वायु प्रदूषण व मानव जीवन Air Pollution and Human Life

वायु का महत्व आप इस तथ्य से समझ सकते हैं कि बिना वायु के सामान्य मनुष्य 5-7 मिनट तक ही जीवित रह सकता है और कुछ समय पश्चात् ही वायु के अभाव में दम घुटने से मृत हो जाता है।

वर्तमान समय में बहुत से ऐसे कारण हैं जो वायु की शुद्धता में धीरे-धीरे कमी पैदा कर रहे हैं। कार्बन डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन व अन्य विषाक्त कणों आदि से वायु दूषित हो जाती है। ऐसी विषैली वायु में श्वास लेने से ये दूषित तत्व श्वास के जरिये हमारे शरीर के भीतर पहुँच कर दुष्प्रभाव पैदा करते हैं।

इस लेख में हम आपको बताना चाहते हैं कि वायु प्रदूषण कैसे मानव जीवन के लिए घातक है और ऐसा खतरा मनुष्य स्वयं ही अपने लिए पैदा कर रहा है। 

यूँ तो वायु प्रदूषण के बहुत से कारण हैं, मगर उन तमाम कारणों की कहीं न कहीं एक मुख्य वजह है, जो वायु प्रदूषण के साथ-साथ अन्य प्रकार के प्रदूषणों को भी बढ़ा रहा है और वह वजह है- जनसंख्या वृद्धि।

जनसंख्या वृद्धि के कारण शहरीकरण बढ़ रहा है। शहरों का क्षेत्र बढ़ाने के लिए पेड़ों की कटाई की जाती है, जिससे वायु में ऑक्सीजन की कमी आती है,कार्बन डाई ऑक्साइड अधिक हो जाती है और वायु में शीतलता का अभाव आता है। 

लोगों की संख्या में बढ़ोतरी से प्रत्येक प्रकार के उत्पादों की माँग भी बढ़ती है। माँग की पूर्ति के लिए उत्पाद निर्माण का कार्य करने वाले मिल व कारखानों की संख्या में वृद्धि भी स्वाभाविक है। फलस्वरूप इनसे निकलने वाला धुंआ अत्यधिक विषाक्त तत्वों से युक्त होता है, जो वायु को भी विषाक्त कर देता है। ऐसी वायु में सांस लेना मानव के लिए अत्यन्त हानिप्रद सिद्ध होता है और कई बीमारियों के कारण पैदा होते हैं। 

आज के समय में लगभग प्रत्येक घर में एक या अधिक दुपहिया वाहन हैं और बहुत से लोगों के पास चार पहिया वाहन भी हैं। जितनी अधिक आबादी होगी, उतनी ही अधिक संख्या मे वाहनों के प्रयोग में बढ़ोतरी होती जायेगी। वाहनों से निकलने वाले दूषित धुंए से वातावरण में साँस लेना मुश्किल हो जाता है और कई बड़े शहरों में तो यह प्रदूषण इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि सब धुंधला दिखाई पड़ने लगता है और चारों ओर दूषित वायु दिखाई पड़ती है, जो कि आँखों में भी जलन पैदा कर देती है।

कृषि कार्य में जब फसल पैदा हो जाती है तो पैदावार के बाद बचे अवशेष या फसल के नष्ट होने पर उसको विनष्ट करने के लिए आग लगा दी जाती है, जिससे बहुत बड़े क्षेत्र में धुंआ फैलता है और सारा वातावरण प्रदूषण से भर जाता है। यह कई रोगों को न्यौता देता है।

इन सबके अलावा और भी बहुत से कारणों से वायु दूषित हो रही है। इन्सान अपनी अनदेखी की वजह से भी वायु प्रदूषण में सहयोगी है।

आप जान ही गए होंगे कि वायु प्रदूषण से मानव दिन-ब-दिन रोगों का शिकार हो रहा है। वायु प्रदूषण की समस्या किसी एक शहर, राज्य या देश की नही है, अपितु पूरे विश्व की है। यह वैश्विक स्तर पर फैल चुका है। अंतर बस यही है कि कहीं पर इसका प्रभाव ज्यादा है और कहीं पर कम। भारत में तो वायु प्रदूषण उच्च स्तर पर ही है।

