कैसे बनता है ज्वालामुखी एवं कैसे होता है, उनमे विस्फोट? Volcano in Hindi

क्या है ज्वालामुखी (volcano)?

पृथ्वी की सतह पर पहाड़ के रूप में उपस्थित आकृति को ज्वालामुखी कहा जाता है, जिसमे अत्यंत ऊर्जा का समावेश होता है एवं इसके ऊपरी सतह पर एक मुख के जैसे दरार पाई जाती है, एवं सक्रिय होने पर इससे गर्म लावा भीषण अग्नि के रूप में बाहर निकलता है|

हर साल ज्वालामुखी में होने वाले विस्फोट भयंकर तबाही का रूप ले लेते है एवं आसपास रहने वालो के लिए परेशानी का कारण बनते है| आज हम यहाँ ज्वालामुखी के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी का विस्तारपूर्वक वर्णन करेंगे जिससे आप इसके बारे में गहराई से जान पाएंगे|

कैसे बनता है ज्वालामुखी पर्वत?

पृथ्वी की निचली परत में बहुत अधिक मात्रा में जियोथर्मल ऊर्जा दबी हुई अवस्था में मौजूद रहती है, किन्तु समय आने पर यह ऊर्जा विस्फोट के रूप में बाहर निकलती है जिससे पहाड़ का मुख बनता है एवं यह फट जाता है|

ज्वालामुखी अंतर्जनित गतिविधि है, यदि विस्फोट थोडा कम या हल्का होगा तो वहां पठार का निर्माण होगा और यदि विस्फोट भारी हुआ तो ऊँचे पहाड़ों का निर्माण होता है|

मैग्मा एवं लावा:

पृथ्वी की सतह के नीचे पिघले हुए पत्थर एवं गैसों के मिश्रण को मैग्मा कहा जाता है, एवं जब यह मैग्मा विस्फोट के द्वारा ज्वालामुखी से बाहर निकलता है तो इसे लावा कहते है|

अधिकांशत: मैग्मा पृथ्वी की सबसे कमजोर परत Asthenosphere में पाया जाता है| मैग्मा के ज्वालामुखी से बाहर आने पर इसके साथ गर्म राख एवं विषैली गैसे निकलती है| कई बार जमीन विस्फोट के कारण जोर से हिलती है जिससे भूस्खलन हो जाता है एवं बाढ़ जैसे हालात बन जाते है|

ज्वालामुखी के प्रकार:

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पृथ्वी का अधिकतर भू भाग ज्वालामुखी से निकले लावे के जमने से निर्मित हुआ है| इससे निकलने वाली गैसों से वायुमंडल बना एवं समुंद्र तलों का निर्माण हुआ|

ज्वालामुखी की सक्रियता एवं अन्य पहलुओं के आधार पर इसे चार भागों में विभाजित किया गया है, जो इस प्रकार है:-

शील्ड ज्वालामुखी (shield Volcano):

इस श्रेणी के ज्वालामुखी आग्नेय पत्थर या बेसाल्ट से बनकर निर्मित होते है एवं बाद में ऊष्मा के कारण द्रव्य के रूप में परिवर्तित हो जाते है| इनका विस्तार दूर तक फैला होता है किन्तु ढलान में कम होते है|

इनमे frozen या जमा हुआ लावा पाया जाता है एवं हवाई द्वीपों पर अधिकतर इनका निर्माण होता है| विस्फोट के दौरान गर्म लावा बहुत दूर तक एवं बहुत ऊंचाई तक उछलता है|

राख या शंकु ज्वालामुखी (Cinder Cone):

इस प्रकार के ज्वालामुखी के भीतर ज्वलनशील प्रव्रति के छोटे-छोटे आकार के पत्थर पाए जाते है| इनकी ढलान काफी तीव्र होती है, एवं राख की मात्रा भी अधिक पाई जाती है|

