मिश्रण के प्रकार

मिश्रण के बारे में पूर्व में चर्चा की जा चुकी है। अब मिश्रण के प्रकार के बारे में भी व्याख्या की जानी चाहिए। मिश्रण दो प्रकार के होते हैं-
# समांगी या समांग मिश्रण
# असमांगी या असमांग या विषमांग मिश्रण

समांग मिश्रण

समांग मिश्रण वे होते हैं जिनमें एक से ज्यादा तत्व या यौगिक एक दूसरे में इस प्रकार समा जाते हैं कि उनको प्रत्यक्ष रूप से देखा नही जा सकता है।
इनमेँ पाये जाने वाले विभिन्न अवयव आपस में समाहित होकर एक ही अंग बन जाते हैं, जिस कारण उनकी अलग-अलग रूपों में पहचान नही की जा सकती। समांग मिश्रण में पाये जाने वाले तत्वों के गुणों का प्रत्येक अंश में एक ही स्वरुप हो जाता है अर्थात् विलयन के प्रत्येक अंश में तत्व की सान्द्रता एक जैसी होती है।

इसमें अलग अलग तत्वों का भौतिक रूप से विभाजन करना सम्भव नही होता है।
जैसे- चीनी और पानी का घोल। इसमें चीनी विलेय पदार्थ है और पानी विलायक है। जब ये आपस में घुल जाते है तो यह चीनी और पानी का विलयन बन जाता है व घुलने के बाद चीनी के कणों को देखा नही जा सकता। अर्थात् पानी के भीतर चीनी पूरी तरह से घुल कर ये दोनों एक अंग बन जाते है, तो ये समांग मिश्रण कहलाते हैं।

कणों के आकार के आधार पर विलयन को समांगी मिश्रण में सम्मिलित किया जाता है।

विलयन

इसमें कण अत्यन्त छोटे होते हैं व हल्के होते हैं। इन्हें प्रत्यक्ष आँखों से देखना तो असम्भव है ही व साथ में साधारण माइक्रोस्कोप से भी इन्हें नही देखा जा सकता।

विलयन भी तीन प्रकार के होते हैं-
संतृप्त विलयन- इसमें निश्चित मात्रा में विलेय एक निश्चित तापमान तक ही विलायक में घुल सकता है। जब तापमान को स्थाई रखा जाए और विलेय की मात्रा को बढ़ाया जाए तो वह घुलना बन्द हो जाता है। इसे ही संतृप्त विलयन कहते हैं।

असंतृप्त विलयन- इसमें विलायक का तापमान बढ़ाकर उसमे विलेय की मात्रा भी बढ़ाई जा सकती है और वह घुलनशीलता कायम रखता है। इसमें तापमान स्थाई नही रख सकते। इसे असंतृप्त विलयन कहते हैं।

अतिसंतृप्त विलयन- संतृप्त व असंतृप्त के बाद एक स्थिति ऐसी आती है कि तापमान बढ़ाये जाने के बाद भी उसमें विलेय का घुलना बन्द हो जाता है। इस स्थिति में विलेय व तापमान दोनों को नही बढ़ाया जा सकता है। इसे ही अतिसंतृप्त विलयन कहते हैं।

उपर्युक्त उदाहरण में चीनी एक ठोस द्रव्य(पदार्थ) है और पानी तरल, परन्तु मिश्रण में विलेय व विलायक में एक का ठोस व दूसरे का द्रव (तरल) होना आवश्यक नही हैं। विलेय किसी भी अवस्था ठोस, द्रव और गैस में हो सकता है, उसी प्रकार विलायक भी ठोस, द्रव या गैस के रूप में हो सकता है।

असमांगी मिश्रण

इसे विषमांग मिश्रण भी कहते हैं। एक से अधिक तत्वों या द्रव्यों के आपस में मिलने से ये पूरी तरह से एक-दूसरे में घुलकर एकीकृत नही हो पाते हैं, जिस कारण उनके कणों को प्रत्यक्ष रूप से अलग-अलग देखा जा सकता है। इनके तत्वों को परस्पर मिश्रित हुआ नही देख सकते।

