खाना खाने के बाद नींद क्यों आती है?why Does you feel sleep after eating?

कभी आपने गौर किया कि भोजन करने के बाद कुछ लोग आलस व् नींद महसूस करते है एवं सोना चाहते है? क्या आपने कभी सोचा कि ऐसा क्यों होता है? हालांकि इसमें कुछ भी अप्राकृतिक या बुरा नहीं है, फिर भी कुछ ऐसे कारण है जिससे भोजन करने के साथ ही शरीर आराम मांगता है और यहाँ हम उसी के बारे में चर्चा करेंगे|

भोजन का हमारे शरीर एवं दिमाग से गहरा सम्बन्ध है, आप क्या खाते है, कब खाते है, कैसे खाते है इससे शरीर पर गहरा असर पड़ता है|

कुछ भोजन ऐसे होते है जिससे शरीर को पर्याप्त ऊर्जा मिलती है एवं शरीर एवं दिमाग एक्टिव बनता है ऐसे भोजन को वेकर्स अर्थात जगाने वाला कहा जाता है जबकि कुछ ऐसे भी होते है जिससे सुस्ती एवं आलस आता है इसे स्लीपर्स कहा जाता है|

क्या है स्लीपर्स?

खाने की बहुत सारी चीजे ऐसी होती है जिसे खाने के बाद शरीर आराम करना चाहता है एवं नींद आती है, जैसे मिठाई, पनीर, रोटी, दाले आदि| ऐसे भोजन को स्लीपर्स कहते है|

इन्हें खाने के बाद शरीर की समस्त ऊर्जा पाचन क्रिया में लग जाती है एवं नसे ढीली पड़ जाती है जिससे हम मीठी नींद सोना चाहते है|

अलग-२ लोगों की शरीरिक बनावट के आधार पर स्लीपर्स अलग-२ असर करते है, जरूरी नहीं कि जिससे एक को नींद आये तो सबको ही आएगी|

क्या है वेकर्स?

जिन खाद्य पदार्थों से शरीर को भरपूर मात्रा में एनर्जी मिलती हो उन्हें वेकर्स कहा जाता है| जैसे चाय, काफी, कोला, एवं विभिन्न प्रकार की एनर्जी ड्रिंक्स आदि|

ये शरीर को इतनी ऊर्जा देती है कि इन्हें खाने या पीने के बाद सोना मुश्किल लगता है|

ऐसा होने का मुख्य कारण:

यदि भोजन करने के बाद नींद आने के पीछे वैज्ञानिक कारण की बात करे तो यही कहा जायेगा कि भोजन को पचाने के लिए अतिरिक्त रक्त की आवश्यकता होती है|

भोजन करने के बाद शरीर के विभिन्न अंगो से रक्त पेट की तरफ प्रवाहित होता है जिससे दिमाग में रक्त प्रवाह धीमा हो जाता है एवं शरीर सुस्ती महसूस करने लगता है एवं नींद आती है|

अन्य कारण:

कुछ विशेषज्ञ लोगों की मान्यता यह भी है कि यदि भोजन नींद आने का कारण है तो सुबह के नाश्ते के बाद या रात के खाने के बाद वैसी नींद क्यों नहीं आती जैसी दोपहर के समय आती है| इसके पीछे कई और कारण जिम्मेवार हो सकते है, जैसे-

अधिक कैलोरी वाला भोजन:

शरीर के कुछ अंग ऐसे होते है जिन्हें एक्टिव बने रहने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है जैसे की दिमाग एवं आंते|

दोपहर के समय हम अधिकतर भारी ऊर्जा एवं कैलोरी वाला खाना खाते है जबकि दोपहर एवं रात के समय ऐसा नहीं होता| भारी भोजन करने के बाद हमारा मस्तिष्क लाल रक्त कणों को पेट की तरफ भोजन पचाने के लिए भेजता है एवं दिमाग के शिथिल पड़ते ही शरीर भी शिथिल पड़ने लगता है जिससे नींद आती है|

एडेनोसाइन:

यह एक ऐसा रसायन है शरीर में नींद के लिए जिम्मेवार होता है एवं यह केमिकल रात के समय एवं दोपहर के समय क्रियाशील रहता है इसलिए शायद इन दोनों समय में हम सोना अधिक पसंद करते है|

अधिक देर तक कम करते रहने या जागने के बाद भी यह रसायन आप मे नींद की इच्छा को जगा देता है|

इन्सुलिन:

खाना खाने के बाद लीवर इन्सुलिन का निर्माण करता है जो बाद में हमारे रुधिर के साथ जाकर मिल जाता है यह इन्सुलिन ट्रिप्टोफेन रसायन को एक्टिवेट कर देता है जिसके कारण शरीर सोने के प्रति इछुक होने लगता है|

यह क्रिया और भी तेजी से होती है यदि आप दोपहर के समय मीठा खा लेते है| इसलिए कहा भी जाता है कि मीठा खाने के बाद नींद अच्छी आती है|

उम्मीद करते है कि आपको यह जानकारी अच्छी लगी होगी| हमारे साथ अपना अनुभव एवं विचार जरुर शेयर करे एवं यदि आप कुछ पूछना चाहे तो हमे मेल के द्वारा सम्पर्क करे|      

