बोर का परमाणु मॉडल – Bohr atomic model in Hindi

बोर का पूरा नाम था- नील्स हेनरिक डेविड बोर। इनका जन्म 1885 को डेनमार्क में हुआ। सन् 1913 में बोर द्वारा परमाणु मॉडल पेश किया गया।

नील्स बोर द्वारा रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल में कुछ तथ्यों की अनुपस्थिति का अंदाजा लगाया गया तथा प्लांक के क्वाण्टम सिद्धांत की सहायता लेते हुए बोर ने अपना एक मॉडल तैयार किया।

यह मॉडल नील्स बोर द्वारा परमाणु के सम्बन्ध में पेश किया गया था।

इसे रदरफोर्ड-बोर मॉडल भी कहा जाता है, क्योंकि यह रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल में कुछ स्थितियों में सुधार व नवीनीकरण करके बनाया गया था, अतः काफी हद तक रदरफोर्ड के मॉडल से मेल खाता हुआ था।

बोर के इस मॉडल के अनुसार यह बात प्रस्तुत की गयी थी कि इलेक्ट्रॉन द्वारा नाभिक के बाहरी ओर निरन्तर तेज गति से चक्कर लगाये जाते हैं। इसके लिए इलेक्ट्रॉन को ऊर्जा या बल की आवश्यकता पड़ती है। इसे अपकेंद्रिय बल कहते हैं।

जब विद्युत के ऋण आवेश युक्त इलेक्ट्रॉन का नाभिक के चक्कर लगाने से इसमें स्थित धन आवेश वाले प्रोटॉन के कारण इनके मध्य आकर्षण बल उत्पन्न होता है। यह आकर्षण बल ही इलेक्ट्रॉन को अपकेंद्रिय बल देने में सहायक होता है। इसके कारण ही इनमे गति करने की ऊर्जा बनी रहती है।

अतः बोर के परमाणु मॉडल के परिणामस्वरूप यह बात स्पष्ट होती है कि इलेक्ट्रॉन को अपकेंद्रिय बल नाभिक में स्थित प्रोटॉन के होने से प्राप्त होता है।

बोर ने अपने मॉडल में इस बात का भी व्याख्यान किया कि परमाणु के भीतर स्थित नाभिक के बाहृ भाग में भिन्न-भिन्न स्तर (कक्षा या कक्ष) सृजित हुए होते हैं, जिनमे इलेक्ट्रॉन वृत्ताकार गति करते हैं।

इन भिन्न-भिन्न स्तरों पर ऊर्जा का स्तर भी भिन्न होता है अर्थात् जो स्तर या कक्ष नाभिक के अधिक नज़दीक होगा, उसमे ऊर्जा काफी कम होगी। जैसे-जैसे इन कक्षों की स्थिति नाभिक से दूर होती जाती है, वैसे-वैसे इनमे ऊर्जा का स्तर बढ़ता जाता है।

परमाणु में किसी कारणवश यदि ऊर्जा में परिवर्तन होता है, तो इलेक्ट्रॉन द्वारा भी कक्षों  या ऊर्जा स्तरों में परिवर्तन होने लगता है।

जब परमाणु के भीतर इलेक्ट्रॉन अपने एक ही कक्ष में स्थायी रूप से गतिमान रहता है तो इसे आद्य अवस्था कहा जाता है।

जब ऊर्जा स्तर में बदलाव के कारण इलेक्ट्रॉन एक कक्ष की त्यागकर दूसरे कक्ष में पहुँच जाता है तो इसे इलेक्ट्रॉन की उत्तेजित अवस्था कहा जाता है।

इलेक्ट्रॉन द्वारा गति करते वक्त इन कक्षों के कारण ऊर्जा का निर्धारण होता है, जिससे इलेक्ट्रॉन में तीव्रता पैदा होती है। इसी वजह से विकिरण को उत्सर्जित नही कर पाते।

इस बिंदु ने रदरफोर्ड के मॉडल की कमी को दूर कर दिया, क्योंकि यहाँ यह बात सिद्ध हुई कि विकिरण का उत्सर्जन न होने के कारण इलेक्ट्रॉन नाभिक के भीतर नही गिर सकते।

कमियाँ- परमाणु में इलेक्ट्रॉन द्वारा गतिशील रहने के दौरान उनमे पाई जाने वाली ऊर्जा का स्तर कम व ज्यादा होता है। इससे इलेक्ट्रॉन द्वारा अपने कक्षों में भी परिवर्तन किया जाता है। इस कारण स्पेक्ट्रम रेखाओं का सृजन होता है।

चुम्बकीय प्रभाव वाले क्षेत्र में इन स्पेक्ट्रम रेखाओं में विभाजन होता है, इससे पड़ने वाला प्रभाव “ज़ीमान प्रभाव” कहलाता है।

