उर्जा के सिद्धांत

holding bulb

किसी भी कार्य को करने की छ्मता को उर्जा कह्ते है और इस उर्जा के कई स्त्रोत है। उर्जा के स्तोत्रो मे क्रमशः रसायनिक, भौतिक, सौर्य, नाभीकीय, विद्युत, यांत्रिक जैसी कई प्रकार की उर्जा होती है।

पर हर प्रकार की उर्जा का एक समान्य मूल सिद्धांत यह है कि उर्जा ना तो निर्मित होती है ना मरती है, उर्जा बस अपना रूप बदलती रह्ती है।

इसे हम कुछ उदाहरणों से भी समझ सकते है। अगर हम खाने पकाने जैसे रोजमर्रा के काम को भी देखे तो इसमे भी उर्जा स्थानांतरण एक अहम भुमिका निभाती है। जैसे ही खाद्य पदार्थ को पकने के लिये आग पर रखा जाता है तो उष्ण उर्जा रसायनिक उर्जा मे परिवर्तित हो जाती है। इसमे कही भी उर्जा का संचार नही हो रहा बस उर्जा का प्रारूप बदल जा रहा है।

ज़मीन पर पड़ी हुई स्थिर गेंद को अगर पैर से मारा जाय तो उस गेंद की स्थितिज उर्जा गतिज उर्जा मे तब्दील हो जाती है।

उर्जा का मुख्य सिदधांत उर्जा संरक्षण ही है यानी उर्जा ना विलुप्त हो सकती है ना बनायी जा सकती है। इससे बड़े बड़े अनुसंधान पर भी लागू कर के देख सकते है कि प्लुटोनियम जैसे तत्व मे भरी स्थितिज उर्जा को उष्ण्ता से हम कैसे नाभीकीय उर्जा मे बदल सकते है। यही उर्जा संरक्षण ना ही एक खोज या आविष्कार है बल्कि विकास की ओर अग्रसर एक ऐसी खोज है जिससे महासागर उर्जा को भी संरक्षित करने मे सफलता मिली है।

धरती से निकलने वाली उष्मा उर्जा भी आज काफी फैक्ट्रियों मे कार्य निष्पादन के काम आ रही है। ऐसा नही है कि एक तरह की उर्जा पूर्णता दूसरे प्रकार की उर्जा मे तब्दील हो जाती है, कभी कभी एक तरह की उर्जा एक से ज्यादा उर्जा मे बट जाती है। एक जलती हुई मोमबत्ती का ही उदाहरण ले तो उस मोम्बत्ती की उष्म उर्जा रसायनिक उर्जा और प्रकाश उर्जा मे परिवर्तित हो जाती है।

प्रमाणित है कि उर्जा नष्ट ना होते हुए भी विनाश का कारण बन सकती है। अगर नाभीकीय और सौर्य उर्जा को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करे तो इतनी उर्जा पैदा होगी जो काफी उष्ण्ता पैदा करेगी जो भयंकर विनाशकारी प्रकोप ला सकती है। उर्जा संरछ्ण पर बना वाष्प इंजन कोयले से ज्यादा अच्छा और पर्यावरण के लिये ज्यादा हितकर माना गया था। उर्जा के संरक्षित सिद्धांत मे विनाशकारी और निर्माणकारी दोनो ही गुण है पर उसको इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है ये उस पर निर्भर करता है।

ज्वरीय उर्जा भी आजकल प्रख्यात होती जा रही है जिसे हम यांत्रिक उर्जा मे परिवर्तित करके पवन चक्की चलाते है। समय समय पर किये गये शोध उर्जा के नये रूप और रूपांतर को प्रस्तुत कर रहे है और अनुसंधान केंद्र भी ज्यादा से ज्यादा उर्जा विकास और उपयोग पर ध्यान दे रहे है, पर उर्जा संरक्षण को मानवीय अपेछाओं के अंतर्गत एक सुचारु रूप देना इतना भी आसान नही है। कई बार उर्जा संरक्षण के कार्य छेत्र मे ऐसी दुर्घट्नाये हो जाती है जो परोछ रूप से नुकसान भी पहुचाते है। अगर पीछे आविष्कार हुए बॉम्ब बनाने वाले शोधो को देखे तो उर्जा का एक विनाशकारी रूप भी दिखेगा। उर्जा के सिदधांत जितने पुराने है उतने ही कंठ्स्त भी है की अगर उर्जा को हम सही तरीके से प्रयोग मे नही लायेंगे तो उर्जा हमे नष्ट कर देगी।

जल भी उर्जा का महत्वपुर्ण स्तोत्र है इसका विद्युत उर्जा बनाने मे इस्तेमाल कर सकते है। इससे अन्य पदार्थो से बनने वाली उर्जा से हुए प्रदूषण से रोकथाम मिल सकती है। उर्जा संरछ्ण के सिदधांत ना सिर्फ विकसित विषय है परंतु जन जीवन को फलित करने और समाज को अग्रसर करने वाली प्द्ध्त्ती भी है।

कंप्यूटर का उपयोग Importance of Computer Uses in our Life

कंप्यूटर क्या है, यह कैसे कार्य करता है, एवं आधुनिक समय में इसके उपयोग एवं महत्व से ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जो अनभिज्ञ हो| घर में, ऑफिस में, शिक्षा के क्षेत्र में, चिकित्सा के क्षेत्र में, मनोरंजन में, एवं अन्य बहुत तरह से इसका उपयोग किया जाता है एवं आज का हमारा आर्टिकल कंप्यूटर के उपयोग से सम्बंधित है|

कंप्यूटर का उपयोग:

शिक्षा के क्षेत्र में:

कंप्यूटर एवं इन्टरनेट ने शिक्षा के क्षेत्र में अपना अहम योगदान दिया है| अब स्टूडेंट्स को किसी भी विषय की जानकारी एक जगह बैठे प्राप्त हो जाती है| वे कंप्यूटर के द्वारा अपने प्रोजेक्ट्स एवं असाइनमेंट तैयार कर सकते है एवं एक्सपर्ट्स की राय ले सकते है|

विभिन्न प्रकार के वेबसाइट द्वारा वे अपने ज्ञान का विस्तार कर सकते है एवं आजकल कई प्रकार के ऑनलाइन कोर्सेज एवं डिप्लोमा उपलब्ध है इसे डिजिटल लर्निंग कहा जाता है, जिससे ऑनलाइन स्टडी की जा सकती है|

चिकित्सा क्षेत्र में:

अब आपको अस्पतालों में लम्बी लाइन लगाने की आवश्यकता नहीं पडती क्योकि आप कंप्यूटर के द्वारा अपनी ऑनलाइन अपॉइंटमेंट ले सकते है| आजकल कुछ वेबसाइट घर बैठे ही आपको दवाई एवं जाँच की सुविधा उपलब्ध करवाती है जो चिकित्सा के क्षेत्र में किसी क्रांति से कम नहीं|

चिकित्सक भी अब विदेश में बैठे एक्सपर्ट से किसी केस की जानकारी एवं सलाह कुछ ही मिनिट में ले सकते है| इसके साथ ही रोज आने वाले हजारो मरीजो का डाटा आसानी से मैनेज किया जा सकता है एवं जरूरत के समय ओपन किया जा सकता है|

बैंकिंग के क्षेत्र में:

क्लाइंट्स का रिकॉर्ड रखने के लिए, ऑनलाइन पैसे भेजने या प्राप्त करने के लिए, विभिन्न प्रकार के अन्य ऑफर्स एवं सुविधाए प्राप्त करना काफी आसान हो गया है| आजकल सभी बैंक में कंप्यूटर होना आम बात है|

स्पोर्ट्स में:

कंप्यूटर मानव से अधिक तेजी से कार्य करता है एवं खिलाडियों की गतिविधियों को रिकॉर्ड करता है जिसे कितनी बार भी देखा जा सकता है एवं अन्य देशों की अलग-अलग तकनीक सीखने में भी सहायता मिलती है|

बीजनेस के क्षेत्र में:

अपने बीजनेस का प्रमोशन करना, ऑनलाइन billing, पूरी दुनिया में इसे बढ़ाना आदि सब कार्य कंप्यूटर ने आसान कर दिए है| अब आप घर बैठे अपना बीजनेस या जॉब कर सकते है एवं पैसे और नाम दोनों कमा सकते है|

विज्ञानं एवं अविष्कार के क्षेत्र में:

इसके अंतर्गत दुनिया भर के वैज्ञानिक एक दूसरे से सम्पर्क में रहते हुए अपने प्रयोग एवं अनुसन्धान पर गहनता से अध्ययन कर सकते है| एक दूसरे की खोजों के बारे में जान सकते है एवं अपनी खोज की महत्वपूर्ण जानकारी सेव रख सकते है|

मौसम की जानकारी हेतु:

विभिन्न प्रकार की app कंप्यूटर में डालकर मौसम में होने वाले बदलाव का पता लगाना और भी आसान हो गया है जिससे आने वाली तबाही पर कुछ हद तक नियत्रण किया जा सकता है एवं आम जनता को संकट से बचाया जा सकता है|

मनोरंजन के लिए:

मनोरंजन के क्षेत्र में कंप्यूटर की जितनी तारीफ की जाए कम है| आप एक जगह बैठे पूरी दुनिया को अपनी स्क्रीन पर देख सकते है, विडियो गेम्स खेल सकते है, गाने सुन सकते है, अपनी रूचि से सम्बंधित गहन जानकारी प्राप्त कर सकते है, एवं पूरी दुनिया में बैठे लोगो से जुड़े रह सकते है|

डिफेन्स या रक्षा के लिए:

अपने मिशन की ख़ुफ़िया जानकारी सिक्योर रखने के लिए, दुश्मन पर नजर बनाये रखने के लिए कंप्यूटर को कैमरा के साथ जोड़ा जाता है एवं रक्षा दल के स्टाफ एवं मेम्बेर्स के डाटा को सेव रखने हेतु भी कंप्यूटर का यूज़ किया जाता है|

सरकारी कार्यों हेतु:

आजकल लगभग सभी सरकारी क्षेत्रों में कंप्यूटर का उपयोग होने लगा है| अब आप आसानी से रेल टिकेट बुक करवा सकते है, आधार कार्ड की जानकारी लेना, या पासपोर्ट अप्लाई करना आदि कार्य कर सकते है|  

संचार Communication क्या है?

संचार या communication शब्द का साधारण भाषा में अर्थ है, अपने विचारो या भावों का किसी अन्य व्यक्ति से आदान-प्रदान करना अथवा किसी सूचना या मेसेज को एक से दूसरी जगह प्रेषित करना या भेजना संचार कहलाता है|

किसी भी सूचना का तभी उपयोग है जब वह किसी दूसरे तक भेजी जाती है|

जिस प्रकार एक व्यक्ति भोजन करता है, सोता है, उसी प्रकार बोलना एवं अपने विचारों को व्यक्त करना जिन्दगी की आवश्यक प्रक्रिया है|

संचारण की प्रक्रिया के दौरान एक व्यक्ति sender अर्थात सूचना भेजने वाला एवं दूसरा व्यक्ति reciever यानी सूचना ग्रहण करने वाला होता है|

संचार की परिभाषा एवं प्रक्रिया के सम्बन्ध में अलग-अलग विद्वानों के अलग-अलग मत है किन्तु सभी का सार यही है कि इसमें विचारों, सूचनाओं, एवं भावों का आदान-प्रदान किया जाता है|

संचार प्रक्रिया के प्रकार:

संचार प्रक्रिया के मुख्य रूप से चार प्रकार होते है:-

Intrapersonal communication या अंत: वैयक्तिक संचार:

संचार करने की यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत व्यक्ति स्वयं से संचार करता है| इसमें व्यक्ति खुद से विचार विमर्श करता है एवं विभिन्न प्रकार के निष्कर्ष निकालता है|

Interpersonal communication अंतर वैयक्तिक संचार:

संचार की इस प्रक्रिया के अंतर्गत इसमें दो लोग शामिल होते है जो आपस में विचारों, भावों एवं सूचनाओं का एक्सचेंज करते है| संचार करने का यह अच्छा तरीका है क्योकि इसमें दूसरे की सहमति या राय जानी जा सकती है|

जन संचार Mass communication:

इस प्रक्रिया में संचार को जन तक पहुचाने के लिए TV, रेडियो, मोबाइल, इन्टरनेट, आदि का इस्तेमाल किया जाता है| वर्तमान समय में संचार का यह सबसे प्रसिद्ध तरीका बन गया है| इसके अंतर्गत पूरी दुनिया से जानकारी एवं तत्कालीन होने वाली घटनाओं का पता लगाया जा सकता है|

समूह संचार Group communication:

जैसा कि नाम से पता लग रहा है कि इसमें संचार की प्रक्रिया एक ग्रुप में होती है जिसमे कई लोग शामिल होते है| व्यक्तित्व के विकास के लिए एवं संचार को गहनपूर्ण बनाने के लिए यह प्रक्रिया कारगर साबित होती है|

Communication & Technology:

संचार मानव जीवन का इतना महत्वपूर्ण अंग है कि इसे प्रभावी एवं तीव्र बनाने के लिए हमने कितने उपकरण खोज डाले जिसमे से सेटलाइट, मोबाइल, इन्टरनेट आदि आते है एवं इन्ही प्रयासों ने सूचना क्रांति एवं प्रोद्योगिकी को जन्म दिया| इसी के कारण कम से कम समय में एवं कम खर्च में बिना कही जाए किसी से भी संचार किया जा सकता है|

संचार के कंपोनेंट्स या घटक:

डाटा अथवा उपयोगी सूचना को एक स्थान से दूसरे तक सम्प्रेषित करने के लिए कुछ माध्यम या डिवाइस का प्रयोग किया जाता है जो सही समय पर सही जगह उस सूचना को पहुचाने का कार्य करते है| इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए संचार के घटकों को जानना अनिवार्य है जो इस प्रकार है:-

सन्देश:

इसमें वो सभी डाटा, इनफार्मेशन, एवं सूचना आती है जो आप किसी को भेजना चाहते है| यह डाटा ऑडियो, विडियो, आंकड़े, टेक्स्ट, फाइल आदि किसी भी रूप में हो सकता है|

प्रेषक या Sender:

sender वह व्यक्ति होता है जो सन्देश को आगे भेजता है एवं उसे इस बात का पता होता है कि उसे किसे, कितना, कब, कहाँ, और क्या डाटा भेजना है|

माध्यम:

Medium या माध्यम सन्देश को भेजने में सहायता करता है एवं वह कुछ भी हो सकता है जैसे कि फैक्स, टेक्स्ट मेसेज, विडिओ, प्रिंट, या एक पोस्टमैन भी संचार के माध्यम के अंतर्गत आता है|

प्राप्तकर्ता या Reciever:

सन्देश या डाटा प्राप्त करने वाली डिवाइस या व्यक्ति प्राप्तकर्ता कहलाता है जो भेजे गये डाटा को receive करता है|

प्रोटोकॉल:    

इसका कार्य भेजे गये डाटा को मैनेज करना होता है एवं इससे संचार की प्रकिया को कारगर बनाने में सहायता मिलती है| असल में यह रूल्स का एक समूह होता है जो reciever को आपकी बात समझाने का कार्य करता है|

इस्पात (स्टील) कैसे बनता है?

इस्पात या स्टील हमारे आसपास न जाने किन-किन रूपों में मौजूद रहता है चाहे वह हमारा घर हो, रसोई हो, ऑफिस हो या कुछ और| स्टील के प्रयोग बिना किसी भी निर्माण की कल्पना नहीं की जा सकती|

खाना बनाने के बर्तन से लेकर सड़को पर दौड़ने वाले वाहन, बड़े-बड़े पुल या समुंद्र में चलने वाले जहाज या हवा में उड़ने वाले प्लेन आदि सभी में स्टील का इस्तेमाल किया जाता है| क्या आपने कभी सोचा है कि इतनी महत्वपूर्ण धातु का निर्माण कैसे किया जाता होगा आइये जानते है इस बारे में|

क्या है स्टील एवं कैसे बनता है?

स्टील दो धातुओ कार्बन एवं लोहा के मिश्रण से निर्मित हुआ धातु है जिसे लोहे के साथ अन्य धातुओं को मिलाकर बनाया जाता है जिससे इसे पर्याप्त कठोरता मिल सके क्योकि शुद्ध लोहा नर्म होता है एवं उससे मजबूत निर्माण नहीं किया जा सकता|

1149 डिग्री के उच्च तापमान पर लोहे में केवल 2.14% कार्बन को मिक्स किया जाता है एवं इससे ज्यादा कार्बन मिलाने पर लोहा और अधिक मजबूत एवं अच्छी क्वालिटी का निर्मित होता है जिसे कास्ट आयरन कहा जाता है जिसमे जल्दी से जंग नहीं लगती|

कार्बन के साथ इसमें मजबूती एवं सुधार के लिए अन्य सहायक तत्व जैसे टंगस्टंन, मैगनीज, वेनेडियम, क्रोमियम आदि मिक्स किये जाते है|

क्या है स्टेनलेस स्टील?

