क्या विटामिन D की कमी से हो सकता है, बुजुर्गों में तनाव? | Deficiency of vitamin D in Hindi

क्या है, विटामिन D?

विटामिन D शरीर के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है, जो हमे सूर्य के प्रकाश एवं भोजन से प्राप्त होता है|

हाल ही में हुए अध्ययनों में वैज्ञानिकों ने यह बात साबित की, कि विटामिन D के अभाव में शरीर कई तरह की बीमारियों से ग्रसित हो जाता है, एवं बढती उम्र के साथ-साथ विटामिन D की कमी के घातक परिणाम हो सकते है|

हाल ही में हुए शोध में पेनकोफर नामक लेखक ने अपनी रिसर्च में इस बात का पता लगाया की, विटामिन D अनेक प्रकार के रोगों जैसे, दिल की बीमारी, तनाव, सोचने समझने की शक्ति, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, जोड़ों में दर्द आदि के लिए जिम्मेवार होता है, एवं यदि यह पर्याप्त मात्रा में आपके शरीर में मौजूद है, तो इन बीमारियों एवं अन्य कई स्वास्थ्य सम्बन्धित समस्याओं से लड़ने में सहायक होता है|

कैसे होती है, विटामिन D की कमी?

भोजन में जरूरी तत्वों की कमी एवं सूर्य के प्रकाश से वंचित रहना विटामिन D की कमी का प्रमुख कारण है| विटामिन D को हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माना जाता है, यह शरीर में मौजूद कैल्शियम का अवशोषण करके उसे अन्य भागों तक पहुचाता है एवं शरीर की सभी कोशिकाओं को स्वस्थ रखने का कार्य करता है|

इससे हड्डियों को मजबूती मिलती है, एवं जोड़ो में सूजन या दर्द की सम्भावना भी कम रहती है| यह शीघ्रता से वसा में घुल जाता है एवं सूर्य की रोशनी में बैठने पर शरीर अपने आप इसका निर्माण करता है एवं प्रतिपूर्ति करता है|

विटामिन D की कमी के लक्षण:

यह बात स्मरण रखने योग्य है कि भोजन से केवल दस प्रतिशत तक विटामिन D की कमी की पूर्ति होती है, शेष नब्बे प्रतिशत कमी सूर्य द्वारा होती है, इसलिए यदि आप ऐसा भोजन करते है, जिसमे विटामिन D हो परन्तु सूर्य से वंचित है तो आपके शरीर में विटामिन D की कमी होना स्वाभाविक है, जिसके महत्वपूर्ण लक्ष्ण इए प्रकार है:-

हड्डियों में कमजोरी आना एवं जोड़ो में दर्द रहना

असमय बालों का झड़ना

पाचन क्रिया का कमजोर पड़ना

उदास एवं तनावग्रस्त रहना

बार-बार बीमार पड़ना या संक्रमित होना आदि|

बुजुर्गों में विटामिन D की कमी के कारण:

आधुनिक युग में बुजुर्गों में विटामिन D की कमी के अत्यधिक मामले सामने आये है, जिसमे यह तथ्य उजागर हुआ की, वृद्ध लोगों को सही आहार न मिलने एवं उनकी शारीरिक हालत कई बार ठीक न होने के कारण वे सूर्य के प्रकाश से वंचित रह जाते है, जिससे विटामिन D की काफी कमी हो जाती है|

बुजुर्गों में विटामिन D की कमी अवसाद का रूप धारण कर लेती है, जिससे उनका किसी कम में मन नही लगता एवं तनावपूर्ण स्थिति बन जाती है एवं कई प्रकार के रोग उनके शरीर को घेर लेते है, जैसे थकान अनुभव करना, जोड़ो में दर्द एवं सूजन, उदास रहना, घाव का जल्दी न भरना एवं पाचन सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ता है|

