पदार्थ व इनके रासायनिक नाम

हम अपने रोजमर्रा के जिंदगी में अनेक पदार्थों का प्रयोग करते हैं। इन्हें हम सामान्य नाम से पहचानते हैं, परन्तु ये पदार्थ रसायन से युक्त होते हैं और इनके रासायनिक नाम भी होते हैं।

आज इस लेख में हम आपको कुछ उपयोगी पदार्थों के रासायनिक नाम से अवगत करवाना चाहते हैं। कुछ पदार्थों के नाम व रासायनिक नाम निम्नलिखित हैं-

नौसादर- अमोनियम क्लोराइड

द्राक्ष शर्करा (अंगूर का सत)- ग्लूकोज़

स्लेट- सिलिका एल्युमिनियम ऑक्साइड

लाल सिंदूर- लेडपर ऑक्साइड

चूना- केल्शियम ऑक्साइड

लाल दवा- पोटेशियम परमैग्नेट 

खाने का सोडा- सोडियम बाई कार्बोनेट

धोने का सोडा- सोडियम कार्बोनेट

शोरा- पोटेशियम नाईट्रेट

शोरे का अम्ल- नाइट्रिक एसिड

कास्टिक पोटाश- पोटेशियम हाइड्रोक्साइड

स्प्रिट- मैथिल एल्कोहल

बुझा चूना- कैल्शियम हाइड्रोक्साइड

लाफिंग गैस- नाइट्रस ऑक्साइड

चाक- कैल्शियम कार्बोनेट

हरा कसीस- फेरिकसल्फेट

नीला थोथा- कॉपर सल्फेट

सफेद थोथा- जिंक सल्फेट

जिप्सम- कैल्शियम सल्फेट

फिटकरी- पोटेशियम एल्युमिनियम सल्फेट 

सुहागा- बोरैक्स

मण्ड- स्टार्च

गंधक- सल्फ्यूरिक एसिड

टी. एन. टी.- ट्राई नाइट्रो टॉल्विन

बालू रेत- सिलिकॉन ऑक्साइड

साधारण नमक- सोडियम क्लोराइड

नमक का अम्ल- हाइड्रोक्लोरिक एसिड

चीनी- सुक्रोज

हल्दी- कुर्कुमा लौंगा

संगमरमर- कैल्शियम कार्बोनेट

ब्लीचिंग पाउडर- कैल्शियम हाइपो क्लोराइट

प्लास्टर ऑफ़ पेरिस- कैल्शियम सल्फेट हाफ़ हाइड्रेट

चिली साल्टपीटर- सोडियम नाईट्रेट

चाइना व्हाइट- जिंक ऑक्साइड

मार्श गैस- मेथेन

पानी- हाइड्रोजन डाई ऑक्साइड

यूरिया- कार्बोनेट

हाइपो- सोडियम थायोसल्फेट

एल्कोहल- इथाइल एल्कोहल

गैलेना- लेड सल्फाइड

अश्रु गैस- क्लोरो एसीटो फेनोन

कूलर कैसे काम करता है

गर्मियों में आप एयर कूलर तो जरूर इस्तेमाल करते होंगे, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है की एयर कूलर कैसे काम करता है ?

एयर कूलर को अंग्रेजी में हम स्वाम्प कूलर या एवापोराटिव कूलर भी कहते है, यह कूलर ठीक उसी सिधांत पर काम करता है जिस सिधांत पर पानी से भरा मटकी।

इसे और आसानी से समझने लिए हम एक उधारण लेते हैं, आप जब स्नान करके हवा खाने जाते हैं तो आपको ठण्ड लगती है।

अगर शरीर पूरा भीगा है तो ज्यादा ठण्ड लगती है और कम भीगा है तो कम लगती है लेकिन आखिर ऐसा होता क्यों है।