इसमें तत्वों के सान्द्रता में समता नही पाई जाती अर्थात् भिन्न-भिन्न अंशों में तत्वों के अवयव समान मात्रा में उपस्थित नही होते हैं। किसी स्थान पर अधिक होते हैं और किसी पर कम। इनके तत्वों में घुलनशीलता का गुण नही होने के कारण इनके कणों को भौतिक रूप से अलग किया जाना भी सम्भव होता है।

इस मिश्रण में भी भिन्न-भिन्न द्रव्य की अवस्थाएँ होती है। ठोस, द्रव या गैस किसी भी रूप में हो सकती है। उदाहरण के लिए, पानी में कोई भी चिकना द्रव जैसे तेल मिलाने से वह उसमें पूरी तरह से घुल नही पाता है तथा सतह पर तैरने लगता है। हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि पानी में कोई चिकना द्रव डाला गया है तथा वह सतह पर दिखाई भी देता है।

कणों के आकार के आधार पर निलम्बन व कोलॉइड को असमांगी मिश्रण में सम्मिलित किया जाता है।

निलम्बन

इसमें कण अधिक भारी होते हैं और बड़े होते हैं। इस कारण ये कण अधिक समय तक हलचल में न रहकर धीरे-धीरे सतह पर जम जाते हैं। ये साफ़ दिखाई देते हैं। जैसे- हवा में उड़ती हुई धूल।

कोलॉइड- इसके कण अधिक बड़े नही होते हैं। इन्हें देखने के लिए माइक्रोस्कोप की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि इन्हें प्रत्यक्ष आँखों से नही देखा जा सकता। जैसे- धुंआ, धुंध।

मिश्रण में पाये जाने वाले द्रव्यों की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं के आधार पर उनके तत्वों में पृथक्करण की विधियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। जैसे-
किसी विलायक में अघुलनशील प्रकृति का ठोस द्रव्य मिलने पर उसे निस्पंदन विधि द्वारा अलग-अलग किया जाता है अर्थात् छानकर पृथक्करण किया जाता है। जैसे- जल में रेत का मिलना।

किसी द्रव पदार्थ में ठोस के मिलने पर जो विलयन बनता है तो उसमे वाष्पीकरण या आसवन विधि द्वारा पृथक्करण किया जाता है।

दो ठोस द्रव्यों के परस्पर मिलने पर बने मिश्रण में ऊधर्वपातन विधि द्वारा उनके तत्वों को अलग-अलग किया जाता है

भौतिक व रासायनिक परिवर्तन

परिवर्तन हमारे जीवन का हिस्सा है। प्रत्येक क्षण किसी न किसी रूप में कहीं न कहीं कोई परिवर्तन होता ही रहता है।
हमारे आसपास पाये जाने वाले द्रव्यों में भी यह परिवर्तन होते हैं। द्रव्य में विभिन्न प्रकार के तत्वों, अवयवों, कणों, अणुओं, परमाणुओं का समावेश होता है। इन सबके मध्य क्रियाएँ होने से पदार्थ के रूप या गुण या आकार या सान्द्रता आदि में कई प्रकार के परिवर्तन आते हैं और कई बार ऐसे परिवर्तन से नया द्रव्य (पदार्थ)भी प्राप्त होता है। इनके अलावा द्रव्य की अवस्थाओं में भी परिवर्तन होते हैं, जैसे ठोस से द्रव बनना या गैस बनना आदि।
द्रव्यों में आने वाले इन परिवर्तनों को दो भागों में विभाजित किया गया है-
भौतिक परिवर्तन
रासायनिक परिवर्तन

भौतिक परिवर्तन

किसी द्रव्य की भौतिक स्थिति व गुणों में बदलाव आने को भौतिक परिवर्तन कहते हैं। किसी द्रव्य में पाये जाने वाले अणुओं के मध्य होने वाली अभिक्रिया से किसी द्रव्य में केवल रंग, आकार व मात्रा में ही परिवर्तन आता है, परन्तु रासायनिक आधारीय गुणों में कोई परिवर्तन नही आता है। जैसे- स्प्रिंग को दबाना या खींचना, कागज़ के टुकड़े करना।

भौतिक परिवर्तन अस्थाई प्रवृत्ति के होते हैं। कुछ परिस्थितियों में कोई नया द्रव्य प्राप्त होता है, परन्तु यह शाश्वत नही होता और नए प्राप्त द्रव्य पर विपरीत अभिक्रिया दोहराई जाये तो पुनः उसके मूल द्रव्य व मूल अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है।