सन्तुलित आहार के आवश्यक तत्व । Balance Diet in Hindi

सन्तुलित आहार स्वस्थ जीवन का आधार है। कोई भी व्यक्ति यदि शारीरिक रूप से असन्तुलित है या जिसका स्वास्थ्य असन्तुलित है तो उसका जीवन भी सन्तुलित नही रहता है। यह तो सर्व मान्य ही है कि पहला सुख नीरोगी काया अर्थात् मनुष्य कितने भी सुखों की प्राप्ति कर ले, परन्तु यदि उसका शरीर रोगों से ग्रस्त रहता है तो बाकी सब सुख फीके लगते हैं। अतः अच्छे स्वास्थ्य को कायम रखने से शुरुआत आहार से ही की जानी चाहिए।

सन्तुलित आहार में अनेक प्रकार के तत्व विद्यमान रहते हैं। आज हम आपको इन तत्वों के बारे में बता रहे हैं, ताकि आप अपने भोजन को पेट भरने के साथ-साथ शरीर को विकारों व रोगों से मुक्त रखने के उद्देश्य से ग्रहण करें।

वसा- सन्तुलित आहार का अन्य मुख्य तत्व है- वसा, जिसे फैट भी कहते हैं। बहुत से लोगों में यह धारणा है कि वसा शरीर के लिए अच्छा तत्व नही है, परन्तु यह केवल अधूरी जानकारी के कारण उत्पन्न हुई गलतफहमी मात्र है। वसा भी शरीर के लिए अन्य तत्वों की भाँति लाभदायी है, बशर्ते यह पर्याप्त आवश्यक मात्रा में हो। ध्यान देने योग्य बात है कि वसा की आवश्यकता से अधिक मात्रा भी नुकसानदेय सिद्ध हो सकती है।

शारीरिक रूप से क्रियाशील बने रहने के लिए आवश्यक है कि हमारे शरीर में पर्याप्त मात्रा में वसा रहनी चाहिए। वसा से हमे ऊर्जा प्राप्त होती है। कोशिकाओं, त्वचा व बालों का उचित स्वास्थ्य व गुणवत्ता बनाये रखने के लिए वसा उपयोगी है। काजू, दूध, पनीर, सोयाबीन का तेल व मूंगफली का तेल आदि वसा के अच्छे स्त्रोत हैं। 

वसा दो प्रकार की होती है-

संतृप्त वसा व असंतृप्त वसा।

प्रोटीन- मनुष्य शरीर के भीतर नव कोशिका निर्माण में सबसे ज्यादा योगदान प्रोटीन का होता है तथा इससे क्रियाशीलता बनी रहती है। इसके अतिरिक्त मनुष्य शरीर का उचित तापमान कायम रखने में भी प्रोटीन सहायक होता है। हमारे आहार में 30-35 प्रतिशत तक प्रोटीन होना स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है। प्रोटीन शाकाहारी व माँसाहारी दोनों आहारों से प्राप्त होता है, जैसे- चना, मक्का, बाजरा मूँगफली, दाल, मछली, मुर्गा, अंडा आदि प्रोटीन के अच्छे स्त्रोत हैं। 

प्रोटीन की कमी से शारीरिक बल में कमी आती है तथा वजन में भी गिरावट आती है। साथ में रोग प्रतिरोधक क्षमता में क्षीणता आने से शरीर पर कई रोगों का साया बना रहता है।

फाइबर- जो खाद्य पदार्थ रेशेदार होते हैं, उनमें भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जैसे- संतरा।

ये हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने मे सहयोग करते हैं। प्रतिरक्षा तन्त्र को सुचारू रूप से कार्य करने के लिए फाइबर युक्त यानि कि रेशे वाली चीजों का सेवन करना चाहिए। फाइबर से छोटे-मोटे रोगों को झेलने की व उनसे लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है। इसी के साथ पेट के लिए उचित है क्योंकि इससे पाचन ठीक रहता है तथा कब्ज की समस्या भी नही होती और भोजन के साथ पाये जाने वाले दूषित पदार्थों के प्रभाव को कम करने में सहायक होता है।

पपीता, सेब, इसबगोल, अंगूर, खीरा, शकरकन्द, सूजी आदि फाइबर के अच्छे स्त्रोत माने जाते हैं।

कार्बोहाइड्रेट- यह तीन मुख्य तत्वों से मिलकर बना होता है- कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन। इसे कार्बोज भी कहा जाता है।

Close up of mixed of pasta

मनुष्य के शरीर में अंदरूनी कुछ अंगों व ऊत्तकों में ग्लूकोज़ पाया जाता है, इसे ही कार्बोहाइड्रेट कहते हैं। 

कार्बोहाइड्रेट के मुख्य घटक शर्करा, स्टार्च व फाइबर है।

सब्जियों, फलियों, पेय द्रवों व साबुत अनाज में कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। 

शरीर ने वसा की मात्रा को नियंत्रित करने में कार्बोहाइड्रेट की विशेष भूमिका रहती है। एक मनुष्य द्वारा उम्र के आधार पर जितनी कैलोरी की आवश्यकता होती है, उस कैलोरी का लगभग 50-60 प्रतिशत तक कार्बोहाइड्रेट की भी जरूरी होता है।

दिल, गुर्दे, मांसपेशियों के उचित व स्वस्थ रूप से कार्य करने के लिए यह आवश्यक होता है।

जल- मनुष्य के लिए जल की आवश्यकता और महत्व के ज्ञान से कोई भी अनभिज्ञ नही होगा। जल भिन्न-भिन्न रूपों में उपयोगी होता है। प्यास बुझाने के साथ ही मूत्र सम्बन्धी समस्याओं से बचाव करता है और पेट की सफाई में सहयोगी है। त्वचा के कसाव व चमक के लिए पर्याप्त मात्रा में जल का सेवन करना चाहिए।