उपरोक्त लक्षण नजर आने पर जाँच के द्वारा विटामिन D की कमी का पता लगाया जा सकता है एवं उम्र के मुताबिक डाक्टर की सलाह से दवाई का सेवन शुरू किया जाना चाहिए|

विटामिन D की कमी से बचाव के उपाय:

विटामिन D की कमी को दूर करने का सबसे अच्छा उपाय सूर्य की रोशनी में 20 से 30 मिनट तक बैठना है, यदि गर्मियों का मौसम है तो आप सुबह उगते सूर्य की किरणों में बैठे एवं सर्दियों में आप किसी भी समय सूर्य की रोशनी में बैठ सकते है|

इसके साथ ही विटामिन D से युक्त आहार जैसे दूध, पनीर, मछली, अंडे, मशरूम आदि का सेवन करे| लीवर या किडनी के रोगी विटामिन D की कमी से जल्दी प्रभावित होते है, अत: लीवर को ठीक करने हेतु आवश्यक दवाइयों का सेवन करे|

बुजुर्ग लोगों का विशेष रूप से ध्यान रखा जाये एवं उन्हें रोजाना धूप में थोड़ी देर बिठाया जाए| इसके साथ ही विटामिन D की अत्यधिक कमी खतरनाक साबित हो सकती है, इसलिए विशेषज्ञ की सलाह की सलाह से इससे सम्बंधित सप्लीमेंट्स एवं दवाइयों का सेवन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए|

विटामिन D की अधिक कमी होने से बच्चों को अस्थमा, वयस्कों में कैंसर, बाँझपन, एवं ओस्टियोमलेसिया नामक बीमारी हो सकती है| इसमें पांच वर्ष के बच्चो में विटामिन D की कमी होने के ज्यादा संकेत मिलते है इसलिए उनका खास ख्याल रखा जाना चाहिए|

सिर दर्द क्यों होता है? Why we have headache in Hindi

सिरदर्द होना आम समस्या है, परन्तु इसके होने की वजह आम हो; यह जरूरी नही है। कई बार सामान्य कारणों से सिरदर्द होने लगता है तथा कई बार सिरदर्द कुछ गंभीर रोगों की ओर इशारा करता है। इसके कारणों को तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है, जिनमें हैं- 

आंतरिक कारण

बाह्य कारण

अन्य कारण

आंतरिक कारण-

इसमें शरीर के भीतर होने वाले कुछ विकारों या रोगों की वजह से सिरदर्द होता है। ऐसा सिरदर्द कई बार घातक समस्या की ओर भी संकेत करता है। आंतरिक कारण निम्नलिखित हैं-

मस्तिष्क सम्बंधी समस्या- मस्तिष्क शोथ या मस्तिष्काघात, अवसाद ग्रस्त होने से मस्तिष्क की नसों में खिंचाव व सूजन की समस्या पैदा होती है, जिससे सिरदर्द होने लगता है। यह चिंताजनक है क्योंकि कई बार गंभीर रोग का रूप भी ले सकता है।

गैस- खाली पेट रहने या तले व गरिष्ठ भोजन के सेवन से कई बार पेट में गैस बन जाती है तथा पाचन तन्त्र भी खराब हो जाता है। यह गैस शरीर में गति करती हुई सिर तक पहुँच जाती है तथा सिरदर्द का रूप ले लेती है।

तनाव- कई बार किसी विषय पर लगातार सोचने से चिंताजनक रूप ले लेता है, जिससे तनाव उत्पन्न होता है। तनाव के कारण हमारी नसों में खिंचाव पैदा हो जाता है। इससे सिरदर्द की समस्या खड़ी हो जाती है।

असन्तुलित रक्तप्रवाह- रक्त प्रवाह का सन्तुलन ऊँचा या नीचा होने से भी रुधिर वाहिकाओं में रक्त संचालन कम या ज्यादा होने से सिर में दर्द का अनुभव हो सकता है।