इस प्रकार के ज्वालामुखी का आकार छोटा होता है एवं यह भयंकर उत्पात नहीं मचाते|

संयुक्त ज्वालामुखी (Composite Volcano):

इस प्रकार के ज्वालामुखी की ढलान मध्यम होती है एवं इनमे ऊपर की तरफ गड्डे पाए जाते है| इनके अंदर रेत, पत्थर, बजरी अभी मिश्रित मात्रा में पाए जाते है इसलिए इसे संयुक्त ज्वालामुखी कहा जाता है|

जब इनमे विस्फोट होता है तो ये पदार्थ बाहर आते है एवं ठोस होकर विभिन्न परतो के रूप में आसपास जम जाते है|

caldera ज्वालामुखी:

इस श्रेणी के ज्वालामुखी सबसे ज्यादा खतरनाक एवं विस्फोटक माने जाते है| जब इनमे विस्फोट होता है तो इनका मैग्मा चैम्बर का आकार काफी अधिक होता है| ये किसी सरंचना का निर्माण नहीं करते बल्कि विस्फोट के बाद एक ही जगह पर ढेर हो जाते है|

प्रशांत महासागर के चारों ओर ज्वालामुखी एक श्रंखला के रूप में विद्यमान है जिसे ‘रिंग ऑफ़ द फायर’ कहा जाता है|

ज्वालामुखी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य:

# अब तक दुनिया में 500 से अधिक ज्वालामुखी सक्रिय अवस्था में है जिसमे से अधिकांश हवाई द्वीप में स्थित है जिसमे से सबसे खतरनाक ज्वालामुखी मौना किया एवं मौना लोया है|

# दुनिया के कई इलाकों में ज्वालामुखी की पूजा की जाती है जिससे वह शांत रहे एवं कम से कम तबाही मचाये|

# ज्वालामुखी विस्फोट की तीव्रता का पता लगाने के लिए इंडेक्स का अविष्कार 1982 में कर लिया गया था जिसके अंतर्गत 0 से 8 तक का स्केल रखा गया जिसमे 2 स्केल तक का विस्फोट साधारण होता है किन्तु 3 का स्केल घातक माना जाता है|

# 4 से 5 स्केल के विस्फोट दशको में 1 बार होते है एवं 7 या 8 स्केल के विस्फोट से भयंकर तबाही होती है एवं सुनामी आ जाती है|

# ज्वालामुखी से कई प्रकार के कीमती धातु निकलते है जिन्हें बाद में एकत्रित कर लिया जाता है|

# भारत का एवं एशिया का सक्रिय ज्वालामुखी अंडमान निकोबार पर उपस्थित बैरन द्वीप पर स्थित है, जो 2005 में सक्रिय हुआ था|

# कई ज्वालामुखी सुप्त अवस्था में होते है जिनमे कभी विस्फोट नहीं होता किन्तु ये कभी भी जाग सकते है|

# विश्व का अब तक का सबसे ऊँचा एवं सक्रिय ज्वालामुखी ‘ओजस-डेल-सलाडो’ है, जो अर्जेंटीना में उपस्थित है एवं सबसे शांत रहने वाला ज्वालामुखी एकाकगुआ है|

वायुमण्डल में पायी जाने वाली गैसें Gases in atmosphere in Hindi

हमारे चारों ओर जहाँ तक वायु (गैसों) का अस्तित्व बना रहता है, वह वायुमण्डल कहलाता है।

इसमें तरह-तरह की गैसें पायी जाती है। गैसों की भिन्नता के कारण इनकी भूमिका में भी भिन्नता पायी जाती है। हर एक गैस अपना अलग योगदान प्रदान करती है। वायुमण्डल में लगभग 11 प्रकार की गैसें मौजूद रहती है। इनमे से कुछ गैसें सक्रिय रूप से निश्चित मात्रा में पायी जाती है, जिनमें नाइट्रोजन, ऑक्सीजन व कार्बनडाई ऑक्साइड को शामिल किया गया है। इनके अतिरिक्त विद्यमान सभी गैसें असक्रिय रूप से वायुमण्डल में मौजूद रहती हैं।