श्वसन रोग, आँखों के रोग, कैंसर व अन्य स्वास्थ्य को हानि देने वाले रोगों का एक कारण वायु प्रदूषण भी है। मनुष्य अपनी ही लापरवाही से अपने लिए खतरे पैदा कर रहा है। वर्तमान व भावी नुकसान से अवगत होने और ज्ञानवान होने के बावजूद भी मनुष्य इस खतरे की गहराई में जाता जा रहा है। यह तो अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।

वैश्विक स्तर पर चल रही इस समस्या में कमी करने के लिए वैश्विक स्तर पर ही प्रयास किये जाने चाहिए, अन्यथा यह बढ़ती ही जायेगी और कभी कम नही हो पायेगी|

जल प्रदूषण के कारण Essay on Water Pollution: Causes and Prevention

आधुनिक समय में जल प्रदूषण अत्यंत चिंता का विषय बना हुआ है एवं इससे लड़ने के लिए कई उपाय किये भी जा रहे है| किन्तु मनुष्य को यह समझना होगा कि यह किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं अपितु सभी को प्रकृति को पहुचाये नुकसान को दूर करने के लिए सहयोग देना होगा|

यदि समय रहते जल प्रदूषण को नहीं रोका गया तो अगले कुछ वर्षों में इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध शायद पानी के लिए हो| इसलिए सबसे पहले जल प्रदूषण के कारणों का पता लगाकर उसे रोकने के उपाय किये जाने चाहिए| इसके कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार है:-

औद्योगिक व तकनीकी विकास- उद्योगों व तकनीकी कार्यविधियों के दौरान कई तरह के ठोस व द्रव अपशिष्ट निकलते हैं, जिनकी निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण ये नाली से नहरों व नदियों में मिलकर जल को जहरीला बना देते हैं।

घरेलू अपशिष्ट पदार्थ- घरों से निकलने वाले कूड़े, मल-मूत्र व अन्य कचरे के नष्ट न होने के कारण यह नालियों के द्वारा जल के अन्य स्त्रोतों में मिलकर जल को दूषित करता है।

धार्मिक प्रचलन- हिंदू धर्म में पूजा सामग्री, शव, अस्थि आदि का नदियों में प्रवाह करने जैसे रिवाज भी जल प्रदूषण जी वजह बनते हैं। ऐसी धार्मिक गतिविधियों के कारण पानी गन्दा हो जाता है।

अम्ल वर्षा- अम्ल वर्षा एक प्रकार के रसायन से युक्त जल की वर्षा होती है। जहाँ कहीं भी अम्ल वर्षा होती है, उस क्षेत्र के जल स्थान में यह अम्ल मिलकर उसे रसायन से युक्त कर देता है और जल हानिकारक हो जाता है।

रासायनिक प्रयोगशाला- कुछ प्रयोगशालाओं में रसायनों के नए-नए प्रयोग किये जाते है और कहीं ऐसे उत्पादों का निर्माण किया जाता है, जिनमें भिन्न-भिन्न रसायनों का उपयोग होता है। ऐसे प्रयोगों व उत्पाद निर्माण के दौरान जो रसायन अपशिष्ट के रूप में निकलने है, वे भी बहते हुए जल में मिलकर जल प्रदूषण का कारण बनते हैं।

खेतों से निकासी- आजकल कृषि कार्य में खेती में वृद्धि के लिए रासायनिक खाद, रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जा रहा है। ये रासायनिक उत्पाद मिट्टी में मिलकर भूमि प्रदूषण करते है तथा खेतों में दिया जाने वाला पानी भी रसायन से युक्त हो जाता है और अतिरिक्त पानी आगे नालियों से निकलता हुआ नहरों में मिलकर जल को भी रसायन युक्त कर के दूषित कर देता है।

ज्ञान का अभाव- ग्रामीण व पिछड़े इलाकों में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें जल प्रदूषण का मतलब ही नही पता, क्योंकि वे पढ़े-लिखे नही है तथा ज्ञान के विभिन्न स्त्रोतों के उपयोग से भी अछूते हैं। ऐसे लोग अपनी अज्ञानता की वजह से जल को दूषित करते जा रहे हैं और वैसे ही दूषित जल का नियमित उपयोग भी कर रहे हैं। फलस्वरूप इससे होने वाले नुकसान को भी झेल रहे हैं।