विद्युत प्रभावी क्षेत्र में स्पेक्ट्रम रेखाओं में विभाजन होने की क्रिया से पड़ने वाले प्रभाव को “स्टॉर्क प्रभाव” कहते हैं।

बोर द्वारा प्रस्तुत किये गए मॉडल में ज़ीमान प्रभाव व स्टॉर्क प्रभाव दोनों का स्पष्टीकरण नही किया गया।

निष्कर्ष- बोर द्वारा अपना परमाणु मॉडल प्रस्तुत होने से पहले ही परमाणु की संरचना के सम्बन्ध में  बहुत से तथ्य साबित हो चुके थे, जैसे- परमाणु का विभाजन नही किया जा सकता, परमाणु के केन्द्र में नाभिक(केन्द्रक) पाया जाता है व परमाणु कई छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनता है। इनमे से कुछ धनावेशित, ऋणावेशित व उदासीन प्रकृति के होते हैं।

बोर द्वारा रदरफोर्ड के मॉडल को उच्च स्तर पर ले जाकर उसमे नई खोजों के तथ्यों को जोड़ा गया व परमाणु सरंचना सम्बन्धी कुछ नियमों से ज्ञात करवाया गया। कुछ कमियों के अलावा बोर का मॉडल काफी कामयाब रहा।

विसरण किसे कहते हैं -What is diffusion in Hindi

जब एक से अधिक द्रव्य प्राकृतिक रूप से परस्पर मेल से क्रियाशील होकर नए समांग मिश्रण का सृजन करते हैं तो इस क्रिया को विसरण कहा जाता है।

द्रव्यों में पाये जाने वाले कणों में परस्पर क्रिया होने से मूल द्रव्य में परिवर्तन होकर नया रूप प्राप्त होता है। इस क्रिया को ही विसरण कहते हैं। जब तक यह एक समान मिश्रण का रूप नहीं ले लेता, तब तक यह क्रिया चलती रहती है।

विसरण की क्रिया की तीव्रता में द्रव्य की अवस्था के आधार पर परिवर्तन आता है।

द्रव्य की गैस अवस्था में विसरण क्रिया अत्यधिक तीव्र गति के साथ संचालित होती है,क्योंकि गैस के कणों के मध्य दूरी पाई जाने के कारण उनमे क्रियाशीलता बनी रहती है तथा वह निरन्तर गतिशील रहते हैं। जबकि ठोस में इसी के विपरीत विसरण की अत्यंत धीमी गति रहती है,क्योंकि ठोस के कण एक-दूसरे के काफी नजदीक होने के कारण अधिक गतिशील नही होते हैं। द्रव में यह सामान्य होती है, क्योंकि द्रव में पाये जाने वाले कण न अधिक दूर होते हैं और न ही अधिक पास।

विसरण क्रिया के दौरान यदि उस द्रव्य को ताप देकर गर्म किया जाए तो द्रव्य के कणों में गतिज ऊर्जा पैदा होने के कारण वे अधिक तेजी से गति करने लगते है तथा विसरण क्रिया में तीव्रता पैदा होती है।

(१) विसरण के ठीक पहले
(२) विसरण के थोडी देर बाद
(३) विसरण आरम्भ होने के बहुत देर बाद

द्रव्य की तीनों अवस्थाओं में विसरण इस प्रकार है-

गैस में विसरण

इसे हम एक साधारण से उदाहरण के माध्यम से समझ सकते हैं। जब रसोईघर में कोई भोजन पकाया जा रहा होता है तो रसोईघर से बाहर तक उसकी गन्ध को महसूस किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि भोजन पकाने के दौरान उसमें कुछ गंधयुक्त गैस पैदा होती है जो कि विसरण क्रिया के कारण गति करती हुई वातावरण की वायु में मिलकर दूर तक पहुँच जाती है और इसमें अधिक समय भी नही लगता है।

द्रव में विसरण

इसका उदाहरण है कि जब किसी पानी से भरे पात्र में स्याही की कुछ बूंदों को डाल दिया जाए तो यह थोड़ी से स्याही पूरे पात्र के पानी में घुलकर इसका रंग परिवर्तित कर देती है। स्याही में पाये जाने वाले कणों में विसरण होने के कारण ही इसके कण पानी में जाकर फैल जाते है तथा सारे पानी के साथ एकाकार हो जाते हैं।

ठोस में विसरण

इसको समझने के लिए यह आसान उदाहरण दिया जा रहा है कि जब चाक से श्यामपट्ट पर लिखकर बिना साफ़ किये उसे 10-12 दिनों तक वैसे ही छोड़ दिया जाए तो हम पायेंगे कि अब चाक को साफ़ करना आसान नही रहा क्योंकि चाक के कुछ कण विसरण के कारण श्यामपट्ट के भीतर समाहित हो गए हैं।