नाइट्रोजन- वायुमण्डल में 78.09% की निश्चित व सर्वाधिक मात्रा में नाइट्रोजन पायी जाती है।

ऑक्सीजन- ऑक्सीजन गैस नाइट्रोजन से काफी कम मात्रा में वायुमण्डल में उपस्थित होती है। यह 20.95% मात्रा में पायी जाती है। यह प्राणवायु है अर्थात् श्वास लेने में सहयोगी है।

कार्बनडाई ऑक्साइड- यह गैस वायुमण्डल में 0.03% तक की निश्चित मात्रा में होती है। यह ग्रीन हाऊस एफेक्ट (हरित गृह प्रभाव) की मुख्य कारक गैस है।

उपर्युक्त सक्रिय गैसों के अलावा असक्रिय रूप में ऑर्गन गैस वायुमण्डल में 0.93% तक की मात्रा में पायी जाती है। यह सक्रिय गैस नही है और अक्रिय गैस के रूप में यह सबसे अधिक मात्रा में पायी जाने वाली गैस है। 

निऑन लगभग 0.0018% तक, हाइड्रोजन गैस 0.001% मात्रा में, हीलियम 0.000524% तक, क्रिप्टन वायुमण्डल में 0.0001% मात्रा में, जेनॉन गैस वायुमण्डल में 0.000008% मात्रा में तथा ओज़ोन गैस वायुमण्डल में 0.000001% तक पायी जाती है, जो कि तापमान में वृद्धि करने में सहायक होती है और मेथेन गैस अत्यन्त अल्प मात्रा में वायुमण्डल में पायी जाती है।

इन गैसों के अलावा वायुमण्डल में 5% जलवाष्प भी पायी जाती है। मानो तो वाष्प भी गैस का ही एक रूप है। जलवाष्प वायुमण्डल में पाया जाने वाला स्थायी तत्व है। समुन्द्र, जल स्त्रोत व वनस्पतियों आदि से वायुमण्डल में जलवाष्प की पूर्ति होती है। वायुमण्डल में जलवाष्प की मौजूदगी अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि ओलावृष्टि, ओंस, पाला, बरसात, बादल बनना आदि प्राकृतिक क्रियाओं के संचालन में पूर्ण सहयोग जलवाष्प का ही होता है|

जैव प्रौद्योगिकी

earth in hands

जैव प्रौद्योगीकी या बायोटेक्नोलॉजी, विज्ञानं के विस्तृत क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण अंग है| पिछले कई वर्षों में जैव प्रौद्योगीकी ने विकास के चरम शीर्षों को छुआ है तथा इसका मुख्य उदेश्य मानव जाति को सब तरफ से लाभ पहुचाना एवं राष्ट्र के विकास एवं उन्नति में योगदान करना है|

प्रौद्योगीकी का साधारण अर्थ तकनीक या आभियांत्रिकी से है, जिसके अंतर्गत जीवों के जीवन से सम्बन्धित डाटा या जानकारी एकत्रित की जाती है एवं उनसे जुडी हुई समस्याओं को समझने एवं सुलझाने का प्रयास किया जाता है|

सम्पूर्ण विश्व में इस विषय के सहज एवं गहन अध्ययन हेतु निकाय उपलब्ध होते है, किन्तु जिन संस्थानों में ये अलग से नहीं होते वहा इस विषय को जीव विज्ञानं अथवा रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग में रखा जाता है|

जैव प्रौद्योगीकी के प्रमुख खोज के क्षेत्र:

जैव प्रौद्योगीकी के मुख्य रूप से अनुसन्धान या वैज्ञानिक खोज के अंतर्गत तीन क्षेत्र निर्धारित किये गये है, जो इस प्रकार है;-

