सबसे साधारण शब्दों में बीमारी का अर्थ है शरीर में किसी भी तरह का छोटा या बड़ा असंतुलन। और यह असंतुलन अनेक कारणों से हो सकता है। प्राकृतिक रूप से हमारे शरीर की संरचना छोटे मोटे रोगों से लड़ने में सक्षम है, और सही आहार और कसरत से इस क्षमता को काफी हद तक और भी बढ़ाया जा सकता है। परन्तु कई रोग एसे भी हैं, जो इस क्षमता से बाहर हो ही जाते हैं।

ऐतिहासिक रूप से मानव ने बीमारियों को ईश्वर के कोप, और पापों के दंड के रूप में देखा है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के उद्भव से पहले, चिकित्सकों के पास जाने की बजाये पुजारियों और तांत्रिकों इत्यादि के पास जाया जाना एक बड़ी ही स्वाभाविक बात होती थी।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार रोग  संक्रामक और असंक्रामक, दो तरह के होते हैं। संक्रामक रोग जो की बाहरी जीवाणुओं जैसे की बैक्टीरिया, फंगस, परिजंतु या पैरासाइट्स और वायरस के कारण होते हैं। ये जीवाणु शरीर में वायु, भोजन या पीने के पानी के ज़रिये, या फिर खुले ज़ख्मों, इत्यादि के ज़रिये प्रविष्ट होते हैं और बीमारियां उत्पन्न करते हैं। शरीर की रोग प्रतिकारक क्षमता के अनुसार साधारणतया ऐसे छोटे मोटे रोगों से शुरुवाती स्तर पर ही बच कर, इन्हे और अधिक जटिल होने से रोका जा सकता है। परन्तु कई बार चिकित्सकीय परामर्श और सहायता भी लेनी पड़ सकती है।  साधारणतया ऐसे रोगों की जितना जल्दी हो सके जांच करा लेना ही सबसे अच्छा इलाज होता है।  संक्रामक रोग, समय के साथ बढ़ते और शक्तिशाली होते जाते हैं और इसिलए, बचाव ही सबसे सही  चिकित्सा मानी जाती है।

असंक्रामक रोग, जीवाणुओं से नहीं होते, ये ना ही फैलते हैं और न ही जीवाणु रोधक दवाओं से ठीक होते हैं। ये रोग, अधिकतर जीवन शैली और बाहरी कारणों से होते हैं। त्वचा का कैंसर, उदाहरण के तौर पर, जीवाणुओ से नहीं, अपितु बहुत अधिक समय तक सूर्य की रौशनी में होने की वजह से हो सकता है। ह्रदय के रोग, और दौरे भी जीवाणुओं से नहीं अपितु लम्बे समय तक असंतुलित जीवन शैली के कारण होते हैं।

इसके अतिरिक्त, अनुवांशिक कारण भी कई रोगों का एक बड़ा महत्वपूर्ण हैं। ह्रदय का रोग भी, न केवल गलत जीवनचर्या अपितु माता या पिता के द्वारा आने वाली पीढ़ियों की जीन में प्रवेश कर सकता है, और कई बार बहुत समय के बाद, जीवन के काफी आगे के पड़ावों पर सामने आता है।