अलग-अलग समय पर जल के सेवन से शरीर को अलग तरह के अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। गर्मी के दिनों में कम से कम 10 गिलास पानी पीना स्वास्थ्य के लिए उचित होता है।

खनिज पदार्थ- सन्तुलित आहार के मुख्य तत्वों में खनिज पदार्थ भी महत्वपूर्ण है। खनिज पदार्थों की विशेषता यह है कि इनकी भिन्नता के कारण ये शरीर के प्रत्येक हिस्से के लिए भिन्न-भिन्न रूप से स्वास्थ्य प्रदायी व लाभदायक है। शरीर में खनिज पदार्थों की पूर्ति होने से कई रोगों से बचाव सम्भव हो जाता है। हड्डियों, दाँतो, त्वचा, मांसपेशियों, पेट, मस्तिष्क, रक्त आदि सभी के लिए खनिज पदार्थ फायदेमंद होते हैं।

ये अनेक प्रकार के होते हैं, जिनके बारे में विस्तार से एक अन्य प्रलेख में बताया हुआ है।

विटामिन- विटामिन छः तरह के होते हैं। विटामिन ए, बी, सी, डी, ई, के। विटामिन का कई प्रकार की बीमारियों से बचने व रोकथाम में सहयोग होता है। शरीर के कुछ हिस्सों में जहाँ अन्य तत्वों की भूमिका नही होती है, वहाँ विटामिन की जरूरत पड़ती है। सौंदर्य विकास में भी विटामिन अत्यन्त महत्वपूर्ण माने जाते हैं। दूध से बने सभी खाद्य पदार्थ, पत्तेदार सब्जियां, दालें, फल, माँसाहार आदि भिन्न-भिन्न विटामिन के स्त्रोत हैं।

इस प्रकार आप जान चुके होंगे कि सन्तुलित आहार में उपर्युक्त वर्णित सभी तत्वों का समावेश रहता है, जो कि हमारे शरीर के लिए अत्यन्त लाभदायी होते हैं। सन्तुलित जीवन की ओर पहला कदम सन्तुलित आहार ही है|

पाउडर से कैंसर का ख़तरा: सच या झूठ? Powder in Hindi

पाउडर एक ऐसा उत्पाद है जिसका प्रयोग कुछ लोगों द्वारा भिन्न-भिन्न उद्देश्यों के लिए प्रतिदिन किया जाता है। बच्चों के लिए पाउडर का इस्तेमाल पसीने को रोकने के लिए व खुशबूदार बनाये रखने के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त महिलाओं द्वारा नहाने के बाद जननांगो में सूखापन बनाये रखने के लिये पाउडर उपयोग किया जाता है। सौंदर्य बढ़ाने के लिए भी चेहरे पर मेकअप करते हुए पाउडर का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे रंगत में निखार दिखाई देता है तथा गोरापन अधिक लगता है।

इनसे परे क्या कभी आपने विचार किया है कि पाउडर के इस्तेमाल से कैंसर जैसा जानलेवा रोग भी हो सकता है? जवाब होगा “नही”। पाउडर लगाते हुए इतनी गहराई से तो कोई भी नही सोचता कि हम शायद अपने शरीर में कैंसर के बीज बो रहें हैं।

आइये आज हम आपको इस विषय से जुड़े कुछ मामलों से अवगत करवाते हैं। 

सबसे पहले यह जान लेना आवश्यक है कि आखिर पाउडर में ऐसा क्या है जो कैंसर होने की वजह बनता है।

यहाँ हम बताना चाहते हैं कि पाउडर बनाने के लिए जिन सहउत्पादों का प्रयोग किया जाता है, उनमे से एक उत्पाद है- अभ्रक। अभ्रक में एस्बेस्टस नामक एक तत्व पाया जाता है, जिसका शरीर के सम्पर्क में होना कैंसर का कारण भी बन सकता है।

कुछ समय पहले ही बच्चों के लिए उत्पाद बनाने वाली सुप्रसिद्ध विदेशी कम्पनी “जॉन्सन एन्ड जॉन्सन” का मामला काफी चर्चा में रहा था। जिसमें अमेरिका की एक महिला द्वारा वाद प्रस्तुत किया गया कि जॉन्सन एन्ड जॉन्सन पाउडर के इस्तेमाल से वह गर्भाशय के कैंसर से ग्रस्त हो गयी। मामला अदालत में जाने के बाद इस कम्पनी को 27 अरब का हर्जाना पीड़ित को देने के आदेश दिए गए, जिसपर बाद में रोक लगा दी गयी। इसके बाद बहुत सी महिलाओं द्वारा पाउडर के इस्तेमाल से कैंसर होने के कई मामले सामने आये।

अतः इस प्रकार के मामले सामने आने से एक डर पैदा हो जाता है। पाउडर का अधिक इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए गम्भीर समस्या खड़ी हो जाती है कि कहीं यह सौंदर्य प्रसाधन जानलेवा न बन जाये।

पाउडर के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले उत्पादों में मैग्नीशियम ऑक्साइड, सिलिकॉन डाई ऑक्साइड, एल्युमिनियम ऑक्साइड, आयरन ऑक्साइड, जिंक ऑक्साइड, बेंजोइन, केल्शियम कार्बोनेट, ऑर्गेनिक तेल आदि रसायनों का योगदान रहता है। 