जब हमारे शरीर पर पानी होता है तो वह पानी जब सूखता है तो हमे ठण्ड लगती है, यहाँ पर पानी द्रव अवस्था से गैसीय अस्वथा में जब बदलता है तो उसे हीट (गर्मी ) की जरूरत पड़ती है, तो जब गरम हवा उस पानी से टकराता है तो वह उस पानी तो भाफ या गैस में बदल देता है इस प्रक्रिया में गरम हवा ठंडा हो जाता है क्यों की उसकी सारी गर्मी पानी द्वारा सोख ली जाती है और इस प्रकार हमे ठण्ड लगने लगता है जब तक की सारा पानी सुख न जाये।

कूलर भी इसी सिधांत पर काम करता है, कूलर में जो हम पानी डालते है वो गरम हवा से गैस में बदल जाता है और गरम हवा कूलर के अन्दर ठंडा हो जाता है जिसे कूलर में लगा फैन बहार की ओर फेक देता है और हमे इस तरह ठंडा हवा मिलता है।

कूलर के 3 साइड में खस लगे होते है जिसपर पानी गिराया जाता है, और जब उन पानी की बूंदों से गरम हवा टकराती है तो वह उन बूंदों को भाफ में बदल देती है और ठंडी हो जाती है।

एयर कूलर, AC से पर्यावरण के लिए अच्छा है क्यों की AC में मौजूद केमिकाल्स हमारे ओजोन परत को ख़राब कर रहे है कूलर का कोई ऐसा साइड इफ़ेक्ट नही है।

कूलर का एक खामी यह है की उसे बहोत ज्यादा पानी चाहिए होता है। ऐसे जगह जहाँ पानी की किल्लत है वह कूलर लगाना महंगा पड़ सकता है।

थेर्मोकोल क्या है और कैसे बनाया जाता है ? Thermocol in Hindi

थर्मोकोल का वैज्ञानिक नाम Polystyrene है , यह एक प्रकार का प्लास्टिक है जिसका इस्तेमाल फ़ूड पैकेजिंग, फोम के प्लेट्स, गिलास तथा वस्तुवो को सुरक्षित रखने के लिए गद्दे के रूप में उपयोग किया जाता है।

थर्मोकोल फोम जो हम देखते हैं वह Polystyrene का एक प्रकार है जिसमे 90 % हवा भरा रहता है, Polystyrene का दूसरा रूप ठोस प्लास्टिक है जो की Polystyrene से बना हुआ हो।

ठोस Polystyrene प्राकृतिक रूप से पारदर्शी होता है, लेकिन इसमें रंग मिला कर इसका रंग बदला जा सकता है।

ठोस Polystyrene का उपयोग गाड़ियों में , CD केस , इलेक्ट्रॉनिक्स, खिलौना, किचन appliances में किया जाता है।

Polystyrene कैसे बनता है

Polystyrene बनाने के लिए styrene नामक मोनोमर को गर्म किया जाता है, जिसके फलस्वरूप styrene के छोटे छोटे कण एक दूसरे से जुड़ते चले जाते है और एक पॉलीमर की लंबी श्रृंखला ( long chain polymer ) बनती है जिसे हम Polystyrene कहते हैं।

Polystyrene का केमिकल फार्मूला (C8H8)n है।

2010 में टोटल 25 million tonnes styrene बनाया गया था।

यह पानी में घुलनशील नहीं है लेकिन acetone में घुलनशील है।

Polystyrene का खोज Eduard Simon ने सन 1839 में किया था। इसको IG Farben ने सन 1931 में commercialize किया।

Polystyrene इनर्ट ( inert  ) है इसका मतलब की यह किसी और वस्तु से react नहीं करता। यह प्लास्टिक काफी किफायती और लॉन्ग लास्टिंग भी है। यह insulating भी है, यानि की इससे बिजली का प्रवाह नहीं होता है।