जैसे- पानी का बर्फ बनना। यदि पानी को ठण्डा किया जाये तो बर्फ बनती है और बर्फ को ताप दिया जाए तो वह पानी बन जाता है।
इसमें पानी मूल द्रव्य है, जमना प्राथमिक अभिक्रिया है, तथा बर्फ नया प्राप्त द्रव्य है व ताप देना विपरित अभिक्रिया है।

रासायनिक परिवर्तन

जब किसी द्रव्य के अणुओं के मध्य ऐसी अभिक्रियाएँ होती हैं जिससे उसके भौतिक गुणों के साथ-साथ रासायनिक गुणों में परिवर्तन आता है तथा मूल गुणों से विहीन व नए गुणों से परिपूर्ण एक नया द्रव्य प्राप्त होता है तो यह रासायनिक परिवर्तन कहलाता है। जैसे- आटे की रोटियाँ सेकना, कागज़ जलाना, सब्जी पकाना आदि।

कई बार एक से अधिक द्रव्य आपस में क्रिया करके भी एक नए द्रव्य का निर्माण करते हैं। जैसे- दूध से दही बनना। जब कुछ दूध में थोडा सा दही डाला जाता है तो दही व दूध आपस में रासायनिक क्रिया कर के संपूर्ण दूध को दही के रूप में परिवर्तित कर देते हैं।

ऐसे परिवर्तनों में स्थायित्व होता है। इसमें नए प्राप्त द्रव्य की मूल अवस्था को पुनः प्राप्त नही किया जा सकता। इसमें होने वाली रासायनिक अभिक्रियाएँ द्रव्य को संरचनात्मक रूप से बदल देती हैं।

उपर्युक्त वर्णित उदाहरणों के अनुसार आटे के सिकने के बाद पकी हुई रोटी प्राप्त होती है व रोटी सिक जाने के बाद उसे आटे के रूप में लाना असम्भव है।
कागज़ जल कर राख होने के बाद हमे राख प्राप्त होती है व राख पुनः कागज़ का रूप नही ले सकती।
कच्ची सब्जी पकने के बाद पकी हुई सब्जी प्राप्त होती है और पकने के बाद उसे कच्ची अवस्था में नही लाया जा सकता।

भौतिक व रासायनिक परिवर्तन की सह स्थिति-
एक उदाहरण ऐसा भी है जो भौतिक व रासायनिक दोनों परिवर्तनों की सभी नियमों व शर्तों को पूरा करता है, वह है- मोमबत्ती का जलना।
जब मोमबत्ती को जलाया जाता है तो कुछ मोम आग से क्रिया करके धुंए व आग के रूप में जल कर खत्म हो जाता है। उसे पुनः मोम के रूप में प्राप्त नही किया जा सकता है। इसमें स्थायित्व प्रकट होता है। इसे रासायनिक परिवर्तन कहा जा सकता है।
इसके अतिरिक्त जलने के साथ ही कुछ मोम पिघलते हुए नीचे की ओर जमा होने लगता है, जिससे मोमबत्ती के आकार में परिवर्तन आता है। उस मोम को एकत्र कर पुनः मोमबत्ती के रूप में बनाकर उपयोग में लिया जा सकता है। इसमें अस्थायित्व की स्थिति रहती है। इस प्रकार यह भौतिक परिवर्तन कहलाता है ।

द्रव्य क्या है?

पदार्थ ही द्रव्य है। सृष्टि में पाई जाने वाली कोई भी वस्तु या पदार्थ जिसमें स्थान घेरने की क्षमता हो तथा जिसका कोई भार हो, द्रव्य कहलाती है।

मनुष्य अपनी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा द्रव्य की उपस्थिति को महसूस कर सकता है।
द्रव्य में वे सभी पदार्थ या तत्व सम्मिलित किये जाते हैं, जिनका या तो एक निश्चित आकार हो या जिनका घनत्व निश्चित हो या जिनका आयतन निश्चित हो अथवा जिनका आकार, घनत्व व आयतन तीनों ही निश्चित हो; द्रव्य कहलाते हैं।
किसी वस्तु में पाये जाने वाले पदार्थ की मात्रा को उस वस्तु का द्रव्यमान कहा जाता है। यह कभी भी शून्य नही होता है।

