पौधे व इनके वैज्ञानिक नाम Plants and their Scientific Names

गन्ना- सैकेरम ऑफिसिनेरम

तम्बाकू- निकोटियाना टोबेकम

सूरजमुखी- हैलिएन्थस एनस

लोबिया- विग्ना एनग्युकुलेटा

मूँगफली- एराकिस हाइपोज़िया

ज्वार- सॉर्घम वल्गेयर

मक्का- ज़िया मेज़

उड़द- विग्ना मुंगो

चना- साइसर एरीटिनम 

आलू- सोलेमन ट्यूबरोसम

मसूर- लेन्स कूलिनेरिस

गेँहू- ट्रिटिकम एस्टीवम

लीची- लीची साइनेंसिस

काजू- एनकार्डियम ऑसिडेंटेल

नीम्बू- सिट्रस ओरेंटीफोलिया

पपीता- केरिका पपाया

टमाटर- लाइकोपर्सिकम एस्कुलेंटम

इमली- टैमारिंडस इंडिका 

सन्तरा- सिट्रस साइनेंसिस

सेब- पाइरस मैलज़

ख़जूर- फॉईनिक्स डेक्टाईलीफेरा

गोभी- ब्रेसिका ओलेरेसिका

लहसून- एलियम स्टाईवा

मूली- रेकेन्स स्टाईवस

भिण्डी- एबरमोस्कस एस्कुलेंटस

कमल- मेलम्बियम स्पीशियोसम

करेला- मिमोर्डिया करंशिया

शकरकन्द- आइपोमिया बटाटा

प्याज- एलियम सैपा

शलगम- ब्रेसिका रापा

गाजर- डॉकस कैरोटा

शहतूत- मौरस इंडिका

मिर्च- कैप्सिकम एनम

नाशपती- पाईरस कम्युनिस 

खीरा- कूकुमिस मीलो

बैंगन- सोलेनम मेलोंजीना

अनार- प्रुनिका ग्रेनेटम 

केला- मूसा पैराडीसीयाका

नारियल- कोकोज़ न्यूसीफेरा

जौ- होर्डियम वल्गेयर

सरसों- ब्रेसिका कैम्पेस्ट्रिम

मटर- पाइजम स्टाइवम

बाजरा- पैनीसिटम टाइफॉइडस

धान- ओराइजा स्टाइवा

सोयाबीन- ग्लाइसीन मैक्स

अरहर- कैलेनस कज़ान

कपास- गोसीपीयम हरबेसियम

अमरुद- साइडियम ग्वाजावा

मूँग- विग्ना रैडियेटा

आम- मेंजिफेरा इंडिका

अँगूर- वायटिस विनीफेरा

सेम- डॉलिकम लवलव

बाँस- बैम्बूसोयदाय

अदरक- ज़िन्ज़िबर ऑफिसिनेल

पुदीना- मैंथा एरवेन्सिस

मनी प्लांट- एपिप्रेमन्म औरेयम

चावल- ओराइजा स्टाइवा

गुलाब- रोज़ा

पालक- स्पीनिया ओलेरसाइए

हल्दी- कुर्कुमा लौंगा

तुलसी- ऑसीमम सेक्टम

करी पत्ता- मुराया कोइंजी

काली मिर्च- पाइपर नाइग्रम

बरगद- फ़िकस बेंगलेंसिस

सहजन- मोरिंगा ओलिफेरा

नीम- एज्दिरॉच्टा इंडिका

चन्दन- सन्तालुम् अल्बम

तरबूज- सिट्रलस वल्ग्रिस

पेड़ व पौधों के हिन्दी व अँग्रेजी नाम

कनेर Oleander

पीला कनेर Yellow Oleander 

कंगन Ixora

मेहँदी Hennah

गुलतुर्रा Peacock Flower

दिकमाला Brilliant Gardenia

गन्धराज Jasmine

तुलसी Tulasi

लाल पत्ते Lobster Plant

रंगून की बेल Rangoon Creeper

चाँदनी Moonbeam

गुड़हल Hibiscus

हारसिंगार Tree of sorrow

कलिहारी Glory Lily

मुलता Sky Flower

बबूल Acacia

बास Bamboo

सिरस Abbizia Labbek

भोजपत्र Birch

बरगद Banyan

सागवान Teak

देवदार Cedar

रुद्राक्ष Eleocarpus

बेंत Cane

नागफनी Cactus

देवदार Fir

नारियल का पेड़ Cocoa Tree

सुपारी का पेड़ Betel Nut Tree

सेब का पेड़ Apple Tree

ककड़ी का पेड़ Bilimbi Tree

आम का पेड़ Mango Tree

खजूर का पेड़ Date Palm

अमरुद का पेड़ Guava

अँगूर की बेल Grape Vine

कटहल का पेड़ Jack Tree

