कूलर कैसे काम करता है

गर्मियों में आप एयर कूलर तो जरूर इस्तेमाल करते होंगे, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है की एयर कूलर कैसे काम करता है ?

एयर कूलर को अंग्रेजी में हम स्वाम्प कूलर या एवापोराटिव कूलर भी कहते है, यह कूलर ठीक उसी सिधांत पर काम करता है जिस सिधांत पर पानी से भरा मटकी।

इसे और आसानी से समझने लिए हम एक उधारण लेते हैं, आप जब स्नान करके हवा खाने जाते हैं तो आपको ठण्ड लगती है।

अगर शरीर पूरा भीगा है तो ज्यादा ठण्ड लगती है और कम भीगा है तो कम लगती है लेकिन आखिर ऐसा होता क्यों है।

जब हमारे शरीर पर पानी होता है तो वह पानी जब सूखता है तो हमे ठण्ड लगती है, यहाँ पर पानी द्रव अवस्था से गैसीय अस्वथा में जब बदलता है तो उसे हीट (गर्मी ) की जरूरत पड़ती है, तो जब गरम हवा उस पानी से टकराता है तो वह उस पानी तो भाफ या गैस में बदल देता है इस प्रक्रिया में गरम हवा ठंडा हो जाता है क्यों की उसकी सारी गर्मी पानी द्वारा सोख ली जाती है और इस प्रकार हमे ठण्ड लगने लगता है जब तक की सारा पानी सुख न जाये।

कूलर भी इसी सिधांत पर काम करता है, कूलर में जो हम पानी डालते है वो गरम हवा से गैस में बदल जाता है और गरम हवा कूलर के अन्दर ठंडा हो जाता है जिसे कूलर में लगा फैन बहार की ओर फेक देता है और हमे इस तरह ठंडा हवा मिलता है।

कूलर के 3 साइड में खस लगे होते है जिसपर पानी गिराया जाता है, और जब उन पानी की बूंदों से गरम हवा टकराती है तो वह उन बूंदों को भाफ में बदल देती है और ठंडी हो जाती है।

एयर कूलर, AC से पर्यावरण के लिए अच्छा है क्यों की AC में मौजूद केमिकाल्स हमारे ओजोन परत को ख़राब कर रहे है कूलर का कोई ऐसा साइड इफ़ेक्ट नही है।

कूलर का एक खामी यह है की उसे बहोत ज्यादा पानी चाहिए होता है। ऐसे जगह जहाँ पानी की किल्लत है वह कूलर लगाना महंगा पड़ सकता है।

अर्किमिडिज का सिद्धांत।Archimedes Principle in Hindi

सिद्धांत

जब कोइ ठोस चीज़ किसी द्रव्य मे डाली जाये तो उस द्रव्य से ठोस वस्तु पर लगने वाला उत्प्लावन बल (Buoyancy) ही अर्किमिडिज के सिद्धांत को दर्शाता है।

इसके अनुसार हम ये भी समझ सकते है कि कोइ भी चीज़ तरल माध्यम मे डालने से या तो तैरने लगती है या डूब जाती है या तो आधी डूबी रह्ती है।

अर्किमिडिज का सिद्धांत उत्छेप पर आधारित है। इसका मतलब है कि अगर ठोस वस्तु का वजन विस्थापित तरल के वजन से ज्यादा है तो ठोस वस्तुपर उत्छेप होता है और जैसे जैसे ठोस वस्तु विस्थापित तरल से ज्यादा वजनीय होती जाती है तो अंततः तरल पदार्थ मे डूब जाती है।

जिसका दुसरा प्रारुप यह है कि जब ठोस वस्तु का वजन विस्थापित तरल के वजन से कम है तो वस्तु उत्प्लावन बल (Buoyancy) को ज्यादा हावी पाती है और तरल पदार्थ मे तैरने लगती है।

तीसरा प्रारूप यह है कि ठोस वस्तु का वजन अगर विस्थापित किये तरल के वजन के बराबर है तो संतुलन के सिदधांत के अनुसार ठोस वस्तु आधी तैरती और आधी तरल माध्यम मे डूबी दिखाई देती है।

इस उत्प्लावन बल (Buoyancy) को हम मछ्लियों मे भी देख सकते है। मछ्लियो के अंदर तैराकी के लिये एक आशय दिया होता है जिसमे मछ्लिया हवा भर सकती है या जिससे हवा बाहर निकाल सकती है।

फोटो सोर्स: britishseafishing.co.uk

जब मछ्लिया तैरना चाह्ती है तो अपने स्विम ब्लैडर मे हवा भर लेती है, जिससे उनका आयत बढ जाता है और पानी के उत्प्लावन बल (Buoyancy) के कारण वो तैरने लगती है। जब मछ्लिया पानी के अंदर जाना चाह्ती है तो स्विम ब्लैडर मे भरी हुइ सारी हवा बाहर निकाल देती है जिससे उनका आयत कम और वजन ज्यादा बढ्ने लगता है, इससे पानी पर उनका वजन बढ्ता है और मछ्लिया अंदर चली जाती है।

अर्किमिडिज के सिद्धांत को किसी अनियमित आकार के वस्तु के आयतन को जानने के लिये किया जाता है यानि उस वस्तु को जिसका आयतन जानना है उसे तरल पदार्थ मे डालने के बाद जितने वजन के तरल पदार्थ को विस्थापित करे, उतना ही उस वस्तु का वजन होगा। इसे किसी भी वस्तु के घनत्व और विशिष्ट घनत्व को जानने के लिये इस्तेमाल करते है।

उदाहरणतया, जब किसी वस्तु का घन्त्व पानी से ज्यादा है तो पहले उस वस्तु का वजन हवा मे करते है और फिर उस वस्तु का वजन पानी मे डालके करते है, इससे जो घनत्व मे फर्क़ आता है उससे हम विशिष्ट घनत्व का मान निकालते है।

अर्किमिडिज के सिद्धांत का सबसे अच्छा प्रयोग माना गया जहाज़ और पंडुब्बी को।

इस उत्प्लावन बल (Buoyancy) के विज्ञान को लेकर आज जहाज और पंडुब्ब्बियां अपने विस्त्रित और विकसित रूप मे एक सुचारु कर्यप्रणाली के अंतर्गत काम कर रही है।

पंडुब्ब्बी के अंदर जो बळॉस्ट टैंक होता है वो बिल्कुल मच्छ्लियों के स्विम ब्लैडर की तरह होता है जिसमे से अगर पानी खाली कर दिया जाये तो हल्के वजन के कारण पंडुब्ब्बी उपर आ जाती है। जब ये बळॉस्ट टैंक भरे हुए होते है तो ज्यादा वजनीय होने की वजह से पानी के अन्दर चले जाते है जिससे पानी के अंदर सफर तय करना मुमकिन हो पाता है।