जन सामान्य की लापरवाही- अधिकतर लोग जो जल-प्रदूषण के नुकसान व कारणों से अनभिज्ञ नही हैं, लेकिन फिर भी वे लापरवाही दिखाते हुए ऐसे कार्य करते हैं जो जल को गन्दा करते हैं। जैसे नहरों के किनारे कपड़े धोना, घर का कचरा नहरों में बहाना, नदी में नहाते हुए मल-मूत्र त्याग देना व साबुन का प्रयोग करना आदि।

जल प्रदूषण के निवारण-

कारणों के ज्ञान से ही निवारण होगा। उपर्युक्त वर्णित सभी कारणों पर ध्यान देकर इन्हें कम करने या खत्म करने के प्रयास से ही जल प्रदूषण में कमी लायी जा सकती है।

समय-समय पर आम जनता को जल प्रदूषण से होने वाले खतरों से सचेत करवाने के कार्य भिन्न-भिन्न माध्यमों जैसे स्कूल, कॉलेज, नुक्कड़ कार्यक्रम, इन्टरनेट, विज्ञापन, टी.वी. आदि के द्वारा किये जाने चाहिए।

घरों, उद्योगों, प्रयोगशालाओं व प्रत्येक स्थान से अपशिष्ट की निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। 

हर व्यक्ति को अपने स्तर पर जल-प्रदूषण की रोकथाम के सुधारात्मक प्रयास करने चाहिए|

जल संरक्षण की आवश्यकता ।Essay on water conservation in Hindi

जल को दूषित होने से बचाना, जल के अनावश्यक उपयोग पर नियंत्रण, जल के व्यर्थ होने पर रोकथाम और जल का उचित उपयोग व बचाव ही जल का संरक्षण है।

प्राचीन समय में जल की गुणवत्ता उचित स्तर की होती थी तथा जल प्रदूषण के स्त्रोत नही पाये जाते थे, परन्तु आज के समय में तकनीकी व औद्योगिक विकास के फलस्वरूप जल की गुणवत्ता में निरन्तर कमी आती जा रही है और जल का दोहन भी बुरे तरीके से हो रहा है। 

कुछ लोगों की अनदेखी व लापरवाही की आदत भी जल की बर्बादी कर रही है।

आज के समय में अंधाधुंध तरीके से जल की बर्बादी की जा रही है। शुद्ध पेयजल की मात्रा निरन्तर कम होती जा रही है। कई बड़े शहरों में तो हालात ऐसे हैं कि वहाँ लोगों को पीने योग्य पानी खरीदना पड़ रहा है, क्योंकि सड़कों पर लगे नल, कुओं, हैंडपम्प का पानी दूषित है व पीने योग्य नही है। नहरों व नदियों का जल स्तर भी घट रहा है और शुद्ध जल की मात्रा में गिरावट आ रही है।

एक अनुमान के अनुसार जब एक नल से बूँद टपकती रहती है तो गणना में एक मिनट में 30 बूँद गिरती है और एक साल में 46 हजार लीटर पानी की बर्बादी होती है।

यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति प्रतीत होती है। इस प्रकार आप जान सकते हैं कि जल की एक बूँद की भी कीमती होती है। 

यदि जल का बचाव व संरक्षण न हो, सुरक्षित न रखा जाए तो इससे कई संकट पैदा हो सकते हैं, जो अत्यन्त दुष्प्रभावी हो सकते हैं। 

आगे इस लेख में हम आपको बता रहे हैं कि जल का संरक्षण करने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? 

क्यों अनिवार्य है जल सरंक्षण?

कृषि कार्य- अन्न का स्त्रोत कृषि कार्य पर भी निर्भर करता है। जल के दुरूपयोग के साथ  संरक्षण की अनदेखी हमारी कृषि पर भारी पड़ सकती है। यदि जल नही होगा तो खेती नही होगी और फसलों की पैदावार नही होगी। जल के अभाव में फसलें सूखकर नष्ट हो जायेगी। अब जरा सोच कर देखिये बिना अन्न के मनुष्य खायेगा क्या और कितने समय तक जीवित रहेगा। 

शारीरिक महत्व- जल को दूषित करना, पेयजल की बर्बादी, जल में अस्वच्छता पैदा होने से पीने योग्य पानी में कमी आएगी और गन्दे पानी के सेवन से शरीर में कई तरह के विकार उत्पन्न होते हैं। त्वचा सम्बन्धी, पेट के रोग, पाचन गड़बड़ी आदि हो जाते हैं। इस प्रकार मनुष्य को अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए जल संरक्षण के लिए उचित प्रयास करते रहना चाहिए, ताकि वे स्वयं तथा उनकी भावी पीढ़ियों को जल अभाव में बुरी परिस्थितियों का सामना न करना पड़े। 