सरू Cypress

सन Flax

झाऊ Conifer

आबनूस Abony

पटसन Jute

अंजीर Fig

महोगनी Mahogany

बलूत Oak

चन्दन Sandal

नील Indigo

ताड़ का पेड़ Palm Tree

धान का पौधा Paddy

चीड़ का पेड़ Pine

साल का पेड़ Saal Tree

अशोक Polyalthia

जीरा Staman

रामधन चम्पा Golden Champak

रोहिड़ा Desert Teak Tree

सहजन Drumstick Tree 

आँवला Emblica 

गोंद Gum 

बेर Jujube

नीम Neem

इमली Tamarind 

पीपल Peepal

पलाश Parrot Tree

पँजीरा Coral Tree

अर्जुन Pride of India

रगतूरा Tulip Tree

अमलतास Pudding Pipe Tree

शिवलिंगम Cannon Ball Tree

महुआ Indian Butter Tree

ताल Fan Palm

वनस्पति तेल क्या होता है। Vegetable Oil in Hindi

वनस्पति तेल, बहुत प्रकार की वनस्पतियों के बीज से निकला गया तेल होता है जैसे सोयाबीन का तेल, सूर्यमुखी का तेल, सरसों का तेल, नारियल का तेल।

प्राकृतिक रूप से बनाया गया वनस्पति तेल हमारे स्वास्थ के लिए काफी लाभदायक होता है जैसे की सरसों का तेल, नारियल का तेल , सोयाबीन का तेल वहीं कृत्रिम रूप से बनाया गया हाइड्रोजनेटेड आयल जैसे की डालडा, रिफाइन आयल हमारे स्वास्थ के लिए काफी नुकसानदायक सिद्ध होते है इस आर्टिकल में हम ये पता करेंगे की हाइड्रोजनेटेड आयल, रिफाइन आयल और प्राकृतिक वनस्पति आयल क्या होता है।

नारियल का तेल

नारियल का तेल, नारियल से बनाया जाता है, कोकोनट आयल या नारियल का तेल हम अक्सर बालो में लगाते है लेकिन इसके और भी बहुत सारे उपयोग हैं । नारियल तेल मुख्यतः दो तरह का पाया जा सकता है एक बिना रिफाइन कोकोनट तेल और दूसरा रिफाइन कोकोनट तेल । बिना रिफाइन किया हुआ प्राकृतिक कोकोनट का तेल बहूत ही लाभकारी होता है।

नारियल तेल को हम बालो के साथ साथ त्वचा और शरीर पर भी इस्तेमाल कर सकते हैं, इस तेल को खाना बनाने में भी इस्तेमाल किया जाता है, यह तेल हमलोगों के लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध हुआ है क्यों की हम इसका इस्तेमाल खाना से लेकर, शरीर के मसाज में भी कर सकते है ।

इस तेल का इस्तेमाल घरेलु साबुन बनाने में भी किया जाता है ।

सूरजमुखी का तेल

सूरज मुखी का तेल उसके बीज से निकला जाता है, इसका तेल खाने में और शरीर के मालिस करने में इस्तेमाल किया जाता है। सूरज मुखी के तेल में विटामिन E काफी मात्रा में पाया जाता है, इस तेल में अधिकतर unsaturated fat पाया जाता है, जो की saturated fat से अच्छा है उनलोगों के लिए जो की दिल की बीमारी से दूर रहना चाहते हैं।
लेकिन इनसब के बावजूद सूरज मुखी तेल के कई नुकसान भी पाए गए है जैसे की आपको सूरज मुखी के तेल का इसतेमाल नही करना चाहिए अगर आप pregnent हैं या अपने बच्चे को दूध पिला रही हों।
जिन लोगो को डायबिटीज है उनको भी सूरज मुखी के तेल का इस्तेमाल नही करना चाहिए क्यों की ये तेल blood के sugar level को बढ़ा देते हैं।