इस सिदधांत का प्रयोग गर्म हवा से भरे गुब्बारे मे भी किया जाता है जहां गर्म हवा के प्रयोग से गुब्बारे हवा मे तैरने लगते है है क्योकि गर्म हवा ज्यादा हल्की होती है वही तापमान कम होने से हवा का घनत्व घट्ता जाता है और वजन बढ्ता जाता है जिससे गुब्ब्बारा नीचे की ओर जाने लगता है। अर्किमिडिज ने इस ऐतिहासिक सिदधांत को अपने घर मे नहाते वक़्त ट्ब के अंदर अपने शरीर के पानी पर पड़्ते वजनीय प्रभाव से जाना था । तो इतना ही सरल था एक वैज्ञानिक के रोज़्मर्रा की ज़िंदगी का द्रिष्टिकोण जो अर्किमिडिज के उत्प्लावन बल (Buoyancy) का सिदधांत बन गय।

भाप क्या है व इसके उपयोग

disel engine

भाप क्या है? 

जल को अत्यधिक ताप देने से इसका आयतन बढ़ता है तथा 100° सेल्सियस से अधिक गर्म होने पर यह जिस रूप में उड़ता है, उसे वाष्प या भाप कहते हैं। साधारण शब्दों में,जल को गर्म करनेसे निकलने वाली वाष्प को भाप कहते हैं अर्थात् जलवाष्प को भाप कहते हैं। यह गैसीय रूप में होती है।

जल को भाप में परिवर्तित करने के लिए जिस ऊष्मा की आवश्यकता होती है, उसे भाप की गुप्त ऊष्मा कहते हैं। 

इसके अलावा किसी अत्यधिक गर्म वस्तु पर पानी डालने से भी उसमे से भाप निकलती है।

यदि भाप की प्रकृति के बारे में बात की जाए तो यह दो तरह से हो सकती है- 

आर्द्र भाप व शुष्क भाप।

आर्द्र भाप- जब भाप में बूँदों के रूप में जल की कुछ मात्रा उपस्थित रहती है तो इसे आर्द्र भाप कहते हैं। यह सामान्यतः दृश्य होती है अर्थात् इसे देखा जा सकता है, क्योंकि जल की उपस्थिति के कारण यह सफेद रंग लिए हुए होती है।

शुष्क भाप- इसी के विपरीत जब भाप जलविहीन हो तो इसे शुष्क भाप कहा जाता है। यह अदृश्य होती है, क्योंकि जल के पूर्ण अभाव के कारण इसका कोई रंग नही होता।

भाप के उपयोग-

भाप के उपयोग का इतिहास बहुत बड़ा है। इसका उपयोग ऊष्मा को यांत्रिक ऊर्जा के रूपमें परिवर्तित करने के लिये किया जाता है। लगभग 300 ईसा पूर्व भाप को यांत्रिक ऊर्जा के रूप में प्रयोग करने का पहला श्रेय एलेक्जेंड्रिया के व्यक्ति को जाता है, जिनका नाम “हीरो” था। इन्होंने भाप से खिलौनों में गति  पैदा की थी अर्थात् भाप से चलने वाले छोटे-छोटे खिलौने निर्मित किये थे।

1698 ईस्वी में”सेवरी” नामक व्यक्ति द्वारा भाप से चलने वाली एक मशीन बनाई गयी। इस वाष्पयान का उपयोग खदानों तक पानी की व्यवस्था करने हेतु तथा कुओं से पानी निकालने के लिए किया जाता था।

सेवरी के बादभाप इन्जन के रूप में एक नया आविष्कार “टॉमस न्यूकॉमेन” द्वारा किया गया। उनके इस आविष्कार को न्यूकॉमेन इन्जन के नाम से जाना गया। लगभग 50 वर्षों तक इसका व्यावसायिक उपयोग किया गया।

टॉमस न्यूकॉमेनके इस आविष्कार के कारण सर जेम्स वाट को अपने आविष्कार के लिए एक दिशा मिली, क्योंकि न्यूकॉमेन द्वारा बनाये गए वाष्पयान की मरम्मत की जिम्मेदारी वाट को मिली थी। मरम्मत कार्य के दौरान यन्त्र में रुचि रखने वाले वाट ने अपनी बौद्धिक क्षमता का बाखूबी इस्तेमाल करते हुए यह पाया कि उसमे ईंधन बहुत व्यर्थ होता है तथा इसका सही उपयोग नही हो रहा है। बाद में इसमें सुधार करके नया रूप दिया गया। अतः मुख्य रूप से भाप का सबसे बड़ा उपयोग 19वीं सदी के आरम्भ में “सर जेम्स वाट“द्वारा भाप से चलने वाले इन्जन का आविष्कार करके किया गया।

सन 1884 में “सर चार्ल्स पेर्सन्स” द्वारा एक ऐसी मशीन का निर्माण किया गया, जिससे भाप की ऊष्मा को यांत्रिक ऊर्जा का रूप प्रदान किया जाता है। इस मशीन को वाष्प टरबाईन कहा जाता है। वर्तमान समय तक भी यान्त्रिक ऊर्जा के निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है।

इसके पश्चात् भाप से चलने वाली कई छोटी मशीनों का भी निर्माण किया गया।

आधुनिक समय में कई तरह से भाप का उपयोग किया जा रहा है।

शीत युक्तप्रदेशों में घरों में गर्माहट बनाये रखने के लिए भाप का इस्तेमाल किया जाता है।इसमें घर के सबसे नीचे वाले भाग में गर्म पानी से भाप पैदा की जाती है तथा नलिकाओं से होती हुई भाप कमरों तक पहुंचकर तापमान को बढ़ाती है। सौन्दर्य के क्षेत्र में भीभाप का उपयोग किया जाता है। चेहरे की स्वच्छता व रोमछिद्रों को खोलने के लिए भापका उपयोग किया जाता है।

स्वास्थ्य हेतुचिकित्सा क्षेत्र में भी शरीर को भाप प्रदान की जाती है। इसे वाष्पस्नान  कहा जाता है। इसमें भापयुक्त कक्ष का उपयोगकिया जाता है| इससे शरीर की विभिन्न प्रकार की बीमारियों का इलाज करने हेतु प्रयोग कियाजाता है, एवं आयुर्वेद में भाप का काफी महत्व है| इस प्रकार आज के आधुनिक युग में भाप का कई प्रकार से उपयोग किया जाता है, इसकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता एवं इसके अविष्कार एवं प्रयोग का इतिहास भी काफी रोमांचक रहा है|उम्मीद है, कि आपको इस लेख से अच्छी जानकारी मिली होगी एवं कुछ नया खोजने की प्रेरणा प्राप्त हुई होगी|