डॉल्टन का परमाणु सिद्धांत – Dalton Atomic Theory in Hindi

सृष्टि में हर ओर अनगिनत द्रव्य पाये जाते हैं।
इन द्रव्यों की प्रकृति, प्रकार व इनके मध्य  होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के सम्बन्ध में बहुत से विख्यात रसायन विशेषज्ञों व वैज्ञानिकों द्वारा कई प्रकार के तर्क व तथ्य प्रस्तुत किये गए।

इस लेख में हम इंग्लैंड के प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर जॉन डॉल्टन की द्रव्य के सम्बन्ध में रखे गए विचारों की व्याख्या करेंगे। डॉल्टन का जन्म इंग्लैंड के इगल्सफ़ील्ड में सन् 1766 में हुआ था। उन्होंने अल्पायु में ही शिक्षक के पद पर कार्य करना प्रारम्भ कर दिया था। विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ वे, विज्ञान में अधिक रुचि होने के कारण इसके सम्बन्ध में नये-नये  ज्ञान को जुटाने व प्रयोगों में व्यस्त रहते थे।

डॉल्टन द्वारा परमाणुओं के सम्बन्ध में जिस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया, उसे  “डॉल्टन का परमाणु सिद्धांत” या “डॉल्टन का परमाणुवाद नियम” के नाम से जाना जाने लगा तथा वर्तमान काल में भी इसी नाम से जाना जाता है। यह सिद्धान्त रासायनिक संयोजन के कुछ नियमों की भी पुष्टि करता है। रासायनिक संयोजन के नियमों के आधार पर ही डॉल्टन ने परमाणु सम्बन्धी कुछ तर्क प्रस्तुत किये।

द्रव्यों के सम्बन्ध में डॉल्टन का यह मत था कि सभी द्रव्य बहुत से छोटे-छोटे कणों से निर्मित हुए होते हैं। इन सूक्ष्म कणों को डॉल्टन ने परमाणु नाम दिया।

परमाणु की प्रकृति के बारे में व्याख्या करते हुए ये कहा कि द्रव्यों में जब संयोजन के द्वारा इनके तत्वों से यौगिक व मिश्रण बनते है तो  किसी भी रासायनिक संयोजन के दौरान होने वाली अभिक्रियाओं से इनमे उपस्थित परमाणुओं को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही किसी भी विधि के द्वारा नए परमाणुओं का सृजन किया जा सकता है।

रासायनिक संयोजन में होने वाली रासायनिक अभिक्रिया के पूर्व व पश्चात भी तत्वों में परमाणुओं की संख्या अपरिवर्तित रहती है।

परमाणु में अविभाजन का गुण होता है अर्थात् परमाणु को बांटा नही जा सकता। किसी भी रासायनिक या भौतिक क्रिया की सहायता से भी परमाणु के टुकड़े नही किये जा सकते।

समान द्रव्यों के समान तत्वों में पाये जाने वाले परमाणुओं की आकृति व द्रव्यमान में भी समानता पाई जाती है। इसी के विपरीत असमान तत्वों में भिन्न-भिन्न आकृति व द्रव्यमान वाले परमाणु उपस्थित रहते हैं।

रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग लेने वाली सबसे छोटी इकाई परमाणु ही होते हैं।

द्रव्यों के रासायनिक संयोजन के दौरान अलग-अलग तत्वों के परमाणु सदैव पूर्णांकों के अनुपात में परस्पर क्रिया कर यौगिक का सृजन करते हैं।

निष्कर्ष- उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि डॉल्टन का परमाणुवाद का नियम द्रव्यों के रासायनिक संयोजन के सभी नियमों को प्रदर्शित नही करता है। यह केवल द्रव्यमान संरक्षण निश्चित अनुपात व गुणित अनुपात के नियम की आधार पर कुछ बिन्दु प्रस्तुत करता है। इसमें तत्वों की भिन्नता के कारण उनमे पाई जाने वाली परमाणु की भिन्नता की भी व्याख्या की गई है।

द्रव्य की इस आधारभूत विचारधारा से अवगत कराता है कि द्रव्य का निर्माण असंख्य परमाणु के मेल से होता है, जो आकार में अत्यन्त छोटे होते हैं। डॉल्टन ने अपने इस सिद्धान्त में  अणुओं के सम्बन्ध में कोई विचार शामिल नही किया

परमाणु के मौलिक कण

atom model

मौलिक कण से अभिप्राय ऐसे कणों से है जो अन्य किसी कण या तत्व से नहीं बने होते,  क्योंकि यह स्वयं मूल कण होते हैं,  आधारशिला होते हैं।

परमाणु के एकदम मध्य का भाग नाभिक कहलाता है अथवा परमाणु के केन्द्र भाग को केन्द्रक या नाभिक कहते हैं।

परमाणु में मूल रूप से तीन तरह के कण पाये जाते हैं। इन प्राथमिक कणों से ही परमाणु बनता है, ये हैं- प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, इलेक्ट्रॉन।