स्टील का परिष्कृत रूप जो साधारण स्टील के मुकाबले ज्यादा टिकाऊ एवं बेहतर होता है उसे स्टेनलेस स्टील का नाम दिया गया| स्टेनलेस स्टील में अधिक क्रोमेयिम, निकेल, ताम्बा, आदि मिलाया जाता है जिससे इसे लॉन्ग लाइफ मिलती है एवं जंग या धब्बे लगने से यह खराब भी नहीं होता|

यह स्टील आम स्टील की तुलना अधिक ताप सहन कर सकता है| दरअसल इस स्टील का निर्माण 1871 ई. में किसी प्रयोग की भूलवश हुआ| खोजकर्ता बंदूक के बैरल को बनाना चाहते थे जो पानी आदि लगने से खराब न हो न ही जंग लगे और निर्मित हुआ स्टेनलेस स्टील का नमूना जिसका आज न जाने कहाँ-कहाँ प्रयोग किया जाता है|

स्टील एक ऐसी धातु है जिसे पुन: रीसायकल किया जा सकता है एवं इससे पर्यावरण को भी कोई खास हानि नहीं होती| स्टील के आधुनिक रूप स्टेनलेस स्टील ने उद्योगिक जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन किये एवं आज भी आप वर्षो पहले निर्मित हुए निर्माणों को जैसे का तैसा देख सकते है|

उम्मीद है आपको यह जानकारी पसंद आई होगी यदि आपके पास इससे सम्बंधित कोई रोचक तथ्य हो तो हमसे जरुर शेयर करे एवं अपनी राय रखे|

गर्मी में दूध खट्टा क्यों हो जाता है

दूध हम सभी के रोजाना खाद्य पदार्थ का एक अभिन्न अंग है, दूध के बिना हम चाय नही पी सकते, दही नही बना सकते, मिठाई नही बना सकते, पनीर नही बना सकते।

दूध जानवरों से लेकर इंसानों तक सभी के लिए जरूरी है, दूध पीकर हम भूक मिटा सकते है और यह हमारे शरीर को सभी जरूरी पोसक तत्व भी प्रदान करता है।

दूध में मिक्रोएलेमेंट्स ( जैसे कैल्शियम, मैग्नीशियम ), वसा, प्रोटीन, विटामिन, एंजाइम और बैक्टीरिया मौजूद होते हैं।

दूध में मौजूद बैक्टीरिया हमारे लिए हानिकारक नही है लेकिन ये वही बैक्टीरिया हैं जो दूध को गर्मियों में अधिक समय तक रखने पर खट्टा बना देते हैं।

दूध में अधिकतर lactobacillus ( लाक्टोबसिलुस ) नाम का एक बैक्टीरिया पाया जाता है जिसकी सुरुआत में जनसँख्या कम होती है लेकिन जब दूध को अधिक देर तक बिना गर्म किये छोड दिया जाये तो वे अपनी जनसँख्या को बढ़ा लेते हैं।

lactobacillus ( लाक्टोबसिलुस ) बैक्टीरिया दूध में मौजूद एंजाइम (lac­tose) लाक्टोस को लैक्टिक एसिड (lactic acid) में बदल देते हैं।

दूध में लैक्टिक एसिड की मात्रा बढ़ने से दूध खट्टा हो जाता है, और बहोत ज्यादा बढ़ने से दूध फट भी सकता है।

दूध को lactobacillus ( लाक्टोबसिलुस ) बैक्टीरिया से अगर हम बचा कर रखे तो दूध को कई दिनों तक रखा जा सकता है।

इसके लिए दूध को तेज आंच पर गर्म करना पड़ेगा ताकि उसमे मौजूद बैक्टीरिया मर जाएँ इसके बाद उस दूध को रेफ्रीजिरेटर (फ्रिज ) में रखना पड़ेगा।

ठण्ड में lactobacillus ( लाक्टोबसिलुस ) उतने ग्रो नही कर पाते जितने की गर्मियों में, इसलिए गर्मियों में दूध अक्सर खट्टा हो जाता है।

दूध को फ्रेश रखने के लिए उसको साफ़ बर्तन में रखना चाहिए जैसे की ग्लास या सेरामिक के बर्तन, या स्टील के बर्तन।

दूध के बर्तन को ठन्डे पानी से धोना चाहिए।

दूध को ढक कर और दुर्गन्ध से दूर रखना चाहिए।

दूध को प्रकाश से भी दूर रखना चाहिए क्यों की प्रकाश दूध में मौजूद विटामिन्स को तोड़ देते हैं।

माइक्रोफोन क्या हैं?

माइक्रोफोन एक ऐसा उपकरण है जो ध्वनि तरंगो को, इलेक्ट्रिकल सिग्नल या एनालॉग सिग्नल में बदल देता है, माइक्रोफोन को हम हिंदी में माइक भी कहते हैं जिसका इस्तेमाल शादी, पर्व या भासन देने होता है।

दो तरह के माइक्रोफोन बाज़ार में उपलब्ध है।

  • कंडेंसर माइक्रोफोन
  • डायनामिक माइक्रोफोन

डायनामिक माइक्रोफोन

डायनामिक माइक्रोफोन में एक चुम्बक के ऊपर तार ( metal coil ) को लपेटा जाता है, फिर चुम्बक के ऊपर एक पतली झिल्ली जिसे diaphragm कहते है, को लगाया जाता है।

यह डायाफ्राम ( diaphragm), ध्वनि तरंगो ( sound waves ) के vibrations को तार ( metal coil ) तक पहुचाता है।

जब ध्वनि तरंगे (sound waves) डायाफ्राम से टकराती है तो जो vibrations होता है उससे इलेक्ट्रिकल एनर्जी पैदा होता है यानि की बिजली पैदा होता है, ये वैसे ही काम करता है जैसे की एक मोटर में गोल चुम्बक के अंदर coil को घुमाने से बिजली बनता है।

बिजली कितना बनेगा यह इस बात पर निर्भर करता है की डायाफ्राम ( diaphragm) कितना vibrate कर रहा है।

फिर यह बिजली या इलेक्ट्रिकल सिग्नल तार के द्वारा कंप्यूटर या ऑडियो डिवाइस में जाता है।

कंडेंसर (Condenser) माइक्रोफोन

कंडेंसर माइक्रोफोन में आगे एक डायाफ्राम ( diaphragm) लगा होता है और उसके पीछे Backplate लगा होता है।

दोनों प्लेट एक दुसरे के सामानांतर होतीं हैं, जब ध्वनि डायाफ्राम ( diaphragm) से टकराती है तो यह vibrate करने लगता है इसके कारण डायाफ्राम और Backplate की बीच की दुरी बदलती रहती है।

इस बदलाव को इलेक्ट्रिकल सिग्नल के रूप में ट्रान्सफर किया जाता है, जहाँ डायनामिक माइक्रोफोन बिना इलेक्ट्रिसिटी की चलती है वही कंडेंसर माइक्रोफोन को इलेक्ट्रिक उर्जा की आवश्यकता होती है।

कंडेंसर माइक्रोफोन से निकल इलेक्ट्रिकल सिग्नल इतना छोटा छोटा है की उसे एम्पलीफायर की आवश्यकता पड़ती है।

एम्पलीफायर उस सिग्नल को बढ़ा देता है।

5G तकनीक क्या है। 5G technology in Hindi

जैसे-जैसे मोबाइल डेटा की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, हम निकट भविष्य में 5 जी जैसी अधिक तेज तकनीक की उम्मीद कर रहे हैं। कई कंपनियां इस तकनीक को विकसित करने के लिए काम कर रही हैं ताकि 5G हमारे भविष्य के नेटिज़न्स की जरूरतों को पूरा कर सके।

5G मोबाइल नेटवर्क वायरलेस संचार की अगली पीढ़ी है जो डेटा को स्थानांतरित करने के लिए तेज गति, कम विलंबता और बढ़ी हुई क्षमता प्रदान करने का वादा करता है।