सभी कम्पनियों की पाउडर निर्माण की प्रक्रिया एक जैसी होना आवश्यक नही है, यह भिन्न-भिन्न हो सकती है। जहाँ एक कम्पनी अपने पाउडर के निर्माण में किसी तत्व विशेष का अधिकता से प्रयोग कर सकती है, जबकि वहीं दूसरी कम्पनी द्वारा उस तत्व का प्रयोग कम मात्रा में किया जाना भी सम्भव है। अतः यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि कुछ कम्पनियों द्वारा पाउडर बनाने के लिए कम एस्बेस्टस वाली अभ्रक का इस्तेमाल किया जा सकता है और कुछ अधिक एस्बेस्टस युक्त अभ्रक का भी इस्तेमाल करती होंगी, जबकि इसी के विपरीत कुछ पाउडर निर्माताओं द्वारा यह भी दावे किये जाते हैं कि एस्बेस्टस का इस्तेमाल किये बिना ही पाउडर बनाया जाता है।

अब हम कुछ जाँचों व शोध आधारित तथ्यों के बारे में आपको बताना चाहेंगे, जो पाउडर से कैंसर होने या न होने तथा इसके कारणों के बारे में जानने के सम्बन्ध में की गयी।

अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थानों द्वारा कि गयी जाँचों के आधार पर ये तथ्य सामने आये कि जननांगों पर पाउडर का अधिक उपयोग कैंसर होने का कारण पैदा कर सकता है।

इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के द्वारा टेल्कम पाउडर का उपयोग करने को कैंसर होने के कारणों की श्रेणी में रखा गया है।

कुछ चर्म रोग विशेषज्ञों द्वारा ये बात कही गयी कि सामान्यतः सभी पाउडर के निर्माण में अभ्रक का प्रयोग किया ही जाता है। इसमें एस्बेस्टस होने के कारण ये खतरनाक हो सकता है, क्योंकि एस्बेस्टस की असामान्य मात्रा के शरीर में जाने से कैंसर होता है।

कैंसर प्रिवेंशन कोलिज़न की माने तो पाउडर जैसे उत्पाद के उपयोग से कैंसर हो सकता है। दुनियाभर में प्रत्येक 10 में से 2 महिलायें रोज़ाना पाउडर का इस्तेमाल करती है। पाउडर न लगाने वाली महिलाओं की तुलना में पाउडर लगाने वाली महिलाओं को गर्भाशय कैंसर अधिक होता है। जो महिलायें गुप्तांगो में पसीने व बदबू से बचने के लिए पाउडर लगाती है, ऐसा करना कई बार घातक भी सिद्ध हो सकता है क्योंकि उनके जननांगो से पाउडर में पाये जाने वाले कैंसरकारी कण भीतर गर्भाशय तक पहुँच जाते हैं, जो कैंसर को न्यौता देते है|

कौन सा दूध है सर्वाधिक प्रोटीन युक्त दूध? Vitamin in milk in Hindi

प्रत्येक व्यक्ति के जन्म के साथ ही उसके भोजन का आधार दूध होता है। शिशु का जन्म होते ही उसकी माँ का दूध ही प्रथम आहार होता है। 

दुनिया में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो दूध के स्वाद से अनभिज्ञ हो।

शारीरिक विकास के लिए दूध को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया है। इसी के साथ-साथ दूध अन्य बहुत से गुणों से भरपूर होता है। 

इसमें प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, प्रोटीन व कई विटामिन भी पाये जाते है।

गाय, भैंस, बकरी, भेड़, ऊँटनी आदि कई भिन्न-भिन्न दुधारू पशुओं के दूध में भिन्न-भिन्न पोषक तत्वों के समावेश होता है, जो हमारे शरीर को लिए अलग-अलग रूप में स्वास्थ्य प्रदान करने में उपयोगी होता है। 

दूध भी अलग-अलग प्रकार का होता है-

पूर्ण दूध- यह वसा युक्त दूध होता है। इसमें संघटन हेतु किसी क्रिया का उपयोग नही किया जाता है।

स्टेण्डर्ड दूध- इसमें कुछ क्रियाओं का उपयोग करके दूध में पायी जाने वाली वसा को कम किया जाता है।

टोन्ड दूध- पूर्ण दूध में पानी व पाउडर मिलाकर वसा का अनुपात निर्धारित किया जाता है।

रिकम्बाइंड दूध- पाउडर, पानी व बटर ऑयल के मेल से यह दूध तैयार किया जाता है।

फिल्ड दूध- दूध की सारी वसा को निकाल कर वसाहीन कर दिया जाता है।

रिकन्स्टिट्यूटेड दूध- इसमें थोड़ा सा पाउडर (एक भाग) व अधिक पानी (7 भाग)के मेल से दूध तैयार किया जाता है।

प्रोटीन मनुष्य शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्व है। इसकी अल्पता से शरीर के विकास में बाधा उत्पन्न होती है व शारीरिक वृद्धि अवरुद्ध होती है।

प्रोटीन की कमी मांसपेशियों की कमजोरी का कारण बनती है। प्रोटीन कुल 20 तरह से एमिनो अम्ल से युक्त होता है, जिसमें से 8 तो हमें भिन्न-भिन्न खाद्य पदार्थों से ग्रहण करने पड़ते हैं और बाकी के 12 एमिनो अम्ल शरीर के भीतर ही निर्मित होते हैं।