प्राकृतिक आपदाओं से बचाव- ग्लोबल वार्मिंग आज के समय में संकट का चर्चित विषय बना हुआ है। जल का संरक्षण न होने से ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ अन्य संकट जैसे सूखा, वर्षा में कमी, तापमान में वृद्धि आदि अनेक आपदाएँ आ सकती है। ऐसी आपदाओं के परिणाम के बारे में बताने की तो आवश्यकता ही नही है, क्योंकि आप इनसे अनभिज्ञ तो नही हैं। 

इस प्रकार आप अनुमान लगा सकते हैं कि जल का संरक्षण करना हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है। यदि मानव जीवनकाल में विकास करना है तो प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी माध्यम से जल संरक्षण का कार्य करना चाहिए। हमारे द्वारा किया गया जल का संरक्षण स्वयं का व आगे आने वाली नयी पीढ़ी के हित का भी संरक्षण सिद्ध होगा।

आज की गयी लापरवाही घातक हो सकती है। अतः जितना हो सके जल संरक्षण की युक्तियाँ अपनाई जानी चाहिए तथा दूसरों को भी जल संरक्षण के कार्य के लिए प्रेरित करना चाहिए। यह सुधार के पथ पर आगे ले जायेगा|

ग्लोबल वार्मिंग कारण व उपाय (Global Warming: Causes and Remedy)

ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ है भूमण्डलीय ऊष्मीकरण। साधारण तौर पर पृथ्वी पर तापमान की निरन्तर होती वृद्धि को ही ग्लोबल वॉर्मिंग कहते हैं।

पृथ्वी पर ताप प्राप्ति का मुख्य स्त्रोत सूर्य है। सूर्य से आने वाली सौर किरणों पर ही पृथ्वी का तापमान कायम है। ये किरणें कई मण्डलों से गुजरती हुई पृथ्वी के तल तक पहुंचती है और वहीं से टकराकर परावर्तन के कारण वापिस चली जाती है। 

चूँकि यह तो सर्वविदित ही है कि पृथ्वी पर जलवायु व तापमान की विविधता पायी जाती है। एक ही समय में प्रत्येक क्षेत्र की जलवायु एक समान नही रहती है। 

परन्तु बीते कुछ वर्षों में जलवायु व तापमान में असामान्य रूप से परिवर्तन नजर आये हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी के तापमान में तुलनात्मक रूप से निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। कुछ लोगों द्वारा यह भी कहा गया है कि सूर्य की स्थिति परिवर्तित होकर यह धीरे-धीरे पृथ्वी के नजदीक आता जा रहा है, जिससे तापमान में वृद्धि हो रही है। इस तरह  बहुत सी बाते सामने आयी हैं।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण क्या हैं

ग्लोबल वार्मिंग होने का मुख्य निम्न आधार है- 

ग्रीन हाउस गैस- ग्रीन हाउस गैस तापमान में नियन्त्रण बनाये रखती है जिसके अंतर्गत कार्बन डाई ऑक्साइड, मिथेन, आदि गैस शामिल है किन्तु वर्तमान समय में इन गैसेस में वृद्धि होने के कारण तापमान तेजी से बढने लगा है एवं जलवायु में भी तीव्रता से परिवर्तन आया है|कुछ आंकड़ो के अनुसार पिछले कुछ 15 से 20 वर्षो में Co2 का वातावरण में उत्सर्जन 40 से 50% तक बढ़ गया है इसलिए ग्लेशियर तेजी से पिघलते जा रहे है एवं मौसम में बदलाव आया है| 

प्रदूषण- जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, विकिरण प्रदूषण आदि से भी पृथ्वी पर तापमान बढ़ता है। वातावरण प्रदूषण से वर्षा में कमी आती है तथा जहरीली गैसें तापमान का सन्तुलन बिगाड़ती हैं। ताप वृद्धि से ग्लेशियर पिछलने के कारण जलवायु में गड़बड़ पैदा होती है। 