5G मोबाइल दूरसंचार के लिए मानकों की 5 वीं पीढ़ी है।

1G पहली पीढ़ी को संदर्भित करता है जिसे 1990 के दशक की शुरुआत में अपनाया गया था।

2 जी दूसरी पीढ़ी को संदर्भित करता है, जिसने एनालॉग 1 जी को पूरी तरह से डिजिटल 2 जी नेटवर्क से बदल दिया। 2 जी नेटवर्क ने सबसे पहले एसएमएस (टेक्स्ट) की शुरुआत की 
संदेश), MMS (मल्टीमीडिया संदेश)

3 जी तीसरी पीढ़ी को संदर्भित करता है जिसने संचार की गति को बढ़ाया और यह वीडियो कॉलिंग, लाइव स्ट्रीमिंग, मोबाइल इंटरनेट जैसी नई चीजों को करने में सक्षम था ।

4G, 3G का उत्तराधिकारी है, 4G, 3G की तुलना में लगभग 5 से 7 गुना तेज है। यह 100 एमबीपीएस से 1 जीबीपीएस तक की गति प्रदान करता है।

5 जी कैसे काम करता है (How 5G Works)

यह समझने के लिए कि 5g कैसे काम करता है हमें निम्नलिखित दो विषयों यानी मिलीमीटर तरंगों और छोटे सेल नेटवर्क को समझने की आवश्यकता है।

4 जी नेटवर्क लोअर फ्रीक्वेंसी नेटवर्क का उपयोग करता है और यह फ्रीक्वेंसी बैंड 2 – 8 गीगाहर्ट्ज के बीच होता है वहीं 5 जी नेटवर्क उच्च आवृत्ति 28 और 39 गीगाहर्ट्ज का उपयोग करता है। इन उच्च आवृत्ति को मिलीमीटर तरंगों के रूप में जाना जाता है। ये मिलीमीटर तरंगें कम विलंबता या अंतराल (प्रतिक्रिया समय) के साथ बहुत अधिक गति से बड़ी मात्रा में डेटा ले जा सकती हैं।

मिलीमीटर तरंगे ( Millimeter Waves )

मिलीमीटर तरंगें विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम का क्षेत्र है जहाँ तरंगदैर्घ्य 10 मिलीमीटर (0.4 इंच) से 1 मिलीमीटर (0.04 इंच) तक होता है

मिलीमीटर तरंगें इंफ्रारेड तरंगों या एक्स-रे से लंबी होती हैं, लेकिन माइक्रोवेव या रेडियो तरंगों से कम होती हैं। मिलीमीटर तरंगों को अत्यधिक उच्च आवृत्ति (EHF) के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि रेडियो आवृत्ति का बैंड विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम में 30 से 300 गीगाहर्ट्ज़ (GHz) के बीच होता है। इस बैंड में रेडियो तरंगों में 10 से 1 मिलीमीटर तक की तरंग दैर्ध्य होती है यही कारण है कि इसे मिलीमीटर बैंड कहा जाता है। मिलीमीटर तरंगों का एक नुकसान यह है कि वे बहुत लंबी दूरी की यात्रा नहीं कर सकते हैं क्योंकि आम तौर पर वे वायुमंडल में गैसों द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं।

मिलीमीटर तरंगें बिंदु A से बिंदु B तक सीधी रेखाओं में यात्रा करती हैं, जिसका अर्थ है कि बीच में कोई हस्तक्षेप संचरण को अवरुद्ध कर सकता है। यहां तक ​​कि एक जानवर भी और बिंदु A और बिंदु B के बीच चलने वाला मानव संचरण को अवरुद्ध कर सकता है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए दो समाधान हैं:
बीमफॉर्मिंग और बीम ट्रैकिंग । सरल शब्दों में बीमफॉर्मिंग का मतलब है कि रेडियो तरंगों के बीम को सीधे आपके मोबाइल पर भेजें, लेकिन व्यवधान के कारण कभी बीम काम भी नहीं कर सकता है यही कारण है कि आपके फोन की ओर कई बीम हो सकते हैं और आपका फोन बीम-ट्रैकिंग के माध्यम से सबसे मजबूत बीम पकड़ता है।

यदि प्रेषक और रिसीवर एक सीधी रेखा में नहीं हैं, तो बीम को किसी सतह से एक सटीक कोण पर भेजा जा सकता है तब बीम ट्रैकिंग जैसा उपकरण सबसे मजबूत सिग्नल का उपयोग कर सकता है। यहां तक ​​कि मोबाइल एंटीना पर आपके हाथ की हस्तक्षेप भी बीम को अवरुद्ध कर सकता है। कंपनियां इस संबंध में काम कर रही हैं और मोबाइल फोन के कोने पर 2 एंटेना का उपयोग करने पर विचार किया जा रहा है।

छोटे सेल नेटवर्क (Small Cell Network)

छोटे सेल नेटवर्क एक तरह के सब नेटवर्क होते हैं जिन्हें एक बड़े मैक्रो नेटवर्क के साथ लागू किया जा सकता है, उदाहरण के लिए एक बिल्डिंग में छोटे नेटवर्क को पिको सेल कह सकते हैं।

छोटे सेल नेटवर्क 5g नेटवर्क को विस्तृत क्षेत्र तक पहुँचने में मदद कर सकते हैं ।

5 जी तकनीक 2 प्रकार के टावरों का उपयोग करेगी। एक बड़ा टॉवर है और हम इसे मैक्रो नेटवर्क कह सकते हैं और एक छोटा टॉवर, जिसे हम छोटा सेल नेटवर्क कह सकते हैं।

जबकि मैक्रो बड़े क्षेत्रों के लिए पर्याप्त है, छोटे सेल नेटवर्क कम दूरी के लिए हैं और इसका उपयोग शहरों या भवन के अंदर किया जा सकता है।

छोटे सेल नेटवर्क एक प्रकार के वायरलेस ट्रांसमीटर और रिसीवर हैं।

5 जी प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग

स्मार्ट होम्स (Smart Homes)

दूर से घर का प्रबंधन करने के लिए घरेलू उपकरणों को एक साथ जोड़ा जा सकता है। संभावना है कि जब आप घर पहुंचेंगे तो आपका भोजन तैयार हो सकता है। 5g के माध्यम से सभी घरेलू उपकरण वास्तविक समय में एक दूसरे के साथ संवाद कर सकते हैं और दूरस्थ क्षेत्रों से निगरानी की जा सकती है।

स्मार्ट होम्स अब एक कल्पना नहीं हैं, कई कंपनियां इस सेगमेंट में काम कर रही हैं

सेल्फ ड्राइविंग कार (Self Driving Car)

5 जी वास्तव में सेल्फ ड्राइविंग कार तकनीक को बढ़ावा देगा क्योंकि स्वयं ड्राइविंग कारों को वास्तविक समय में अपना स्थान जानने के लिए अन्य कारों के साथ संवाद करने की आवश्यकता होती है।

किसी भी संभावित टकराव से बचने के लिए हर निर्णय को मिलीसेकंड में लिए जाने की आवश्यकता पड़ती है।

तेज़ नेटवर्क (Faster Network)

5 जी तकनीक हमें 10 से 20 जीबीपीएस की गति से डेटा डाउनलोड करने की अनुमति देगी जो फाइबर ऑप्टिक्स गति के समान है। 5G पर वॉयस और हाई स्पीड डेटा को एक साथ ट्रांसफर किया जा सकता है।

इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स (IOT – Internet of things)

इंटरनेट के साथ हर उपकरण, मशीन, उपकरणों को जोड़ने के लिए इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स एक और विचार है। इसके लिए बड़ी मात्रा में डेटा ट्रांसफर करने के लिए सबसे कुशल तरीके की आवश्यकता होगी और 5G इस तकनीक के लिए अनुकूल होगा।

विद्युत ऊर्जा क्या है?what is Electrical Energy

विद्युत ऊर्जा यानि कि विद्युत के महत्व का अंदाजा तो आप इसी बात से लगा सकते हैं कि एक बटन दबाते ही लाइट, पंखे व सभी विद्युत चलित साधन हमें दैनिक जीवन की सुख-सुविधा प्रदान करवाते हैं और जब कभी कुछ देर के लिए विद्युत आपूर्ति बन्द हो जाती है तो विद्युत से चलने वाले सभी साधन अनुपयोगी हो जाते हैं, प्रकाश उपलब्ध नही होता व अन्य कई असुविधाएँ महसूस होती है।