इस प्लास्टिक को हम शार्ट फॉर्म में PS भी बोलते है, इसका recycle नहीं किया जाता है, क्यों की इसका recycle करके कोई खास वैल्यू प्राप्त नहीं होता , इस प्लास्टिक का उत्पाद करना काफी सस्ता है इसलिए रीसायकल के लिए इसका कोई मूल्य नहीं बचता।

यह प्लास्टिक बायोडिग्रेडेबल नहीं है, यानि की बैक्टीरिया इसे decompose नहीं कर सकते, लेकिन Mealworm नामक कीड़े इसे खाकर अपने पेट में तोड़ देते हैं।

बहुत सारे देस इस प्लास्टिक को बैन भी कर रहे है क्यों की यह हमारे पर्यावरण के लिए काफी नुकसान दायक है।

रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल – Rutherford model in hindi

रदरफोर्ड का जन्म 30 अगस्त 1871 को न्यूजीलैंड में हुआ। इनका पूरा नाम अर्नेस्ट रदरफोर्ड था। विज्ञान में अत्यधिक रूचि के कारण इनके द्वारा किये गए प्रयोगों, विधियों व तथ्यों के स्पष्टीकरण के फलस्वरूप इन्हें नाभिकीय भौतिकी के जनक के रूप में जाना जाने लगा।

प्रसिद्ध रसायन विशेषज्ञ अर्नेस्ट रदरफोर्ड  द्वारा सन् 1911 में परमाणु के संरचनात्मक विषय पर प्रतिरूप पेश किया।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सौर मण्डल में केन्द्र भाग में सूर्य केन्द्रक की भाँति स्थित रहता है व बाकी ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते रहते है, उसी प्रकार नाभिक भी केन्द्र भाग में स्थित रहता है व इलेक्ट्रॉन इसके चारों ओर घूमते रहते हैं। इस कारण रदरफोर्ड द्वारा बनाये गए परमाणु मॉडल को “सौर मण्डल प्रणाली परमाणु मॉडल” के नाम से भी जाना जाता है।

अपने प्रयोग में उन्होंने सोने के एक पतली पट्टी पर अल्फा कणों की बौछार कर के यह पाया कि कुछ कण इसके आर-पार होकर इसमें में सीधे गुजरे, कुछ कण इससे टकराकर अपनी चाल से डगमगा कर मार्ग से विचलित हो गए तथा थोड़े से कण इससे टकराकर वापिस आ गए।

अर्नेस्ट रदरफोर्ड द्वारा अपने प्रयोगों द्वारा यह बताया गया कि परमाणु का कुछ भाग खाली (खोखला) होता है, जिसमे से अल्फ़ा कण आर-पार हो जाते हैं।

परमाणु में विद्युत के धन आवेश युक्त कण पाये जाते हैं, जिन्हें प्रोटॉन कहते हैं, जिससे कारण अल्फ़ा कण अपने रास्ते से हट कर रास्ता बदल लेते हैं।

परमाणु का नाभिक कठोर होता है तथा आकार में छोटा होने के कारण कुछ अल्फ़ा कण इससे टकराकर वापिस मुड़ जाते है।

रदरफोर्ड द्वारा परमाणु के मध्य भाग में स्थित केन्द्रक के बारे में भी चर्चा की गयी। परमाणु में पाया जाने वाला विद्युत का धन आवेश एक निश्चित स्थान पर केन्द्रित रहता है, जिसे परमाणु का केन्द्रक या नाभिक कहा जाता है। धनावेशित प्रोटॉन नाभिक में ही मौजूद रहते हैं।

नाभिक परमाणु के मध्य भाग में स्थित होता है, तो स्पष्टतः तुलनात्मक रूप से नाभिक आकार में परमाणु से काफी छोटा होता है। चूँकि नाभिक में प्रोटॉन पाये जाते हैं तो नाभिक विद्युत के धन आवेश से युक्त रहता है।