सोयाबीन का तेल

सोयाबीन का तेल सोयाबीन के पौधे के बीज़ से निकला जाता है, सोयाबीन के तेल खाने से कोलेस्ट्रॉल में कमी आती है।

इस तेल का उपयोग काफी किया जाता है क्यों की इसमें पाया जाने वाला फैटी एसिड्स हमारे शरीर के लिए काफी उपयोगी है , १०० ग्राम सोयाबीन के तेल में, १६ ग्राम saturated fat , २३ ग्राम
monounsaturated fat और ५८ polyunsaturated fat पाया जाता है।

जैतून का तेल

जैतून के तेल जैतून के पौधे के फल से निकला जाता है।

जैतून का तेल स्वास्थ के लिए काफी लाभदायक है, इसमें मौजूद omega -3 फैटी एसिड्स हमारे दिल के स्वास्थ के लिए काफी अच्छा है।

इस तेल का प्रयोग खाना बनाने, सौन्दर्य सामग्री, साबुन और दवाइया बनाने में किया जाता है। जैतून का तेल वजन घटाने में सहायक हो सकता है। इसके सेवन से कोलेस्ट्रॉल में कमी आती है। दिल की बीमारियों से दूर रहने के लिए इसका सेवन जरूर करे।

मूंगफली का तेल

बाजार में उपलब्ध वनस्पति तेलों में से एक मूंगफली का तेल भी है, मूंगफली का तेल मूंगफली के दानो से बनाया जाता है, इस तेल का उपयोग खाना बनाने में किया जाता है, इस तेल में काफी मात्रा में polyphenol antioxidants  पाया जाता है, जो हमे कैंसर जैसे खतरनाक बीमारियों से बचाता है।

बादाम का तेल

बादाम का तेल या आलमंड आयल मुख्यतः बालो और त्वचा में निखार लाने में प्रयोग किया जाता है। यह त्वचा को Moisturize  कर के रखता है अगर इसका इस्तेमाल त्वचा पर किया जाये तो।

रूखी त्वचा को ठीक करने में यह काफी मददगार होता है। इसके तेल में विटामिन E और A पाया जाता है जो त्वचा और बालो के लिए कभी लाभदायी है।

पादपों में जनन 

cute plants

जनन के द्वारा ही नए पादपों का विकास व जन्म होता है। लैंगिक व अलैंगिक जनन दोनों से ही पादप की भिन्न-भिन्न व नई प्रजातियां पैदा की जा रही हैं।

पादपों में लैंगिक जनन

पुष्पी पादपों में जनन के लिए दो अंग होते हैं-

स्त्रीकेसर– यह  मादा जननांग है। इसे अण्डप भी कहते हैं। इसके तीन भाग है- अण्डाशय, वर्तिकाग्र, वर्तिका। यह पुष्प के केंद्र में स्थित रहता है। वर्तिकाग्र द्वारा परागकणों को ग्रहीत करता है तथा वर्तिका से होते हुए ये परागकण अण्डाशय तक पहुँचते हैं।

पुंकेसर– यह नर जननांग है। इसी में परागकण निर्मित व परिपक्व होते हैं। पूर्ण परिपक्वता के बाद परागकण का आवरण फट जाता है तथा बाहर आ जाते है। परागकण जिस आवरण से ढके रहते हैं उसे परागकोश कहते हैं। हवा या पानी या जीवों के माध्यम से पादपों तक पहुंच कर उन्हें निषेचित करते हैं।

इसके अलावा पुष्पधर, बाह्यदल व पंखुड़ियाँ पुष्प के अन्य भाग हैं।

सभी पुष्प एक समान नहीं होते है। इनकी प्रवृति में भी भिन्नता पाई जाती है।

एकलिंगी पुष्प– कुछ पादप या पुष्प ऐसे होते हैं, जिनमें नर या मादा जननांग दोनों में से कोई एक ही जननांग स्थित होता है।

द्विलिंगी पुष्प– ऐसे पादप या पुष्प जिनमें नर जननांग व मादा जननांग दोनों ही स्थित होते हैं।