नींद की कमी- नींद की कमी के कारण दिमाग़ी थकावट हो जाती है तथा मस्तिष्क को आराम न मिलने के कारण नसों में दर्द हो सकता है, जिससे सिरदर्द का कारण पैदा होता है। इसके अतिरिक्त नींद पूरी न होने के कारण आँखों में भी थकान हो जाती है तथा आँखों की रोशनी पर भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। इसके कारण भी सिरदर्द हो सकता है।

बाह्य कारण-

बाहरी रूप से शरीर के किसी हिस्से में कोई परेशानी होने से भी सिरदर्द हो जाता है। ये कारण निम्नलिखित हैं-

कान के रोग- कान की नसों का सम्बन्ध सिर की नसों से होता है तथा कान के साथ ही सिर मौजूद होता है। कान का कोई रोग या कान दर्द होने के कारण आपसी समीप्य से वह दर्द नसों से होता हुआ सिर तक पहुँच जाता है। अतः कान की समस्या के साथ सिरदर्द की भी समस्या होना सामान्य है।

थकावट- कई बार लगातार काम करते रहने व भागदौड़ से शारीरिक थकान हो जाती है। यह थकान कई बार गति करती हुई हमारे सिर की नसों तक पहुँच कर उनमे दर्द पैदा कर देती है। अतः थकावट आना भी कई बार सिरदर्द का कारण बन सकता है।

फोड़ा या फुँसी- मनुष्य शरीर रोगों से घिरने में समय नही लेता। फोड़ा या फुँसी जैसी समस्या होना आम बात है। जब यह कान या सिर या गर्दन के आसपास हो जाते है तो इनमे मवाद के कारण चारों ओर रह रह कर होने वाले दर्द की समस्या खड़ी करते हैं। अतः सिर के आस पास फोड़ा या फुँसी होने पर सिरदर्द हो सकता है।

अन्य कारण-

इसमें वे कारण शामिल किये जाते हैं जो न तो शरीर के आंतरिक भाग से सम्बंधित है और न ही बाह्य भाग से। ऐसे अन्य कारण निम्नलिखित हैं-

चुस्त कपड़े- कई बार फैशन के चक्कर में फसे हुए तंग कपड़े पहनने से पेट पर दबाव पड़ने से नसों में कसाव महसूस होता है। यह दबाव भी कई बार सिरदर्द का कारण बनता है।

कैफ़ीन- कॉफी या चाय का अनावश्यक मात्रा में सेवन करने से कुछ नशा हो जाता है। जिससे सिर में भारीपन महसूस होता है तथा सिर घूमता रहता है। अतः कैफ़ीन की अधिक मात्रा भी सिरदर्द का कारण बनती है।

अधिक ठण्डा पदार्थ- कई बार अधिक ठण्डा पदार्थ का सेवन करने से अचानक से नसों में सिकुड़न हो जाती है। नसों में होने वाली इस हलचल से सिरदर्द की समस्या उत्पन्न हो सकती है।

वातावरण का असर- वातावरण का असर तो शरीर पर पड़ता ही है। मौसम में बदलाव के कारण शरीर में कई क्रियाएँ व प्रतिक्रियाएँ होना सामान्य बात है। शुरूआती सर्दी या गर्मी या वर्षाऋतु में कई बार शरीर में बदलाव के कारण सिरदर्द हो सकता है। अतः बदलता वातावरण भी कई बार सिरदर्द की वजह बन सकता है।

खुशबू- परफ्यूम या सेंट या डीयो आदि की महक से कई बार कुछ लोगो को एलर्जी होती है। अत्यधिक तेज सुगंध कई बार सिर तक पहुँच जाती है तथा सिरदर्द पैदा करती है। अत: ऐसे उत्पादों से दूर रहना बेहतर होता है|

फोन का अत्यधिक इस्तेमाल- फोन पर अधिक देर तक बात करने से या नजरें टिकाये रखने से मस्तिष्क की नसों को आराम नही मिल पाता तथा आँखें भी थक जाती है। इससे भी सिरदर्द की शिकायत हो सकती है।