द्रव के गुण

liquid water touching

आयतन की निश्चितता- सभी पदार्थ कोई न कोई जगह अवश्य ही लेते है। उस जगह का माप ही आयतन कहलाता है।
यह समझना सरल ही है कि कोई भी द्रव एक निश्चित स्थान घेरता ही है। इसीलिए इसमें निश्चित आयतन का गुण विद्यमान होता है।

घनत्व की निश्चितता- प्रत्येक द्रव्य (पदार्थ) में द्रव्यमान पाया जाता है। एक द्रव्य के आयतन के एक इकाई हिस्से में पाया जाने वाला द्रव्यमान ही उसका घनत्व कहलाता है। यह द्रव पदार्थ की सघनता को दर्शाता है।

अनिश्चित आकृति- द्रव पदार्थ के आयतन व घनत्व का एक निश्चित मान होता है, परन्तु इसका आकार निर्धारित नही होता है। द्रव जिस आकार के ढाँचे में रहता है, उसी का आकार ले लेता है।

सीमित आकर्षण बल- द्रव (तरल) के अणुओं की दूरस्थता के कारण इनके मध्य खाली जगह होती है। कणों के नज़दीक न होने के कारण ये एक दूसरे को अधिक आकर्षित नही करते हैं अर्थात् द्रव के अणुओं आकर्षण बल कमजोर होता है।

गतिशीलता- द्रव पदार्थ के कण एक दूसरे से कुछ दूरी पर स्थित रहते हैं। इस दूरी के कारण कणों के मध्य खाली जगह बनी रहती है, जिससे इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए रास्ता मिल जाता है तथा ये कण गति करते रहते हैं। द्रव में गतिशीलता व लोचशीलता का गुण पाया जाता है।

बहाव- द्रव के कणों में गति व लोच पाये जाने के कारण इसमें अस्थिरता बनी रहती है। यह एक स्थान पर मजबूती लिए हुए नही बना रह सकता, जिससे इसमें प्रवाहित होने का गुण भी पैदा होता है। जैसे नहरों,नदियों, नालियों आदि में जल बहता हुआ आगे जाता रहता है। यदि द्रव को किसी बर्तन (पात्र) में रखा जाए तो इसे प्रवाहित होने के लिए पर्याप्त स्थान नही मिल पाता, जिससे यह उस पात्र की सतह से टकराता रहता है।

असंपीड़न- द्रव में लोच व गति होने के कारण इसमें संपीड़न का अभाव पाया जाता है। जब किसी द्रव पदार्थ पर बाहरी दबाव बनाया जाता है तो इनके अणु नज़दीक नही आते है, जिससे ये दबते व सिकुड़ते नहीं है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि द्रव पदार्थों में सिकुड़न पैदा नही की जा सकती, क्योंकि ये असंपीड़ित प्रकृति के होते हैं।

श्यानता- द्रव पदार्थों के प्रवाह (बहने) होने की गति में होने वाले विरोधाभास (प्रतिरोध) को श्यानता कहते हैं। किसी द्रव को प्रवाहित होते हुए आगे बढ़ने में बल का प्रयोग करना पड़ता है। घर्षण बल लगता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी सपाट वस्तु पर पानी गिराया जाए तो वह गति करता हुआ फिसलने लगता है और यदि कोई गाढ़ा द्रव जैसे शहद गिराया जाये तो वह धीरे-धीरे फिसलता है। पानी में शहद की अपेक्षा काम विरोधाभास होगा। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पानी में श्यानता कम पाई जाती है व गाढ़े द्रव में श्यानता अधिक पाई जाती है।

वाष्प दाब- यह गुण द्रव में पाया जाता है। जब किसी द्रव को गर्म करके ऊर्जावान बनाया जाता है और गर्म द्रव को किसी बर्तन में रखकर ढक दिया जाता है तो इसमें से वाष्प के कण निकलते है। यह वाष्पीकरण है।
ढके होने के कारण वाष्प उड़ नही पाती तथा सतह से टकराते हुए गतिशील अणु पुनः पानी बनकर जल में गिरते है। यह क्रिया संघनन कहलाती है।
इस प्रकार निरन्तर होती वाष्पीकरण व संघनन की क्रिया बराबर चलने लगती है अर्थात् साम्यता आ जाती है।

पृष्ठ तनाव- द्रव में कई प्रकार के अणु पाये जाते हैं। जब इसमें पाये जाने वाले एक ही प्रवृति वाले अणुओं के मध्य लगने वाले बल के कारण द्रव के पृष्ठ भाग(क्षेत्रफल) में सिकुड़न या तनाव पैदा होने लगता है। इस बल को ससंजक बल कहते है तथा इससे होने वाली सिकुड़न को पृष्ठ तनाव कहते है। साबुन के पानी में बनने वाले बुलबुले पृष्ठ तनाव का उदाहरण है।

पारिस्थितकी एवं पारितंत्र:

पारिस्थितिकी या इकोलॉजी से अर्थ हमारे चारों तरफ उपस्थित जीवों, प्राणियों, पौधे, एवं सूक्ष्म जीवों से है, जो पर्यावरण एवं वातावरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है| ये सभी जीव-जन्तु एवं पादप मिलकर जैविक इकाई के रूप में कार्य करते है एवं खाद्य श्रंखला का निर्माण करते है|

पारिस्थितिकी के अंतर्गत आने वाले अधिकांश जीव भोजन हेतु दूसरे जीवों पर आश्रित होते है, ये आपस में निवास स्थान बांटते है एवं अन्य क्रिया-कलापों हेतु दूसरे जीवों की सहायता लेते है|

पारिस्थितिकी या पारिस्थितिकी तन्त्र जीव विज्ञान के लिए अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसके अंतर्गत जीव जगत के आपसी सम्बन्धों एवं व्यवहार का गहनतापूर्वक अध्ययन किया जाता है|

इकोलॉजी जर्मन भाषा का शब्द है, जिसका सबसे पहले प्रयोग अर्नेस्ट हैकल ने अपनी बुक में किया, जो की स्वयं एक जर्मन वैज्ञानिक थे| इसमें उन्होंने जीवों के अध्ययन के साथ मानव पारिस्थितिकी की अवधारणा का भी प्रतिपादन किया, जिसमे मानव के पर्यावरण एवं इसमें रहने वाले जीवो एवं पादपो के साथ पारस्परिक सम्बन्ध को दर्शाया गया है|

