आकाशगंगा लाखों तारों का एक समूह होती है, जो गुरुत्वाकर्षण की शक्ति से एक-दूसरे के करीब होते हैं। इनका आकार अण्डाकार हो सकता है तथा कुछ आकाशगंगा अनियमित आकार में भी हो सकती हैं। 

हम पृथ्वी पर रहते हैं, जो कि एक ग्रह है। हमारे सौरमण्डल में पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य ग्रह भी मौजूद है। एक सौरमण्डल में कई ग्रह व अनगिनत तारे उपस्थित रहते हैं तथा यह विभिन्न गैसों व पदार्थों से युक्त रहता है। ऐसे ही कई सौरमण्डल मिलकर एक आकाशगंगा का निर्माण करते हैं। 

साधारण शब्दों में असंख्य तारों व ग्रहों तथा अन्य तत्वों व पदार्थों वाले कई सौरमण्डलों के मेल को आकाशगंगा कहते हैं। 

आकाशगंगा में भिन्नता की तरह इनके आकार में भी भिन्नता पाई जाती है। 

कई आकाशगंगायें अण्डे के आकार के समान होती है तथा इनके बाहरी ओर से भुजाओं की तरह एक आकृति निकलती हुई दिखाई पड़ती है। इसीलिए ऐसी आकाशगंगा को सर्पीली अण्डाकार आकाशगंगा भी कहते हैं।

कई आकाशगंगायें बड़े गोल आकार या वृत्त के आकार की होती है, जिन्हें दीर्घवृत्ताकार आकाशगंगा कहा जाता है। 

सबसे विशाल आकाशगंगा एबैल 2029 गैलेक्सी है। इसकी खोज 1990 में हुई थी। इसका व्यास 5.5 मिलियन प्रकाश वर्ष है, जो हमारी आकाशगंगा से लगभग 80 गुना बड़ा है। इस आकाशगंगा की रोशनी सूर्य से खरबों गुणा अधिक तीव्र है। यह समस्त ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी आकाशगंगा है। पृथ्वी से यह 107 करोड़ प्रकाश वर्ष की दूरी पर है।

पृथ्वी के सर्वाधिक नज़दीक मौजूद आकाशगंगा का नाम है- धनुबौनी। यह पृथ्वी से 70 हज़ार प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है। इसकी खोज को अधिक समय नही हुआ है। सन् 1994 में इस आकाशगंगा के अस्तित्व का पता लगाया गया था।

सबसे दूरस्थ दिखने वाली एंड्रोमेडा आकाशगंगा पृथ्वी से 23लाख 9हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। इसे दूरस्थ दिखने वाली इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसे सरल तरीके से नंगी आँखों से देखा जा सकता है। इसमें लगभग 300 खरब तारों का समूह है। इसका कुल व्यास 1 लाख 80 हजार प्रकाश वर्ष है।

सबसे चमकदार आकाशगंगा मैगेलेनिक क्लाउड को केवल दक्षिणी गोलार्द्ध से ही देखा जा सकता है। इसका व्यास 9 हज़ार प्रकाशवर्ष है। यह पृथ्वी से 1 लाख 70 हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। यह अन्य सभी आकाशगंगाओं की तुलना में सबसे अधिक चमकती हुई दिखाई पड़ती है।

सबसे प्रसिद्ध आकाशगंगा “मिल्की वे” है। इसका व्यास 1 लाख प्रकाश वर्ष है। यह हमारी आकाशगंगा है अर्थात् इसी आकाशगंगा में हमारी पृथ्वी विद्यमान है। इस आकाशगंगा को शुद्ध हिंदी में “मन्दाकिनी” भी कहा जाता है। मन्दाकिनी अर्थात् गंगा की तरह हमारी आकाशगंगा को पवित्र माना गया है।

इसके अलावा इसे “क्षीरसागर” भी कहा जाता है।

हमारी आकाशगंगा का मिल्की वे व क्षीरसागर नाम रखने का एक मुख्य कारण है, जिसके बारे में आपको जानकारी देना आवश्यक है।

चूँकि अंग्रेजी ने मिल्क का अर्थ होता है- दूध और हिंदी में क्षीर का अर्थ होता है- दूध।

असल में जब इस आकाशगंगा को अंतरिक्षयान की सहायता से दूर से देखा जाता है तो यह दूध की तरह श्वेत (सफेद) रंगत की दिखाई पड़ती है। इसी वजह से इसका नाम मिल्की वे रखा गया। हमारी आकाशगंगा अण्डाकार है, जिसकी भुजाएं भी मौजूद हैं।

यह आवश्यक नही कि प्रत्येक आकाशगंगा किसी न किसी निश्चित आकार में ही हो। कुछ आकाशगंगायें अनियमित रूप से अनिश्चित आकार की होती हैं। 

ब्रह्माण्ड में पाई जाने वाली आकाशगंगायें अनन्त हैं। अब तक बहुत सारी आकाशगंगायें खोजी जा चुकी हैं। इनका विस्तार क्षेत्र अथाह है। हम अनुमान भी नही लगा सकते कि ब्रह्माण्ड में कितने तरह के ग्रह मौजूद है। इनका जहाँ तक विस्तार है, वहाँ तक शायद हम कभी भी नहीं पहुँच सकते।

ध्यान देने योग्य बात है कि यदि इतनी आकाशगंगायें अस्तित्व में हैं तो हो सकता है कि पृथ्वी के तरह कोई ओर भी ग्रह हो जहाँ जीवन सम्भव हो या शायद मनुष्यों की भाँति ही कोई प्राणी या जीव मौजूद हो। अगर इस बारे में विचार करें तो बहुत सी बातें दिमाग में आती है तथा विभिन्न सम्भावनाएं पैदा होती हैं और तरह-तरह के प्रश्न उठते हैं। 

हालांकि आज तकनीकी व वैज्ञानिक तौर पर इतनी अधिक प्रगति हो चुकी है कि साधारण मनुष्य के ज्ञान से परे नए-नए तथ्य व ज्ञान की प्राप्ति हुई है। ब्रह्माण्ड के बारे में इतनी गहरी बातों से अवगत होने से मनुष्य का ज्ञानवर्द्धन हुआ है|