द्रव्य दो तरह के होते हैं-
शुद्ध द्रव्य
अशुद्ध द्रव्य

शुद्ध द्रव्य

तत्व- कुछ पदार्थ प्राकृतिक रूप से ही सृष्टि में विद्यमान होते हैं। किसी भी रासायनिक या भौतिक प्रायोगिक क्रियाओं के द्वारा इनका निर्माण नही किया जा सकता है। इन पदार्थों को ही तत्व कहा जाता है। जैसे- चाँदी, सोना, हाइड्रोजन आदि।

यौगिक- दो या अधिक तत्वों के आनुपातिक रूप से संयोग होने से निर्मित नए तत्व, जिनमें पाये जाने वाले भिन्न-भिन्न तत्वों को रासायनिक क्रिया द्वारा पृथक किया जाना सम्भव हो, यौगिक कहलाते हैं। जैसे- जल, नमक आदि।

अशुद्ध द्रव्य

मिश्रण- दो या अधिक तत्वों के असमान मात्रा में या असमान अनुपात में संयोजन होने से जो एक पदार्थ या तत्व निर्मित होता है, उसे मिश्रण कहा जाता है।

इस प्रकार तत्वों के अनुपातिक संयोजन व तत्वों के असमानुपातिक मिश्रण आदि में द्रव्य को वर्गीकृत किया गया है।
वर्तमान समय तक 115 तत्वों को खोजा जा चुका है। इन तत्वों में 92 तत्व ऐसे है जो प्राकृतिक देन है और बाकी के तत्व अप्राकृतिक रूप से निर्मित किये गए हैं।

पहले द्रव्य की अवस्थाओं को तीन भागों में विभाजित किया गया था। इसमें थे- ठोस, द्रव, गैस। परन्तु अभी बीते कुछ वर्षों के अध्ययन से प्लाज़्मा को भी द्रव्य रूप में माना जाने लगा है
अतः द्रव्य के अन्तर्गत आते हैं- ठोस, द्रव, गैस व प्लाज़्मा।

महर्षि कणाद के अनुसार किसी द्रव्य को विभाजित करने से वह छोटे-छोटे अणुओं में विभक्त हो जाता है, ये अणु जिन सूक्ष्म कणों से बने होते हैं, उन्हें परमाणु कहते हैं। परमाणु का विभाजन सम्भव नहीं है।

भौतिकशास्त्री जॉन डॉल्टन द्वारा यह विचारधारा रखी गयी कि द्रव्य छोटे-छोटे कणों से मिलकर बना होता है। इन कणों को परमाणु कहते हैं तथा इनको विभाजित नहीं किया जा सकता।

बाद में जे.जे.थॉमसनरदरफोर्ड द्वारा यह विचार प्रस्तुत किया गया कि परमाणु का विभाजन किया जाना सम्भव है। परमाणु का निर्माण इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन व न्यूट्रॉन से मिलकर होता है।

द्रव्य की अवस्थाओ का अन्तः परिवर्तन

द्रव्य की क्रमानुसार पाँच अवस्थाएँ- ठोस, द्रव, गैस व प्लाज़्मा है।
इन अवस्थाओं में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। कुछ रासायनिक परिवर्तन होते हैं और कुछ भौतिक।
जब किसी द्रव्य के रासायनिक गुणों व स्तरों में बदलाव आता है तो इसे रासायनिक परिवर्तन कहते हैं। फलों का पकना, मोमबत्ती का जलना आदि रासायनिक परिवर्तन के उदाहरण हैं।
द्रव्यों के भौतिक गुणों जैसे- रंग, आकार, घनत्व आदि में बदलाव पैदा होने को भौतिक परिवर्तन कहते हैं।

संगलन

संगलन एक प्रक्रिया है। जैसा कि नाम से ही ज्ञात हो रहा है संगलन अर्थात् गलने की क्रिया। द्रव्य की ठोस अवस्था का पिघलकर या गलकर द्रव अवस्था बनना ही संगलन कहलाता है। इसके कई उदाहरण लिए जा सकते हैं, जिनमें सबसे सरल है- बर्फ का पानी के रूप में परिवर्तन। इस प्रक्रिया में द्रव्यों द्वारा गुप्त ऊष्मा का अवशोषण भी किया जाता है।