प्रथम क्षेत्र में सूक्ष्म जीवो द्वारा उत्प्रेरक को निर्मित करना, जैव प्रौद्योगीकी के क्षेत्र में आता है|

दूसरे क्षेत्र के अंतर्गत उत्तम तकनीक द्वारा श्रेष्ट परिस्थितियों का निर्माण करना, जिससे जीव मात्र का भला हो सके|

तीसरे क्षेत्र के अंतर्गत, विभिन्न तकनीको द्वारा प्रोटीन अथवा कार्बनिक यौगिक को शुद्ध करके उसे प्रयोग में लाना सम्मिलित है|

जैव प्रौद्योगीकी का उपयोग:

आधुनिक युग में जैव प्रौद्योगीकी का प्रयोग कृषि, चिकित्सा, पर्यावरण को लाभ पहुचाना, देश का विकास एवं मानव के लिए आवश्यक उत्पादों का निर्माण करना आदि में किया जाता है| यह मानव एवं पर्यावरण के साथ-साथ प्रकृति में मौजूद सूक्ष्म जीवों के लिए भी लाभकारी है| इसके द्वारा प्रदुषण को कम करके पारिस्थितकी तन्त्र में संतुलन एवं व्यवस्था कायम की जा सकती है| जैव प्रौद्योगीकी का उपयोग विभिन्न क्षेत्रो में किस प्रकार किया जाता है, उसका विस्तृत वर्णन इस प्रकार है:-

कृषि के क्षेत्र में जैव प्रौद्योगीकी:

खाद्य उत्पादन हेतु एवं बढती जनसंख्या की आपूर्ति हेतु तीन प्रकार से कृषि में बढ़ोतरी की जा सकती है, जैसे: रसायन के आधार पर कृषि करके, कार्बनिक खेती द्वारा एवं पूर्णत: फसल आधारित कृषि द्वारा|

हालांकि हरित क्रांति ने खाद्य उत्पाद की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है किन्तु जनसंख्या में तीव्रता से होती बढ़ोतरी उत्पादन की मांग को बढ़ा रही है| अत: कोई ऐसा तरीका या उपाय किया जाना अनिवार्य है जिससे इस समस्या का समाधान किया जा सके|

इसके अंतर्गत जैव प्रौद्योगीकी द्वारा इसे पादप, बैक्टीरिया, कवक आदि के जीनोम में परिवर्तन किये गये है, जिनसे लम्बे समय तक जीवित रहने वाली फसलों का निर्माण किया जा सके| महंगे रासायनिक कीटनाशको की जरूरत कम से कम पड़े एवं फसल की कटाई के बाद होने वाली हानि को कम करने में सहायता हो|

इसके साथ ही खाद्य उत्पादों की उर्वरता में अधिक से अधिक वृद्धि हो करना आदि बाते जैव प्रौद्योगीकी के कृषि के उपयोग के अंतर्गत आती है| इसके साथ ही क्षेत्रों में इसे पौधो को उगाना जो प्राक्रतिक पीडकनाशक एवं कीटनाशक का कार्य करने में सक्षम हो|

चिकित्सा के क्षेत्र में जैव प्रौद्योगीकी:

चिकित्सा के क्षेत्र के अंतर्गत जैव प्रौद्योगीकी द्वारा ऐसी औष्धियो का निर्माण करने का विचार है जिसमे जटिल रोगों का जड़ समेत निदान किया जा सके| जिस प्रकार मधुमेह से ग्रसित व्यक्तियों को इन्सुलिन लेना अत्यंत अनिवार्य होता है, किन्तु इस इन्सुलिन को पहले जानवरों द्वारा प्राप्त किया जाता था, जिस से कुछ मनुष्यों में इसकी प्रतिक्रिया देखी गई| अत: आर. डी.एन.ए. की तकनीक का प्रयोग करके इन्सुलिन उत्पादन किया जा सकता है, किन्तु इससे कुछ चुनोतिया भी जुडी हुई है|