हम आपको दूध में पाये जाने वाले प्रोटीन के स्त्रोत के सम्बन्ध में जानकारी उपलब्ध करवाना चाहते हैं। चूँकि हमारे इस लेख का मुख्य विषय है- प्रोटीन युक्त दूध, अतः भिन्न-भिन्न पशुओं में पाये वाले गुणों के बारे में व्याख्या आगे दी गयी है जो इस प्रकार है:-

गाय का दूध- गाय के एक कप दूध में लगभग 8 ग्राम प्रोटीन मौजूद रहता है। प्रोटीन के अलावा विटामिन डी व कैल्शियम भी पाया जाता है। गाय को भारत में पूजनीय माना जाता है तथा इसके दूध को भी सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि गाय बुद्धिमान होती है तथा इसका दूध ही रोज़ाना सेवन हेतु मनुष्य के लिए उचित माना गया है। यह जल्दी पचता है एवं हल्का होता है|

बकरी का दूध- गाय के दूध की अपेक्षा बकरी के दूध में अधिक प्रोटीन पाया जाता है। बकरी के एक कप दूध में लगभग 8.7 ग्राम प्रोटीन मौजूद रहता है। इसके अलावा इसमें कई विटामिन, कैल्शियम, खनिज पदार्थ व फास्फोरस आदि अनेक पोषक पदार्थों से भरपूर होता है। यह शारीरिक बल प्रदान करता है तथा नीरोगी होता है। यह जल्दी पचने वाला दूध है।

भैंस का दूध- यह गाय की दूध की अपेक्षा अधिक चिकनाई युक्त होता है। भैंस का दूध शारीरिक बल में वृद्धि करने में सहायक होता है। इसमें भी प्रोटीन व विटामिन प्रचुरता में मिलते हैं। गाय के दूध की तुलना में भैंस के दूध में 11 प्रतिशत अधिक प्रोटीन पाया जाता है। भारी होने के कारण भैंस का दूध पचने में कुछ समय लेता है

भेड़ का दूध- यह अत्यधिक गाढ़ा होता है। इसमें हल्का नमकीन स्वाद होता है। इसमें भी बहुत से खनिज पदार्थों, विटामिन, पोषक तत्वों का समावेश रहता है। यह प्रोटीन युक्त होता है। भेड़ के एक कप दूध में लगभग 14.7 ग्राम प्रोटीन पाया जाता है। सर्वाधिक प्रोटीन भेड़ के दूध में ही पाया जाता है।

ऊँटनी का दूध- यह अत्यन्त लाभकारी व रोग-प्रतिरोधक होता है। इसमें बहुत से पोषक तत्व, कैल्शियम, विटामिन, प्रोटीन आदि मौजूद रहते हैं तथा यह अनेक गुणों से युक्त रहता है। इसके अतिरिक्त यह सौंदर्यवर्धक भी होता है।

पी मिल्क- इसे किसी पशु द्वारा प्राप्त नही किया जाता। सभी प्रकार के दूध से भिन्न यह मटर का दूध होता है। इसे “पी प्रोटीन” भी कहते हैं। यह दूध के प्रोटीन का अन्य मुख्य स्त्रोत है। कुछ लोगों को शुद्ध दूध से एलर्जी होती है या दूध पचने में समस्या पैदा होती है तो उनके लिए मटर का दूध अत्यन्त फायदेमंद होता है। प्रोटीन के अलावा यह अनेक पोषक तत्वों के गुणों से युक्त होता है, जो हमारे शरीर की सेहत बनाये रखने में भी उपयोगी है। 

प्रोटीन के लाभ:-

प्रोटीन से हमारी मांसपेशियों में मजबूती आती है तथा शारीरिक बल बढ़ता है|

प्रोटीन से शरीर के भीतर बनने वाले जहरीले तत्व नष्ट होते हैं|

यह रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करता है, जिससे रोगों से लड़ने में सहायता मिलती है|

प्रोटीन से हमारे शरीर की पाचन शक्ति मजबूत होती है|

बालों व त्वचा की सुन्दरता में भी प्रोटीन अत्यन्त उपयोगी होता है|

हिचकी क्यों आती है?

सामान्य मान्यता के अनुसार हिचकी आने के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न कारण बताये जाते हैं, जैसे- किसी के द्वारा याद करने पर या चोरी करके खाने पर या किसी के द्वारा चर्चा करने पर हिचकी आती है। लेकिन यहाँ हम हिचकी आने के वैज्ञानिक कारणों की बात करने जा रहे हैं। 

विज्ञान की माने तो हमारे शरीर के भीतर फेफड़ों व पेट के मध्य डायफ्राम स्थित होता है। इस डायफ्राम में जब किसी कारणवश सिकुड़न पैदा होती है, तो मांसपेशियों पर दबाव के कारण फेफड़ों में जाने वाली वायु की गति तीव्र हो जाती है, जिससे यह एक आवाज के साथ हमारी श्वास से बाहर निकलती है। इस प्रकार से उत्पन्न हुई आवाज को ही हिचकी कहा जाता है। 

कारण-

भोजन को कम चबाते हुए जल्दबाजी में खाने से व आवश्यकता से अधिक भोजन खाने से कई बार भोजन भीतर अड़चन से जाता है, जिससे अचानक डायफ्राम पर दबाव से हिचकी आती है।