पेड़ों का कटाव-

पेड़ों के कटाव से ऑक्सीजन में कमी आती है और कार्बन डाई ऑक्साइड बढ़ती है, जो कि ग्रीन हाउस गैस में वृद्धि का कारण बनता है। वर्षा में कमी का कारण भी पेड़ों की कटाई है। हरियाली न होने के कारण वायु अशुद्ध व गर्म हो जाती है। ये सब तापमान में बढ़ोतरी करते हैं।

तकनीकीकरण- मशीनों का विकास, कारखाने, वाहन आदि के प्रयोग से वातावरण में अशुद्धता आती है। इसी के साथ एयरकंडीशनर, फ्रीज,कोल्ड स्टोर आदि से निकलने वाली गैसें अत्यधिक हानिकारक होने के साथ-साथ ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करती है तथा तापमान में वृद्धि का कारण बनती हैं।

जनसंख्या वृद्धि- जनसंख्या वृद्धि से अनगिनत समस्याएं पैदा होती हैं। जैसे-जैसे लोगों की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे शहरीकरण बढ़ रहा है, जिससे पेड़ों की कटाई की जा रही है। वाहनों, मशीनों, एयरकंडीशनर, फ्रीज आदि सब का प्रयोग बढ़ रहा है और प्रदूषण भी बढ़ रहा है।

उपर्युक्त सभी कारणों से ग्लोबल वार्मिंग की दर बढ़ती जा रही है।

ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के उपाय-

ग्लोबल वार्मिंग के कारणों पर गौर करके इस पर नियंत्रण करने के लिए कुछ उपाय किये जा सकते हैं। 

ग्रीन हाउस गैस के प्रभाव को बढ़ाने वाले साधनों के प्रयोग पर नियंत्रण किया जाना चाहिए। एयरकंडीशनर, फ्रीज़ आदि के उपयोग में कमी आने से दूषित गैसों की मात्रा में भी कमी आएगी। 

पेड़ों को काटा नही जाना चाहिए, क्योंकि पेड़ों के कटने के ग्लोबल वार्मिंग के अतिरिक्त अन्य कई खतरे पैदा होते हैं। जनसंख्या नियंत्रण के उचित प्रयास कर कई सुधार हो सकते हैं।

अन्ततः जब तक प्रत्येक व्यक्ति को ग्लोबल वार्मिंग के खतरों का ज्ञान न हो तब तक सभी प्रयास नाकामयाब रहेंगे। अतः आम जनता को ग्लोबल वार्मिंग से होने वाले नुकसान के बारे में अवगत करवाया  जाना चाहिए। इस हेतु स्कूलों में विद्यार्थियों को इसका ज्ञान दिया जाना चाहिए तथा जन चेतना कार्यक्रम के तहत सामान्य लोगों तक ज्ञान पहुंचाया जाना चाहिए, ताकि हर व्यक्ति अपनी इच्छा से इस खतरे को कम करने के लिए प्रयासरत रहें|

पर्यावरण की परिभाषाएं और अर्थ (Definitions and meaning of the Environment)

साधारण शब्दों में यदि कहे तो हमारे चारों तरफ का जो वातावरण है, जिसमे सभी जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, प्रकृति, मनुष्य, हवा, पानी, मिटटी आदि तत्व सम्मिलित हो उसे पर्यावरण कहा जाता है|

अंग्रेजी भाषा में पर्यावरण को Environment कहा जाता है जो फ्रेंच भाषा के Environs से लेकर परिष्कृत किया गया है जिसका अर्थ होता है आस-पास या वातावरण|

हिन्दी भाषा में पर्यावरण शब्द दो शब्दों के संयोजन से मिलकर बना है जो है, परि+आवरण| इसमें परि शब्द का अर्थ है हमारे चारों ओर एवं आवरण शब्द का अर्थ है, ढका हुआ अर्थात ऐसा जो हमे चारों ओर से घेरे हुए है या ढके हुए है उसे पर्यावरण कहा जाता है|

पर्यावरण के अंतर्गत वे सभी संजीव एवं निर्जीव चीजे शामिल है जिन्हें हम अपने आस-पास देखते है| मनुष्य को इस कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है जो पर्यावरण को सबसे अधिक प्रभावित करता है|