सन् 1900 तक वैज्ञानिकों द्वारा यह खोज कर ली गई थी कि परमाणु में धनावेश व ऋणावेश से युक्त दो कण क्रमशः प्रोटॉन व इलेक्ट्रॉन पाये जाते हैं। इस समय तक न्यूट्रॉन की खोज नही की गयी थी। सन् 1932 में न्यूट्रॉन की खोज की गयी थी।

इन कणों में पाये जाने वाले विद्युत आवेशों को दर्शाने की इकाई “कूलाम्ब” है तथा इनके द्रव्यमान को “किलोग्राम” द्वारा दर्शाया जाता है।

प्रोटॉन

इसके खोजकर्ता रदरफोर्ड थे।  रदरफोर्ड द्वारा इसे प्रोटॉन नाम प्रदान किया गया था। उन्होंने ग्रीक भाषा के शब्द प्रोटोस से यह शब्द लिया था।

ये नाभिक के भीतर की तरफ पाये जाते हैं। ये परमाणु के मौलिक कण होते हैं और इन्हें प्राणु के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।

प्रोटॉन विद्युत के धनात्मक आवेश से युक्त होते हैं। इसपर स्थित धनावेश की मात्रा 1.602E-19 कूलाम्ब होती है। इसका द्रव्यमान 1.6726E-27 किलोग्राम होता है। प्रोटॉन को सांकेतिक रूप में p द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

सभी परमाणुओं में केन्द्र भाग में नाभिक पाया जाता है और प्रत्येक नाभिक में प्रोटॉन व न्यूट्रॉन एक साथ पाये जाते हैं, परन्तु उदजन इस प्रकार का तत्व है जिसके परमाणु के नाभिक में केवल प्रोटॉन ही पाया जाता है। इसमें प्रोटॉन के साथ न्यूट्रॉन नही पाया जाता। उदजन को हाइड्रोजन भी कहते हैं। यह अत्यन्त हल्का तत्व है जो सबसे अधिक मात्रा में ब्रह्माण्ड में उपस्थित रहता है।

न्यूट्रॉन

वैज्ञानिक जेम्स चैडविक द्वारा इसकी खोज की गयी थी।

यह परमाणु के केन्द्र भाग में नाभिक में प्रोटॉन के साथ पाया जाता है। इसपर विद्युत का न ऋणावेश होता है और न ही धनावेश अर्थात् यह आवेश रहित होते हैं। इनका द्रव्यमान प्रोटॉन के द्रव्यमान से थोडा सा अधिक ही होता है, क्योंकि ये आकार में भी प्रोटॉन से थोड़े बड़े होते हैं। सांकेतिक रूप में इसे n द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

केवल हाइड्रोजन (उदजन) के परमाणु में न्यूट्रॉन का अभाव रहता है, बाकी सभी प्रकार के तत्वों के परमाणुओं में न्यूट्रॉन व प्रोटॉन साथ में पाये जाते हैं।

इलेक्ट्रॉन

इन कणों के खोजकर्ता सर जे.जे.थॉमसन थे और जॉर्ज जोन्सटोन स्टॉनि द्वारा इन कणों को इलेक्ट्रॉन नाम दिया गया।

ये कण परमाणु के नाभिक के बाहरी सतह पर उनकी भिन्न-भिन्न वर्गों में स्थित रहते हैं तथा वहीं गति करते हुए घूमते रहते हैं। इन्हें विद्युदणु भी कहा जाता है। इसपर विद्युत का ऋणात्मक आवेश स्थित रहता है। इसपर विद्युत आवेश की मात्रा 1.6E-19 कूलाम्ब होती है और 9.11E-31किलोग्राम द्रव्यमान से युक्त होते हैं। सांकेतिक भाषा के रूप में इसे e द्वारा प्रकट किया जाता है।

गुरूत्वाकर्षण युक्त क्षेत्र व चुम्बकीय प्रभावी क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन का विशेष सहयोग व उपस्थिति होती है। प्रोटॉन व न्यूट्रॉन का मेल इलेक्ट्रॉन से होने पर ही परमाणु का सृजन होता है।

प्रोटॉन और न्यूट्रॉन एक साथ मिलकर जोड़ी के रूप में बन जाते है तो इसे न्यूक्लिऑन कहा जाता है। प्रोटॉन और न्यूट्रॉन के सह स्थिति में ही नाभिक का निर्माण होता है। नाभिक में स्थित नाभिकीय बल के माध्यम से ये आपस में बन्ध के रूप में जुड़ जाते हैं। परमाणु के नाभिक में स्थित प्रोटॉन व न्यूट्रॉन के द्रव्यमान के कुल योग से परमाणु का द्रव्यमान ज्ञात किया जाता है।

प्रोटॉन में पाया जाने वाला विद्युत का धनावेश उतना ही होता है, जितना इलेक्ट्रॉन में विद्युत का ऋणावेश होता है अर्थात् प्रोटॉन व इलेक्ट्रॉन में समान मात्रा में विद्युत आवेश पाया जाता है