मानव पारिस्थितिकी के अंतर्गत इस बात के तथ्य भी सामने आये कि मानव अन्य जीवों से कही अधिक पारिस्थितिकी तन्त्र को नुकसान पहुचाने की क्षमता रखता है, और उसने जाने-अनजाने ऐसा किया भी है| किन्तु कई बार उसने पारिस्थितिकी को बचाने हेतू उचित प्रयास भी किये है|

पारिस्थितिकी का अध्ययन केवल स्थल तक सीमित न रहकर सागर की गहराई तक भी जाता है, जहाँ जलीय जीवों का अध्ययन किया जाता है, खोजो के दौरान कई ऐसे जीवों का पता लगा जो बहुत कम ऑक्सीजन एवं समुंद्र की काफी गहराई में भी जिन्दा रहते है, किन्तु यह क्षेत्र अभी इतना विस्तृत नहीं हो पाया है|

पारिस्थितिकी तन्त्र या पारितंत्र:

पारिस्थितिकी तन्त्र या पारितंत्र एक ही शब्द के दो रूप है एवं दोनों का समान अर्थ है अर्थात पर्यावरण में विद्यमान सभी जीव-जंतुओं, पादपो, जलीय जीवों आदि का सामूहिक योगदान एवं उनके आपसी संबंधो को पारिस्थितिकी तन्त्र कहा जाता है|

इसके अंतर्गत पर्यावरण में उपस्थित प्रत्येक प्राणी वातावरण के अनुकूल बनने के लिए एक खास प्रणाली या तन्त्र का निर्माण करता है, जिससे वो अपने अस्तित्व को बनाये रख सके, और यह तन्त्र सदियों तक चलता रहता है|

इसी तन्त्र में जीव खाद्य जाल या खाद्य श्रृंखला का निर्माण करते है, जिसमे बड़े मांसाहारी जीव द्वारा छोटे जीवों को मारकर खाना एवं अन्य जीवों का अपने भरण-पोषण हेतू दूसरे साधनों या दूसरे जीवों पर निर्भर रहना आदि सम्मिलित है|

पारिस्थितिकी तन्त्र के घटक:

पारिस्थितिकी तन्त्र के प्रमुख रूप से दो घटक होते है:-

जैविक घटक:

जैविक घटकों में मनुष्य, सूक्ष्म जीव, वनस्पति समुदाय एवं सम्पूर्ण जन्तु समुदाय सम्मिलित है|

अजैविक घटक:

अजैविक घटकों में प्रकाश, ताप, आर्द्रता, मृदा, हवा, स्थलाकृति आदि सम्मिलित है|

पारिस्थितिकी तन्त्र की कुछ विशेषताएं:

# पारिस्थितिकी तन्त्र की सरंचना के लिए तीन महत्वपूर्ण संघटक जिम्मेवार होते है, प्रथम है, ऊर्जा संघटक, दूसरा है, बायोम एवं तीसरे स्थान पर है, अजैविक संघटक|

# पारिस्थितिकी तन्त्र सर्वदा गतिशील एवं कार्यशील इकाई है, जिसमे सभी जीवो के उनके वातावरण के साथ आपसी समन्वय एवं सामंजस्य का योगदान रहता है|

# पारिस्थितिकी तन्त्र धरातल पर एक विशेष क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हुआ नजर आता है|

#  पारिस्थितिकी तन्त्र के तीनो महत्वपूर्ण घटकों के मध्य विभिन्न क्रियाए एवं प्रतिक्रियाए सम्पन्न होती है, और ऐसा ही इसमें मौजूद जीवों के मध्य घटता है|

# पारिस्थितिकी तन्त्र को साधारण भाषा में खुला तन्त्र भी कहा जाता है, क्योकि यहाँ जीवों एवं पदार्थो का आवागमन लगा रहता है|

# पारिस्थितिकी तन्त्र स्थिर स्थिति में रहता हैं जब तक इसके आपसी कारको में अव्यवस्था प्रकट नहीं होती|

# पारिस्थितिकी तन्त्र एक व्यवस्थित एवं सुसंघठित सरंचना है, यदि इसके किसी एक घटक में अव्यवस्था उत्पन्न हो जाए तो दूसरा घटक उसकी भरपाई हेतू तत्पर रहता है, किन्तु यदि मानवीय क्रियाकलापों द्वारा अधिक नुकसान पहुचाया जाये तो भरपाई सम्भव नहीं होती जिससे पर्यावरण प्रदुषण जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती है|

पारिस्थितिकी तन्त्र के प्रकार:

आवासीय क्षेत्र के आधार पर पारिस्थितिकी तन्त्र का वर्गीकरण:

इस वर्गीकरण के अंतर्गत जीवो के निवास स्थान एवं वहा की विशेषताओं एवं समुदायों का निर्धारण किया जाता है| भौतिक क्षेत्रो में काफी विभिन्नताएं पाई जाती है, जो जैविक समुदाय को भी प्रभावित करती है| इसलिए इसे मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:-

पार्थिव या स्थलीय पारिस्थितिकी तन्त्र:

पार्थिव पारिस्थितिकी तन्त्र या स्थलीय पारिस्थितिकी तन्त्र में कई प्रकार की विभिन्नताए पाई जाती है, अत: इसके भी कई उपभाग किये गये है, जैसे- पर्वत पारिस्थितिकी तन्त्र, रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तन्त्र, निम्न स्थलीय पारिस्थितिकी तन्त्र, आदि|

जलीय पारिस्थितिकी तन्त्र:

जलीय पारिस्थितिकी तन्त्र को भी कई उपभागों में विभाजित किया गया है, जिससे उनके अध्ययन में आसानी हो सके| इसके अंतर्गत सर्वप्रथम ताजे जल का पारिस्थितिकी तन्त्र आता है, जिसमे नदी, झील, जलाशय, दलदल आदि का पारिस्थितिकी तन्त्र शामिल किया गया है| दूसरा जलीय पारिस्थितिकी तन्त्र सागरीय पारिस्थितिकी तन्त्र है, जिसमे समुंद्र में रहने वाले सभी प्राणियों का अध्ययन सम्मिलित किया गया है|

क्षेत्रीय माप के आधार पर पारिस्थितिकी तन्त्र का वर्गीकरण:

यदि सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तन्त्र का व्यापक रूप से आकलन किया जाए तो यह अति-व्यापक एवं वृहत क्षेत्र माना जायेगा| इसलिए क्षेत्रीय माप के द्वारा पारिस्थितिकी तन्त्र को दो भागों में विभक्त किया जाता है, जिसमे प्रथम है- महाद्वीपीय पारिस्थितिकी एवंम दूसरा है महासागरीय पारिस्थितिकी| अध्ययन की सुविधा हेतु एवं आवश्यकता के अनुसार क्षेत्रीय माप को और छोटा किया जा सकता है, जैसे- पर्वतीय पारिस्थितिकी, जलीय पारिस्थितिकी, मैदान पारिस्थितिकी, जीव पारिस्थितिकी आदि|

उपयोग के आधार पर पारिस्थितिकी तन्त्र का वर्गीकरण:

पारिस्थितिकी तन्त्र को अपने उपयोग के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है| जैसे ई.पी. ओडम ने, कृषि क्षेत्र में विभिन्न विधियों के आधार पर पारिस्थितिकी तन्त्र का दो भागों में विभाजन किया| जिनके नाम कृषित एवं अकृषित पारिस्थितिकी तन्त्र दिए|

कृषित के अंतर्गत फसलो के विभिन्न प्रकारों को अलग-अलग भागों में बांटा गया| जैसे गेहू पारिस्थितिकी तन्त्र, चारा पारिस्थितिकी तन्त्र| अकृषित पारिस्थितिकी तन्त्र में दलदल, क्षेत्र, घास एवं वन पारिस्थितिकी एवं बंजर जमीन पारिस्थितिकी तन्त्र को सम्मिलित किया गया है|

पारिस्थितिकी पिरामिड:

पारिस्थितिकी पिरामिड से अर्थ है, पारिस्थितिकी के अंतर्गत आने वाले समस्त जीवधारियो एवं पादपो के आपसी संबंधों एवं पौष्टिकता के आधार पर उनका अध्ययन करना| इसी प्रक्रिया को पारिस्थितिकी शंकु या पारिस्थितिकी पिरामिड भी कहा जाता है, इसका उद्देश्य जीव-विज्ञान के लिए पारिस्थितिकी तन्त्र के गहन खोजो को सरल बनाना एवं अधिक से अधिक जानकारी इकठा करना है|

इस प्रक्रिया में प्राणियों के पारिस्थितिकी सम्बन्धित आकड़ो को संख्या पिरामिड, बायोमास पिरामिड एवं ऊर्जा के पिरामिड के रूप में व्यक्त किया जाता है, जिससे यह ज्ञात किया जाता है, कि प्राणियों की जनसँख्या में कितनी बढ़ोतरी या घटत हुई है, इसके साथ ही ऊर्जा का कितनी मात्रा में व्यय हुआ है|

पारिस्थितिकी पिरामिड के प्रमुख प्रकार:-

पारिस्थितिकी पिरामिड को वैज्ञानिको ने मुख्य रूप से तीन भागों में विभक्त किया है, जो इस प्रकार है:-

जीव गणना या संख्या पिरामिड

पारिस्थितिकी या बायोमास पिरामिड

पारिस्थितिकी ऊर्जा कोण पिरामिड

पारिस्थितिकी तन्त्र के निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है, कि पारिस्थितिकी एवं पारितंत्र का हमारे जीवन एवं पर्यावरण में महत्वपूर्ण योगदान रहता है| इन जीवों का अध्ययन करना एवं समस्त सूचनाओं को एकत्र करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना की ये जीव-जन्तु एवं पौधे|

प्रकृति के प्रत्येक कार्य में एक लयबद्धता है, जिसमे सभी क्रियाकलाप निर्धारित होते है| सभी प्राणधारी जीव अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए अथक प्रयास करते है, किन्तु जीवित रहने हेतू दूसरे जीवों को मरना भी इसी पारिस्थितिकी तन्त्र का हिस्सा है| अत: मानव को अपने हानिकारक क्रियाओ से इसे हानि नहीं पहुचानी चाहिए|

पर्यावरण, प्रदूषण एवं इसके प्रभाव

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जल, वायु, वनस्पति, जीव-जन्तु, मिट्टी आदि मनुष्य के चारों ओर परिलक्षित है, इन्हीं से हम घिरे हुए हैं, यही पर्यावरण है। हमारे आस-पास की परिस्थितियां, प्रभाव व वस्तुस्थितियां ही पर्यावरण है। हमारा वातावरण ही पर्यावरण है। वातावरण में पाये जाने वाली सभी घटकों को पर्यावरण में सम्मिलित किया जाता है।

पर्यावरण एक व्यापक अभिव्यक्ति है। इसमें वे सभी कारक सम्मिलित किये गए हैं, जिनके बीच हम रह रहें हैं और जिनका मनुष्य जीवन के प्राकृतिक परिवेश पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव अवश्य पड़ता है।

यह भी माना जा सकता है कि यदि पर्यावरण स्वच्छ व शुद्ध है, तो सबका जीवन भी स्वस्थ व सुखी बना रहता है और इसी के विपरीत यदि पर्यावरण में अशुद्धता व संदूषण है, तो जीवन निर्वाह भी अस्वस्थ व कष्टकर बन सकता है।

पर्यावरण का दूषित होना ही पर्यावरण प्रदूषण है। पर्यावरण प्रदूषण के कुछ ऐसे कारण है जो प्राकृतिक है, जैसे सूखा, बाढ़, भूकम्प, लावा, सुनामी आदि से जब वनस्पति नष्ट होती है, जल स्त्रोत नष्ट होते है, जीव-जन्तुओं की मृत्यु होती है तथा बहुत सी बाधाएँ उत्पन्न होती है, जिससे मानव हानि होती है। इन सबका सारा दुष्प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है, जिससे पर्यावरण प्रदूषित होता है।

पर्यावरण प्रदूषण के कुछ कारण ऐसे भी हैं जो मानव निर्मित हैं, जैसे- जनसंख्या वृद्धि, गरीबी, शहरीकरण,
औद्योगिकिकरण, जन चेतना का अभाव, पर्यावरण शिक्षा का अभाव, ओज़ोन परत की क्षीणता, वन विनाश आदि।

जनसंख्या बढ़ने व गाँव के लोगो के शहरों में बस जाने से गाँव खत्म हो रहे है तथा शहरों का विकास हो रहा है। शहरों का विकास करने के लिए जंगलों की कटाई की जा रही है, जिससे वायु में अशुद्धता आ रही है। लोगो की बढ़ोतरी के साथ जरूरतें बढ़ने से औद्योगिक व्यवसाय, कारखाने भी बढ़ रहे है, जो जल, वायु व मृदा प्रदूषण के कारण पैदा कर रहे हैं। तो इस तरह से एक के साथ एक कड़ी जुड़ते हुए बहुत बड़ी श्रृंखला बनी हुई है, जिससे प्रदूषण फैलता जा रहा है। इस बारे में जितनी व्याख्या की जाए, उतनी कम होगी।