पादपों में अलैंगिक जनन

विखण्डन– इसका तात्पर्य है विभाजित होना। इसमें द्विविखण्डन व बहुविखंडन शामिल हैं। द्विविखण्डन में मुख्य कोशिका पूरी तरह विकसित होने के निकट पहुंचकर दो भागों में विभाजित हो जाती है तथा फिर स्वयं खत्म होकर दो नए पादपों को पैदा करती है। बहुविखंडन में मुख्य कोशिका बहुत विभाजित होकर बहुत से नए पादपों को पैदा करती है।

मुकुलन–  इसमें मुख्य पादप पर एक नया छोटा पादप विकसित हो जाता है तथा धीमी गति से वृद्धि करते हुए समय आने पर उस मुख्य पादप से अलग होकर नए पादप के रूप में विकसित होता रहता है।

बीजाणु का निर्माण– बीज व अणु से मिलकर बना शब्द बीजाणु के द्वारा ही नए पादप पनपते हैं। पादपों की प्रत्येक किस्म में बीजाणु का निर्माण होता है।

पुनःजनन– इसका अर्थ है दुबारा से जन्म होना। जब किसी पादप का कोई हिस्सा जैसे पत्ते, तना या टहनी टूट कर अलग हो जाती है तो प्राकृतिक रूप से अपने आप नई पैदावार होती है। यह अलैंगिक जनन है क्योंकि इसमें बिना किसी जनन क्रिया के नई उत्पत्ति होती है।

कायिक प्रवर्धन– यह प्रचलित प्रक्रिया है। इस में किसी पादप का कोई हिस्सा निकालकर या तोड़कर अलग कर लिया जाता है तथा फिर उन्हें आवश्यक निश्चित मिट्टी, हवा पानी आदि की सहायता से उपजाऊ स्थान में नए पादपों के विकास की क्रिया की जाती है। कायिक प्रवर्धन की भी अलग-अलग विधियाँ होती है- कलम लगाना, जड़ें लगाना, कतरन लगाना आदि सम्मिलित हैं।

कलम लगाना (Grafting)–  एक पादप का कोई हिस्सा (शाखा, पत्ती, टहनी) जिसपर बीज लगे हों, को तोड़कर नई जगह में उपजाऊ मिट्टी में डाल दिया जाता है तथा पर्याप्त हवा व पानी के द्वारा विकसित होते होते वह नए पौधे का रूप ले लेता है।

जड़ें लगाना  (Layering)– पादप की कुछ जड़ों को उस से अलग करके नई जगह पर मिट्टी में डाल दिया जाना है तथा कुछ समय पश्चात जड़ें पनपने लगती है तथा नए पौधे के रूप में विकसित होती जाती है।

कतरन लगाना (Cutting)– इस क्रिया में दो भिन्न-भिन्न पादपों का कोई तना उससे अलग कर लिये जाते हैं, अथवा काट लिए जाते हैं, जिनमें से एक तने को जड़ सहित व दूसरे तने को जड़ रहित अलग किया जाता है। दोनों तनों को आपस में मिलाकर जोड़ दिया जाता है व कुछ समय के लिए प्लास्टिक की एक पतली परत से ढक दिया जाता है। कुछ दिनों में ये दोनों तने आपस में क्रिया कर नए पादप का रूप लेने लगते हैं। दो भिन्न-भिन्न पादपों के तनों से बना यह नया पादप दोनोँ पुराने पादपों के गुणों से भरा हुआ होता है।

परागण

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परागकोश में पाये जाने वाले परागकणों का अण्डप में वर्तिकाग्र तक पहुंचना ही परागण कहलाता है। परागण निषेचन से पहले होता है।परागकणों को पादपों में पहुंचाने के लिए पादपों के आंतरिक भाग में अण्डाशय के ऊपर नलिका के रूप में “वर्तिका” पाई जाती है, इस वर्तिका का अग्रभाग (आगे का हिस्सा) ही वर्तिकाग्र कहलाता है।

परागकोशों में बनने वाले परागकण परिपक्व होते हुए नर युग्मक से युक्त हो जाते हैं तथा जब परागकोशों की भित्ति फट जाती है तो ये परागकण बाहर आ जाते हैं। लैंगिक जनन के लिए ये परागकण नर युग्मक के रूप मे भ्रुणकोष अर्थात् मादा युग्मक तक पहुँचते है।