परमाणु के अभिलक्षण 

atom model

परमाणु के अभिलक्षण अर्थात गुणों को जानने के लिए हमे सबसे पहले यह जानना होगा कि प्रत्येक तत्व विभिन्न प्रकार के रासायनिक गुणों से युक्त होता है या इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि रासायनिक गुणों की भिन्नता के आधार पर तत्वों में भी विभिन्नता पाई जाती है। किसी तत्व के इन रासायनिक गुणों का भण्डार जहाँ होता है, उसे ही परमाणु कहते हैं अथवा ये रासायनिक गुण परमाणु में ही पाये जाते हैं और यह कई अभिलक्षणों से युक्त होते हैं।

ब्रह्माण्ड में निहित सभी द्रव्य या पदार्थ या तत्व परमाणु से ही बने होते हैं। यह अत्यधिक सूक्ष्म रूप में होते हैं।

परमाणु के सम्बन्ध में प्राचीन काल से ही महान भौतिकविदों द्वारा कई अवधारणाएं प्रस्तुत की गयी।

लगभग 600 ईसा पूर्व महर्षि कणाद द्वारा सर्वप्रथम द्रव्य का निर्माण करने वाले कणों को परमाणु नाम दिया। उन्होंने कहा कि परमाणु बहुत छोटे हैं तथा इनका विभाजन किया जाना सम्भव नही हैं। ये किसी भी तत्व में अस्वतन्त्र रूप में वास करते हैं।

यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक डेमी क्रिट्स द्वारा लगभग 460 ईसा पूर्व कहा गया कि प्रत्येक द्रव्य का निर्माण अत्यंत छोटे व अदृश्य कणों से हुआ होता है, जिसे “एटम” कहते हैं। इनका विनाश नही किया जा सकता। तत्व की भिन्नता के आधार पर एटम के भी आकार, रचना, द्रव्यमान में भिन्नता पाई जाती है।

सन् 1800 के दौर में विशेषज्ञ जॉन डॉल्टन द्वारा यह विचारधारा रखी गयी कि द्रव्य का कोई भी रूप चाहे तत्व या यौगिक या मिश्रण; सभी बहुत से छोटे-छोटे कणों के मेल से निर्मित होते हैं। ये कण ही परमाणु कहलाते हैं। किसी भी रासायनिक अभिक्रिया द्वारा परमाणु का निर्माण नही किया जा सकता और न ही इनको खत्म किया जाना सम्भव है।

ऊपर दिए गए प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के वर्णन से परमाणु में पाये जाने वाले बहुत से अभिलक्षणों के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त हुआ है। इसी के साथ ओर भी कुछ ख्याति प्राप्त वैज्ञानिकों जैसे रदरफोर्ड, थॉमसन, बोर द्वारा परमाणु की संरचना के सम्बन्ध में प्रतिरूप तैयार किये गए थे। इनमें भी परमाणु में पाये जाने वाले अभिलक्षणों व इनकी भौतिक स्थिति के सम्बन्ध में प्रयोग करके कुछ तथ्यों से अवगत करवाया गया था।

परमाणु में इलेक्ट्रॉन बन्धुता का भी गुण पाया जाता है। इसमें ऋण आवेश वाले इलेक्ट्रॉन को आकर्षित करने की प्रवृत्ति पाई जाती है।

परमाणु के नाभिक के बाह्य ओर बादल की तरह इलेक्ट्रॉन मँडराते रहते हैं, इसे इलेक्ट्रॉन बादल भी कहा जाता है।

परमाणु के अन्य अभिलक्षणों के बारे में जानने के लिए हमें इसके नाभिक और इसमें पाये जाने वाले कणों जैसे प्रोटॉन, न्यूट्रॉन व इलेक्ट्रॉन के अभिलक्षित गुणों का भी ज्ञान होना आवश्यक है, जिन्हें जानने से हमे व्याख्यातमक रूप से परमाणु के अभिलक्षणों के बारे में पता लगेगा। ये निम्न प्रकार से है-

नाभिक के अभिलक्षण- परमाणु के मध्य भाग विद्युत के धन आवेश से युक्त होता है। इसे केन्द्रक या नाभिक कहा जाता है। यह प्रोटॉन व न्यूट्रॉन से मिलकर बना होता है, मिश्रित रूप में इन्हें न्यूक्लिऑन्स कहते हैं। चूँकि नाभिक परमाणु के अन्दर पाया जाता है, तो सम्भवतः यह आकार में अत्यन्त छोटा होता है, परन्तु परमाणु के द्रव्यमान का लगभग सारा भाग नाभिक में ही समाहित होता है।

