कोलेस्ट्रोल क्या है ? इसके फायदे नुकसान के बारे में क्या जानते हैं आप ?

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उत्तर  = मोटापा बढ़ना आजकल एक समस्या बन चुका है , लोग अपने खानपान की …

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शाकाहारी होना अच्छा है या मांसाहारी क्या मांसाहार में ज्यादा शक्ति होती है ? क्या शाकाहारी स्वस्थ नहीं होते हैं ?

उत्तर – ईश्वर ने सभी जीवों को पेट दिया है इस पेट को भरने के …

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क्या प्रोटीन पाउडर शरीर के लिए हानिकारक है या नहीं?

प्रोटीन पाउडर को दूध, दही, पनीर, सोयाबीन, अण्डे, चावल, मटर आदि प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों से निर्मित किया जाता है। यह सीधे खाद्य पदार्थों से प्रोटीन न लेकर पाउडर के जरिये अप्रत्यक्ष रूप से प्रोटीन ग्रहण करने का स्त्रोत  है।

यदि हमारे शरीर में पर्याप्त प्रोटीन है और फिर भी हम प्रोटीन पाउडर का अधिक उपयोग करे तो यह कहीं न कहीं दुष्परिणाम दे सकता है। प्रत्येक खाद्य पदार्थ कुछ गुणवत्ता लिए हुए होता है, परन्तु आवश्यकता से अधिक सेवन करना नुकसानदायी भी हो सकता है। अतः प्रोटीन पाउडर के फायदे भी है और नुकसान भी, जो हम आगे इस लेख में आपको बताने जा रहे हैं- 

प्रोटीन पाउडर के फायदे:

शारीरिक व्यायाम व कसरत के पश्चात मांसपेशियों में आई जकड़न को दूर करने व  मजबूत बनाने के लिए व शरीर में प्रोटीन के उचित स्तर को बनाये रखने के लिए प्रोटीन पाउडर का सेवन करना चाहिए।

प्रोटीन पाउडर भूख पर नियंत्रण रखने के लिए भी उपयोगी होता है। इससे पर्याप्त मात्रा में कैलोरी मिलती है तथा भूख कम होने से वजन कम करने में सहयोगी होता है।

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं व गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य के लिए प्रोटीन पाउडर एक अच्छा विकल्प है।

इसके अलावा कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों का सीधे तौर से सेवन करना पसन्द नही करते या दूध, दही से एलर्जी करते हैं, तो ऐसे में प्रोटीन पाउडर का सेवन करना बेहतर होता है।

प्रोटीन पाउडर के नुकसान:

प्रोटीन पाउडर यदि शारीरिक नुकसान पहुँचाने पर आये तो यह पेट सम्बन्धी समस्याएँ जैसे गैस, आँतो की सूजन, पाचन क्षमता पर प्रभाव आदि पैदा हो सकती है।

प्रोटीन पाउडर से हॉर्मोन में असन्तुलन पैदा होता है जो कई गुप्त रोगों का कारण बन सकता है और प्रजनन क्षमता पर भी विपरीत प्रभाव डालता है। 

कई शोधों में यह बात सामने आई है कि कुछ प्रोटीन पाउडर ऐसे भी पाये गए हैं जिनमें कैंसर कारक तत्वों की मौजूदगी है। इसके सेवन से कैंसर होने का खतरा होता है।

इसके अतिरिक्त आजकल बाज़ार में मिलने वाले खाद्य पदार्थों में मिलावट की खबरें सुनना आम बात हो गयी है। हमें आसानी से बाजार निर्मित सभी प्रकार के विभिन्न कम्पनियों के प्रोटीन पाउडर मिलते हैं, जिनमें कुछ नुकसानदायी तत्वों से भी युक्त हो सकते हैं।

उपर्युक्त सारे लेख से यह बात स्पष्ट होती है कि जहाँ उचित गुणवत्ता वाले प्रोटीन पाउडर की सही मात्रा में सेवन करना फायदेमन्द हो सकता है, वहीं खराब तत्वों से बने या आवश्यकता से अधिक मात्रा में सेवन करना हानिप्रद भी सिद्ध हो सकता है|

अल्ट्रासाउंड तकनीक के फायदे एवं नुकसान क्या है?