शोर- शांतिप्रिय लोगों को अत्यधिक शोर सुनने की आदत नही होती है। लेकिन कई बार अधिक तेज आवाज़ उनके कानों व मस्तिष्क पर बजने से दबाव पैदा करती है, जिससे सिरदर्द हो सकता है।

लू लगना- गर्मी की अधिकता के कारण कई बार लू के आघात का सीधा असर सिर पर होता है। अतः अधिक गर्मी में भी कई बार सिरदर्द होने लगता है। अत: अत्यधिक गर्मी में घर से बाहर निकलने से परहेज करे|

उपर्युक्त वर्णित के अलावा रजोवृति या रजोधर्म, गर्भनिरोधक दवाइयों का सेवन, खान-पान में लापरवाही, विटामिन्स की अल्पता, शारीरिक तन्त्र में असन्तुलन, ज़ुकाम, गले के रोग, मिर्गी आदि अनेक प्रकार के कारणों से सिरदर्द हो सकता है। कई बार कुछ ठंडा खाने या पीने से भी सिर में दर्द हो जाता है, इसलिए अचानक कुछ ठंडा न खाए|

कई बार सिरदर्द कम होता है और कई बार अत्यधिक तेज़, जिसे केवल एक बार में सामान्य दवाई लेकर ठीक किया जा सकता है। परन्तु यदि सिरदर्द असहनीय हो जाए और दवाई लेने पर भी ठीक न हो तो ऐसी स्थिति में डॉक्टर से अवश्य सलाह लेनी चाहिए और यदि जरूरी हो तो कारण जानने हेतु आवश्यक जाँच भी करवाई जानी चाहिए, ताकि यह संतुष्टि हो जाए कि कहीं यह सामान्य सा लगने वाला सिरदर्द किसी गम्भीर रोग की ओर संकेत न करता हो|

आधुनिक प्रजनन की विधियाँ

आधुनिक प्रजनन विधियाँ

कई बार पति या पत्नी की किसी शारीरिक विकृति के कारण प्राकृतिक तरीके से गर्भाधान व संतान पैदा करने की अक्षमता उत्पन्न हो सकती है, जो कि काफ़ी निराशाजनक होता है। 

परन्तु आज के समय में विज्ञान व तकनीकी जगत में प्रगति के कारण पति-पत्नी कुछ खास विधियों का उपयोग कर अपनी सन्तान का सुख प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए कुछ अलग-अलग प्रकार की विधियाँ काम में लायी जा सकती हैं। इन विधियों को “सहायक जननप्रौद्योगिकी” कहते हैं।

ये निम्नलिखित हैं-

#1 परखनली शिशु(Test Tube Baby)

#2 युग्मक अन्तःफेलोपियन स्थानांतरण(G.I.F.T.)

#3 अन्तः जीवद्रव्यीय शुक्राणु बन्धन(I.C.S.I.)

#4 कृत्रिमगर्भाधान(A.I.)

परखनली शिशु(Test Tube Baby):

किसी स्त्री की अंडवाहिनियों में विकार होने के कारण या पुरुष में पर्याप्त शुक्राणु निर्माण न होने के कारण स्त्री को गर्भधारण न होने की समस्या हो जाती है। अंडवाहिनी विकार की स्थिति में किसी अन्य स्त्री के गर्भाशय से अण्डाणु ग्रहण किये जाते है तथा उस स्त्री के पति के शुक्राणु से मेल करवाकर निषेचन प्रक्रिया सम्पन्न करवाई जाती है। इससे युग्मनज निर्मित होते हैं। जब यह युग्मनज 32-कोशिकीय अवस्था में पहुँच जाता है तो इसका उस स्त्री के गर्भाशय में रोपण कर दिया जाता है तथा भ्रूण विकास की शेष सम्पूर्ण प्रक्रिया गर्भाशय में धीरे-धीरे चलती रहती है। इस प्रकार से जन्म लेने वाला शिशु को परखनली शिशु कहा जाता है।