कोई गर्म चीज खाने के साथ तुरन्त ठण्डी चीज खाने से शारीरिक क्रिया में परिवर्तन होने से मांसपेशियों में आकस्मिक संकुचन पैदा होता है, जो हिचकी का कारण बनता है।

कोई भी कार्बोनेटेड द्रव्य के सेवन से तथा अत्यधिक शराब पीने की आदत भी हिचकी की समस्या पैदा करती है, क्योंकि शराब में नशा होने के कारण मांसपेशियों व फेफड़ों पर दबाव पड़ता है। 

कोई भी चूसने वाली चीज़ जो अधिक समय तक मुह में रखी जाती है या च्यूइंग गम आदि खाने कई बार श्वास के साथ बाहरी हवा भी श्वसन तन्त्र तक जाती है। इससे भी हिचकी हो सकती है। 

पाचन सम्बन्धी विकार, एसिडिटी, गैस आदि के कारण भी मांसपेशियों में सिकुड़न पैदा कर हिचकी की समस्या को जन्म देते हैं।

उपर्युक्त वर्णित कारणों के अतिरिक्त मानसिक तनाव, अवसाद, भावनात्मक रूप से हुई उत्तेजना, तापमान में आकस्मिक बदलाव, दवाईयों के दुष्प्रभाव आदि भी हिचकी होने के कारण बन सकते हैं।

कई बार हिचकी आना सामान्य होता है, जो की स्वयं ही कुछ समय पश्चात बन्द हो जाती है या पानी के सेवन से रुक जाती है। इसके विपरीत असामान्य रूप से एक साथ लगातार हिचकी आती रहती है तथा रूकती नही है, तो यह बेहद परेशानी का कारण बनती है। ऐसे में डॉक्टर से सलाह लेना उचित रहता है|

कार्बोहाइड्रेट के फायदे व् नुकसान | Carbohydrates food in Hindi

क्या है कार्बोहाइड्रेट?

कार्बोहाइड्रेट् शरीर के लिए एक आवश्यक तत्व है, जिससे हमारे शरीर को ऊर्जा मिलती है एवं यह हमे रोजमर्रा के भोजन से प्राप्त हो जाता है|

चावल, गेहूं, बीन्स, आलू, एवं अन्य चीजों में भी इसकी प्रचुर मात्रा पाई जाती है| शारीरिक विकास के लिए भी कार्बोहाइड्रेट का महत्वपूर्ण योगदान रहता है, किन्तु इसकी अधिक मात्रा से शरीर को नुकसान भी हो सकता है|

एक स्वस्थ व्यक्ति को एक दिन में 225 से 335 ग्राम तक कार्बोहाइड्रेट की आवश्यकता होती है, जिससे शरीर को सुचारू रूप से कार्य करने के लिए ऊर्जा मिल जाती है, किन्तु इससे अधिक मात्रा लेने पर कई बार वजन बढ़ने की सम्भावना रहती है, इसलिए जो लोग फिट रहना पसंद करते है, उन्हें अपने भोजन में से कार्बोहाइड्रेट की मात्रा को घटाने के लिए कहा जाता है|

कार्बोहाइड्रेट के प्रकार:

कार्बोहाइड्रेट के कई प्रकार होते है, जिसमे से कुछ स्वास्थ्य के लिए अच्छे एवं कुछ नुकसानदायक होते है, जो इस प्रकार है:-

चीनी:

चीनी या शुगर अनेक उत्पादों में प्राक्रतिक रूप से विद्यमान होती है, जैसे दूध, सब्जिया, लगभग सभी प्रकार के फल आदि| इन पदार्थों में शुगर तीन प्रकार से मौजूद रहती है, लेक्टोज, फ्रुक्टोज, एवं सुक्रोज| शुगर हमारे शरीर को शक्ति प्रदान करता है एवं यह शरीर के लिए अनिवार्य भी है|

स्टार्च:

इसको भी शुगर का ही एक प्रकार माना जाता है, जो की आलू, फलियाँ, मटर, चावल आदि में पाया जाता है तथा मोटापे के लिए सबसे ज्यादा इसे ही जिम्मेवार माना जाता है|

फाइबर:

यह भी मुख्य रूप से शुगर का हिस्सा है, यह सोया, सेम, फाइबर युक्त सब्जियां, एवं फलो व् साबुत अनाज में पाया जाता है| फाइबर युक्त भोजन आसानी से पच जाता है एवं इससे पाचन प्रणाली भी ठीक रहती है एवं पेट सम्बन्धी समस्याए नहीं होती|

कार्बोहाइड्रेट के लाभ:

जैसा की पहले भी कहा जा गया है, की कार्बोहाइड्रेट शरीर को उर्जावान बनाये रखने के लिए आवश्यक है, इससे शरीर रोजमर्रा के कार्य करने में समर्थ रहता है एवं थकावट महसूस नहीं होती| हालांकि अधिक सेवन से मोटापा आ सकता है, किन्तु यदि इसके बिलकुल भी न लिया जाये तो शरीर में कमजोरी आना स्वाभाविक है|

यह पाचन शक्ति को भी मजबूत करता है, एवं भोजन आसानी से पच जाता है| इससे आप चुस्त महसूस करते है एवं विभिन्न प्रकार के रोगों से रक्षा करता है| यदि पर्याप्त मात्रा में कार्बोहाइड्रेट का सेवन किया जाये तो इसके नुकसान से बचा जा सकता है|