परागण के तीन माध्यम होते हैं- जन्तु परागण, वायु परागण, जल परागण। परागकण अत्यधिक हल्के होने के कारण ये किसी जन्तु, वायु, जल आदि के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाते हैं।

जन्तु परागण में परागकण जब किसी पक्षी या कीट-पतंगे पर चिपक जाते हैं और वह विचरण करता हुआ किसी पादप के पुष्प पर बैठता है तो परागकण उस पुष्प के वर्तिकाग्र पर गिर कर पादप को परागित करते हैं। वायु परागण में परागकण वायु के वेग से गमन करते हुए पादपों तक पहुँच जाते हैं तथा उन्हें परागित कर देते हैं।

जल परागण में परागकण जल के माध्यम से प्रवाहित होते हुए किसी पादप को परागित करते हैं। ऐसे में परागण जल की सतह पर भी हो सकता है तथा जल की सतह की नीचे भी हो सकता है।

परागण प्रमुखतः दो तरह से होता है – स्वपरागण व परपरागण।

स्वपरागण- जब परागकण एक पादप के किसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं तथा वहीँ से उसी पादप के अन्य पुष्पों के वर्तिकाग्र पर पहुंचते हैं तो इस प्रकार से होने वाला परागण स्वपरागण कहलाता है। स्वपरागण द्विलिंगी पादपों में होता है। इसमें एक पुष्प भाग लेता है। इसमें बाह्य परागण कारकों की उपस्थिति के बिना ही परागण हो जाता है। इसके उदाहरण हैं- मटर, टमाटर।

परपरागण- जब परागकण एक पादप के किसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते है तथा वहाँ से अपनी ही प्रजाति के किसी अन्य पादप के पुष्पों के वर्तिकाग्र पर पहुँचते है तो यह परपरागण कहलाता है। परपरागण में पादप द्विलिंगी नहीं होते है। इसमें दो पुष्प भाग लेते हैं। इसमें परागण के लिए बाह्य परागण कारकों का होना जरूरी होता है। इसके उदाहरण हैं- गुलाब, पॉपी।

परागकण हल्के व चिकनी प्रवृत्ति के होते हैं तथा इनमें प्रचुर मात्रा में पोषक पदार्थ भी पाये जाते हैं। वर्तमान समय में विदेशों में परागकणों का प्रयोग कर के पराग उत्पाद निर्मित किये जा रहे हैं, जैसे- पराग गोलियाँ व सिरप आदि।

पादपों में पोषण (Nutrition in Plants)

cute tree

पर्यावरण में रहने वाले सभी जीव प्रकृति से अपना भोजन प्राप्त करते है एवं अपना भरण पोषण करते है| पादप पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण अंग है एवं ये अपने विकास एवं पोषण के लिए अधिकांशत: सूर्य के प्रकाश पर निर्भर करते है| मुख्य रूप से पादपो में २ प्रकार का पोषण होता है, क्योकि पादप भी दो प्रकार के होते है, जो इस प्रकार है:

स्वपोषी

स्वपोषी प्रक्रिया के अंतर्गत, जैसा की नाम से स्पष्ट हो रहा है, इसे पादप जो अपना भोजन स्वय बनाते है, उन्हें स्वपोषी कहा जाता है| ये पौधे प्रकाश संश्लेष्ण क्रिया द्वारा अपना पोषण प्राप्त करते है| कुछ एककोशकीय जीव, शैवाल, सभी हरे रंग के पौधे एवं कुछ जीवाणु सभी स्वपोषी की श्रेणी में आते है|

परपोषी

इसे जीव या पादप जो अपने भरण पोषण के लिए दूसरे जीवों पर निर्भर रहते है एवं स्वय अपना भोजन नहीं बना सकते, उन्हें परपोषी कहा जाता है| सारे जन्तु एवं कवक आदि परपोषी के अंतर्गत आते है|

पादपों में पोषण का मुख्य आधार

सभी हरे पादप अकार्बनिक से कार्बनिक भोजन का निर्माण करते है, जिसमे सूर्य की किरनों का अहम् योगदान होता है| पादपो में भोजन निर्माण के लिए प्रकृति द्वारा प्रदत एक घटक पाया जाता है, जिसे क्लोरोफिल कहा जाता है, यह सूरज से आने वाले प्रकाश को अवशोषित करता है, जिसे प्रकाश संश्लेष्ण क्रिया कहा जाता है| इसके आभाव में पौधे अपना भोजन निर्माण नहीं कर सकते|