नाभिक के बाहरी ओर ऋणावेशित कण इलेक्ट्रॉन गतिमान अवस्था में रहते हैं। इलेक्ट्रॉन तीव्रता से नाभिक की परिक्रमा करते रहते हैं।

कमियाँ- विद्युत गति के सिद्धान्त के अनुसार जब कोई विद्युत आवेश वाले कण लगातार गतिशीलता बनाए रखते हैं तो विकिरण प्रभाव के कारण धीरे-धीरे उन कणों की ऊर्जा में कमी आती है तथा गति निम्न स्तर में आ जाती है।

रदरफोर्ड के मॉडल में बताया गया कि नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन निरन्तर घूमते रहते है। विद्युत गति के सिद्धान्त के अनुसार इलेक्ट्रॉन में ऊर्जा की कमी आनी चाहिए तथा कमजोर होकर इलेक्ट्रॉन को नाभिक में प्रवेश कर जाना चाहिए। जिससे ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन की टक्कर धनात्मक प्रोटॉन से होने से इनका स्वयं ही विनाश हो जाएगा। फलस्वरूप परमाणु भी विनष्ट हो जाएगा।

जबकि तथ्य यह है कि परमाणु का इस प्रकार से नष्ट होना असम्भव है।

उपर्युक्त विवरण से यह बात सामने आई है कि रदरफोर्ड के मॉडल में परमाणु के स्थिरता व स्थायित्व के सम्बन्ध में कोई स्पष्टीकरण नही किया गया।

निष्कर्ष- ऊपर दिया गया पूरा व्याख्यान पढ़ने पर निष्कर्ष यह निकलता है कि थॉमसन द्वारा परमाणु संरचना के सम्बन्ध में इलेक्ट्रॉन की स्थिति की तुलना तरबूज या पुडिंग से करने वाली अवधारणा से रदरफोर्ड संतुष्ट नही थे।

अपनी इस असन्तुष्टि को दूर करने के लिए उन्होंने स्वयं प्रयोग किये व परमाणु मॉडल सामने लाये, ताकि परमाणु की संरचना सम्बन्धी कोई अलग से आवश्यक ज्ञान प्राप्त हो सके।

वे इसमें काफी हद तक कामयाब भी रहे। उन्होंने परमाणु में नाभिक की उपस्थिति को स्पष्ट किया तथा प्रोटॉन पर विद्युत के धन आवेश की भी व्याख्या की और इलेक्ट्रॉन द्वारा नाभिक की परिक्रमा करने के तथ्य को भी साबित किया|

 

परमाणु व अणु – Atom and Molecule in Hindi

atom model

वर्तमान समय में इस बात से कोई भी अनभिज्ञ नही है कि ब्रह्माण्ड के निर्माण करने में सहयोगी द्रव्य (पदार्थ) का सृजन अणुओं से होता है तथा अणुओं का निर्माण परमाणुओं से होता है। यह सृजन की एक श्रृंखला की भाँति है, एक से दूसरे का निर्माण व दूसरे से तीसरे का निर्माण।

किसी भी द्रव्य की कोई भी अवस्था द्रव या ठोस या गैस या प्लाज्मा, प्रत्येक का सृजन परमाणु से होता है।

परमाणु

परमाणु इतने छोटे कण होते हैं कि इनको तोड़ा नही जा सकता अथवा इनके टुकड़े नही किये जा सकते। परमाणु से ही अणु अस्तित्व में आते हैं। बिना परमाणु के अणुओं का निर्माण नही हो सकता।

परमाणु में रासायनिक विशेषतायें पाई जाती है। इनका निर्माण भी कुछ इससे भी अत्यन्त छोटे-छोटे कणों से मिलकर होता है। ये कण प्रोटॉन, न्यूट्रॉन व इलेक्ट्रॉन हैं। इन्हें परमाण्विक कण भी कहते हैं।