जिस प्रकार पर्यावरण के भिन्न-भिन्न अँग है, जैसे जल, वायु, मिटटी आदि; उसी प्रकार इनके आधार पर पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार भी भिन्न-भिन्न हैं-

वायु प्रदूषण

प्रकृति की स्वच्छ हवा के की गुणवत्ता में जब कमी आ जाती है तथा वायु अस्वच्छ व अशुद्ध हो जाती है तथा वायु में प्रदूषण के कण फैल जाते हैं, तो यह वायु प्रदूषण कहलाता है। ऐसी हवा में साँस लेने से यह फेफड़ों तक पहुँच कर शरीर को भी नुकसान पहुँचाती है।
वायु के दूषित होने के ये कारण हैं- वाहनों से निकलने वाली गैस, कारखानों व मिल से निकलने वाली विषैली गैस, पेड़ों के कटाव से अस्वच्छ होती वायु आदि।

जल प्रदूषण

किसी द्रव या गैस या ठोस पदार्थ से होने वाला जल का ऐसा संदूषण जिससे जल के भौतिक व जैविक गुणों में कमी आती है तथा जीवों व मनुष्यों के लिए ऐसा जल क्षतिकारक हो जाता है तथा सेवन के लायक नहीं रहता है, तो यह जल प्रदूषण कहलाता है।
नदी-नहरों में कचरा फेंकना, जन्तुओं के मृत शरीर को जल में प्रवाहित करना, कारखानों व खेतों से निकलने वाले रसायनों का नहरों-नदियों में मिलना आदि जल प्रदूषण के कारण हैं।

ध्वनि प्रदूषण

जिस आवाज या शोर या ध्वनि से मनुष्य में बेचैनी, अशान्ति व चिड़चिड़ापन पैदा होता है और जो सुनने में अप्रिय लगे, ऐसी स्थिति ही ध्वनि प्रदूषण कहलाती है।
ध्वनि प्रदूषण के कृत्रिम मानव जनित स्त्रोत हैं- उद्योग धंधे, मिल, वाहन, मनोरंजन के साधन जैसे स्पीकर, टी.वी. व डी.जे.और पूजा स्थल के उपकरण।
ध्वनि प्रदूषण के प्राकृतिक स्त्रोत हैं- बादलों की गर्जना, तूफ़ान, उच्च वेगयुक्त वायु, तीव्र वर्षा, ओला वृष्टि।

भूमि प्रदूषण

इसे मृदा प्रदूषण भी कहते हैं। जब मिट्टी में पाये जाने वाले प्राकृतिक गुण नष्ट हो जाते हैं तथा भूमि अनुपजाऊ होने लगती है, तो इसे भूमि प्रदूषण कहते हैं।
फसलों में प्रयोग किये जाने वाले रासायनिक खादों व कीटनाशकों, पॉलीथिन व ठोस अपशिष्ट पदार्थों के मिट्टी में मिल जाने से यह दूषित होती है। मृदा के संदूषण से फसलों की उपज पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

विकिरण (रेडियोएक्टिव) प्रदूषण

दुनिया में कहीं न कहीं अणु बम या परमाणु बम आदि के विस्फोट होते हैं या विस्फोट के प्रयोग होते हैं, जिससे इनसे निकलने वाली अत्यधिक हानिकारक रेडियोएक्टिव किरणें हमारे पर्यावरण को प्रदूषित करती है तथा ये रेडियोएक्टिव किरणें मनुष्यों व जीवों के लिए अत्यन्त हानिकारक होती हैं। रेडियोएक्टिव किरणों का प्रभाव कई दशकों तक बना रहता है।

ओज़ोन प्रदूषण

ओज़ोन हमारी रक्षक परत है। सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी का बचाव करने वाली ओज़ोन परत का क्षीण होना ही ओज़ोन प्रदूषण कहलाता है। ये किरणें यदि सीधी पृथ्वी पर पड़े तो नुकसानदायी होती हैं।
रेफ़्रिजरेटर व एयरकंडीशनर से निकलने वाली  गैसों का दुष्प्रभाव सीधे ओज़ोन परत पर पड़ता है। इससे ओज़ोन परत धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही हैं।

पर्यावरण प्रदूषण के कुछ प्राकृतिक व कृत्रिम कारणों जैसे ज्वालामुखी फटना, लावा निकलना, कारखानों व वाहनों से निकलने वाले रसायन वायुमण्डल में मिलकर सल्फ़र व नाइट्रोजन के यौगिक का निर्माण करते हैं।
सल्फ़र डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन वातावरण में मिलकर जल से क्रिया करके सल्फ्यूरिक व नाइट्रिक अम्ल का निर्माण करते हैं, फिर ये अम्ल पृथ्वी पर वर्षा के जरिये नीचे आते हैं, इसे अम्लीय वर्षा कहते हैं।
अम्लीय वर्षा से मृदा की गुणवत्ता में कमी आती है, पेड़-पौधे पीले पड़ने लगते हैं व जड़े सूखने लगती हैं, मनुष्यों में श्वसन व त्वचा सम्बन्धी रोग पैदा होते हैं।

प्रदूषण किसी भी प्रकार का हो, वह सभी पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शारीरिक या मानसिक प्रभाव डालता ही है। मनुष्य मानसिक या शारीरिक व्याधि से ग्रस्त हो जाता है। मानव, जीवों, पेड़-पौधों अर्थात् सजीवों पर पर्यावरण का सीधा प्रभाव पड़ता है।
यदि प्रदूषण पर नियंत्रण न हो तो न केवल पर्यावरण प्रदूषित होगा, अपितु जीवन भी दूषित होगा तथा सभी को इसके दुष्प्रभावों का सामना करना होगा, जिससे संकट की स्थिति पैदा होगी तथा दुर्दशा हो जाएगी।

पर्यावरण की सुरक्षा बनाये रखने के लिए सरकार द्वारा एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया, जिसके अन्तर्गत सन् 1986 में “पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986” पारित किया गया। यह अधिनियम 12 नवम्बर 1986 से प्रवर्तन में आया। इसका विस्तार जम्मू कश्मीर सहित पूरे भारत पर है।
इस अधिनियम के मुख्य उद्देश्य हैं- पर्यावरण प्रदूषण का निवारण करना, प्रदूषण का उपशमन करना, मनुष्यों व जीवों को प्रदूषण के दुष्प्रभावों से बचाना आदि।