सूर्य के प्रकाश के साथ-साथ जल व् कार्बन डाईऑक्साइड भी पादपो के पोषण के लिए अनिवार्य है| पौधे की पत्तियों में सूक्ष्म छेद होते है, जिन्हें स्टोमेटा कहा जाता है, जिनके द्वारा कार्बन डाईऑक्साइड पौधे के भीतर प्रवेश करती है एवं जल की पूर्ति जड़ो द्वारा जल को अवशोषित करके हो जाती है| इसके बाद रासायनिक प्रक्रिया द्वारा पत्तियां भोजन बनाती है, जो शर्करा के रूप में पौधे को प्राप्त होता है एवं जिसे ग्लूकोज कहा जाता है| बाद में यह शर्करा पादप के अन्य भागों तक पंहुचा दी जाती है, जिससे सभी भागों को समान रूप से पोषण प्राप्त हो सके|

पादपों में पोषण हेतु मुख्य तत्व

पादपों में गहराई से पोषण हेतु १७ मुख्य एवं आवश्यक तत्वों का महत्वपर्ण योगदान रहता है, जिससे पौधे का विकास होता है, इसमें जल एवं प्रकाश के साथ-साथ अन्य तत्व भी जरूरी होते है, जिनका विवरण इस प्रकार है:-

प्राथमिक पोषक तत्व

प्राथमिक पोषक तत्व वे होते है, जिनकी पौधे को अपने विकास के लिए सबसे अधिक आवश्यकता होती है| इन तत्वों में आक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन, फास्फोरस, हाइड्रोजन, कैल्शियम, पोटेशियम, एवं सल्फर आदि सम्मिलित है| इसमें १० घटकों का समावेश किया गया है|

द्वितिय पोषक तत्व

इन्हें लघुमत्रिक पोषक तत्व भी कहा जाता है, क्योकि पौधे को इसकी कम आवश्यकता होती है| इस श्रेणी में मुख्य रूप से ८ तत्वों को शामिल किया गया है, जिनमे ताम्बा, निकेल, जस्ता, बोरोन, लोहा, क्लोरिन, मैंगनीज एवं मालिब्डेनिम आदि शामिल किये गये है|

क्रान्तिक तत्व

ये ऐसे तत्व होते है, जिनका काम भूमि की उर्वरता को अधिक से अधिक बढ़ाना है, जिससे अच्छी फसल प्राप्त की जा सके| अत: इन तत्वों को भूमि का उपजाऊपन बढ़ाने हेतु खाद के रूप में डाला जाता है|

आक्सीजन, कार्बन, हाइड्रोजन:

ये तीनो तत्व पौधे के विकास के लिए अत्यंत अनिवार्य है, जिसे पौधे की कोशिका भित्ति का निर्माण होता है, एवं जीवद्रव्य बनता है| पौधे अपनी जरूरत के अनुसार ये तत्व वातावरण से ग्रहण करते है, एवं प्रकाश संश्लेष्ण से रासायनिक क्रिया द्वारा अपना भोजन निर्माण करते है|

सल्फर:

सल्फर पौधे के विकास एवं जड़ की मजबूती के लिए नितांत आवश्यक है| जिन पौधे की पत्तियां खराब या पीली पड़ने लगती है, उनमे सल्फर की कमी पाई जाती है एवं फलों का बनना रुक जाता है|

नाइट्रोजन:

नाइट्रोजन पौधे के अंदर प्रोटीन निर्माण में सहायता करता है एवं न्यूक्लिक एसिड बनाता है, जो पौधे के बढने के लिए आवश्यक है|

फास्फोरस:

इसके द्वारा पौधे की विभिन्न कोशिकाओ का निर्माण होता है, एवं अच्छी फसल के लिए यह अनिवार्य है|

कैल्शियम:

यह तत्व गुणसूत्रों का निर्माण करने, DNA व् RNA को पौधे के प्रोटीन से जोड़ने, वसा के अवशोषण आदि का कार्य करता है| इसकी कमी होने पर पौधे में बीज बनना रूक सकता है|