परमाणु संरचना के संबंध में बात की जाए तो परमाणु के आंतरिक दो भाग होते हैं-

1- नाभिक

2- नाभिक का बाह्य क्षेत्र

नाभिक- यह परमाणु के अन्दर बिल्कुल मध्य में पाया जाता है। चूँकि यह परमाणु का एक हिस्सा है तो सम्भवतः बहुत छोटा होता है। केन्द्र में स्थित होने के कारण इसे केन्द्रक भी कहा जाता है।

इसमें परमाणु निर्माण में सहयोगी दो कण न्यूट्रॉन व प्रोटॉन पाये जाते हैं।

न्यूट्रॉन की खोज सर जेम्स चैडविक ने की थी। उन्होंने यह बात साबित कि थी कि न्यूट्रॉन नाभिक के भीतर पाये जाने वाले ऐसे कण हैं, जो आवेश विहीन होते हैं। सभी तत्वों के परमाणुओं में ये प्रोटॉन के साथ पाये जाते हैं, परन्तु एकमात्र हाइड्रोजन के परमाणु के नाभिक में प्रोटॉन अकेला पाया जाता है, न्यूट्रॉन नही पाये जाते।

प्रोटोस से उद्भव हुआ शब्द प्रोटॉन को महान वैज्ञानिक रदरफोर्ड ने खोजा था। यह भी नाभिक के अन्दर स्थित रहते हैं। इन्हें प्राणु भी कहा जाता है। ये विद्युत के धन आवेश से परिपूर्ण होते हैं।

नाभिक का बाह्य क्षेत्र- नाभिक के बाहरी हिस्से में ऋण आवेश से भरे हुए इलेक्ट्रॉन बादलों की भाँति मँडराते रहते हैं। सर जे.जे.थॉमसन द्वारा इलेक्ट्रॉन को खोजा गया था। ये जब प्रोटॉन व न्यूट्रॉन के साथ मिलते हैं तो परमाणु अस्तित्व में आता है।

परमाणु क्रमांक- एक परमाणु में पाये जाने वाले सभी प्रोटॉन की संख्या को ही परमाणु क्रमांक कहा जाता है।

परमाणु द्रव्यमान- किसी भी परमाणु का द्रव्यमान इसके नाभिक में ही केंद्रित रहता है।  अतः यह समझना सरल ही है कि नाभिक में  पाये जाने वाले न्यूट्रॉन व प्रोटॉन के योग से प्राप्त संख्या ही परमाणु द्रव्यमान संख्या कहलाती है।

समस्थानिक- एक तत्व में प्रोटॉन समान संख्या में हो, परन्तु न्यूट्रॉन असमान संख्या में हो अर्थात् परमाणु क्रमांक में समानता व परमाणु द्रव्यमान में असमानता पाई जाती है तो ऐसे तत्व को समस्थानिक कहा जाता है।

समभारिक- यह समस्थानिक से विपरीत है।  तत्वों के परमाणु द्रव्यमान एक जैसे हो, परन्तु  परमाणु क्रमांक अलग-अलग हो तो इन्हें समभारिक कहा जाता है।

परमाणु के अस्तित्व व संरचना के संबंध में कुछ महान विज्ञान विशेषज्ञों द्वारा अलग-अलग तथ्य प्रस्तुत किये गए व तर्क रखे गए।

जॉन डॉल्टन द्वारा यह कहा गया कि सृष्टि में विद्यमान प्रत्येक द्रव्य का निर्माण अत्यन्त सूक्ष्म कणों से होता है। ये कण ही परमाणु हैं।

परमाणु स्वतः उत्पन्न होते हैं, इनको न बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। यह अविभाज्य होता है, अतः इसे काटा या तोड़ा भी नहीं जा सकता।

रदरफोर्ड द्वारा परमाणु मॉडल के सम्बन्ध में कहा गया कि नाभिक सूर्य की तरह है तथा इलेक्ट्रॉन अन्य ग्रहों की भाँति इसके चारों तरफ घूमते रहते हैं तथा नाभिक अत्यन्त कठोर होता है।