विश्व में सफलतापूर्वक प्रथम परखनली शिशु का जन्म इंग्लैंड में हुआ था, जिसका नाम लुईस जॉय ब्राउन है।

भारत में सर्वप्रथम परखनली शिशु 3 अक्टूबर 1978 में कोलकाता में हुआ था, जिसका नाम कनुप्रिया अग्रवाल है।

युग्मक अन्त

फेलोपियन स्थानांतरण(G.I.F.T.) इसे अंग्रेजी में GameteIntra Fallopian Transfer कहते हैं। कुछ स्त्रियों के गर्भाशय में शुक्राणु से प्रतिरक्षा करने वाले  पदार्थ पाये जाते हैं, जिससे शुक्राणु व अण्डाणु का मेल न होने के कारण निषेचन सम्भव नही होता अर्थात  अंडाशय निर्माण न होने की समस्या पाई जाती है, जिस कारण स्त्री में गर्भधारण की क्षमता नही रहती।

फेलोपियन स्थानांतरण विधि में फेलोपियन नलिका के भीतर शुक्राणु व अण्डाणु का निषेचन करवाया जाता है तथा शेेेष प्रक्रिया गर्भाशय में चलती रहती है।

अन्तः जीवद्रव्यीय शुक्राणु बन्धन(I.C.S.I.)

इसे अंग्रेजी में IntraCytoplasmic Sperm Injection कहते हैं। इस विधि में पुरूष के शुक्राणुओं को प्रयोगशाला में संवर्धन देकर सीधे ही स्त्री के गर्भाशय में अण्डाणु प्रवेश करवा दिया जाता है। यह परखनली शिशुविधि से थोड़ी ही अलग है।

कृत्रिम गर्भाधान(A.I.)

इसे अंग्रेजी में Artificial Insemination कहते हैं। कुछ परिस्थितियों में पुरुषों में सम्भोग के दौरान बनने वाले वीर्य में गर्भाधान योग्य पर्याप्त शुक्राणु नही निर्मित हो पाते हैं अर्थात् वीर्य में शुक्राणुओं की कम मात्रा के कारण स्त्री गर्भ धारण नही कर पाती। ऐसी स्थिति में कृत्रिम गर्भाधान विधि का उपयोग किया जाता है। इसमें पुरुष का वीर्य एकत्र करके उस स्त्री के गर्भाशय में स्थापित करवाया जाता है तथा गर्भग्रहण होने के बाद की शेष प्रक्रिया गर्भाशय में पूरी होती रहती है। 

सरोगेसी

कई बार स्त्री के गर्भाशय सम्बन्धी समस्या के कारण किसी प्रजनन विधि के बाद भी गर्भ का विकास करने की क्षमता नही होती है, तो ऐसी स्थिति में अन्य युक्ति काम में ली जा सकती है। 

स्त्री के अण्डाणु व उसके पति के शुक्राणु का परस्पर कृत्रिम तरीके से निषेचन करवा दिया जाता है। फलस्वरूप युग्मनज का निर्माण तथा फिर भ्रूण अस्तित्व में आता है। जब यह भ्रूण 32 कोशिकीय अवस्था में होता है तो किसी अन्य स्त्री की सहमति से उसके गर्भाशय में उस भ्रूण को रोपित कर दिया जाता है तथा भ्रूण विकसित होते हुए शिशु के रूप में जन्मता है। यह प्रक्रिया ही सरोगेसी कहलाती है तथा ऐसी स्त्री को सरोगेट मदर या परिचारक माँ कहा जाता है| आधुनिक समय में यह प्रक्रिया काफी प्रचलन में है|