गलनांक

यह कोई प्रक्रिया नही है, अपितु ताप का एक निश्चित स्तर (बिन्दु) है। जब कोई ठोस एक निश्चित तापमान मिलने के बाद द्रव अवस्था में आना प्रारम्भ होता है तो वह ताप उस द्रव्य का गलनांक (melting point) कहलाता है अर्थात् वह ताप जिसकी ऊर्जा से ठोस गलकर या पिघलकर अपनी अवस्था से परिवर्तित होकर द्रव अवस्था में आता है, गलनांक होता है। द्रव्य की ठोस अवस्था का गलनांक ठोस में पाये जाने वाले अणुओं के मध्य आकर्षण बल की मात्रा अर्थात् आकर्षण बल की अधिकता या न्यूनता की ओर इंगित करता है।

ऊधर्वपातन

जब एक द्रव्य अपनी प्रथम अवस्था से द्वितीय अवस्था का त्याग करते हुए उसमें न आकर सीधे तृतीय अवस्था में पहुंच जाता है और इसके विपरीत तृतीय अवस्था से सीधे प्रथम अवस्था में आता है तो यह ऊधर्वपातन कहलाता है। दूसरे शब्दों में, जब कोई द्रव्य अपनी ठोस अवस्था में होता है तथा ठोस से वह द्रव अवस्था में रूपांतरित हुए बिना सीधे गैस अवस्था में परिवर्तित हो जाता है और फिर गैस से वह द्रव न बनकर सीधे ठोस बन जाता है, तो इस प्रक्रिया को ही ऊधर्वपातन कहते हैं।

वाष्पीकरण

यह एक प्रक्रिया है। इसे समझना भी अत्यन्त सरल है, क्योंकि इसके नाम में ही इसका अर्थ स्पष्ट हो रहा है। द्रव को जब ऊष्मीय ऊर्जा दी जाती है तो वह अत्यधिक गर्म होने लगता है। फिर गर्म होते-होते एक स्थिति ऐसी आती है कि द्रव में पाये जाने वाले अणु अत्यधिक ऊर्जा से युक्त होने लगते है, जिससे वे उबलते हुए भाप (वाष्प) के रूप में धीरे-धीरे उड़ने लगता है व द्रव कम होने लगता है, जिसे वाष्पीकरण कहते हैं।

क्वथनांक

द्रव्य की प्रथम द्रव अवस्था में जब ऊर्जा पहुँचाई जाती है अर्थात् द्रव को गर्म किया जाता है तो इसमें उबाल आने लगते है। ताप के जिस स्तर पर उबाल आने आरम्भ होते है, वह स्तर (बिन्दु) ही क्वथनांक कहलाता है। अधिक ऊर्जा मिलने के कारण द्रव के अणुओं में गतिशीलता अधिक हो जाती है। यह कोई प्रक्रिया नही है, अपितु गलनांक की भाँति यह भी द्रव को उबालने के लिए आवश्यक निश्चित ताप का स्तर है। पानी 100° सेल्सियस ताप पर उबलने लगता है, जिसे इस प्रकार भी लिखा जा सकता है कि पानी का क्वथनांक 100° C होता है।

संघनन

द्रव्य की गैस अवस्था का द्रव अवस्था में परिवर्तन होना ही संघनन कहलाता है। यह वाष्पीकरण की विपरीत क्रिया है। आसमान में वाष्प के रूप में बादल होते हैं। जब ये बादल (वाष्प) पानी (द्रव) के रूप में गिरने लगते हैं तो इसे संघनन कह सकते हैं। बर्फ़बारी, वर्षा, ओंस आदि संघनन के ही उदाहरण हैं। संघनन प्रक्रिया में भी द्रव्यों द्वारा गुप्त ऊष्मा का अवशोषण किया जाता है।

जमना

जमना एक क्रिया है। द्रव का रूपांतरण ठोस में होना, जैसे- पानी को अत्यधिक ठण्डा करने पर वह बर्फ का रूप ले लेता है। ताप के जिस स्तर पर द्रव का रूप ठोस में बदलने लगता है, उस ताप के स्तर को हिमांक कहा जाता है।
जब कोई द्रव्य तरल (द्रव)रूप में होता है तो उसके अणुओं के मध्य कुछ खाली स्थान होता है। जब वह हिमांक पर होता है तो उसके अणुओं के मध्य आकर्षण बल अधिक होने लगता है तथा खाली स्थान भी कम होते होते वह धीरे-धीरे ठोस का रूप ले लेता है। इसे ही जमना कहते हैं।

