सिद्धांत

जब कोइ ठोस चीज़ किसी द्रव्य मे डाली जाये तो उस द्रव्य से ठोस वस्तु पर लगने वाला उत्प्लावन बल (Buoyancy) ही अर्किमिडिज के सिद्धांत को दर्शाता है।

इसके अनुसार हम ये भी समझ सकते है कि कोइ भी चीज़ तरल माध्यम मे डालने से या तो तैरने लगती है या डूब जाती है या तो आधी डूबी रह्ती है।

अर्किमिडिज का सिद्धांत उत्छेप पर आधारित है। इसका मतलब है कि अगर ठोस वस्तु का वजन विस्थापित तरल के वजन से ज्यादा है तो ठोस वस्तुपर उत्छेप होता है और जैसे जैसे ठोस वस्तु विस्थापित तरल से ज्यादा वजनीय होती जाती है तो अंततः तरल पदार्थ मे डूब जाती है।

जिसका दुसरा प्रारुप यह है कि जब ठोस वस्तु का वजन विस्थापित तरल के वजन से कम है तो वस्तु उत्प्लावन बल (Buoyancy) को ज्यादा हावी पाती है और तरल पदार्थ मे तैरने लगती है।

तीसरा प्रारूप यह है कि ठोस वस्तु का वजन अगर विस्थापित किये तरल के वजन के बराबर है तो संतुलन के सिदधांत के अनुसार ठोस वस्तु आधी तैरती और आधी तरल माध्यम मे डूबी दिखाई देती है।

इस उत्प्लावन बल (Buoyancy) को हम मछ्लियों मे भी देख सकते है। मछ्लियो के अंदर तैराकी के लिये एक आशय दिया होता है जिसमे मछ्लिया हवा भर सकती है या जिससे हवा बाहर निकाल सकती है।

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जब मछ्लिया तैरना चाह्ती है तो अपने स्विम ब्लैडर मे हवा भर लेती है, जिससे उनका आयत बढ जाता है और पानी के उत्प्लावन बल (Buoyancy) के कारण वो तैरने लगती है। जब मछ्लिया पानी के अंदर जाना चाह्ती है तो स्विम ब्लैडर मे भरी हुइ सारी हवा बाहर निकाल देती है जिससे उनका आयत कम और वजन ज्यादा बढ्ने लगता है, इससे पानी पर उनका वजन बढ्ता है और मछ्लिया अंदर चली जाती है।

अर्किमिडिज के सिद्धांत को किसी अनियमित आकार के वस्तु के आयतन को जानने के लिये किया जाता है यानि उस वस्तु को जिसका आयतन जानना है उसे तरल पदार्थ मे डालने के बाद जितने वजन के तरल पदार्थ को विस्थापित करे, उतना ही उस वस्तु का वजन होगा। इसे किसी भी वस्तु के घनत्व और विशिष्ट घनत्व को जानने के लिये इस्तेमाल करते है।

उदाहरणतया, जब किसी वस्तु का घन्त्व पानी से ज्यादा है तो पहले उस वस्तु का वजन हवा मे करते है और फिर उस वस्तु का वजन पानी मे डालके करते है, इससे जो घनत्व मे फर्क़ आता है उससे हम विशिष्ट घनत्व का मान निकालते है।

अर्किमिडिज के सिद्धांत का सबसे अच्छा प्रयोग माना गया जहाज़ और पंडुब्बी को।

इस उत्प्लावन बल (Buoyancy) के विज्ञान को लेकर आज जहाज और पंडुब्ब्बियां अपने विस्त्रित और विकसित रूप मे एक सुचारु कर्यप्रणाली के अंतर्गत काम कर रही है।

पंडुब्ब्बी के अंदर जो बळॉस्ट टैंक होता है वो बिल्कुल मच्छ्लियों के स्विम ब्लैडर की तरह होता है जिसमे से अगर पानी खाली कर दिया जाये तो हल्के वजन के कारण पंडुब्ब्बी उपर आ जाती है। जब ये बळॉस्ट टैंक भरे हुए होते है तो ज्यादा वजनीय होने की वजह से पानी के अन्दर चले जाते है जिससे पानी के अंदर सफर तय करना मुमकिन हो पाता है।

इस सिदधांत का प्रयोग गर्म हवा से भरे गुब्बारे मे भी किया जाता है जहां गर्म हवा के प्रयोग से गुब्बारे हवा मे तैरने लगते है है क्योकि गर्म हवा ज्यादा हल्की होती है वही तापमान कम होने से हवा का घनत्व घट्ता जाता है और वजन बढ्ता जाता है जिससे गुब्ब्बारा नीचे की ओर जाने लगता है। अर्किमिडिज ने इस ऐतिहासिक सिदधांत को अपने घर मे नहाते वक़्त ट्ब के अंदर अपने शरीर के पानी पर पड़्ते वजनीय प्रभाव से जाना था । तो इतना ही सरल था एक वैज्ञानिक के रोज़्मर्रा की ज़िंदगी का द्रिष्टिकोण जो अर्किमिडिज के उत्प्लावन बल (Buoyancy) का सिदधांत बन गय।