पर्यावरण में होने वाले बदलावों व गतिविधियों की जानकारी पाने के लिए 1978-1979 में “पर्यावरण प्रभाव आकलन योजना” का आरम्भ हुआ।
स्वस्थ पर्यावरण हेतु बनाये गए सभी मानक व नियम का पालन करना, प्राकृतिक आपदाओं का अनुमान लगाना, भावी आपदाओं से होने वाली जोख़िमों को कम करना, प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग करना, जैव-विविधता बनाये रखना आदि लाभ इस योजना के अन्तर्गत सम्मिलित हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 में पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी प्रावधान दिए हैं। इसमें राज्य को पर्यावरण सुरक्षा के कर्तव्य सौंपे गए है  जिसमें यह लिखा गया है कि “राज्य; देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्द्धन का और वन व वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।
इसी के साथ संविधान के अनुच्छेद 51 में भारतीय नागरिकों का दायित्व व मूल कर्तव्य है कि “वे प्राकृतिक पर्यावरण जिसमें वन, झील, नदी व वन्य जीव हैं; की रक्षा करें और इनका संवर्द्धन करें तथा प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव रखें।”

प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वे पर्यावरण की रक्षा करें तथा स्वच्छता बनाये रखे, ताकि वह स्वयं भी एक शुद्ध वातावरण में स्वस्थ जीवन यापन कर सके। यदि स्वयं के जीवनशैली में सकारात्मकता चाहते हैं तो ऐसे हर सम्भव प्रयास किये जाए जिससे पर्यावरण में नकारात्मकता न आये।

जैव प्रौद्योगिकी

earth in hands

जैव प्रौद्योगीकी या बायोटेक्नोलॉजी, विज्ञानं के विस्तृत क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण अंग है| पिछले कई वर्षों में जैव प्रौद्योगीकी ने विकास के चरम शीर्षों को छुआ है तथा इसका मुख्य उदेश्य मानव जाति को सब तरफ से लाभ पहुचाना एवं राष्ट्र के विकास एवं उन्नति में योगदान करना है|

प्रौद्योगीकी का साधारण अर्थ तकनीक या आभियांत्रिकी से है, जिसके अंतर्गत जीवों के जीवन से सम्बन्धित डाटा या जानकारी एकत्रित की जाती है एवं उनसे जुडी हुई समस्याओं को समझने एवं सुलझाने का प्रयास किया जाता है|

सम्पूर्ण विश्व में इस विषय के सहज एवं गहन अध्ययन हेतु निकाय उपलब्ध होते है, किन्तु जिन संस्थानों में ये अलग से नहीं होते वहा इस विषय को जीव विज्ञानं अथवा रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग में रखा जाता है|

जैव प्रौद्योगीकी के प्रमुख खोज के क्षेत्र:

जैव प्रौद्योगीकी के मुख्य रूप से अनुसन्धान या वैज्ञानिक खोज के अंतर्गत तीन क्षेत्र निर्धारित किये गये है, जो इस प्रकार है;-

प्रथम क्षेत्र में सूक्ष्म जीवो द्वारा उत्प्रेरक को निर्मित करना, जैव प्रौद्योगीकी के क्षेत्र में आता है|

दूसरे क्षेत्र के अंतर्गत उत्तम तकनीक द्वारा श्रेष्ट परिस्थितियों का निर्माण करना, जिससे जीव मात्र का भला हो सके|

तीसरे क्षेत्र के अंतर्गत, विभिन्न तकनीको द्वारा प्रोटीन अथवा कार्बनिक यौगिक को शुद्ध करके उसे प्रयोग में लाना सम्मिलित है|

जैव प्रौद्योगीकी का उपयोग:

आधुनिक युग में जैव प्रौद्योगीकी का प्रयोग कृषि, चिकित्सा, पर्यावरण को लाभ पहुचाना, देश का विकास एवं मानव के लिए आवश्यक उत्पादों का निर्माण करना आदि में किया जाता है| यह मानव एवं पर्यावरण के साथ-साथ प्रकृति में मौजूद सूक्ष्म जीवों के लिए भी लाभकारी है| इसके द्वारा प्रदुषण को कम करके पारिस्थितकी तन्त्र में संतुलन एवं व्यवस्था कायम की जा सकती है| जैव प्रौद्योगीकी का उपयोग विभिन्न क्षेत्रो में किस प्रकार किया जाता है, उसका विस्तृत वर्णन इस प्रकार है:-

कृषि के क्षेत्र में जैव प्रौद्योगीकी:

खाद्य उत्पादन हेतु एवं बढती जनसंख्या की आपूर्ति हेतु तीन प्रकार से कृषि में बढ़ोतरी की जा सकती है, जैसे: रसायन के आधार पर कृषि करके, कार्बनिक खेती द्वारा एवं पूर्णत: फसल आधारित कृषि द्वारा|

हालांकि हरित क्रांति ने खाद्य उत्पाद की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है किन्तु जनसंख्या में तीव्रता से होती बढ़ोतरी उत्पादन की मांग को बढ़ा रही है| अत: कोई ऐसा तरीका या उपाय किया जाना अनिवार्य है जिससे इस समस्या का समाधान किया जा सके|

इसके अंतर्गत जैव प्रौद्योगीकी द्वारा इसे पादप, बैक्टीरिया, कवक आदि के जीनोम में परिवर्तन किये गये है, जिनसे लम्बे समय तक जीवित रहने वाली फसलों का निर्माण किया जा सके| महंगे रासायनिक कीटनाशको की जरूरत कम से कम पड़े एवं फसल की कटाई के बाद होने वाली हानि को कम करने में सहायता हो|

इसके साथ ही खाद्य उत्पादों की उर्वरता में अधिक से अधिक वृद्धि हो करना आदि बाते जैव प्रौद्योगीकी के कृषि के उपयोग के अंतर्गत आती है| इसके साथ ही क्षेत्रों में इसे पौधो को उगाना जो प्राक्रतिक पीडकनाशक एवं कीटनाशक का कार्य करने में सक्षम हो|

चिकित्सा के क्षेत्र में जैव प्रौद्योगीकी:

चिकित्सा के क्षेत्र के अंतर्गत जैव प्रौद्योगीकी द्वारा ऐसी औष्धियो का निर्माण करने का विचार है जिसमे जटिल रोगों का जड़ समेत निदान किया जा सके| जिस प्रकार मधुमेह से ग्रसित व्यक्तियों को इन्सुलिन लेना अत्यंत अनिवार्य होता है, किन्तु इस इन्सुलिन को पहले जानवरों द्वारा प्राप्त किया जाता था, जिस से कुछ मनुष्यों में इसकी प्रतिक्रिया देखी गई| अत: आर. डी.एन.ए. की तकनीक का प्रयोग करके इन्सुलिन उत्पादन किया जा सकता है, किन्तु इससे कुछ चुनोतिया भी जुडी हुई है|

जीन चिकित्सा:

बहुत सारे व्यक्ति आनुवंशिक रोगों के साथ पैदा होते है अत: इसे व्यक्तियों के इलाज के लिए जीन चिकित्सा प्रणाली सबसे कारगर एवं प्रभावी माध्यम है एवं जैव प्रौद्योगीकी ने इसमें अहम भूमिका अदा की है| इसके अंतर्गत इस प्रकार के रोग से ग्रसित शिशु का गर्भ में पता लगाकर उसमे सुधार की प्रक्रिया शुरू की जाती है|

इसमें जीन्स को ग्रसित व्यक्ति के उत्तको में प्रवेश करवाया जाता है| जीन प्रणाली का सर्वप्रथम प्रयोग 1990 ई. एडीए रोग के उपचार हेतु में किया गया था| जीन चिकित्सा द्वारा कोशिका में रूपांतरण करके सक्रिय एडीए का प्रवेश करवाया जाता है|

जीन चिकित्सा प्रणाली के अंतर्गत रोगी के खून से लसिका अणु को शरीर से बाहर निकला जाता है, इस लसिका अणु में सक्रिय अणु या एडीए के साथ मिलाकर पुन: शरीर में डाला जाता है| इस प्रक्रिया पर अभी भी शोध कार्य जारी है क्योकि यह इलाज पूरी तरह से रोग का नाश नहीं करता|

आणविक इलाज:

रोग का पूरा इलाज करने के लिए उस रोग के सम्बन्ध में सभी कारणों व प्रभावों का पता लगाया जाना आवश्यक है| कारण ज्ञात होने पर ही निवारण किया जा सकता है| जैव प्रौद्योगीकी के द्वारा जटिल रोगों के लक्षण ज्ञात होने पर उनका समय पर निदान किया जा सकता है अन्यथा लक्षणों के बढने एवं रोग के विकराल रूप धारण कर लेने पर इलाज करना असम्भव प्रतीत होता है|

भारत में जैव प्रौद्योगीकी विभाग:

भारत देश में जैव प्रौद्योगीकी विभाग की स्थापना सम्बन्धित कार्यक्रमों एवं योजनाओं के सुनियोजित क्रियान्वन एवं समन्वय हेतु की गयी थी| जैव प्रौद्योगीकी अथवा डी.बी.टी. विभाग, विज्ञानं और प्रौद्योगीकी मंत्रालय के अंतर्गत आता है|

इस विभाग का प्रमुख कार्य देश में स्थापित अनुसंधान शालाओ का सुचारू रूप से क्रियान्वयन, विश्वविद्यालय एवं जैव प्रौद्योगीकी से सम्बन्धित प्रयोग शालाओं के अनुदान आदि की व्यवस्था करना आदि सम्मिलित है| इसके साथ ही जैव प्रौद्योगीकी निकाय के मुख्य कार्य एवं जिम्मेदारियां इस प्रकार है:-

# जैव प्रौद्योगीकी का अधिक से अधिक प्रयोग करने हेतु एवं इसके सदुपयोग को प्रोत्साहन देना|

# जैव प्रौद्योगीकी से जुड़े हुए सभी क्षेत्रों एवं प्रयोगशालाओ के विकास के लिए विभिन्न केन्द्रों की स्थापना करना|

# अनुसन्धान एवं जैव प्रौद्योगीकी के विचार को आगे बढ़ाने हेतु मूल सुविधाओ को उपलब्ध करवाना|

# जैव प्रौद्योगीकी से सम्बन्धित उत्पादों के आयात हेतु सरकार के साथ मिलकर इसके कार्यकर्ता के रूप में कार्य करना|

# विभिन्न अनुप्रयोगों एवं खोज आदि के लिए दिशा-निर्देश जारी करना एवं उनके देश में लागू होने के लिए सहयोग करना|

# मानव संसाधन एवं विकास से सम्बन्धित कार्यक्रमों के लिए पहल करना|

# जैव प्रौद्योगीकी के क्षेत्र को विकसित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करने की चेष्टा करना|

# जैव प्रौद्योगीकी के लिए नोडल एजेंसी के समान कार्य करना जिससे सूचनाओं का भली प्रकार से प्रचार व् प्रसार किया जा सके|

राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगीकी एवं विकास नीति की स्थापना:

पिछले कुछ वर्षों से सरकार एवं वैज्ञानिको द्वारा जैव प्रौद्योगीकी के क्षेत्र में अद्भुत एवं सकारात्मक परिणाम सामने आये है जिसे मद्दे नजर रखते हुए सरकार ने वर्ष 2007 से राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगीकी एवं विकास नीति को पूर्ण रूप से अपनी स्वीकृति प्रदान की है|

यह नीति सरकार ने जैव प्रौद्योगीकी से सम्बन्धित मंत्रालय, विभिन्न विभागों एवं गैर-सरकारी एवं सरकारी संघटनो के साथ करीब २ वर्ष तक गहन मनन एवं विमर्श करने के बाद जारी की है|

इस योजना का मुख्य उद्देश्य जैव प्रौद्योगीकी से जुड़े हुए हर प्रकार के विकास एवं परिणामो का ब्यौरा रखना, अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में जैव प्रौद्योगीकी की भागीदारी को बढ़ावा देना, अन्य देशो में इससे सम्बन्धित जानकारी को फ़ैलाने हेतु अनुवाद की सहायता लेना, जैव प्रौद्योगीकी क्षेत्र के अंतर्गत अनेक छात्रवृत्तियां एवं उच्च स्तर पर पी.एच.डी. एवं शोध कार्यों की नीव रखना एवं उनका क्रियानावंन करना, चिकित्सा, कृषि एवं अन्य क्षेत्रो के विकास हेतु नयी संस्थाओं की स्थापना करना एवं समय-समय पर उनमे बदलाव करना, जैव प्रौद्योगीकी से होने वाली आय का कुछ प्रतिशत भाग कार्यक्रमों के चालन हेतु सुरक्षित रखना आदि मुख्य बाते सम्मिलित की गई है|