प्रोटॉन के अभिलक्षण- ये कण विद्युत के धनात्मक आवेश से परिपूर्ण होते हैं। इसमें पाया जाने वाला विद्युत का धनावेश उतना ही होता है, जितना इलेक्ट्रॉन में ऋणात्मक आवेश होता है। प्रोटॉन का द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान से बहुत अधिक होता है अर्थात प्रोटॉन का द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान से लगभग 1850 गुना अधिक होता है।

न्यूट्रॉन के अभिलक्षण- इसके अभिलक्षित गुण है कि यह विद्युत के आवेश से अछूता होता है। इसपर न तो धन आवेश होता है और न ही ऋण आवेश अर्थात यह उदासीन प्रवृति वाला है। जितना द्रव्यमान प्रोटॉन में समाहित होता है, लगभग उतना ही द्रव्यमान न्यूट्रॉन में भी होता है।

इलेक्ट्रॉन के अभिलक्षण- यह विद्युत के ऋण आवेश से परिपूर्ण होता है। इसमें प्रोटॉन के धन आवेश के लगभग बराबर ही ऋण आवेश पाया जाता है। यह आकार में प्रोटॉन से छोटा होता है अर्थात इसका द्रव्यमान प्रोटॉन का लगभग 1850 वां हिस्सा होता है।

थॉमसन का परमाणु मॉडल – प्लम-पुडिंग मॉडल – Thomson atomic theory in Hindi

जे.जे.थॉमसन का जन्म 1856 में इंग्लैंड में हुआ था। इनका पूरा नाम जोसेफ़ जॉन थॉमसन था।

सर्वप्रथम थॉमसन द्वारा ही 1904 में परमाणु के सम्बन्ध में प्रतिरूप (मॉडल) तैयार किया गया।

थॉमसन ने कैथोड किरणों पर कुछ प्रयोग करके इलेक्ट्रॉन की खोज की थी तथा परमाणु की प्रवृत्ति की भी व्याख्यान किया।

थॉमसन के परमाणु मॉडल को तरबूज या प्लम-पुडिंग परमाणु मॉडल के नाम से भी जाना जाता है। थॉमसन ने अपने प्रयोगों द्वारा यह बात प्रस्तुत की थी कि परमाणु गोल आकृति वाले होते हैं तथा परमाणु में धनावेश से युक्त अनगिनत कण मौजूद रहते हैं, और ऋणावेश युक्त कण इलेक्ट्रॉन भी इसमें स्थित रहते हैं। ये दोनों कण परमाणु में इस प्रकार से स्थिति बनाये रखते हैं, जैसे तरबूज के भीतर इसके बीज थोड़ी-थोड़ी दूरी पर स्थित होते हैं या पुडिंग में किशमिश या चेरी अलग-अलग फैली हुई स्थिति में होती है।

इस कारण से थॉमसन के परमाणु मॉडल को तरबूज या प्लम-पुडिंग परमाणु मॉडल के रूप में जाना जाने लगा।

थॉमसन के द्वारा पेश किये गए वाक्यों के अनुसार परमाणु में विद्युत के धन आवेश वाले कण व ऋण आवेश युक्त इलेक्ट्रॉन कण समान रूप से फैले हुए होते हैं। इस कारण धनावेश कणों की बराबरी ऋणावेशित कणों से होने से परमाणु उदासीन प्रकृति का हो जाता है।

थॉमसन द्वारा इलेक्ट्रॉन की खोज की गयी थी। अपने इस मॉडल में भी उन्होंने स्पष्ट रूप से इलेक्ट्रॉन के नाम के साथ इसकी स्थिति की व्याख्या की थी, परन्तु प्रोटॉन नाम उन्होंने कहीं स्पष्ट न करते हुए इन्हें धनावेश युक्त कण कहा था।

कमियाँ

थॉमसन के मॉडल के बाद दूसरे वैज्ञानिकों द्वारा परमाणु के सम्बन्ध में और नए प्रयोग व खोज करने से अन्य तथ्य प्रस्तुत किये गए। इस कारण से थॉमसन के मॉडल की बहुत सी कमियाँ सामने आईं, जिनमें से कुछ हैं-

थॉमसन ने परमाणु के मध्य भाग में स्थित नाभिक या केन्द्रक की उपस्थिति के सम्बन्ध में न कोई व्याख्या की गयी थी और न कोई जानकारी दी थी।

परमाणु में पाये जाने वाले उदासीन प्रवृति के कण न्यूट्रॉन के अस्तित्व का भी उल्लेख नही किया गया था, अपितु यह कहा गया कि परमाणु स्वयं आवेश विहीन होता है।

थॉमसन ने बताया की तरबूज में पाये जाने वाले बीजों की भाँति परमाणु के धनावेश युक्त कण (प्रोटॉन) व इलेक्ट्रॉन भी बिखरे हुए रहते हैं। इलेक्ट्रॉन की सही स्थिति की व्याख्या नही की थी। जबकि बाद में हुए नए प्रयोगों व शोधों के आधार पर दूसरे विज्ञान विशेषज्ञों द्वारा यह तथ्य पेश किये गए कि प्रोटॉन नाभिक के भीतर की तरफ स्थित रहते हैं और इलेक्ट्रॉन नाभिक के बाहर चारों ओर गति करते रहते हैं।