पोटेशियम:

पौधे की लम्बाई एवं उचित विकास के लिए इस तत्व का पाया जाना अनिवार्य है, इसकी कमी से पौधे को कई प्रकार के रोग लग सकते है|

आयरन:

इस तत्व का पादप की श्वसन प्रणाली में अहम योगदान रहता है| पादप में लोह तत्व की कमी से हरिमहीनता एवं अन्य रोग घेर सकते है|

मैग्नीशियम:

यह तत्व पौधे के प्रोटीन का क्लोरोफिल के साथ संयोजन करने में मदद करता है|

मैंगनीज:

यह तत्व पादप में नाइट्रेट बनाने में सहायता करता है|

बोरोन:

यह तत्व ग्लूकोज निर्माण में सहायता करता है|

जिंक:

यह तत्व पौधे की लम्बाई एवं फल के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है|

ताम्बा:

यह पौधे की श्वसन प्रणाली के लिए उचित व्यवस्था करता है|

मालिब्डेनम:

यह पौधे के मेटाबोलिजम के लिए अनिवार्य तत्व है|

पादप जगत (Kingdom Plantea)

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पादप को प्राणी जगत का एक बड़ा एवं महत्वपूर्ण अंग माना जाता है| अब तक हुई खोजों के अनुसार ३ लाख से अधिक पादपों की विभिन्न प्रजातियों की खोज की गई है जिसमे से अधिकांशत: बीज युक्त पौधे है, किन्तु फिर भी खोजकर्ता ऐसा मानते है कि पादप जगत इतना विशाल है की सभी प्रजातियों की खोज करना अत्यधिक कठिन है|

पादपो के अध्ययन करने की प्रक्रिया को वनस्पति विज्ञान कहा जाता है| पादप जगत के अंतर्गत शैवाल, वृक्ष, मास, छोटे से लेकर बड़े पेड़, फ़र्न, कवक पादप आदि सम्मिलित किये गये है| इनमे से अधिकांशत: पादप प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते है किन्तु कुछ कवक पादप परजीवी हो सकते है| कवक एवं जीवाणु को पादप जगत में सम्मिलित नहीं किया गया है किन्तु ग्रीन शैवाल को पादप जगत का हिस्सा माना जाता है|

पादप को प्राथमिक उत्पाद भी कहा जाता है, इनमे भी प्राण होते है, जो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया जा चूका है| हरे पौधे के कारण वातावरण में आक्सीजन की पूर्ति होती है, एवं विभिन्न प्रकार के पादपो द्वारा जीव-जन्तु एवं मनुष्य अपना भरण पोषण करते है, इसलिए पादपो को जीवन का आधार माना गया है|

पादपो का वर्गीकरण

पादप वर्गीकरण के सिधांत के अंतर्गत पौधे के नाम, भौगोलिक लक्षण, आकृति एवं शारीरिक लक्षण, पहचान एवं रासायनिक संगठन के आधार पर पौधे का वर्गीकरण किया जाता है| इसके अंतर्गत कोशिका सरंचना भी सम्मिलित है क्योकि पादपो में भी कोशिका पाई जाती है|

पादपो का वर्गीकरण वनस्पति विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है| वर्गिकी शब्द का इस्तेमाल सर्वप्रथम A.P केंडोले ने अपनी पुस्तक में १८३४ ई में किया था जो की एक फ्रेंच वनस्पतिशास्त्री थे| पादप जगत के अंतर्गत पौधे का वर्गीकरण करने हेतु कुछ इकाईया निश्चित की गई है, जिससे पौधे को वर्गिकी के आधार पर ठीक श्रेणी में रखा जा सके एवं खोजकर्ताओ के लिए यह प्रक्रिया आसान हो सके|

वर्गीकरण की इकाई के अंतर्गत पौधे का जगत, प्रभाग, उपभाग, संवर्ग, उपसंवर्ग, कुल, उपकुल, गण, उपगण, जाति, उपजाति, वंश, उपवंश, किस्म, उपकिस्म, ट्राइब, सब ट्राइब, फ़ोर्मा, एवं स्लोन आदि के आधार पर पौधे का वर्गीकरण करके उसे उसके जैसे समूह में वर्गीकृत किया जाता है|