कार्बोहाइड्रेट के नुकसान:

प्रकृति में उपस्थित कोई भी उत्पाद का यदि जरूरत से ज्यादा प्रयोग किया जाए तो उसके लाभ से ज्यादा नुकसान ही होते है| आजकल के व्यस्त समय में उचित खानपान की कमी के चलते शरीर में कार्बोहाइड्रेट के बढने से विभिन्न प्रकार के रोग जन्म ले लेते है, जैसे मोटापा, दिल से सम्बन्धित रोग, यहाँ तक की दिमाग पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है, जैसे स्मरण शक्ति का कमजोर होना, आलसी बनना आदि|

चूँकि कार्बोहाइड्रेटयुक्त भोजन में अत्यधिक मात्रा में कैलोरीज होती है, एवं आज के युग में जंक फ़ूड का चलन जोर-शोर से प्रचलित है, जैसे बर्गर, पिज़्ज़ा, पास्ता आदि में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा जरूरत से ज्यादा होती है, जो शरीर को नुकसान पहुचाती है|

कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन खाने में स्वादिष्ट लगता है, किन्तु इससे डायबिटीज होने का भी खतरा रहता है क्योकि मनुष्य शरीर इतनी कैलोरीज पचाने में असमर्थ होता है|

कार्बोहाइड्रेट की मात्रा:

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है, कि कैसे तय करे की कार्बोहाइड्रेट की कितनी मात्रा का सेवन सही रहेगा? क्योकि इसे लेना भी आवश्यक है, एवं पूर्णत: छोड़ा भी नहीं जा सकता|

अलग-अलग व्यक्तियों की कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अलग-अलग होती है, जो व्यक्ति शारीरिक रूप से अधिक मेहनत करते है उनमे इसकी मात्रा अधिक होनी चाहिए, क्योकि इसका प्राथमिक कार्य शरीर को शक्ति देना है|

जैसे यदि आपको एक दिन में 2000 कैलोरीज की आवश्यकता है तो 40 से 50 प्रतिशत कैलोरीज कार्बोहाइड्रेट द्वारा पूरी की जाएगी| कार्बोहाइड्रेट के 1 ग्राम में 4 तक कैलोरीज होती है अत: एक स्वस्थ व्यक्ति को 225 से 335 ग्राम तक का रोज का सेवन अनिवार्य है, इसमें कभी-कभी कमी या बढ़ोतरी की जा सकती है परन्तु ज्यादा मात्रा में नहीं|

कार्बोहाइड्रेट के मुख्य स्त्रोत:

यदि आप में कार्बोहाइड्रेट की कमी है तो इससे कुपोषण होने का खतरा पैदा हो सकता है, अत: बाहर के हानिकारक पदार्थो के अलावा इसे प्राक्रतिक रूप से हासिल करे|

फाइबरयुक्त फल जैसे बेर, तरबूज, अंगूर, संतरा, नाशपति, बेरीज, खजूर आदि में प्रचुर फाइबर पाया जाता है एवं इससे स्वास्थ्य को भी कोई हानि नहीं होती, इनका इस्तेमाल कार्बोहाइड्रेट की कमी को पूरा करने के साथ-साथ शरीर में मिनरल्स एवं विटामिन्स की कमी को भी पूरा करता है|

शुद्ध किये हुए अनाज से बेहतर है की आप साबत अनाज का प्रयोग करे जैसे बाजार में मिलने वाला आटा काफी बारीक़ होता है जिसमे फाइबर की मात्रा ना के बराबर होती है अत: चोकोरयुक्त आटे का सेवन करे| इसके साथ ही रिफाइंड दालें एवं अन्य उत्पाद भी साबत प्रयोग करे|       

इसके अलावा फलियाँ, मटर, सेम आदि में फाइबर पाया जाता है, एवं इसमें कोलेस्ट्रोल एवं वसा भी नहीं होती न ही नुकसानदायक कार्बोहाइड्रेट होता है, इसे भी आप जब चाहे खा सकते है, एवं दिल के मरीज भी इसका प्रयोग कर सकते है| इसमें मैग्नीशियम, पोटेशियम, सेलेनियम आदि तत्व पाए जाते है जो शरीर के विकास के लिए आवश्यक है एवं विभिन्न रोगों से लड़ने में सहायता करते है|

डेयरी उत्पाद द्वारा भी कार्बोहाइड्रेट की कमी को पूरा किया जा सकता है, किन्तु यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि डेयरी उत्पाद में नकली शुगर नहीं होनी चाहिए केवल प्राक्रतिक शुगरयुक्त पदार्थ का सेवन किया जाना चाहिए|

अंतत: यह कहा जा सकता है कि कार्बोहाइड्रेट शरीर के विकास एवं पोषण हेतु अनिवार्य है, परन्तु यह भी सच है की इसके कई नुकसानदायक पहलू भी है| जब भी हम भोजन करते है तो पाचन तन्त्र उसे पचाता है एवं फिर उसे शुगर एवं स्टार्च में तोड़ता है, जिसमे इन्सुलिन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है|

फिर यही ग्लूकोज के रूप में शरीर को ऊर्जा देता है, यदि खाने में शुगर अधिक होगी तो बाद में यह फैट या मोटापा बन जाती है|

क्या विटामिन D की कमी से हो सकता है, बुजुर्गों में तनाव? | Deficiency of vitamin D in Hindi

क्या है, विटामिन D?