प्रोटॉन व इलेक्ट्रॉन के क्रमशः धनावेश व ऋणावेश से युक्त होने पर तथा साम्यता के साथ एक-दूसरे के आसपास स्थित होने पर ये दोनों विपरीत होने के कारण एक-दूसरे को आकर्षित करके आपस में टकराकर स्वयं ही नष्ट हो जाएगे। इस कारण परमाणु में विद्युत आवेश नही होगा। थॉमसन द्वारा रखे गए इस पहलू द्वारा भी सत्यता प्रमाणित नही हुई थी।

निष्कर्ष

ऊपर दिए गए विवरण को पढ़ने से यह ज्ञात होगा कि सर जे.जे.थॉमसन द्वारा किये गए प्रयोग व विधियों के परिणामस्वरूप इलेक्ट्रॉन के अस्तित्व तथा इसपर पाये जाने वाले विद्युत के ऋणात्मक आवेश के बारे में सम्पूर्ण जगत को ज्ञान प्राप्त हुआ।

इस आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि परमाणु संरचना के सम्बन्ध में पहली बार प्रतिरूप पेश करने का श्रेय जे.जे.थॉमसन को जाता है। इनसे पहले किसी भी वैज्ञानिक द्वारा परमाणु की संरचना के सम्बन्ध में कोई प्रतिरूप सामने नही लाया गया था।

हालांकि यह परमाणु मॉडल अत्यधिक प्रचलित नही हो सका, क्योंकि इसमें कुछ तथ्य अस्पष्ट व अछूते रह गए थे, लेकिन इन सबके बावजूद भी थॉमसन द्वारा विज्ञान के विषय में नए-नए प्रयोग व शोध किये गए थे, जिनसे बहुत सी आवश्यक जानकारियां प्रदान की गयी,जो कि वर्तमान काल तक  सहयोगी रही हैं और आगे भी रहेंगी

रासायनिक संयोजन के नियम

प्रकृति में पाये जाने वाले अनगिनत द्रव्य व उनके तत्व आपस में संयोग कर के रासायनिक क्रिया द्वारा नए तत्वों व द्रव्यों तथा यौगिकों का निर्माण करते हैं।
विश्व में बहुत से प्रख्यात वैज्ञानिकों व रसायन विशेषज्ञों द्वारा ऐसे रासायनिक संयोजन के सम्बन्ध में कई नियम प्रतिपादित किये गए।

मुख्यतः छः नियम हैं-
द्रव्यमान संरक्षण नियम
स्थिर अनुपात नियम
गुणित अनुपात का नियम
व्युत्क्रम अनुपात का नियम
गैसीय आयतन का नियम
एवोगाड्रो का नियम

द्रव्यमान संरक्षण नियम

इस नियम का प्रतिपादन एनटॉयन लॉवाइजे ने सन् 1774 में किया था। यह नियम दर्शाता है कि किसी द्रव्य को व इसमें पाये जाने वाले द्रव्यमान को न तो निर्मित किया जा सकता हैं और न ही विनष्ट किया जा सकता हैं।

इसी प्रकार द्रव्यों में रासायनिक अभिक्रियाओं व रासायनिक समीकरणों के दौरान भी किसी भी विधि से उसके तत्वों के द्रव्यमान में न तो विकास किया जा सकता है और न ही विनाश किया जा सकता है। इसे ही द्रव्यमान संरक्षण कहते हैं।

जब एक से अधिक द्रव्यों के मध्य रासायनिक क्रिया से जिस द्रव्यमान की उपस्थिति में संयोजन होता है; क्रिया सम्पन्न होने के बाद भी बनने वाले नए द्रव्य में वही द्रव्यमान संरक्षित रहेगा।

किसी भी रासायनिक क्रिया द्वारा द्रव्य के रूप में परिवर्तन किया जाना संभव है, परन्तु द्रव्य का अस्तित्व नही मिटाया जा सकता, विनाश नही किया जा सकता। इसीलिए इसे “द्रव्य अविनाशिता का नियम” भी कहा जाता है।

स्थिर अनुपात नियम

फ़्रांस के रसायन विशेषज्ञ जोसफ़ प्रौउस्ट द्वारा सन् 1799 में यह नियम बनाया गया। इसके अनुसार किसी भी द्रव्य में पाये जानेे वाले तत्वों व उसमें स्थित द्रव्यमान का अनुपात सदैव स्थायित्व लिए हुए होता है। जब एक से अधिक द्रव्य संयोजित होकर कोई नया द्रव्य बनाते है तो उसमे पाये जाने वाले तत्वों का द्रव्यमान निश्चित व स्थिर अनुपात में रहता है। यह अनुपात परिवर्तनीय नही होता है। इसीलिए इसे स्थिर अनुपात का नियम कहा जाता है।