जीन चिकित्सा:

बहुत सारे व्यक्ति आनुवंशिक रोगों के साथ पैदा होते है अत: इसे व्यक्तियों के इलाज के लिए जीन चिकित्सा प्रणाली सबसे कारगर एवं प्रभावी माध्यम है एवं जैव प्रौद्योगीकी ने इसमें अहम भूमिका अदा की है| इसके अंतर्गत इस प्रकार के रोग से ग्रसित शिशु का गर्भ में पता लगाकर उसमे सुधार की प्रक्रिया शुरू की जाती है|

इसमें जीन्स को ग्रसित व्यक्ति के उत्तको में प्रवेश करवाया जाता है| जीन प्रणाली का सर्वप्रथम प्रयोग 1990 ई. एडीए रोग के उपचार हेतु में किया गया था| जीन चिकित्सा द्वारा कोशिका में रूपांतरण करके सक्रिय एडीए का प्रवेश करवाया जाता है|

जीन चिकित्सा प्रणाली के अंतर्गत रोगी के खून से लसिका अणु को शरीर से बाहर निकला जाता है, इस लसिका अणु में सक्रिय अणु या एडीए के साथ मिलाकर पुन: शरीर में डाला जाता है| इस प्रक्रिया पर अभी भी शोध कार्य जारी है क्योकि यह इलाज पूरी तरह से रोग का नाश नहीं करता|

आणविक इलाज:

रोग का पूरा इलाज करने के लिए उस रोग के सम्बन्ध में सभी कारणों व प्रभावों का पता लगाया जाना आवश्यक है| कारण ज्ञात होने पर ही निवारण किया जा सकता है| जैव प्रौद्योगीकी के द्वारा जटिल रोगों के लक्षण ज्ञात होने पर उनका समय पर निदान किया जा सकता है अन्यथा लक्षणों के बढने एवं रोग के विकराल रूप धारण कर लेने पर इलाज करना असम्भव प्रतीत होता है|

भारत में जैव प्रौद्योगीकी विभाग:

भारत देश में जैव प्रौद्योगीकी विभाग की स्थापना सम्बन्धित कार्यक्रमों एवं योजनाओं के सुनियोजित क्रियान्वन एवं समन्वय हेतु की गयी थी| जैव प्रौद्योगीकी अथवा डी.बी.टी. विभाग, विज्ञानं और प्रौद्योगीकी मंत्रालय के अंतर्गत आता है|

इस विभाग का प्रमुख कार्य देश में स्थापित अनुसंधान शालाओ का सुचारू रूप से क्रियान्वयन, विश्वविद्यालय एवं जैव प्रौद्योगीकी से सम्बन्धित प्रयोग शालाओं के अनुदान आदि की व्यवस्था करना आदि सम्मिलित है| इसके साथ ही जैव प्रौद्योगीकी निकाय के मुख्य कार्य एवं जिम्मेदारियां इस प्रकार है:-

# जैव प्रौद्योगीकी का अधिक से अधिक प्रयोग करने हेतु एवं इसके सदुपयोग को प्रोत्साहन देना|

# जैव प्रौद्योगीकी से जुड़े हुए सभी क्षेत्रों एवं प्रयोगशालाओ के विकास के लिए विभिन्न केन्द्रों की स्थापना करना|

# अनुसन्धान एवं जैव प्रौद्योगीकी के विचार को आगे बढ़ाने हेतु मूल सुविधाओ को उपलब्ध करवाना|

# जैव प्रौद्योगीकी से सम्बन्धित उत्पादों के आयात हेतु सरकार के साथ मिलकर इसके कार्यकर्ता के रूप में कार्य करना|

# विभिन्न अनुप्रयोगों एवं खोज आदि के लिए दिशा-निर्देश जारी करना एवं उनके देश में लागू होने के लिए सहयोग करना|

# मानव संसाधन एवं विकास से सम्बन्धित कार्यक्रमों के लिए पहल करना|

# जैव प्रौद्योगीकी के क्षेत्र को विकसित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करने की चेष्टा करना|

# जैव प्रौद्योगीकी के लिए नोडल एजेंसी के समान कार्य करना जिससे सूचनाओं का भली प्रकार से प्रचार व् प्रसार किया जा सके|

राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगीकी एवं विकास नीति की स्थापना:

पिछले कुछ वर्षों से सरकार एवं वैज्ञानिको द्वारा जैव प्रौद्योगीकी के क्षेत्र में अद्भुत एवं सकारात्मक परिणाम सामने आये है जिसे मद्दे नजर रखते हुए सरकार ने वर्ष 2007 से राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगीकी एवं विकास नीति को पूर्ण रूप से अपनी स्वीकृति प्रदान की है|

यह नीति सरकार ने जैव प्रौद्योगीकी से सम्बन्धित मंत्रालय, विभिन्न विभागों एवं गैर-सरकारी एवं सरकारी संघटनो के साथ करीब २ वर्ष तक गहन मनन एवं विमर्श करने के बाद जारी की है|

इस योजना का मुख्य उद्देश्य जैव प्रौद्योगीकी से जुड़े हुए हर प्रकार के विकास एवं परिणामो का ब्यौरा रखना, अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में जैव प्रौद्योगीकी की भागीदारी को बढ़ावा देना, अन्य देशो में इससे सम्बन्धित जानकारी को फ़ैलाने हेतु अनुवाद की सहायता लेना, जैव प्रौद्योगीकी क्षेत्र के अंतर्गत अनेक छात्रवृत्तियां एवं उच्च स्तर पर पी.एच.डी. एवं शोध कार्यों की नीव रखना एवं उनका क्रियानावंन करना, चिकित्सा, कृषि एवं अन्य क्षेत्रो के विकास हेतु नयी संस्थाओं की स्थापना करना एवं समय-समय पर उनमे बदलाव करना, जैव प्रौद्योगीकी से होने वाली आय का कुछ प्रतिशत भाग कार्यक्रमों के चालन हेतु सुरक्षित रखना आदि मुख्य बाते सम्मिलित की गई है|

महाद्वीप किसे कहते है, प्रकार ?

world map

पृथ्वी के भू भाग को घेरने वाली सबसे बड़ी इकाई या क्षेत्र को महाद्वीप कहा जाता है| मुख्य रूप से पृथ्वी पर उपस्थित स्थल की इकाई को या महाद्वीपों को 7 भागों में विभक्त किया गया है, जिसमे एशिया महाद्वीप को सबसे बड़ा एवं ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप को सबसे छोटा माना गया है, सभी महाद्वीपों का विवरण इस प्रकार है:-

एशिया:

एशिया महाद्वीप पृथ्वी का सबसे विशाल एवं सर्वाधिक जनसंख्या महाद्वीप है जो सम्पूर्ण पृथ्वी के ३०% भाग को घेरे हुए है| यहाँ संसार की ६०% आबादी निवास करती है, जिसमे सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश चीन एवं उसके बाद भारत है|

एशिया महाद्वीप में ही विश्व की सर्वोच्च पर्वत श्रंखला विद्यमान है जिसे हिमालय पर्वतमाला कहा जाता है| एशिया महाद्वीप में विश्व की सबसे गहरी झील बैकाल झील एवं सबसे लम्बी झील कैस्पियन सागर स्थित है|

अफ्रीका:

अफ्रीका, एशिया के बाद आने वाला विश्व का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है जो जिब्राल्टर नदी से यूरोप महाद्वीप से विभक्त होता है| यहाँ विश्व का सबसे गर्म माना जाने वाला स्थान अल-अजीजीयह उपस्थित है जो लीबिया में स्थित है| अफ्रीका में कई प्रकार की आदिम जातिया एवं जनजातिया निवास करती है तथा यहा उष्ण घास के मैदान एबम शीतोषण घास के मैदान पाए जाते है जिसे सवाना व् वेल्ड कहा जाता है|