आजकल के समय में घर हो या गली, अंदर हो या बाहर, व्यावसायिक उपक्रम या दुकान, प्रत्येक जगह विद्युत के बिना कार्य करने की कल्पना मात्र भी कठिन दिखाई पड़ती है। छोटे से लेकर बड़ा कार्य करने में भी विद्युत ऊर्जा सहायक है। इस तकनीकी युग में मनुष्य पूरी तरह से विद्युत के अधीन होकर ही प्रगति कर सकता है।

विद्युत ऊर्जा को जानने से पहले हमे ऊर्जा के विषय में ज्ञान होना आवश्यक है।

किसी कार्य को करने के लिए शक्ति अर्थात् क्षमता का प्रयोग किया जाता है, इसी क्षमता को ऊर्जा कहते हैं।

ऊर्जा कोई पदार्थ नही है, अपितु पदार्थों में पाया जाने वाला गुण है। इस गुण का स्थानान्तरण व रूपान्तरण किया जा सकता है। इसे केवल अदृश्य शक्ति के रूप में माना जाता है।

जो ऊर्जा किसी विद्युत आवेश से युक्त होती है, वह विद्युत ऊर्जा कहलाती है। यह स्थितिज ऊर्जा होती है, जो कूलाम्ब बल के कारण आवेशित कणों के मध्य जुड़ जाती है। विद्युत ऊर्जा की ईकाई किलोवाट घण्टा होती है। 

विद्युत उत्पादन-

सामान्यतः विद्युत उत्पादन के लिए विद्युत जरनेटर (जनित्रों) की सहायता ली जाती है। जरनेटर के माध्यम से यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरित किया जाता है। इनमे चुम्बकीय क्षेत्र का महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसी यांत्रिक ऊर्जा की प्राप्ति के कई स्त्रोत हो सकते हैं, जैसे ऊँचाई से गिरते हुए जल से, गैस, भाप या अन्य ईंधन से व परमाणुशक्ति से। 

विद्युत जरनेटर फैराडे के “विद्युत चुम्बकीय प्रेरण” के सिद्धान्त पर कार्य करता है।

जरनेटर विद्युत आवेशों के प्रवाह का कार्य करता है। ध्यान देने योग्य तथ्य है कि विद्युत इंजन स्वयं चलायमान नही होते हैं। बाहरी शक्ति स्त्रोत से इनको चलाया जाता है, जिसके लिए भाप इंजन, गैस टरबाईन, पवन टरबाईन आदि में से किसी भी स्त्रोत का उपयोग किया जा सकता है।

विद्युत जनित्र दो प्रकार के होते हैं- दिष्ट धारा जनित्र व प्रत्यावर्ती धारा जनित्र। इन दोनों का कार्य करने का सिद्धान्त तो एक ही है, परन्तु इनकी संरचना में भेद पाया जाता है।

जहाँ विद्युत (बिजली) का उत्पादन किया जाता है, उस स्थान को बिजलीघर कहते हैं। विद्युत उत्पादन के भिन्न-भिन्न तरीके होते हैं, फलस्वरूप बिजलीघर भी अलग-अलग प्रकार के होते हैं। इनका विवरण इस प्रकार है-

पनबिजलीघर- इनमे मुख्यतः नदी या नहरों से बाँध की सहायता से उपयुक्त मात्रा में पानी एकत्रित करते है। उस पानी को विद्युत जरनेटर वाले टरबाईन पर ऊँचाई से गिराया जाता है। ये टरबाईन इन जनरेटरों के प्रधान चालक होते हैं। इससे विद्युत उत्पादन किया जाता है।

भाप चलित बिजलीघर- इनमे भाप से चलने वाले टरबाईन का प्रयोग किया जाता है। इन टरबाईन को तीव्रता से चलाने के लिए अत्यधिक भाप पैदा करने हेतु इनमे बड़े-बड़े बॉयलर (वाष्पित्र) होते हैं। इस प्रकार भाप वाले टरबाईन से विद्युत उत्पादन होता है।

परमाण्वीय बिजलीघर- आजकल कुछ देशों में परमाणु शक्ति की सहायता से भी विद्युत उत्पादन किया जा रहा है। इसमें किसी प्रकार के ईंधन का इस्तेमाल नही किया जाता और न ही जल का उपयोग होता है। फलस्वरूप ईंधन व जल की खपत ने भी कमी आती है, परन्तु इनकी लागत अपेक्षाकृत अधिक होती है।

इसके अतिरिक्त गैस टरबाईन के द्वारा भी विद्युत उत्पादन किया जाता है। गैस से चलने वाले टरबाईन बड़ी आकृति के होते हैं, परन्तु इनके संचालन के लिए अत्यधिक ताप और दबाव की आवश्यकता पड़ती है। वर्तमान समय में गैस टरबाईन का अधिक इस्तेमाल नही किया जा रहा।

सौर ऊर्जा व पवन ऊर्जा का प्रयोग भी विद्युत उत्पादन में किया जाता है।

विद्युत प्रेषण-

यह तो सर्वविदित ही है कि विद्युत का उत्पादन जिस क्षेत्र में होता है, वहाँ विद्युत का उपयोग नही होता। उपयोग करने वाले क्षेत्र तक विद्युत का स्थानांतरण किया जाता है, जिसे विद्युत प्रेषण भी कहते हैं।  तारों (केबल) की सहायता से विद्युत स्थानांतरित की जाती है। ये तारें भूमिगत यानि कि जमीन के अंदर होती है और कुछ तारें खम्बों के सहायता से जमीन से 20 फ़ीट या अधिक ऊँचाई पर भी होती हैं। आपने सामान्यतः सड़कों पर लगे विद्युत के खम्बे देखें ही होंगे, जिनकी सहायता से हमें घर बैठे विद्युत की सुविधा प्राप्त होती है|

जल शुद्धिकरण की प्रक्रिया The process of water Purification

जल को अमृत के समान दर्जा दिया गया है जिसके बिना जीवन का कोई अस्तित्व नहीं होता| आधुनिक युग में जल प्रदूषण एवं उसके कारणों के बारे में काफी चर्चा की जाती है, और हो भी क्यों न, पीने योग्य जल की घटती मात्रा काफी चिंता का विषय बन चुका है|

रोजाना बढती टेक्नोलॉजी एवं कीटनाशको एवं रासायनिक केमिकैल्स के कारण नदियों, झीलों एवं समुंद्र का जल दूषित हो गया है अत: आज हम यहाँ जल को शुद्ध करने के कुछ असरदार तरीकों का विस्तार से विवरण देंगे जिससे आप अपनी पेयजल की कमी को पूरा कर सकते है|

जल शुद्धिकरण की असरदार प्रक्रियाएं:

वाटर प्यूरीफायर जल शुद्धिकरण का आधुनिक तरीका है एवं आज लगभग सभी घरो में इसका होना अनिवार्य है, किन्तु फिर भी हरेक कोई इसे नहीं खरीद सकता इसलिए शुद्धिकरण की ये तकनीक की जानकारी होना अनिवार्य है:-

फिल्ट्रेशन:

जल को शुद्ध करने का यह साधारण उपाय है| इस प्रक्रिया में कपड़े एवं कार्टरिज के द्वारा जल से मिटटी, रेत, आदि के कणों को पानी से अलग किया जाता है| बाजार में अलग-२ आकार के फ़िल्टर मौजूद है जिसे घरेलू स्तर एवं बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है|

ये फ़िल्टर विभिन्न आकारों में उपलब्ध होते है जैसे डिस्क शेप, स्पयिरल, आदि| किन्तु इन फिल्टर्स से जल में मौजूद भारी धातुओं को अलग नहीं किया जा सकता| फिल्टर्स में माइक्रोफिल्टर्स एवं अल्ट्रा फिल्टर्स ज्यादा प्रचलित होते है एवं ये जल को पीने योग्य बनाने में सहायक होते है|

रिवर्स आस्मोसिस:

यह प्रक्रिया फिल्टर्स की तुलना में महंगी है, इसमें नैनो फ़िल्टर सिस्टम का प्रयोग किया जाता है| इसमें पानी को तेज प्रेशर के साथ एक बारीक़ झिल्ली में से गुजारा जाता है जिससे उसकी सब अशुद्धीया, कीटाणु, मिटटी, माइक्रोबस, आदि का सफाया हो जाता है|