मानव शरीर में सबसे मजबूत मांसपेशी कौनसी है

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मानव शरीर में मांसपेशियों के तीन तरह के ऊतक पाए जाते हैं, जिन्हें चिकनी, ह्रदय और कंकाल नाम दिया गया है। मानव शरीर की संरचना में 600 तरह की कंकाल की मांसपेशियों को शामिल किया गया है। इन सब में जो सबसे बड़ी मांसपेशी होती है जो समूह के साथ काम करती है, वो सबसे अधिक और निर्णायक काम करती है।  मानव शरीर की सबसे मजबूत मांसपेशी इस प्रकार है।

दिल

सबसे जटिल काम करने वाली मांसपेशी दिल है, दिल में पाई जाने वाली मांसपेशी को कार्डियक मांसपेशी कहा जाता है। यह शरीर का सबसे जटिल काम करती है। एक स्वस्थ वयस्क का दिल एक मिनट में 72 बार धड़कता है, इस हिसाब से अगर देखा जाए तो  दिन में 100,000 बार; साल में 3,600,000 बार; और 70 साल की उम्र तक आते-आते यह 2.5 अरब बार धड़क जाता है।

मस्सेटर:

यह मांसपेशी शरीर के जबड़े में स्थित होती है, यह खाने और चबाने में सहायता करती है। एक आदमी के औसत काटने की क्षमता 117 से 265 पाउंड के बीच की होती है। वहीं अगर बाहरी वस्तु पर बल लगाने की क्षमता का माप लिया जाए तो वो पूर्ण शक्ति का एक उदहारण होता है।

सोलेयस:

शरीर की एकमात्र काफ मांसपेशी को सोलेयस कहा जाता है, यह मांसपेशी शरीर में खिंचाव उत्पन्न करने का काम करती है। जब हम खड़े होते हैं यह मांसपेशी हमारे शरीर को सीधा रखती है तथा यह लगातार गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ़ लड़ाई लड़ती रहती है। यह गतिशील के साथ-साथ शरीर में विस्फोटक शक्ति उत्पन्न करने का काम भी करती है।

ग्लूटस मैक्सिमस

मानव शरीर की सबसे बड़ी मांसपेशी को ग्लूटस मैक्सिमस कहा जाता है। यह मांसपेशी बड़ी और शक्तिशाली है। यह मांसपेशी शरीर में ट्रंक को एक स्थिर मुद्रा में रखने के काम करता है। यह मांसपेशी प्रमुख तरह से एंटीग्रैविटी मांसपेशी की तरह व्यवहार करती है जो सीढियों पर चलने में मदद करती है।

जिम से आने के बाद शरीर की मांसपेशियों में दर्द क्यों होता है

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जब आप जिम में खूब पसीना बहाते हो या सही तरीके से कसरत करते हो तो आपकी मांसपेशियों में दर्द होने लगता है।  यह भी माना जाता है कि कसरत के दौरान अगर आपकी मांसपेशी में दर्द नहीं हुआ तो इसका मतलब यह है कि आपने सही मायने में कसरत नहीं की।  कई लोग इस दर्द से बचने के लिए कम कसरत करते हैं या सही तरीके से कसरत नहीं करते हैं। कसरत के बाद हमारी मांसपेशियों में दर्द होना बेहद जरुरी है।  इसी से हमें इस बात का अंदाजा लगता है कि हमने अपने शरीर पर कितनी मेहनत की।

दरअसल मांसपेशी में दर्द होने की वजह आपकी मांसपेशी में आने वाला खिंचाव है। इससे इस बात का भी पता लगता है कि आपके मांसपेशी अब रिकवरी की स्थिति में आ गयी है। जिसकी वजह से आपकी मांसपेशी न सिर्फ मजबूत होगी बल्कि यह पहले से भी बड़ी हो जाएगी। यही वजह है कि कसरत या जिम करने के बाद मांसपेशियों में दर्द होता है।