अल्ट्रासाउंड या सोनोग्राफी शरीर के भीतर के अंगो एवं कोशिकाओं के देखने के लिए प्रयोग में लायी जाती है| अल्ट्रासाउंड करने के लिए विशेष प्रकार की मशीन का इस्तेमाल किया जाता है जिससे रेडियोएक्टिव किरने निकलती है एवं इसे हम सुन नहीं सकते|

इसके अंतर्गत शरीर के जिस भाग का अल्ट्रासाउंड होना है वह विशेष प्रकार की जेल लगाकर मशीन से जुड़े उपकरण को शरीर के उस भाग पर अच्छे से आगे पीछे ऊपर नीचे घुमाया जाता है जिससे अंदर की स्थिति का पता लगाया जा सके|

अल्ट्रासाउंड करने में 15 से 20 मिनट लगते है एवं इस प्रक्रिया में कोई दर्द नहीं होता| गर्भावस्था के दौरान शिशु के स्वास्थ्य का पता लगाने के लिए माँ का अल्ट्रासाउंड किया जाता है|

अल्ट्रासाउंड् के दौरान शरीर के अंदर यदि कुछ भी गडबडी हो तो उसकी इमेज स्क्रीन पर दिखाई दे जाती है जिसे बाद में प्रिंट कर लिया जाता है| आजकल 3d, 4d अल्ट्रासाउंड काफी प्रचलन में है जिससे और भी उच्च क्वालिटी से अंदरूनी अंगो की छवि ली जा सकती है|

अल्ट्रासाउंड तकनीक के फायदे:

अल्ट्रासाउंड तकनीक का इस्तेमाल भ्रूण की जाँच के लिए, दिल की बीमारियों का पता लगाने के लिए, पित्ते की पथरी का पता लगाने के लिए, थाइरॉइड ग्रंथि के आकलन के लिए, आदि में किया जाता है|

इस प्रक्रिया के द्वारा कैंसर एवं कोई गाँठ आदि का भी पता लगाया जा सकता है| अथवा छाती में किसी प्रकार का इन्फेक्शन आदि का पता लगाया जा सकता है|

सोनोग्राफी प्रक्रिया में मरीज को किसी प्रकार का दर्द का एहसास नहीं होता साथ ही इसमें समय भी काफी कम लगता है|

इसके द्वारा रोग को जड़ से पकडकर शीघ्रता से उसका निदान करना संभव हो पाया है साथ ही गर्भ में पल रहते शिशु की किसी प्रकार की तकलीफ अल्ट्रासाउंड द्वारा देखी जा सकती है|

अल्ट्रासाउंड तकनीक के नुकसान:

अल्ट्रासाउंड टेस्ट के दौरान रेडियोएक्टिव किरणों को शरीर के अंदर से गुजारा जाता है जिससे DNA सेल्स को हानि पहुँच सकती है एवं बहुत ज्यादा अल्ट्रासाउंड करवाने से कैंसर एवं ट्यूमर आदि बनने का खतरा बना रहता है|

शिशु के अधिक अल्ट्रासाउंड उसके दिमागी विकास को बाधित कर सकते है जिससे मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है|

सोनोग्राफी द्वारा भ्रूण की लिंग जाँच करना दंडनीय अपराध है किन्तु फिर भी अधिक पैसे वसूल करके लिंग जाँच की जाती है जो की इस तकनीक का गलत इस्तेमाल है एवं क़ानूनी एवं नैतिक दोनों तरह से ये गलत है|     

दर्द क्यों होता है?

शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द होना प्रत्यक्ष रूप से यही संकेत देता है कि शरीर के किसी आंतरिक या बाह्य भाग में कोई गड़बड़ या परेशानी है। बिना किसी शारीरिक समस्या के दर्द की समस्या पैदा नही होती है। यह समस्या आम भी हो सकती है और गंभीर भी।

मनुष्य के शरीर में अनगिनत नसों का जाल फैला हुआ होता है। एड़ी से लेकर चोटी तक की नसों का जुड़ाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मस्तिष्क तक होता है, जिसके कारण शरीर के किसी भाग में दर्द होने पर नसों के माध्यम से यह संकेत मस्तिष्क तक पहुँचता है तथा हमें दर्द का अनुभव होता है।

नसों के इस उलझे हुए जाल के कारण कई बार ऐसा भी होता है कि तकलीफ तो शरीर के किसी एक भाग में होती है, परन्तु दर्द का अहसास उस भाग के अलावा दूसरे भाग में भी होता है। 