इस प्रणाली को R.O सिस्टम भी कहा जाता है एवं यह आधुनिक समय में काफी लोकप्रिय है, खर्चीली होने के साथ इसमें पानी काफी बहता है जो की जल का दुरूपयोग कहा जा सकता है|

जल का विसंक्रमन:

पानी को संक्रमन से बचाने के लिए क्लोरिन, ओजोन आदि का प्रयोग किया जाता है क्योकि जल में हानिकारक बैक्टीरिया होते है जो सेहत को नुकसान पंहुचा सकते है| किन्तु क्लोरिन या इसके जैसे अन्य केमिकल के इस्तेमाल से पानी हैलोएसिडिक जैसे तत्व पैदा हो जाते है एवं वह भी सेहत के लिए हानिकारक होते है|

जल को विसंक्रमित करने के लिए अल्ट्रा वोइलेट किरण कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए सबसे लोकप्रिय तरीका है जिससे बैक्टीरिया निष्क्रिय हो जाता है एव पानी पीने योग्य बनाया जाता है|

नैनोतकनीक:

कार्बन नैनो प्रणाली के द्वारा जल के अच्छे अणुओं को बचाकर उसे जीवाणु, बैक्टीरिया आदि से रहित करना इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य है जिसपर सभी वैज्ञानिक एकमत है एवं अनुसन्धान की प्रक्रिया जारी है|

इसमें खोजकर्ताओ ने मनुष्य के बाल से कही ज्यादा बारीक़ नैनो फाइबर एवं ट्यूब्स का निर्माण किया है जो जल में मौजूद सूक्ष्म से सूक्ष्म बैक्टीरिया एवं गंदगी का सफाया करने में सक्षम होंगे|

वैज्ञानिको का मानना है, कि यह तकनीक सबसे अधिक कारगर साबित हो सकती है क्योकि इसमें जल को शुद्ध करने के लिए ऊर्जा की खपत कम होगी एवं जल का दुरूपयोग को भी रोका जा सकेगा|

जल शोधक:

प्राय: पीने योग्य जल की आपूर्ति का कार्य प्रत्येक शहर या राज्य में नगरपालिका द्वारा सम्भाला जाता है| किन्तु कई बार संसाधनो की कमी के कारण या पर्याप्त जानकारी के आभाव में इस कार्य में कोई न कोई कमी रह जाती है|

शुद्ध जल जीवित रहने के लिए अत्यंत आवश्यक है इसलिए जल शोधन यंत्रो का इतना प्रचलन बढ़ता जा रहा है जल शोधक अलग-२ प्रकार के आते है अत: यदि आपके घर में जल शोधक पहले से विद्यमान है या आप लगाने का सोच रहे है तो आपको पता होना चाहिए कि आपके घर आने वाले पानी में कौनसी अशुद्धियाँ है जिससे जल शोधक का चुनाव करने में आसानी हो|

इसके लिए आप जल का परिक्षण करवाकर जान सकते है जैसे यदि पानी में सिर्फ मिटटी, रेत आदि की मात्रा अधिक है तो समान्य फ़िल्टर भी इसे दूर कर सकता है किन्तु यदि जल में बैक्टीरिया, जीवाणु आदि है तो आप U.V. फ़िल्टर लगवा सकते है|

यदि जल में फ्लोराइड, कैडमियम, निकिल या अन्य धातु या कोई हानिकारक रसायन दिखाई देता है तो R.O. फ़िल्टर लगवाना जरूरी हो जाता है|    

सोलर पैनल कैसे काम करता है? Solar Panel in Hindi

सोलर पैनल का नाम तो सब ने सुना ही होगा, जिसे सोलर सिस्टम भी कहा जाता है। आज के समय में विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आने के लिए ऊर्जा के पर्याप्त स्त्रोत उपलब्ध होने अति आवश्यक हैं। ऊर्जा स्त्रोत की श्रृंखला में ही एक बेहतर स्त्रोत सोलर पैनल भी है।

यह ऊर्जा का सबसे उपयुक्त स्त्रोत माना जाता है क्योंकि प्रदूषण मुक्त ऊर्जा पैदा करता है तथा प्रदूषण नियंत्रण में सहायक सिद्ध होता है। इसमें किसी प्रकार के ईंधन या पेट्रोल या डीज़ल की आवश्यकता नही रहती है और न बिजली का उपयोग होता है, क्योंकि यह सूर्य की रोशनी से काम करता है।

आसान भाषा में कहे तो यह धूप के जरिये ऊर्जा प्राप्त करके हमे ऊष्मा (विद्युत) उपलब्ध करवाता है।

आइये अब जानते हैं कि सोलर पैनल कैसे कार्य करता है? कैसे सूर्य की रोशनी से हमें ऊर्जा प्राप्त होती है?

सर्वप्रथम जानते हैं कि सोलर पैनल की बनावट में ऐसा क्या होता है, जिससे ऊर्जा बनती है। ततपश्चात इनके कार्य करने की प्रक्रिया पर भी आपको जानकारी उपलब्ध करवायेंगे।

सोलर पैनल की बनावट व कार्यविधि-

सूर्य से निकलने वाली रोशनी में जो ऊर्जा के कण पाये जाते हैं, उन कणों को “फोटॉन” कहा जाता है। फोटॉन को ऊष्मा या विद्युत के रूप में प्राप्त करने को ही “सौर ऊर्जा” कहते हैं। सूर्य से प्रत्यक्ष रूप में ऊर्जा प्राप्त करने के लिए ही “सोलर पैनल” का इस्तेमाल किया जाता है।

सौर पैनल में परस्पर सम्बद्ध सौर सेल लगे होते हैं। सौर सेल को “सौर बैटरी” भी कहते हैं।

इसके अतिरिक्त इन्हें “फोटोवोल्टिक सेल” भी कहा जाता है, यह शब्द ग्रीक भाषा से सम्बंधित है। ये बहुतायत में एक-दूसरे से जुड़े हुए होते हैं। ये सौर सेल “सिलिकॉन” की परतों से बने हुए होते हैं। सिलिकॉन अर्द्धचालक प्रकृति की धातु होती है। इनकी बनावट में सेल की परतों को इस प्रकार से रखा जाता है कि ऊपर वाली परत में ज्यादा मात्रा में इलेक्ट्रॉन पाये जाते हैं। सेल में एक तरफ धनात्मक व दूसरी तरफ ऋणात्मक आवेश पाया जाता है।

जब सूर्य की रोशनी इन सेल पर पड़ती है तो सेल द्वारा फोटॉन की ऊर्जा अवशोषित की जाती है और ऊपरी परत में पाये जाने वाले इलेक्ट्रॉन सक्रिय हो जाते हैं। तब इनमें बनने वाली ऊर्जा का प्रवाह होना आरम्भ होता है। धीरे-धीरे ये ऊर्जा बहती हुई सारे पैनल में फैल जाती है। इस प्रकार से सोलर पैनल ऊर्जा का निर्माण करते हैं। सोलर पैनल में आवश्यकता से अधिक ऊर्जा का निर्माण करके अत्यधिक गर्म होने पर यह खतरनाक भी हो सकता है। अतः इनमे ऊर्जा के नियंत्रण के लिए तथा इसमें सुरक्षा बनाये रखने के लिए सेल में डायोड का भी प्रयोग किया जाता है।

सोलर पैनल दो तरह के होते हैं-

# मोनोक्रिस्टेलिन सोलर पैनल- ये उच्च गुणवत्ता वाले सोलर पैनल होते हैं। इनके निर्माण में एकल सिलिकॉन क्रिस्टल का प्रयोग किया जाता है। ये सूर्य की हल्की रोशनी से भी ऊर्जा प्राप्त कर के हमे विद्युत प्रदान करते हैं। इनमे कम समय में भी अधिक विद्युत या ऊष्मा उत्पादन करने की विशेषता पाई जाती है। इसी कारण ये महंगे भी होते है। ऊँचे स्तर पर सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाले क्षेत्र में इनका उपयोग उचित रहता है।

# पोलीक्रिस्टेलिन सोलर पैनल- ये अपेक्षाकृत कम महंगे होते हैं। इनके निर्माण में सिलिकॉन के एकल क्रिस्टल का प्रयोग न करके अलग-अलग क्रिस्टल का प्रयोग किया जाता है। साधारण प्रयोग के लिए ये सोलर पैनल उपयोगी सिद्ध होते हैं।