जिम ट्रेनर आपको हिदायत देते हैं कि एक सेट लगाने के बाद वेट बढ़ा लेना चाहिए। दरअसल वो इसलिए ताकि आप प्रिंसिपल मांसपेशी को कन्फ्यूज कर सकें। वहीं इसकी वजह यह है कि मांसपेशी पर ज़्यादा से ज़्यादा दबाव देने से यह और मजबूत होती है। दरअसल हमारा शरीर किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं चाहता जब हम जिम से इसमें बदलाव करने की कोशिश करते हैं तो मांसपेशी में दर्द होने लगता है।

एक हफ्ते लगातार जिम करने से आपकी मांसपेशी में दर्द होता है मगर उसके बाद वो दर्द कम हो जाता है, इसके पीछे यह वजह है कि आपका शरीर अब इस बदलाव में ढल गया है। और अब आपके शरीर की मांसपेशियों ने इस पर प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया है।

हम अक्सर बीमार क्यों पड़ते है?

आपने कई बार सुना होगा कि बीमारी कभी बताकर नहीं आती| बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है, कि हम अपने शरीर का पूरा ध्यान रखते है, कभी गलत दिनचर्या का पालन नहीं करते, फिर भी हम बीमार क्यों होते है?

जैसे-जैसे विज्ञानं ने तरक्की की है, वैसे-वैसे कई नई खतरनाक बीमारियां भी अस्तित्व में आई है, जिनके बारे में न पहले सुना गया न देखा गया| आधुनिकीकरण के साथ-साथ विभिन्न रोगों ने मनुष्य को अपना शिकार बनाया है, इनमे से कुछ तो ऐसी है, जिनका कोई इलाज या उपचार अभी तक नहीं खोजा गया है|

परन्तु हमारा यह मानना है, कि यदि आप बीमारी आने से पूर्व कुछ विशेष सावधानी रखे तो इसके परिणाम को कुछ सीमा तक कम किया जा सकता है| आज हम यहाँ इसी की चर्चा करेंगे, कि अक्सर हम बीमार क्यों पड़ते है, आइये इसके कारणों पर थोडा विचार करते है:-

रोगाणु:

रोगाणु को शरीर को बीमार के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेवार समझा जाता है| इसमें से कई रोगाणु ऐसे होते है, जिनपर दवाओ का कोई असर नहीं होता और ये लम्बे समय तक शरीर को बीमार कर सकते है|

रोग-प्रतिरोधक क्षमता की कमी:

किसी भी प्रकार के संक्रमण या बीमारी से लड़ने के लिए शरीर की रोग-प्रतिरोधी क्षमता का शक्तिशाली होना अनिवार्य है, अगर आपकी रोग-प्रतिरोधी शक्ति कमजोर है, तो आप जल्दी बीमारी की चपेट में आयेंगे एवं शीघ्रता से ठीक भी नहीं हो सकेंगे|

दवाइयों का अधिक सेवन:

अक्सर हम छोटी-मोटी बीमारी में दवाइयों का अधिक सेवन करने से बाज नहीं आते बिना यह जाने की एंटीबायोटिक दवाई से शरीर का कितना नुकसान होता है एन शरीर के प्राक्रतिक बीमारी से लड़ने की क्षमता का ह्रास होता जाता है| छोटे बच्चों को भी दवाइयों का सेवन करवाया जाता है, जिससे उनकी रोग-प्रतिरोधी क्षमता समाप्त हो जाती है एवं वे कभी स्वस्थ नहीं रह पाते|

पर्यावरण प्रदूषण:

अधिकतर लोगों की बीमारी का कारण पर्यावरण में मौजूद प्रदूषण भी होता है| वातावरण में विद्यमान छोटे-छोटे कीटाणु एवं रोगाणु श्वास के द्वारा आपके शरीर में प्रवेश करते है एवं विभिन्न रोगों का कारण बनते है| इसलिए स्वाइन फ्लू, इबोला, बर्ड फ्लू जैसे घातक रोग सामने आये जिनका पहले कोई अस्तित्व नहीं था|