थॉमसन द्वारा पेश किये गए परमाणु मॉडल में तरबूज का उदाहरण देते हुए परमाणु को गोल आकृति वाला तथा इसके धनावेशित कणों को तरबूज के बीज के समान थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बिखरा हुआ बताया गया।

बोर के परमाणु मॉडल में इलेक्ट्रॉन की नाभिक के बाहर गतिशीलता के बारे में चर्चा करते हुए इसमें लगने वाले अपकेंद्रिय बल के विषय को प्रकट किया गया। नाभिक के बाहर भिन्न-भिन्न ऊर्जा युक्त कक्षाओं का उल्लेख किया गया।

अणु

द्रव्य जिन कणों से निर्मित होता है, वे कण अणु हैं। अणु का सृजन परमाणु से होता है।

एक से अधिक परमाणु के मध्य आकर्षक बल पैदा होने से उनमें रासायनिक बंध का निर्माण होता है, जिससे वे एक-दूसरे से जुड़ कर अणु का निर्माण करते हैं। यह स्वतन्त्र स्थिति में मौजूद रहता है। इसमें द्रव्य के सभी रासायनिक व भौतिक गुण विद्यमान रहते हैं। परमाणु के विपरीत अणु अविभाज्य नही होते हैं। इनका विभाजन किया जा सकता है।

द्रव्य की अवस्था में भिन्नता के कारण अणुओं की स्थिति में भी भिन्नता पाई जाती है। ठोस में पाये जाने वाले अणु एक-दूसरे के बिल्कुल साथ-साथ जुड़े हुए रहते हैं, जिस कारण ये यहाँ से वहाँ गति नही कर सकते। अणुओं की इस स्थिति के कारण ही इनमे कठोरता व निश्चित आकृति पाई जाती है।

द्रव में पाये जाने वाले अणु ठोस की अपेक्षा एक-दूसरे से कुछ दूरी पर स्थित रहते हैं, इस कारण इनमे एक से दूसरी जगह पर जाने के लिए थोड़ा रास्ता मिल जाता है तथा ये गतिमान अवस्था में रहते हैं। अणुओं की यह स्थिति द्रव को वजन तो प्रदान करती है, परन्तु इनका कोई आकार नही होता।

गैस के अणु अत्यन्त दूरी पर स्थित होते हैं, जिसके कारण इनमें तीव्रता से गति करने के क्षमता होती है। इसके अणु अत्यधिक क्रियाशील होते हैं। अणुओं में दूरस्थता के कारण गैस का कोई निश्चित आकार नही होता है।

परमाणुकता- चूँकि अणुओं का अस्तित्व परमाणु से होता है तो अणु में पाई जाने वाली परमाणु की संख्या की अणु की परमाणुकता कहा जाता है।

ये भी दो तरह के होते हैं-

समपरमाणुक- ऐसे तत्वों में पाये जाने वाले अणुओं में जो परमाणु पाये जाते हैं, वे एक ही प्रकृति वाले तथा एक ही प्रकार के होते हैं। जैसे- h2।

विषमपरमाणुक- ऐसे तत्वों में पाये जाने वाले तत्वों के अणुओं के परमाणु अलग-अलग प्रकार के होते हैं। परमाणु संख्या में समानता न होने के कारण ही इसे विषमपरमाणुक कहा जाता है। जैसे h2so4।

एक ही प्रकार के परमाणु वाले अणुओं से निर्मित द्रव्य को तत्व कहा जाता है।

एक से अधिक अलग-अलग प्रकार से परमाणुओं से बने अणु युक्त द्रव्य को यौगिक कहा जाता है। इसमें परमाणु संयोजन का एक निश्चित अनुपात होता है।