इसके अतिरिक्त आवश्यकता के आधार पर सोलर पैनल के भिन्न-भिन्न आकार होते हैं। बड़े उद्योगों या कार्यों में विद्युत के अधिक उपयोग के लिए बड़े सोलर पैनल इस्तेमाल किये जाते हैं।

सोलर पैनल का महत्व-

सोलर पैनल का सबसे बड़ा फायदा और विशेषता यह है कि ये प्रदूषण फैलाये बिना हमे ऊर्जा या ऊष्मा उपलब्ध करवाते हैं। इनमे विद्युत निर्माण के दौरान न कोई विषैली गैस विसर्जित होती है और न ये वायु को प्रदूषित करती है। इनमें ऊर्जा निर्माण के दौरान कोई तीव्र ध्वनि उत्पन्न नही होती, जो कि ध्वनि प्रदूषण मुक्ति का उदाहरण है। सोलर पैनल कोई विकिरण प्रभाव भी नही डालते हैं। सोलर पैनल के अतिरिक्त ऊर्जा के जितने भी स्त्रोत हैं वे किसी न किसी रूप में प्रदूषण से युक्त होते हैं।

आजकल कृषि क्षेत्र में खेतों में बहुतायत से सोलर पैनल का इस्तेमाल होने लगा है, जो कि अत्यन्त आसान तरीका है। बिना किसी बिजली के कनेक्शन के प्राकृतिक रूप से बिजली उपलब्ध हो जाती है, जो खेतों में कृषि उपकरणों को चलाने में सहायता करती है। 

घरों में भी छतों पर सोलर पैनल लगाये जाने लगे हैं। सर्दियों के मौसम में गर्म पानी करना व विद्युत के लिए सौर ऊर्जा का प्रयोग करके खर्चे में भी कमी की जा सकती है तथा वातावरण को भी प्रदूषण मुक्त रखने में सहयोग किया जा सकता है।

इसका प्रयोग हम पानी गर्म करने या विद्युत के रूप में कर सकते हैं।

इसके अलावा आर्थिक रूप से भी इनका मूल्य उचित होने पर फायदेमंद रहते हैं तथा इनकी संभाल व देखरेख में कोई विशेष परिश्रम करने की भी आवश्यकता नही होती है|

क्या है सैटेलाइट एवं कैसे करता है कार्य? What is satellite in Hindi

सैटेलाइट को कृत्रिम उपग्रह भी कहा जाता है। यह पृथ्वी की परिक्रमा करता है, जिस प्रकार से चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है।

परन्तु चन्द्रमा प्राकृतिक उपग्रह है, जबकि सैटेलाइट को पृथ्वी पर निर्मित करके अंतरिक्ष में भेजा जाता है। गुरुत्वाकर्षण बल के नियमों के कारण ये अंतरिक्ष में यथास्थिति में रहकर घूर्णन करते रहते हैं।

ये एक मशीन है, जिसे विभिन्न उद्देश्यों व जानकारियों को एकत्र करने के लिए बनाया गया तथा अंतरिक्ष में भेजा गया। हम आपको आगे इसी लेख में इसकी आवश्यकता व महत्व के बारे में भी बतायेंगे।

सर्वप्रथम 4 अक्टूबर 1957 को सोवियत संघ द्वारा पहला उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा गया था, जिसका नाम “स्पुतनिक 1” था। “सर सेर्गेई कोरोलेव” द्वारा इस सैटेलाइट का प्रारूप तैयार किया गया था।

सैटेलाइट की बनावट

सैटेलाइट के बाहर दोनों ओर ऊर्जा ग्रहण करने के लिए सोलर पैनल लगे हुए होते हैं। इनसे ही सैटेलाइट में ऊर्जा सदैव बनी रहती है। इनके मध्य भाग में ट्रांसमीटर लगे हुए होते है, इन्हें रिसीवर भी कहा जाता है, क्योंकि इनसे ही अंतरिक्ष, पृथ्वी व अन्य ग्रहों सम्बन्धी समस्त जानकारी प्राप्त की जाती है तथा जानकारी का संचार भी इन्हीं के माध्यम से किया जाता है। 

सैटेलाइट की दिशा या सिस्टम में कोई परिवर्तन करने के लिए अंतरिक्ष में उस तक पहुँचा नही जा सकता। अतः इसे पृथ्वी पर रहते हुए ही सिस्टम में बदलाव के लिए इसमें कंट्रोल मशीन की भी सुविधा पाई जाती है, जिससे दूर बैठे ही इसके स्थान या दिशा परिवर्तन हो जाता है। इस प्रक्रिया को रिमोटली कंट्रोल करना कहते हैं।

चूँकि सैटेलाइट अलग-अलग प्रकार की होती है। इनको अलग-अलग उद्देश्यों के लिए बनाया जाता है, जैसे- पृथ्वी की तस्वीरें लेने के लिए, अंतरिक्ष में हो रही हलचल की जानकारी के लिए, अन्य ग्रहों व उपग्रहों की तस्वीरों के लिए, स्कैनिंग करने के लिए, वीडियो आदि। इस प्रकार उद्देश्य के आधार पर सैटेलाइट की बनावट में भी भिन्नता पाई जाती है।

यदि तस्वीरों के लिए सैटेलाइट का उपयोग हो उसमें उच्च गुणवत्ता वाले बड़े कैमरे लगे होते हैं। 

यदि स्कैनिंग या वीडियो के लिए सैटेलाइट बनाई हो तो उसमे स्कैनर या वीडियो रिकॉर्डर लगे होंगे।

सैटेलाइट कई प्रकार के होते हैं। उद्देश्यों के आधार पर इनमें आकार व बनावट आदि की विशेषताओं में भिन्नता पाई जाती है। इनमें आवश्यकता के अनुसार ही सहायक मशीनें व उपकरण लगाये जाते हैं। इन अलग-अलग प्रकार के सैटेलाइट के नाम हैं-

मौसम (weather) सैटेलाइट, टेथर सैटेलाइट, अंतरिक्ष स्टेशन, किलर सैटेलाइट, आविक्षण सैटेलाइट, पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट, संचार सैटेलाइट, नेविगेशन सैटेलाइट, जैवीय सैटेलाइट, खगोलीय सैटेलाइट।

सैटेलाइट को उसके उद्देश्य के अनुसार पृथ्वी से निश्चित दूरी पर भेजा जाता है। इस दूरी का निर्धारण विशषज्ञों द्वारा किया जाता है।अतः दूरी की स्थिति के आधार पर सैटेलाइट के तीन प्रकार होते हैं-

लॉ अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट- जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो रहा है कि ये सैटेलाइट पृथ्वी के सबसे नजदीक स्थित सैटेलाइट है, जिनकी दूरी 160-1600 किलोमीटर तक हो सकती है। ये तीव्र गति से पृथ्वी के चारों ओर घूर्णन करते हैं 

मीडियम अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट- ये पृथ्वी से 10हजार-20हजार किलोमीटर की दूरी पर स्थित सैटेलाइट हैं। इनकी गति अधिक तीव्र नही होती है। इनको पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करने के लिए 12 घण्टे का समय लगता है।

हाई अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट- नाम के अनुसार ये सबसे अधिक दूरी पर स्थित सैटेलाइट होते हैं। इनकी गति पृथ्वी की गति के लगभग बराबर होती है और ये पृथ्वी से लगभग 36हजार किलोमीटर की दूरी पर होते हैं।

सैटेलाइट का महत्व

सैटेलाइट का हमारे जीवन में सुरक्षा की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है। इसका उपयोग प्राकृतिक आपदाओं के पूर्वानुमान के लिए किया जाता है। वातावरण में हो रही मौसम सम्बन्धी हलचल का अनुमान व गणना करके सैटेलाइट द्वारा सन्देश भेज दिए जाते हैं तथा बाढ़, चक्रवात, भूकम्प, सुनामी आदि प्राकृतिक आपदाओं के धरती पर आने से पूर्व से चेतावनी मिल जाती है, जिससे समय रहते बचाव कार्य किये जा सकते हैं।

कुछ सैटेलाइट द्वारा पृथ्वी का रंगीन नक्शा भी निर्मित करके भेजा जाता है। आज यदि के समय में इंटरनेट के माध्यम से हम दुनिया के किसी भी भाग का नक्शा मोबाईल या कम्प्यूटर आदि किसी में भी देख सकते है तथा यात्रा के दौरान मार्ग देखने के लिए नेविगेशन आदि का बेहतर उपयोग करते हैं तो इसका एकमात्र श्रेय सैटेलाइट को जाता है।