गुप्त ऊष्मा

द्रव्य की अवस्था में अन्तः परिवर्तन के लिए स्थिर तापमान के बावजूद द्रव्य द्वारा कुछ निश्चित ताप ऊर्जा (ऊष्मा या ताप) अवशोषित कर ली जाती है, इसे ही गुप्त या सुषुप्त ऊष्मा कहते हैं। ठोस अवस्था का रूपांतरण द्रव में करने के लिए इसे गर्म करके ऊर्जा दी जाती है, तब ठोस धीरे-धीरे गलना शुरू होता है, परन्तु पूरी तरह नही गलता है। इस गलनांक पर जब तापमान में कोई परिवर्तन नही किया जाता तो अवस्था परिवर्तन के दौरान द्रव्य द्वारा स्वतः ही कुछ ऊर्जा अपने भीतर समाहित कर ली जाती है, इस अवशोषित (उत्सर्जित) ऊर्जा ही संगलन की गुप्त ऊष्मा कहलाती है।
इसके विपरीत गैस से ठोस अवस्था के परिवर्तन के दौरान जब द्रव्य द्वारा कुछ ऊष्मा का उत्सर्जन कर लिया जाता है तो यह संघनन की गुप्त ऊष्मा कहलाती है

द्रव्य की अवस्थाएँ

ठोस– इसकी निश्चित आकृति होती है। यह घनत्व व आयतन की भी निश्चितता लिए हुए होता है। यह एक पूर्ण द्रव्य (पदार्थ) है, क्योंकि इसमें सभी गुणधर्म होते हैं।
ठोस पदार्थ बहुत सारे अणुओं से मिलकर बनते हैं। अणु एक-दूसरे के अत्यधिक नज़दीक होते हैं, जिससे कोई रिक्त स्थान न होने के कारण अणु एक से दूसरे स्थान पर विचरण नही कर सकते तथा कणों में परस्पर आकर्षण बल होता है।

द्रव- तरल में पाये जाने वाले अणु ठोस पदार्थ की अपेक्षा कम नज़दीक होते हैं, परन्तु गैस की अपेक्षा अधिक नज़दीक होते हैं। ठोस पदार्थ की अपेक्षा परस्पर आकर्षण कम होता है, परन्तु गैस की अपेक्षा तरल में अधिक आकर्षण होता है। इसके आयतन व घनत्व में निश्चितता होती है। अणुओं की दूरस्थता के कारण इनमें प्रवाहित होने की प्रकृति पाई जाती है।

गैस– गैस अवस्था में अणुओं के मध्य अधिक दूरी पाई जाती है तथा आकर्षण बल भी लगभग शून्य होता है। गैस की कोई निश्चित आकृति नही होती है और न आयतन होता है, परन्तु घनत्व की निश्चितता होती है।

द्रव्य का रासायनिक वर्गीकरण

रासायनिक तौर पर द्रव्यों को तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है, जो हैं- तत्व, यौगिक, मिश्रण।

तत्त्व

तत्व वे पदार्थ या द्रव्य होते हैं, जिनमे पाये जाने वाले अणुओं में परमाणुओं की प्रकृति एक समान होती है।
फ़्रांस के विख्यात वैज्ञानिक लेवाइज़र ने अपने प्रयोगों के आधार पर इस बात की पुष्टि की थी कि किसी भी द्रव्य का सबसे साधारण व सरल रूप तत्व है।
तत्व प्राकृतिक रूप से ही सृष्टि में विद्यमान होते है। किन्ही भी रासायनिक क्रियाकलापों द्वारा इनको निर्मित नही किया जा सकता और न ही किन्हीं अन्य भिन्न द्रव्यों के मेल से इन्हें बनाया जा सकता है।
तत्व तीन रूपों में पाये जा सकते हैं-
धातु- ये ऊष्मा व विद्युत् के सुचालक होती है तथा इनमें बाहरी चमक दिखाई देती है। सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल आदि शुद्ध धातुएँ होती हैं।
अधातु– धातु के विपरीत ये विद्युत् व ऊष्मा से अच्छे चालक नही होते हैं और इनमे किसी प्रकार की चमक नही पाई जाती है। हाइड्रोजन, ऑक्सीजन आदि धातु के अंतर्गत नहीं आती हैं तो ये अधातु हैं।
उपधातु- ये तत्व कि वह स्थिति है जिसमें धातु व अधातु दोनों के ही कुछ न कुछ विशेषतायें व गुण विद्यमान रहते हैं। सिलिकॉन, जर्मेनियम, आर्सेनिक आदि को उपधातु की श्रेणी में रखा गया है।