शरीर में दर्द होने के अनगिनत कारण हो सकते हैं, जिनमें से कुछ ये हैं- कहीं चोट लगने, हड्डी टूटने या खिसकने, नसों में दबाव, मांसपेशियों में खिंचाव, कटाव या आघात, रोग आदि। दर्द आंतरिक रूप से या बाह्य रूप से या दोनों तरह से हो सकता है।

समय सीमा के आधार पर दर्द दो प्रकार के हो सकते हैं- 

स्थायी दर्द- वह दर्द जो जल्दी से खत्म नही होता है और किसी गम्भीर समस्या के कारण पैदा होता है। कई बार तो यह लाइलाज भी हो जाता है, जो कि मनुष्य के जीवित रहते हुए सदैव ही बना रहता है।

अस्थायी दर्द- ऐसा दर्द जो स्थिर न हो और कुछ अवधि के बाद खत्म हो जाता है। इसका उपचार भी सम्भव होता है या कई बार बिना उपचार के स्वतः ही सही हो जाता है। जैसे- घाव, सरदर्द, पेटदर्द आदि।  

असाधारण स्थिर दर्द की समस्या में व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए।

कई बार शरीर के किसी अंग में दर्द होता है तो वह नसों में खून के बहाव को भी प्रभावित करता है, जिससे रक्त चाप निम्न या उच्च हो जाता है। कई बार रक्त चाप सीमा से अधिक हो जाने पर नस के फटने जैसी गम्भीर स्थिति भी पैदा हो जाती है और जानलेवा भी हो सकती है। 

दर्द को ठीक करने के लिए अलग-अलग चिकित्सा पद्धतियों जैसे होम्योपैथी, एलोपैथी, आयुर्वेद, एक्युप्रेशर, सुजोक आदि में विभिन्न प्रकार के उपायों को अपनाया जाता है। प्रत्येक मनुष्य अपनी बौद्धिक क्षमता व इच्छा के आधार पर दर्द के निवारण के लिए किसी भी प्रकार की चिकित्सा पद्धति का चुनाव कर सकता है|

वाष्प स्नान (स्टीम बाथ) करने के फायदे और नुकसान क्या है?

बाष्प स्नान, स्टीम बाथ, या सोना बाथ, या भाप स्नान आदि नामो से पुकारे जाने वाले इस स्नान को लेना सेहत के लिए काफी फायदेमंद साबित हुआ है| स्टीम बाथ आप न केवल सर्दियों में बल्कि कभी भी ले सकते है|

इससे रक्त संचार ठीक रहता है एवं शरीर की मृत कोशिकाए निकल जाती है, जिससे त्वचा में नयी कोशिकाओं का बनना शुरू होता है एवं अच्छे से सफाई हो जाती है जिससे स्किन अच्छी एवं कोमल बनी रहती है|

स्टीम बाथ का फायदे:

स्टीम बाथ तनाव से मुक्ति पाने का अच्छा तरीका है इससे रोमछिद्र खुल जाते है एवं आपका शरीर खुलकर सांस ले सकता है|

त्वचा को प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन मिलती है एवं हानिकारक टोक्सिन शरीर से पसीने के रूप में बाहर निकल जाते है|

इससे मांसपेशियों को राहत मिलती है एवं किसी प्रकार के दर्द या सूजन में आराम मिलता है एवं इससे इम्यून सिस्टम मजबूत बनता है एवं रात को नींद भी अच्छी आती है|

इससे रक्त प्रवाह बढ़ जाता है, जिससे त्वचा के रोग से छुटकारा मिलता है एवं यह त्वचा को निरोगी एवं सुंदर बनाता है|

तथ्यों में ऐसा माना गया है कि स्टीम बाथ नियमित रूप से लेने पर कैंसर निर्माण करने वाले सेल्स नष्ट हो जाते है जिससे कैंसर होने की सम्भावना कम हो जाती है|

स्टीम बाथ लेने के नुकसान:

स्टीम बाथ के 15 या 20 मिनट से अधिक नहीं लेना चाहिए एवं इसे केवल उपचार स्वरूप लेना ठीक रहता है|

स्टीम बाथ के बाद शरीर से काफी पानी निकल जाता है इसलिए स्टीम बाथ लेने के बाद पानी ज्यादा पीना चाहिए नहीं तो डिहाइड्रेशन की समस्या पैदा हो सकती है|

जिन्हें दिल की बीमारी की समस्या हो या गर्भवती महिलाएं एवं छोटे बच्चे अथवा बुखार आदि होने पर स्टीम बाथ नहीं लेना चाहिए|