महासागरीय हलचल व गतिविधियों तथा  पर्यावरण व वातावरण में हो रहे बदलाव आदि की जानकारी को सैटेलाइट के माध्यम से ही ग्रहण किया जाता है। धरती पर जल-स्तर में हो रही कमी अधिकता, हरियाली का क्षेत्र तथा अग्नि की स्थिति को भी सैटेलाइट के माध्यम से देखा जा सकता है।

इसके अतिरिक्त अंतरिक्ष सम्बन्धी बहुत सी जानकारियों को सैटेलाइट के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। अंतरिक्ष सम्बन्धी अनुसन्धान कार्य में यह बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। ग्रहों की दिशा में हो रहे परिवर्तन, ग्रहों की चाल, तारों व उल्कापिंडों आदि के टूटने या गिरने की भी जानकारी तथा अन्य कोई भी खगोल विषय सम्बन्धी जानकारी सैटेलाइट से प्राप्त की जाती है। आकाशगंगा व ग्रहों की तस्वीरें भी सैटेलाइट से ली जाती हैं|

कंप्यूटर को किसने बनाया

कंप्यूटर

आज के वक़्त में कंप्यूटर एक जरूरत बन चुका है जिसका लगभग हर क्षेत्र में उपयोग होता है। चाहे आप को कोई बुकिंग करनी हो या किसी प्रकार की जानकारी को प्राप्त करना हो। हर जगह कंप्यूटर का उपयोग होता है और हो भी क्यो न कंप्यूटर्स ने हमारी के परेशानियों को चुटकी में जो हल कर देता है।

कंप्यूटर एक ऐसा डिवाइस है जो हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की मदद से चलता है। और इसका इस्तेमाल हम किसी प्रकार के डेटा को स्टोर और सेंड करने के लिए करते है। पर सबसे पहले कंप्यूटर को इतनी सारी चीज़ों को करने के लिए नही बनाया गया था जितनी चीज़ें हम आज के वक़्त में अपने कंप्यूटर पर करते है। सबसे पहले कंप्यूटर को केवल गणना करने के लिए बनाया गया था ताकि बड़ी संख्याओं की गणना आसानी से हो सके। सबसे पहले कंप्यूटर का आविष्कार चार्ल्स बब्बगे को माना जाता है। क्योकि सबसे पहले उन्होंने ही प्रोग्रामेबल कंप्यूटर डिज़ाइन तैयार किया था।

सन 1882 में चार्ल्स बब्बगे ने डिफरेंशिअल इंजन नाम के कंप्यूटर का आविष्कार किया था पर प्रयाप्त पैसो न हो पाने की वजह से यह पूरा नही हो सका था। इसके बाद इलेक्ट्रो मैकेनिकल कंप्यूटर को संयुक्त राष्ट्र के नेवी ने बनाया था। इसका नाम तारपीडो डेटा कंप्यूटर रखा गया था। इसके बाद 1939 में पहली बार वैक्यूम ट्यूब्स का इस्तेमाल किया गया जो कि कॉनराड जूस ने Z2 कंप्यूटर में किया तथा यह सबसे पहला इलेक्ट्रो मैकेनिकल कंप्यूटर था। एक अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. हारवर्ड माइकल ने 1944 में हारवर्ड विश्वविद्यालय में कंप्यूटर की स्थापना की जिसका नाम मार्क-1 था। इसके बाद बेल लेबोरटरी में 1947 में ट्रांजिस्टर का आविष्कार किया था।

यह एक स्विच की तरह काम करता है जो कि सर्किट को ऑन या ऑफ करता है। तथा यह एंपलीफायर की तरह भी कार्य करता है। जैसे ही ट्रांजिस्टर का उपयोग कंप्यूटर की दुनिया मे होने लगा तभी से कंप्यूटर की दुनिया मे बदलाव आने शुरु हो गए और जो कंप्यूटर्स किसी वक़्त में लगभग एक कमरे के बराबर होते थे वो अब छोटे हो गए थे। और इसके बाद माइक्रोप्रोसेसर आ गए और फिर इनका इस्तेमाल कंप्यूटर्स में होने लगा जिससे कि कंप्यूटर्स की दुनिया पूरी तरह से बदल गयी और कंप्यूटर्स की डेटा प्रोसेसिंग स्पीड भी काफी बढ़ गयी था कंप्यूटर्स का प्राइस भी कम हो गयी।

जीपीएस क्या है , यह कैसे काम करता है

gps system

आज के इस तकनिकी दौर में जीपीएस का नाम तो आप सबने सूना ही होगा, यह विकल्प आजकल हर तरह के मोबाइल फोन में भी देखने को मिल जाते हैं। यह एप्लीकेशन आपसे पहले आपकी लोकेशन जांचने की इजाजत मांगता है, जब आप जीपीएस ऑन कर देते हैं तो यह एप्लीकेशन काम करना शुरू कर देती है। मगर क्या आपने कभी सोचा है जीपीएस क्या है ? आइये हम आपको बताते हैं, यह क्या है और किस तरह काम करता है।

जीपीएस का फुल फॉर्म “Global positioning system” होता है, इसका उपयोग कहीं की भी लोकेशन का पता करने के लिए किया जाता है। इस उपकरण का आविष्कार सबसे पहले 1960 में अमेरिका की डिफेंस डिपार्टमेंट ने अमेरिकी सेना के लिए किया था। उस वक्त तक इस उपकरण का उपयोग अमेरिकी सेना ही कर सकती थी। मगर इसके बाद 1995 में यह उपकरण सभी के लिए बना दिया गया। इसी का परिणाम है कि यह आजकल हमारे मोबाईल में भी देखने को मिल जाता है। इस उपकरण का सबसे ज़्यादा उपयोग रास्ता ढूंढने के लिए किया जाता है।

इस उपकरण का उपयोग आज के दौर में काफी ज़्यादा किया जाता है। यह आपको मोबाईल के अलावा हवाई जहांज, रेल यहाँ तक की गाडियों में भी आसानी से देखने को मिल जाता है। इसकी सहायता से हम कहीं भी बड़ी आसानी से पहुँच सकते हैं।

जीपीएस सेटेलाईट से जुड़ कर काम करता है, इसके लिए अमेरिका ने करीब 50 से ज़्यादा सेटेलाईट अन्तरिक्ष में भेजे हैं। यह सेटेलाईट हर समय पर प्रथ्वी पर सिग्नल भेजने का काम करते हैं। इन सिग्नल को रिसीव करने की जरुरत पड़ती है अगर आपकी कार या मोबाईल में वो रिसीवर है तो आप अपनी लोकेशन जांच सकते हो।  ये सिर्फ लोकेशन ही नहीं आपकी दुरी, गति तथा दूसरी जगह से आपकी जगह तक की दुरी सब कुछ बता देती है।

दूरसंचार किसे कहते है

दूरसंचार

दूरसंचार वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से हम काफी दुरी पर भी जानकारी का आदान प्रदान कर सकते हैं।  इस व्यवस्था के द्वारा हम अपनी आवाज़, डाटा, विडियो को दूसरी जगह ट्रांसमिट कर सकते हैं और दूसरी जगह की जानकारी को रिसीव भी कर सकते हैं। दूरसंचार के अंतर्गत टेलीफोन , माइक्रोवेव संचार, फाइबर ऑप्टिक्स, उपग्रह, रेडियो, टेलीविजन प्रसारण, इंटरनेट और टेलीग्राफ आते हैं जिनका इस्तेमाल करके हम जानकारी का आदान प्रदान करते हैं। 

उधारण: आप इस समय अगर इन्टरनेट चला रहें हैं तो आप इस पेज को दूर संचार के माध्यम से देख रहे हैं। इन्टरनेट टेलीफोन के तारो द्वारा प्रसारित किया जाता है। टेलीफोन, मोबाइल जिससे आप बात करते है दूरसंचार के महत्वपूर्ण अंग है।

दूरसंचार के दुनिया में सबसे पहली क्रांति, अलेक्जेंडर ग्राहम बेल के द्वारा टेलीफोन के अविष्कार के बाद आई। भारत  में सूचना क्रांति भी इन्टरनेट के माध्यम से ही सुरु हुआ।