पादप जगत के महत्वपूर्ण वर्ग

पादप जगत के अंदर वैसे तो लाखों प्रजातिया शामिल है, किन्तु मोटे तौर पर शैवाल, ब्रायोफाईट, टेरिडोफाईट एवं अनावृतबीजी और आवृतबीजी आते है, जिनका विवरण इस प्रकार है:-

शैवाल

शैवालों में पत्तियाँ, तना व् जड़ आदि कुछ नही पाया जाता, इसलिए ये निम्न श्रेणी के पादप माने जाते है, किन्तु इनमे क्लोरोफिल पाया जाता है, इसलिए ये अपना भोजन स्वंय बनाते है| शैवालों की ३०,००० से अधिक प्रजातिया मानी गई है जिन्हें मुख्य रूप से ८ उपवर्गों में विभक्त किया गया है, जिनके नाम है:- साइनोफाईटा, युग्लिनोफाईटा, क्लोरोफाईटा, फियोफाईटा, रोड़ोफाईटा, कैरोफाईटा, पाईरोफाईटा एवं क्राईसोफाईटा|

धरती का ऐसा कोई भाग नहीं, जहाँ शैवाल नहीं पाए जाते| सागर, झीलों तालाबों आदि में उपस्थित पौधो को भी शैवाल कहा जाता है| ये विभिन्न रंगो के होते है जैसे नीला, हरा, लाल एवं नारंगी| कुछ शैवाल सूक्ष्म व् एक कोशिकीय होते है, जबकि कुछ शैवाल बड़े एवं बहुकोश्किया होते है|

शैवाल में लेंगिक व् अलेंगीक दोनों प्रकार से जनन क्रिया सम्पन्न होती है| इनमे जनन की अद्भुत क्षमता होती है और बहुत कम समय में ये तेजी से अपनी संख्या बढ़ा लेते है| जैसे बरसात के दिनों में जनन के दौरान हरे रंग के शैवाल का तालाबो में अत्यधिक नजर आता है| कई बार ये कुछ जलीय जीवो के उपर भी विकसित होने लगते है जैसे घोंघा|

ब्रायोफाईटा

वैज्ञानिको का ऐसा मानना है की ब्रायोफाईटा का जन्म हरे शैवाल से हुआ होगा| मुख्य रूप से ब्रायोफाईटा को ३ भागों में विभक्त किया गया है:-

हीपेटीसी:

इसके अंतर्गत कुछ प्रजातिया गीले स्थानों पर विकसित होती है एवं अधिकांशत: पानी के अंदर उगती है| इस वर्ग में ८,५०० के आसपास प्रजातिया सम्मिलित की गई है, जिनके अलग-अलग कुल व् वंश के आधार पर उनका वर्गीकरण किया गया है|

एंथोसिरोटी:

इस वर्ग के अंतर्गत आने वाले पौधे बीजाणु से प्रस्फुटित होकर उपर की दिशा में निकलते है| इसमें पादप का प्रमुख अंग युग्मक जनक होता है, इसमें पुन्धानी उपर से गुब्बारे के तरह गोल व् फूली हुई होती है, एवं नीचे से पतली होती है|

मससाई:

मॉस की लगभग 14,००० के आसपास प्रजातिया मानी गई है, जिनके ६५० वंश है| इनके ३ उपवर्ग होते है, जिन्हें स्फेग्नोब्रिया, एंडोब्रिया एवं युब्रिया कहा जाता है|

टेरीडोफाईटा

इनकी उत्पत्ति करोड़ो वर्ष पहले से मानी जा रही है| इसे मुख्य रूप से 4 भागों में विभाजित किया गया है, जिनके नाम है: साइलोफाईटा, लेपिडोफाईटा, केलेमोफाईटा, एवं टेरीफाईटा|

अनावृतबीजी

जिन पौधो के बीज नग्न अवस्था में होते है, उन्हें अनावृतबीजी पौधे कहा जाता है| इस प्रकार के पौधो के समूह को सिकाडोफिटा कहा जाता है|

आवृतबीजी

जो पौधे अपने बीजों में बंद रहते है, उन्हें आवृतबीजी कहते है| इनमें फूल, पत्तिया, जड़, तना आदि सभी पाए जाते है| ये मुख्य रूप से दो प्रकार के होते है: द्विबीजपत्री एवं एक बीजपत्री|