यौगिक में पाये जाने वाले परमाणु के भार की अवस्था का अनुपात स्थिर रहता है। इसमें निर्माण की क्रियाविधि या स्त्रोत का प्रभाव नही पड़ता अर्थात् यौगिक को किसी भी विधि से निर्मित किया जा सकता है या किसी भी स्त्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है।
इसे “निश्चित संघटन के नियम” के नाम से भी जाना जाता है।

गुणित अनुपात का नियम

यह नियम  जॉन डॉल्टन द्वारा सन् 1804 में प्रतिपादित किया  गया था। नियमानुसार जब दो तत्व आपस में संयोजित होकर रासायनिक क्रिया द्वारा एक से अधिक यौगिकों का निर्माण करते हैं तो उनमे से एक तत्व की मात्रा निश्चित रहती है तथा दूसरे तत्व की मात्रा गुणात्मक रूप में प्रदर्शित होती है अर्थात् एक तत्व की निश्चित मात्रा के साथ संयोजित दूसरे तत्व की मात्रा गुणा के रूप में होगी। इसे ही गुणित अनुपात का नियम कहा जाता है।
किसी यौगिक में पाये जाने वाले दो तत्वों में से एक तत्व की मात्रा स्थिर व निश्चित होगी व इसके साथ जुड़े दूसरे तत्व की मात्रा गुणा के रूप में अर्थात् दोगुणा या तीन गुणा या चार गुणा आदि के गुणित क्रम में हो सकती है।

व्युत्क्रम अनुपात का नियम

इसे तुल्य अनुपात का नियम भी कहते हैं। यह नियम वैज्ञानिक रिचर द्वारा सन् 1792 में बनाया गया।

जब तीन तत्वों के मध्य रासायनिक क्रिया होती है तथा (उदाहरण के लिए A,B,C को तत्वों का नाम दिया गया है) उसमे से एक तत्व (A) की मात्रा निश्चित रहती है तथा बाकी दो तत्वों (B व C) की मात्रा अनिश्चित होती है तो उस निश्चित तत्व की मात्रा के साथ उन दोनों तत्व की कुछ मात्रा जुड़ जाती है। जब कभी दोनों तत्व (B व C) आपस में क्रिया करते है तो उनकी मात्रा का वही अनुपात होगा जो पहले निश्चित तत्व (A) के साथ था।

दूसरे शब्दों में, जब एक निश्चित मात्रा वाला कोई तत्व दो अलग-अलग मात्रा वाले तत्वों से मिलकर क्रिया करता है तो दोनों तत्वों का एक अनुपात उस निश्चित मात्रा वाले तत्व के साथ भी संयोजित हो जाता है। जब वे दोनों अलग-अलग मात्रा वाले तत्व आपस में क्रिया करेंगे तो उनके मध्य वही पुराना अनुपात कायम रहेगा।

गैसीय आयतन नियम

वैज्ञानिक गे लुस्साक द्वारा सन् 1808 में यह नियम प्रतिपादित किया गया। इसके अनुसार जब गैसें एक समान दाब व ताप के अंतर्गत परस्पर क्रिया करती है, उनके मध्य आयतन के अनुपात की सरल अवस्था रहेगी। इन अभिक्रियाओं से बनने वाली नई गैस या गैसों के तत्वों के आयतन का अनुपात भी उन क्रियाशील गैसों के अनुसार सरल स्थिति में रहता है।
दूसरे शब्दों में, जब किसी द्रव्य पर दाब और ताप में परिवर्तन आए या किया जाए तो द्रव्य के आयतन में भी परिवर्तन आता है। अतः नियमानुसार एक से अधिक गैसों के आपस में मिलकर रासायनिक क्रिया करने पर या नयी गैस के निर्मित होने पर यदि उनमें दाब व ताप स्थिर व समान रहता है तो उनका आयतन भी सरल अनुपात में बना रहेगा।

एवोगाड्रो का नियम

जब समान आयतन वाली दो या अधिक भिन्न-भिन्न गैसों को एक निश्चित ताप व निश्चित दाब पर रखा जाता है तो उनमे पाये जाने वाले अणुओं की संख्या भी समान होगी।
इस नियम को सरलता से समझा जा सकता है। केवल ध्यान देने योग्य बिन्दु यही है कि अलग-अलग गैसों को एक स्थिर तापमान व दाब दिया जाता है तो उनके अणु भी समान मात्रा में रहते हैं, परन्तु यह आवश्यक है कि उन गैसों का आयतन समान हो।
इसे दूसरे तरीके से ऐसे भी कहा जा सकता है कि समान अणुओं वाली भिन्न-भिन्न गैसों का आयतन भी समान होता है