विटामिन D शरीर के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है, जो हमे सूर्य के प्रकाश एवं भोजन से प्राप्त होता है|

हाल ही में हुए अध्ययनों में वैज्ञानिकों ने यह बात साबित की, कि विटामिन D के अभाव में शरीर कई तरह की बीमारियों से ग्रसित हो जाता है, एवं बढती उम्र के साथ-साथ विटामिन D की कमी के घातक परिणाम हो सकते है|

हाल ही में हुए शोध में पेनकोफर नामक लेखक ने अपनी रिसर्च में इस बात का पता लगाया की, विटामिन D अनेक प्रकार के रोगों जैसे, दिल की बीमारी, तनाव, सोचने समझने की शक्ति, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, जोड़ों में दर्द आदि के लिए जिम्मेवार होता है, एवं यदि यह पर्याप्त मात्रा में आपके शरीर में मौजूद है, तो इन बीमारियों एवं अन्य कई स्वास्थ्य सम्बन्धित समस्याओं से लड़ने में सहायक होता है|

कैसे होती है, विटामिन D की कमी?

भोजन में जरूरी तत्वों की कमी एवं सूर्य के प्रकाश से वंचित रहना विटामिन D की कमी का प्रमुख कारण है| विटामिन D को हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माना जाता है, यह शरीर में मौजूद कैल्शियम का अवशोषण करके उसे अन्य भागों तक पहुचाता है एवं शरीर की सभी कोशिकाओं को स्वस्थ रखने का कार्य करता है|

इससे हड्डियों को मजबूती मिलती है, एवं जोड़ो में सूजन या दर्द की सम्भावना भी कम रहती है| यह शीघ्रता से वसा में घुल जाता है एवं सूर्य की रोशनी में बैठने पर शरीर अपने आप इसका निर्माण करता है एवं प्रतिपूर्ति करता है|

विटामिन D की कमी के लक्षण:

यह बात स्मरण रखने योग्य है कि भोजन से केवल दस प्रतिशत तक विटामिन D की कमी की पूर्ति होती है, शेष नब्बे प्रतिशत कमी सूर्य द्वारा होती है, इसलिए यदि आप ऐसा भोजन करते है, जिसमे विटामिन D हो परन्तु सूर्य से वंचित है तो आपके शरीर में विटामिन D की कमी होना स्वाभाविक है, जिसके महत्वपूर्ण लक्ष्ण इए प्रकार है:-

हड्डियों में कमजोरी आना एवं जोड़ो में दर्द रहना

असमय बालों का झड़ना

पाचन क्रिया का कमजोर पड़ना

उदास एवं तनावग्रस्त रहना

बार-बार बीमार पड़ना या संक्रमित होना आदि|

बुजुर्गों में विटामिन D की कमी के कारण:

आधुनिक युग में बुजुर्गों में विटामिन D की कमी के अत्यधिक मामले सामने आये है, जिसमे यह तथ्य उजागर हुआ की, वृद्ध लोगों को सही आहार न मिलने एवं उनकी शारीरिक हालत कई बार ठीक न होने के कारण वे सूर्य के प्रकाश से वंचित रह जाते है, जिससे विटामिन D की काफी कमी हो जाती है|

बुजुर्गों में विटामिन D की कमी अवसाद का रूप धारण कर लेती है, जिससे उनका किसी कम में मन नही लगता एवं तनावपूर्ण स्थिति बन जाती है एवं कई प्रकार के रोग उनके शरीर को घेर लेते है, जैसे थकान अनुभव करना, जोड़ो में दर्द एवं सूजन, उदास रहना, घाव का जल्दी न भरना एवं पाचन सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ता है|

उपरोक्त लक्षण नजर आने पर जाँच के द्वारा विटामिन D की कमी का पता लगाया जा सकता है एवं उम्र के मुताबिक डाक्टर की सलाह से दवाई का सेवन शुरू किया जाना चाहिए|

विटामिन D की कमी से बचाव के उपाय:

विटामिन D की कमी को दूर करने का सबसे अच्छा उपाय सूर्य की रोशनी में 20 से 30 मिनट तक बैठना है, यदि गर्मियों का मौसम है तो आप सुबह उगते सूर्य की किरणों में बैठे एवं सर्दियों में आप किसी भी समय सूर्य की रोशनी में बैठ सकते है|

इसके साथ ही विटामिन D से युक्त आहार जैसे दूध, पनीर, मछली, अंडे, मशरूम आदि का सेवन करे| लीवर या किडनी के रोगी विटामिन D की कमी से जल्दी प्रभावित होते है, अत: लीवर को ठीक करने हेतु आवश्यक दवाइयों का सेवन करे|

बुजुर्ग लोगों का विशेष रूप से ध्यान रखा जाये एवं उन्हें रोजाना धूप में थोड़ी देर बिठाया जाए| इसके साथ ही विटामिन D की अत्यधिक कमी खतरनाक साबित हो सकती है, इसलिए विशेषज्ञ की सलाह की सलाह से इससे सम्बंधित सप्लीमेंट्स एवं दवाइयों का सेवन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए|

विटामिन D की अधिक कमी होने से बच्चों को अस्थमा, वयस्कों में कैंसर, बाँझपन, एवं ओस्टियोमलेसिया नामक बीमारी हो सकती है| इसमें पांच वर्ष के बच्चो में विटामिन D की कमी होने के ज्यादा संकेत मिलते है इसलिए उनका खास ख्याल रखा जाना चाहिए|