किसी भी कार्य को करने की छ्मता को उर्जा कह्ते है और इस उर्जा के कई स्त्रोत है। उर्जा के स्तोत्रो मे क्रमशः रसायनिक, भौतिक, सौर्य, नाभीकीय, विद्युत, यांत्रिक जैसी कई प्रकार की उर्जा होती है।

पर हर प्रकार की उर्जा का एक समान्य मूल सिद्धांत यह है कि उर्जा ना तो निर्मित होती है ना मरती है, उर्जा बस अपना रूप बदलती रह्ती है।

इसे हम कुछ उदाहरणों से भी समझ सकते है। अगर हम खाने पकाने जैसे रोजमर्रा के काम को भी देखे तो इसमे भी उर्जा स्थानांतरण एक अहम भुमिका निभाती है। जैसे ही खाद्य पदार्थ को पकने के लिये आग पर रखा जाता है तो उष्ण उर्जा रसायनिक उर्जा मे परिवर्तित हो जाती है। इसमे कही भी उर्जा का संचार नही हो रहा बस उर्जा का प्रारूप बदल जा रहा है।

ज़मीन पर पड़ी हुई स्थिर गेंद को अगर पैर से मारा जाय तो उस गेंद की स्थितिज उर्जा गतिज उर्जा मे तब्दील हो जाती है।

उर्जा का मुख्य सिदधांत उर्जा संरक्षण ही है यानी उर्जा ना विलुप्त हो सकती है ना बनायी जा सकती है। इससे बड़े बड़े अनुसंधान पर भी लागू कर के देख सकते है कि प्लुटोनियम जैसे तत्व मे भरी स्थितिज उर्जा को उष्ण्ता से हम कैसे नाभीकीय उर्जा मे बदल सकते है। यही उर्जा संरक्षण ना ही एक खोज या आविष्कार है बल्कि विकास की ओर अग्रसर एक ऐसी खोज है जिससे महासागर उर्जा को भी संरक्षित करने मे सफलता मिली है।

धरती से निकलने वाली उष्मा उर्जा भी आज काफी फैक्ट्रियों मे कार्य निष्पादन के काम आ रही है। ऐसा नही है कि एक तरह की उर्जा पूर्णता दूसरे प्रकार की उर्जा मे तब्दील हो जाती है, कभी कभी एक तरह की उर्जा एक से ज्यादा उर्जा मे बट जाती है। एक जलती हुई मोमबत्ती का ही उदाहरण ले तो उस मोम्बत्ती की उष्म उर्जा रसायनिक उर्जा और प्रकाश उर्जा मे परिवर्तित हो जाती है।

प्रमाणित है कि उर्जा नष्ट ना होते हुए भी विनाश का कारण बन सकती है। अगर नाभीकीय और सौर्य उर्जा को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करे तो इतनी उर्जा पैदा होगी जो काफी उष्ण्ता पैदा करेगी जो भयंकर विनाशकारी प्रकोप ला सकती है। उर्जा संरछ्ण पर बना वाष्प इंजन कोयले से ज्यादा अच्छा और पर्यावरण के लिये ज्यादा हितकर माना गया था। उर्जा के संरक्षित सिद्धांत मे विनाशकारी और निर्माणकारी दोनो ही गुण है पर उसको इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है ये उस पर निर्भर करता है।

ज्वरीय उर्जा भी आजकल प्रख्यात होती जा रही है जिसे हम यांत्रिक उर्जा मे परिवर्तित करके पवन चक्की चलाते है। समय समय पर किये गये शोध उर्जा के नये रूप और रूपांतर को प्रस्तुत कर रहे है और अनुसंधान केंद्र भी ज्यादा से ज्यादा उर्जा विकास और उपयोग पर ध्यान दे रहे है, पर उर्जा संरक्षण को मानवीय अपेछाओं के अंतर्गत एक सुचारु रूप देना इतना भी आसान नही है। कई बार उर्जा संरक्षण के कार्य छेत्र मे ऐसी दुर्घट्नाये हो जाती है जो परोछ रूप से नुकसान भी पहुचाते है। अगर पीछे आविष्कार हुए बॉम्ब बनाने वाले शोधो को देखे तो उर्जा का एक विनाशकारी रूप भी दिखेगा। उर्जा के सिदधांत जितने पुराने है उतने ही कंठ्स्त भी है की अगर उर्जा को हम सही तरीके से प्रयोग मे नही लायेंगे तो उर्जा हमे नष्ट कर देगी।

जल भी उर्जा का महत्वपुर्ण स्तोत्र है इसका विद्युत उर्जा बनाने मे इस्तेमाल कर सकते है। इससे अन्य पदार्थो से बनने वाली उर्जा से हुए प्रदूषण से रोकथाम मिल सकती है। उर्जा संरछ्ण के सिदधांत ना सिर्फ विकसित विषय है परंतु जन जीवन को फलित करने और समाज को अग्रसर करने वाली प्द्ध्त्ती भी है।