अनिश्चित अनुपात में परस्पर मिलकर रासायनिक क्रिया द्वारा अलग-अलग परमाणुओं से युक्त अणुओं वाले द्रव्य को मिश्रण कहा जाता है।

इसे उदाहरण द्वारा सरलता से समझा जा सकता है, जैसे हाइड्रोजन के दो परमाणु व ऑक्सीजन का एक परमाणु को एक-दूसरे से मिलाने पर जल प्राप्त होता है। इसमें हाइड्रोजन व ऑक्सीजन एक निश्चित अनुपात में रहते हैं। अतः जल एक यौगिक है।

अणुओं से सम्बंधित कुछ गणनाओं के बारे में  व्याख्या निम्न प्रकार से है

आण्विक द्रव्यमान- जैसा कि नाम से पता लग रहा है कि अणुओं के द्रव्यमान को आण्विक द्रव्यमान कहा गया है। चूँकि अणु बहुत से परमाणुओं से मिलकर बने होते हैं तो किसी अणु का द्रव्यमान ज्ञात करने के लिए उसमे पाये जाने वाले सभी परमाणुओं के द्रव्यमान का योग कर दिया जाता है।

सूत्र इकाई द्रव्यमान- किसी यौगिक में स्थित बहुत से अणु मिलकर सामूहिक रूप से एक वृहताकार अणु का निर्माण करते हैं। ये यौगिक धनायन व ऋणायन से युक्त होते हैं। इनमे पाये हाने वाले अणुओं का द्रव्यमान ज्ञात करने के लिए इनके परमाणुओं के द्रव्यमान की गणना की जाती है। इसे सूत्र इकाई द्रव्यमान कहते हैं।

तुल्यंकी भार- किसी भी द्रव्य में पाये जाने वाले अणुओं के भार व इसके तत्वों की संयोजकता के अनुपात से प्राप्त संख्या को तुल्यंकी भार कहा जाता है।

द्रव्य से जुड़े पारिभाषिक शब्द 

Science board

परमाणु द्रव्यमान

ब्रह्माण्ड में समाहित प्रत्येक द्रव्य में कोई न कोई भार अवश्य होता है। चूँकि प्रत्येक द्रव्य का सृजन परमाणुओं से हुआ होता है तो सम्भवतः परमाणु में भी कुछ भार अवश्य ही होता है। इसे ही परमाणु द्रव्यमान कहा जाता है। किसी परमाणु का द्रव्यमान उसके कणों में समाहित होता है। ये कण प्रोटॉन, न्यूट्रॉन व इलेक्ट्रॉन है। इनमें पाया जाने वाला भार या द्रव्यमान इतना होता है कि उसे ग्राम या किलोग्राम में नही ज्ञात किया जा सकता। इस कारण इसे ज्ञात करने की इकाई को परमाणु द्रव्यमान इकाई कहते हैं।

सन् 1961 से किसी तत्व के परमाणु द्रव्यमान की गणना के लिए कार्बन-12 को मानक रूप प्रदान किया गया।

कॉर्बन-12 (C-12) के बाहरवें भाग में पाये जाने वाले मान से किसी तत्व के एक परमाणु की तुलना की जाती है अर्थात् यह गणना की जाती है कि एक द्रव्य में पाये जाने वाले विभिन्न तत्वों के अनगिनत परमाणुओं में से एक परमाणु का भार कार्बन के एक परमाणु के बाहरवें हिस्से के भार से कितना अधिक है।