यौगिक

जैसा कि नाम से ही ज्ञात हो रहा है कि “यौगिक” शब्द “योग” से बना है अर्थात् मेल या जोड़।
जब एक से अधिक तत्व आनुपातिक रूप से परस्पर मिलते हैं तथा उनके मध्य रासायनिक प्रक्रिया होने से जब एक अन्य द्रव्य (पदार्थ) अस्तित्व में आता है, उसे यौगिक कहते हैं।
ऐसे मेल से इनमें पाये जाने वाले तत्वों के आधारीय गुणों में भी परिवर्तन आता है। जैसे- जल (H2O) हाइड्रोजन व ऑक्सीजन से मिलकर बनता है। हाइड्रोजन का आधारीय गुण है कि यह स्वयं ज्वलनशील है तथा ऑक्सीजन का गुण है कि यह आग लगने व बढ़ने में सहायता पहुँचाता है। पर जब ये दोनोँ मिलकर जल (यौगिक) बन जाते हैं जो कि आग को बुझाने में सहायक होता है। इनके वे गुण खत्म हो जाते है।

क्षार, लवण, अम्ल, गैसें आदि द्रव्य भी यौगिक रूप में पाये जाते हैं। जैसे- पोटेशियम हाइड्रोक्साइड (क्षार), कैल्शियम कार्बोनेट (लवण), सल्फ्यूरिक एसिड (अम्ल), अमोनिया (गैस) आदि।
रासायनिक सूत्रों व क्रियाओं के द्वारा यौगिक में पाये जाने वाले तत्वों में पृथक्करण भी किया जा सकता है।

यहाँ ध्यान देने वाला तथ्य यह है कि दो या अधिक तत्वों के एक निश्चित मात्रा या अनुपात में होना आवश्यक है अर्थात् आनुपातिक निश्चितता से ही यौगिक बनता है। यदि किसी अनिश्चित अनुपात में किन्हीं तत्वों के मेल से कोई द्रव्य निर्मित होता है तो वह यौगिक नही कहलाएगा।
यौगिक दो रूपों में होते हैं-
कार्बनिक- इन्हें वनस्पति व जीव-जन्तु से प्राप्त किया जाता है। जैसे- तेल, वसा, चीनी आदि।
अकार्बनिक- इन्हें वनस्पति व जीव-जन्तु से प्राप्त नही किया जा सकता। जैसे- नमक, सोडियम कार्बोनेट, कैल्शियम कार्बोनेट आदि।

मिश्रण

तत्वों के असमान मिलन से बना द्रव्य मिश्रण कहलाता है।
एक से अधिक तत्वों या यौगिक जब अनिश्चित मात्रा में परस्पर मिलकर रासायनिक क्रिया द्वारा जिस द्रव्य का निर्माण करते हैं, वही मिश्रण होता है। इसकी यही विशेषता है कि इनमें कोई भी बराबर व निश्चित अनुपात नही होता है।

मिश्रण के दो भाग होते हैं-
समांग मिश्रण- इसमें तत्वों के परस्पर मिलने के बाद वे मिश्रित हो जाते हैं तथा उन्हें नही देखा जा सकता। जैसे- पानी में चीनी या नमक का घोल बनाने पर उस मिश्रण में पानी के भीतर नमक या चीनी के कण दिखाई नही देते हैं।

असमांग मिश्रण- इसे विषमांग मिश्रण भी कहते हैं। जब कुछ तत्व आपस में मिलते हैं तो उनको परस्पर मिश्रित रूप में नही देखा जा सकता। उनके कणों को अलग से देखा जा सकता है। जैसे- मृदा में कई प्रकार के पदार्थ पाये जाते हैं, जिन्हें सामान्य रूप से देखना सम्भव है और पानी में कोई चिकना पदार्थ जैसे तेल मिलाने पर वह उसमे मिश्रित नही होता। तेल पानी की सतह पर दिखाई देता है