अफ्रीका का सहारा मरुस्थल विश्व का सबसे बड़ा रेगिस्तान है| अफ्रीका को पिछड़ा हुआ महाद्वीप माना जाता है, क्योकि यहाँ अभी इतना विकास नहीं हुआ है|

उत्तरी अमेरिका:

उत्तरी अमेरिका संसार का तीसरा सबसे बड़ा महाद्वीप माना जाता है जिसका क्षेत्रफल २,४२,५५,००० वर्ग किमी है एवं जिसके अन्तर्गत २६ देश आते है| इस महाद्वीप की खोज कोलम्बस द्वारा १४९२ ई. में की गयी थी| उत्तरी अमेरिका का सर्वोच्च शिखर माउंट मैकिन्ले है जो ६१९४ मी. ऊँचा है एवं अलास्का में स्थित है|

इस महाद्वीप में विश्व के सबसे बड़ी ताजे पानी की झील सुपीरियर झील उपस्थित है| विश्व में सर्वाधिक सोयाबीन एवं मक्का उत्पादित करने वाला देश संयुक्त राज्य अमेरिका माना जाता है, जो यहाँ इस महाद्वीप की शान है|

दक्षिणी अमेरिका:

विश्व का चौथा सबसे बड़ा महाद्वीप दक्षिणी अमेरिका को माना गया है, जिसका क्षेत्रफल १,७७,९८,५०० वर्ग किलोमीटर है एवं जिसके अंतर्गत १५ देश आते है| यहाँ पर विश्व की सबसे ऊँची झील टीटीकाका उपस्थित है,जिसकी ऊंचाई ३८११ मी. है| इस महाद्वीप के चिली-अर्जेंटीना में विश्व का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी ओजेस-डेल-सलादो स्थित है जो ६८६८ मी. ऊँचा है|

इस महाद्वीप का सबसे विशाल शहर रियो-डी-जेनेरो है, जो ब्राज़ील में उपस्थित है| ब्राज़ील विश्व का सर्वाधिक कोको उत्पादन करने वाला देश माना गया है| ब्राज़ील विश्व का तीसरे स्थान पर मैगनीज उत्पादन करता है|

अन्टार्कटिका:

पांचवा सबसे बड़ा महाद्वीप होने के साथ-साथ यह सबसे शुष्क एवं ठंडा महाद्वीप है| इसका ९८% भाग बर्फ से घिरा हुआ है, यह महाद्वीप १४,०००,००० वर्ग किमी. में फैला हुया है एवं मानव जाति का निवास यहाँ न के बराबर है|

यूरोप:

ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के बाद यूरोप महाद्वीप सबसे छोटा कहा जाने वाला महाद्वीप है| काकेशश पर्वतमाला यूरोप महाद्वीप को एशिया महाद्वीप से पृथक करती है| यूरोप महाद्वीप में ४६ देश विद्यमान है| यूरोप महाद्वीप का सबसे ऊँचा शिखर एलबुर्ज पर्वत है, जो रूस में स्थित है एवं ५६४२ मी. ऊँचा है|

यूरोप महाद्वीप का सबसे बड़ा शहर लंदन है, जो थेम्स नदी के किनारे बसा हुआ है| इसके साथ-साथ यहाँ फ्रांस, इटली, स्विट्ज़रलैंड, नीदरलैंड, फ़िनलैंड एवं यूक्रेन आदि देश एवं नगर सम्मिलित है|

ऑस्ट्रेलिया:

सबसे छोटा कहा जाने वाला यह महाद्वीप प्राक्रतिक सुदंरता के लिए जाना जाता है, जिसमे २२ देश विद्यमान है एवं जो ८,६००,००० वर्ग किमी पर फैला हुआ है,जो पृथ्वी के कुल भू भाग का ५.७ % है| इस महाद्वीप का सर्वोच्च शिखर कोस्युसको है जो २२२८ मी. ऊँचा है|