आज के आधुनिक युग में पर्यावरण एक सोच का विषय बना हुआ है क्योकि जिस वातावरण में हम जीते है सांस लेते है आज वही विभिन्न प्रकार से प्रदूषित हो चुका है एवं समस्त पृथ्वी पर इसके सम्बन्ध में फैसले लिए जा रहे है कि कैसे पर्यावरण को नुकसान से बचाया जाये क्योकि यदि यही साफ़ नहीं होगा तो जीवित प्राणियों का विनाश सम्भव है|   

पर्यावरण के प्रकार:

मोटे तौर पर पर्यावरण की परिभाषा हम सभी जानते होंगे किन्तु भली प्रकार जानने के लिए इसके प्रकार समझने होंगे| वैसे तो इसके बहुत प्रकार है किन्तु मुख्य रूप से इसे तीन भागों में बांटा गया है जो इस प्रकार है:-

प्राकृतिक पर्यावरण:

प्राकृतिक पर्यावरण के अंतर्गत प्रकाश, हवा, पानी, मिटटी, पौधे, ऊष्मा, खाद्य वस्तुएं, खनिज, ज्वालामुखी, जंगल, नदियाँ, पहाड़ आदि सभी सम्मिलित है| ये सभी मनुष्य एवं अन्य संजीवो पर अपना प्रभाव डालती है एवं उसे अच्छे एवं बूरे दोनों तरफ से प्रभावित करती है|

जैविक पर्यावरण:

जैविक पर्यावरण के भी दो प्रकार है जिसमे सभी जीव-जन्तु एवं पेड़-पौधे एवं वनस्पति सम्मिलित है| इसमें ऐसा माना जाता है कि प्रत्येक प्राणी अथवा वनस्पति किसी न किसी रूप में अन्य को प्रभावित करती है|

इस प्रकार में वनस्पति पर्यावरण एवं जन्तु पर्यावरण दोनों आते है| चूँकि ये दोनों ही पर्यावरण के मुख्य अंग है एवं मनुष्य से भी आन्तरिक एवं बाहरी रूप से जुड़े हुए है|

मनो-सामाजिक पर्यावरण:

पर्यावरण का यह प्रकार सीधा प्रकृति से सम्बंधित न होकर मनुष्य के आस-पास के पड़ोस, उसके अन्य संबंधों से जुड़ा हुआ है, जिसमे उसके रहन-सहन, भाषा, पहनावा, आदि का अध्ययन किया जाता है|

पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले कारण:

जैसा कि सर्वविदित है कि पर्यावरण को प्रदूषित करने में मनुष्य का सबसे बड़ा योगदान रहा है| दिन-प्रतिदिन होने वाली वृक्षों की कटाई एवं अपने स्वार्थ के लिए जीव-जन्तुओ को हानि पहुचने के कारण पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ा है|

रोज कारखानों से जहरीली गैसे एवं अपशिष्ट पदार्थ का निष्कासन किया जाता है जिससे जल एवं वायु प्रदूषण को बढ़ावा मिलता है एवं पीने के पानी एवं हवा के खराब होने से विभिन्न प्रकार के असाध्य रोग पैदा होते है|

आज के समय में विकर्णीय प्रदूषण फैलता जा रहा है जिसमे से हानिकारक रेडियोएक्टिव किरने निकलती है जो अप्रत्यक्ष रूप से जीवित प्राणियों को नुकसान पहुचाती है| रोज नये-नये उपकरण खोजे जा रहे है एवं इन्टरनेट के प्रयोग को और आधुनिक बनाने के लिए कभी 3G, 4G, और अब 5G की खोज ने सभी प्राणियों के लिए संकट पैदा किया हुआ है|

पर्यावरण की महत्ता:

पर्यावरण को बचाने के लिए जागरूकता सबसे ज्यादा आवश्यक है| मनुष्य एक बुद्धिमान प्राणी है एवं उसे अन्य जीवों से ज्यादा ज्ञान है| इतना तो मनुष्य को जागरूक बनना होगा कि जहा वह रहता है, खाता है, सांस लेता है, उसे सुरक्षित रखे|

कम्पोस्ट खाद कैसे बनाते है?

