी से बंद कर लेते है और रेगिस्तान की खतरनाक हवाओं को मात देकर आगे बढ़ जातें है |

दूसरी तरफ ऊंट के पैर गद्दीदार होते हैं जो रेत में नही धसते। ये वैसे ही होता है जैसे एक नाव पानी में डूबने के बजाये तैरता है।

अब तो आप समझ गयें होंगे की ऊंट को को रेगिस्तान का जहाज कहा जाना पूरी तरह से वाजिब है |