भारत के ज्वालामुखी

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ज्वालामुखी से अर्थ धरती पर उपस्थित ऐसी दरार या छेद से होता है, जिसमे से लावा(अत्यधिक गर्म पदार्थ), जहरीली गैसे, विभिन्न धातु एवं राख व् धुआं निकलता रहता है| ज्वालामुखी के ऊपर मिटटी, पत्थर आदि के जमाव या उठाव को ज्वालामुखी पर्वत कहा जाता है|

सम्पूर्ण विश्व में कई खतरनाक एवं सक्रिय ज्वालामुखी विद्यमान है, जो कुछ वर्षो बाद जब सक्रिय होते है, तो भयंकर तबाही मचाते है, जिसमे जन-धन की अत्यधिक हानि होती है| ज्वालामुखी के कई प्रकार होते है, जैसे सुप्त ज्वालामुखी, मृत ज्वालामुखी, सक्रिय या निष्क्रिय ज्वालामुखी आदि|

यहाँ हम भारत के ज्वालामुखी के बारे में चर्चा करेंगे| मुख्य रूप से, भारत में दो ज्वालामुखी स्थित है, जो अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में पाए जाते है, जिसमे से एक सक्रिय अवस्था में है तथा दूसरा निष्क्रिय या सुप्त अवस्था में है| भारत के दो प्रमुख ज्वालामुखी के नाम इस प्रकार है:-

बैरन द्वीप ज्वालामुखी:-

बैरन द्वीप ज्वालामुखी इंडिया का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी है, जो की बैरन द्वीप पर उपस्थित है एवं ३ किमी क्षेत्र में फैला हुआ है| भारत के साथ-साथ यह दक्षिण एशिया का भी एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी है|

साधारण भाषा में बैरन शब्द का अर्थ होता है, बिलकुल बंजर| बैरन द्वीपसमूह ज्वालामुखी के आसपास का इलाका इसी तरह का है, इसलिए इसे यह नाम दिया गया है|

बैरन द्वीप ज्वालामुखी में सबसे पहला विस्फोट १७८७ को रिकॉर्ड किया गया, उसके बाद से इसमें बहुत बार विस्फोट हो चुके है| सबसे तत्कालीन विस्फोट २८ मई २००५ को रिकॉर्ड किया गया था, तथा तबसे यह ज्वालामुखी सक्रिय माना जा रहा है|

वैज्ञानिक जानकारी एवं खोज के अनुसार बैरन द्वीप ज्वालामुखी से शक्तिशाली एवं भयंकर तबाही होने की सम्भावना न के बराबर है| आज भी पर्यटक यहाँ आते है एवं इसमें से धुआं निकलता देखा जा सकता है| पर्यटकों के लिए यहाँ स्कूबा डाइविंग एक आकर्षण का केंद्र है, जिसमे विभिन्न प्रकार के जलीय जीव, वनस्पति एवं साफ़ पानी के साथ प्राक्रतिक नजारे उपस्थित है|

नारकोडम ज्वालामुखी:

भारत का दूसरा ज्वालामुखी है, नारकोडम ज्वालामुखी| यह ज्वालामुखी भी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पर उपस्थित नारकोडम द्वीप पर पाया जाता है| पिछली २ शताब्दियों से यह ज्वालामुखी सुप्त अवस्था में है, किन्तु कुछ विशेषज्ञों का मानना है, कि कभी भी ये ज्वालामुखी सक्रिय हो सकता है|

अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में अधिकांश मात्रा में ज्वालामुखी पर्वत पाए जाते है, किन्तु उनमे से अधिक सुप्त अवस्था में है या निष्क्रिय हो चुके है|

कवर फोटो सोर्स