साफ-सफाई में कमी:

साफ-सफाई में कमी जैसे अपने आसपास के वातावरण को गंदा रखना, फल, सब्जियां आदि बिना धोये हुए इस्तेमाल करना, गंदे शौचालय में जाना, बिना हाथ धोये खाना आदि कई प्रकार की जानलेवा बीमारियों को निमत्रण देते है|

निष्कर्ष:

इस प्रकार इन छोटी-छोटी लापरवाही के चलते आप न चाहते हुए भी बीमार हो जाते है| यदि आप इन कारणों पर गौर करेंगे तो पायेंगे की अधिकतर बीमारियाँ आपके स्वयं के कारण ही पैदा होती है|

अत: स्मरण रखे कि कोई भी बीमारी अचानक से आपके शरीर को निशाना नहीं बनाती, इसलिए सावधानी एवं जागरूकता अनिवार्य है| बचपन से ही बच्चों को स्वच्छता की आदत डाले| जब तक आवश्यक न हो, दवाई लेने से परहेज करे एवं शरीर को उससे लड़ने दे|

समझदारी एवं आपकी जागरूकता बहुत सी परेशानियों से निजात दिला सकती है|

पोषक पदार्थ

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“पहला सुख निरोगी काया” यह तथ्य जनसामान्य में सर्वविदित है। प्रत्येक मनुष्य जानता है कि स्वस्थ शरीर ही सुखी जीवन का प्रथम आधार है और यदि अन्य सुख प्राप्त हो जाये, परन्तु शरीर ही रोगमुक्त और स्वस्थ न हो तो बाकी सब सुख फीके लगने लगते हैं। अतः रोगविहीन शरीर के लिए सबसे महत्वपूर्ण है- पोषक पदार्थ। यदि मनुष्य के शरीर में पोषक पदार्थ उपयुक्त मात्रा में है तो वह रोगविहीन शरीर के साथ जीवन के अन्य सभी सुखों व आनन्द को प्राप्त करके खुशमय जिंदगी व्यतीत कर पाता है।

प्रत्येक जीव के लिए पोषक पदार्थ आवश्यक हैं; चाहे मानव हो या पशु या पौधे। मानव शरीर में मुख्य रूप से पाये जाने वाले पोषक पदार्थ हैं- कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन्स, खनिज लवण, वसा, न्यूक्लिक अम्ल व जल। इन सभी पोषक पदार्थों का शरीर में सही संतुलन ही स्वास्थ्य का सही संतुलन बनाकर रखता है।

पोषक पदार्थ ऐसे तत्व हैं जो शारीरिक विकास व गतिशीलता बनाये रखने के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं। शरीर को सुचारू रूप से संचालन के लिए व ऊर्जा बनाये रखने के लिए पोषक पदार्थों का शरीर में पहुंचना बेहद जरूरी होता है।

कुछ  पोषक पदार्थों को संतुलित व शुद्ध भोजन से अर्थात् बाह्य स्रोत्र से प्राप्त किया जाता है तथा कुछ को मानव शरीर आंतरिक रूप से स्वयं क्रिया करके संश्लेषित करता है। रोगों से लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कायम, प्रतिरक्षा तन्त्र को मजबूत, स्नायु तन्त्र का विकास, दीर्घायु, तन्त्रिकाओं का विकास,  पर्याप्त रक्त का स्तर, शरीर के आंतरिक व बाह्य अंगो के स्वास्थ्य व रक्षा के लिए आदि बहुत सी आवश्यकताओं व आवश्यक क्रियाओं के उचित संचालन के लिए ज़रूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति को नियमित रूप से उन खाद्य उत्पादों को ग्रहण करना चाहिए, जिनसे वह सभी पोषक पदार्थों का उचित स्तर बनाये रख सकता है तथा फलस्वरूप सफ़ल व सुखपूर्ण जीवन यापन कर सकता है।