आधुनिक प्रजनन विधियाँ

कई बार पति या पत्नी की किसी शारीरिक विकृति के कारण प्राकृतिक तरीके से गर्भाधान व संतान पैदा करने की अक्षमता उत्पन्न हो सकती है, जो कि काफ़ी निराशाजनक होता है। 

परन्तु आज के समय में विज्ञान व तकनीकी जगत में प्रगति के कारण पति-पत्नी कुछ खास विधियों का उपयोग कर अपनी सन्तान का सुख प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए कुछ अलग-अलग प्रकार की विधियाँ काम में लायी जा सकती हैं। इन विधियों को “सहायक जननप्रौद्योगिकी” कहते हैं।

ये निम्नलिखित हैं-

#1 परखनली शिशु(Test Tube Baby)

#2 युग्मक अन्तःफेलोपियन स्थानांतरण(G.I.F.T.)

#3 अन्तः जीवद्रव्यीय शुक्राणु बन्धन(I.C.S.I.)

#4 कृत्रिमगर्भाधान(A.I.)

परखनली शिशु(Test Tube Baby):

किसी स्त्री की अंडवाहिनियों में विकार होने के कारण या पुरुष में पर्याप्त शुक्राणु निर्माण न होने के कारण स्त्री को गर्भधारण न होने की समस्या हो जाती है। अंडवाहिनी विकार की स्थिति में किसी अन्य स्त्री के गर्भाशय से अण्डाणु ग्रहण किये जाते है तथा उस स्त्री के पति के शुक्राणु से मेल करवाकर निषेचन प्रक्रिया सम्पन्न करवाई जाती है। इससे युग्मनज निर्मित होते हैं। जब यह युग्मनज 32-कोशिकीय अवस्था में पहुँच जाता है तो इसका उस स्त्री के गर्भाशय में रोपण कर दिया जाता है तथा भ्रूण विकास की शेष सम्पूर्ण प्रक्रिया गर्भाशय में धीरे-धीरे चलती रहती है। इस प्रकार से जन्म लेने वाला शिशु को परखनली शिशु कहा जाता है।

विश्व में सफलतापूर्वक प्रथम परखनली शिशु का जन्म इंग्लैंड में हुआ था, जिसका नाम लुईस जॉय ब्राउन है।

भारत में सर्वप्रथम परखनली शिशु 3 अक्टूबर 1978 में कोलकाता में हुआ था, जिसका नाम कनुप्रिया अग्रवाल है।

युग्मक अन्त

फेलोपियन स्थानांतरण(G.I.F.T.) इसे अंग्रेजी में GameteIntra Fallopian Transfer कहते हैं। कुछ स्त्रियों के गर्भाशय में शुक्राणु से प्रतिरक्षा करने वाले  पदार्थ पाये जाते हैं, जिससे शुक्राणु व अण्डाणु का मेल न होने के कारण निषेचन सम्भव नही होता अर्थात  अंडाशय निर्माण न होने की समस्या पाई जाती है, जिस कारण स्त्री में गर्भधारण की क्षमता नही रहती।

फेलोपियन स्थानांतरण विधि में फेलोपियन नलिका के भीतर शुक्राणु व अण्डाणु का निषेचन करवाया जाता है तथा शेेेष प्रक्रिया गर्भाशय में चलती रहती है।

अन्तः जीवद्रव्यीय शुक्राणु बन्धन(I.C.S.I.)

इसे अंग्रेजी में IntraCytoplasmic Sperm Injection कहते हैं। इस विधि में पुरूष के शुक्राणुओं को प्रयोगशाला में संवर्धन देकर सीधे ही स्त्री के गर्भाशय में अण्डाणु प्रवेश करवा दिया जाता है। यह परखनली शिशुविधि से थोड़ी ही अलग है।

कृत्रिम गर्भाधान(A.I.)

इसे अंग्रेजी में Artificial Insemination कहते हैं। कुछ परिस्थितियों में पुरुषों में सम्भोग के दौरान बनने वाले वीर्य में गर्भाधान योग्य पर्याप्त शुक्राणु नही निर्मित हो पाते हैं अर्थात् वीर्य में शुक्राणुओं की कम मात्रा के कारण स्त्री गर्भ धारण नही कर पाती। ऐसी स्थिति में कृत्रिम गर्भाधान विधि का उपयोग किया जाता है। इसमें पुरुष का वीर्य एकत्र करके उस स्त्री के गर्भाशय में स्थापित करवाया जाता है तथा गर्भग्रहण होने के बाद की शेष प्रक्रिया गर्भाशय में पूरी होती रहती है। 

सरोगेसी

कई बार स्त्री के गर्भाशय सम्बन्धी समस्या के कारण किसी प्रजनन विधि के बाद भी गर्भ का विकास करने की क्षमता नही होती है, तो ऐसी स्थिति में अन्य युक्ति काम में ली जा सकती है। 

स्त्री के अण्डाणु व उसके पति के शुक्राणु का परस्पर कृत्रिम तरीके से निषेचन करवा दिया जाता है। फलस्वरूप युग्मनज का निर्माण तथा फिर भ्रूण अस्तित्व में आता है। जब यह भ्रूण 32 कोशिकीय अवस्था में होता है तो किसी अन्य स्त्री की सहमति से उसके गर्भाशय में उस भ्रूण को रोपित कर दिया जाता है तथा भ्रूण विकसित होते हुए शिशु के रूप में जन्मता है। यह प्रक्रिया ही सरोगेसी कहलाती है तथा ऐसी स्त्री को सरोगेट मदर या परिचारक माँ कहा जाता है| आधुनिक समय में यह प्रक्रिया काफी प्रचलन में है|