कार्बन के बाहरवें हिस्से पर परमाणु द्रव्यमान की इकाई 1.66×10(-24)ग्राम है।

औसत परमाणु द्रव्यमान

सभी द्रव्यों में भिन्न-भिन्न प्रकृति के गुण पाये जाते हैं। इन द्रव्यों के गुणों पर परमाणु द्रव्यमान का प्रभाव पड़ता है। द्रव्यों में पाये जाने वाले तत्वों में भी भिन्नता पाई जाती है। एक समान तत्वों में समस्थानिक भिन्नता पाई जाती है अर्थात् एक ही तत्व के दो या अधिक समस्थानिक प्राकृतिक रूप से मौजूद रहते हैं। ये समस्थानिक एक समान अनुपात में स्थित रहते हैं अथवा इनमे स्थायित्व बना रहता है। भिन्न-भिन्न समस्थानिकों पर द्रव्यमान भी भिन्न होता है। अतः इन समस्थानिकों के द्रव्यमान का आनुपातिक रूप से औसत निकालकर परमाणुओं का औसत परमाणु द्रव्यमान ज्ञात किया जाता है।

इसे उदाहरण द्वारा आसानी से समझा जा सकता है, क्लोरीन में क्रमशः 75% व 25% के अनुपात में (35 u) द्रव्यमान व (37u) द्रव्यमान के परमाणु के समस्थानिक पाये जाते हैं। सूत्र द्वारा हल करने पर 35 का 75% और 37 का 25% करके औसत परमाणु द्रव्यमान 35.5 u प्राप्त होगा।

आणविक द्रव्यमान

यह तो सर्वविदित है कि किसी भी द्रव्य के सृजन में अणुओं का योगदान होता है तथा अणुओं का निर्माण बहुत से परमाणुओं से होता है। सरलतम रूप में यह कह सकते हैं कि इन परमाणुओं के द्रव्यमान के मिलने से अणुओं का द्रव्यमान प्राप्त होता है अर्थात् सभी परमाणुओं का कोई न कोई द्रव्यमान अवश्य रूप से होता है। परमाणु द्रव्यमान को मिलाकर इनका योग करने से प्राप्त परिणाम को आणविक द्रव्यमान कहा जाता है।

आणविक द्रव्यमान को ज्ञात करने पर जब इसे ग्राम इकाई में दर्शाया जाता है तो सम्बंधित अणु को ग्राम अणु कहा जाता है। उदाहरण के लिए, ऑक्सीजन के आणविक द्रव्यमान को (O2)32 के रूप में दर्शाया जाता है, इसीलिए इसका ग्राम आणविक द्रव्यमान 32 ग्राम होता है।

सूत्र इकाई द्रव्यमान

किसी यौगिक का निर्माण अलग-अलग प्रकृति वाले अणुओं से मिलकर होता है। ये सभी अणु मिलकर वृहत् रूप से एक बड़े अणु का सृजन करते हैं। इसे राक्षसी या वृहताकार अणु भी कहते हैं। धनायन व ऋणायन से युक्त यौगिकों में पाये जाने वाले अणुओं व इसके परमाणुओं के द्रव्यमान की गणना के लिए सूत्र इकाई द्रव्यमान का प्रयोग किया जाता है।

हालांकि सूत्र इकाई द्रव्यमान भी आणविक द्रव्यमान के समान है, परन्तु इसमें आणविक द्रव्यमान का कोई प्रयोग नही किया जाता है आणविक द्रव्यमान की भांति इसमें भी यौगिक में मौजूद परमाणुओं के द्रव्यमान का कुल जोड़ करके सूत्र इकाई द्रव्यमान की गणना की जाती है

तुल्यांकी भार

एक द्रव्य में पाये जाने वाले अणुओं के भार और तत्वों की संयोजकता के अनुपात को ही तुल्यांकी भार कहा जाता है। यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि किसी द्रव्य में पाये जाने वाले तत्व हाइड्रोजन के 1 ग्राम भार के या ऑक्सीजन के 8 ग्राम भार के या  क्लोरीन के 35.05 ग्राम भार के साथ जुड़कर क्रियाशील होते हैं।

किसी भी द्रव्य में भिन्न-भिन्न तत्व या यौगिक या मिश्रण पाये जाते हैं। इस कारण परमाणुओं में भी विभिन्नता पाई जाती है।