कम्पोस्ट खाद, खाद का ही एक रूप है जिसे बनाने के लिए मरे हुए पशुओं के अवशेषों एवं सड़े गले पौधो का प्रयोग किया जाता है| कम्पोस्ट का अर्थ है अच्छे से सड़ा हुआ मतलब खेतों में यह डालने से पहले इसे अच्छे से कम्पोस्ट किया जाना चाहिए जिसके लिए उचित तापमान, नमी, एवं वातावरण की आवश्यकता होती है|

कम्पोस्ट खाद को उचित फसल प्राप्त करने एवं जैविक खेती का प्राथमिक अंग माना जाता है| इससे मिटटी की क्वालिटी में सुधार आता है एवं मिटटी उपजाऊ बनती है एवं पौधो का विकास अच्छे से होता है एवं उनमें पौषक तत्वों की कमी पूरी होती है|

यदि कम्पोस्ट खाद को सही तरीके से बनाया जाए तो पौधो के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं आज यहाँ हम कम्पोस्ट खाद कैसे बनाते है एवं उसके क्या फायदे है इस बारे में चर्चा करेंगे|

कैसे बनाते है कम्पोस्ट खाद?

कम्पोस्ट खाद पहले से तैयार नहीं मिलती अत: आपको इसे खुद ही बनाना पड़ता है जिसका तरीका काफी आसान है|

कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए सबसे पहले एक खड्डा खोदना चाहिए जो कम से कम 3 से 5 फीट गहरा एवं 3 या 4 फीट चौड़ा हो| इस खड्डे में पानी छिडके जिससे इसके आसपास की मिटटी नम हो जाए|

अब इस खड्डे में पत्ते, सड़े-गले पौधे, फलों के छिलके, मरे हुए जानवर के अवशेष आदि डाल दीजिये एवं इसकी 30 सेमी. तक परत बना दीजिये| इसके बाद इसके उपर एक परत गोबर की बिछा दीजिये| यदि आपके पास गोबर नहीं है तो यूरिया का इस्तेमाल भी किया जा सकता है|

इसके बाद इसपर एक बार फिर थोडा पानी छिडके एवं फिर से कचरा पत्ते आदि डाल दे एवं किसी वस्तु से या अपने पैरों से अच्छे से इनको दबाकर सेट करदे एवं पानी डाले| अब इस खड्डे के उपर मिटटी भरदे एवं पानी से अच्छे से छिडकाव करदे|

इसमें कुछ दिनों के बाद थोडा-थोडा पानी छिडकते रहे एवं इसे छेड़े नहीं| तकरीबन 3 से 4 महीने के बाद आपकी कम्पोस्ट खाद बनकर तैयार हो जाएगी| गोबर डालने से इनमे बैक्टीरिया पैदा होगा जो खाद को कारगर बनने में सहायता करेगा|

3-4 महीने के बाद आप खड्डे से इसे निकल सकते है एवं पोषक तत्वों से युक्त यह खाद दिखने में काले रंग की होगी एवं इसमें कोई सडन जैसी बदबू नहीं आयेगी| आवश्यकतानुसार आप इसे अपने खेतो या पौधो में डाल सकते है एवं इससे घर में पड़े बेकार कचरे आदि का प्रयोग भी हो जायेगा|

कम्पोस्ट खाद के फायदे:

कम्पोस्ट खाद पूरी तरह से प्राक्रतिक रूप से तैयार की जाती है जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता साथ ही इसमें कोई विशेष खर्चा भी नहीं आता|

इससे पौधो को आवश्यक तत्व एवं उनमे वृद्धि होती है जो हानिकारण केमिकल्स के छिडकाव करने से कही ज्यादा बेहतर है|

यह मिटटी की उर्वरता शक्ति को बढाता है एवं इससे पानी की भी बचत होती है क्योकि इससे खेतों में पर्याप्त नमी बनी रहती है|

कम्पोस्ट खाद मानव, पौधे, मिटटी, एवं पर्यावरण सबके लिए लाभदायक है एवं किसानो के लिए इसने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है|

ओजोन परत का क्या फायदा है?

आपने काफी बार ओजोन परत के बारे में सुना होगा या पढ़ा होगा| जैसा कि हम सब जानते है कि सूर्य से हानिकारक पराबैंगनी किरणें निकलती है जो यदि सीधा पृथ्वी पर आये तो बहुत नुकसानदायक परिणाम सामने आ सकते है इसलिए पृथ्वी के चारों ओर गैसों के समूह से मिलकर एक परत मौजूद रहती है जिसे ओजोन परत कहा जाता है एवं यही परत सूर्य से आने वाली अल्ट्रावायलेट किरणों से हमारी रक्षा करती है|

ओजोन परत के फायदे:

ओजोन परत के बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना नही की जा सकती क्योकि सूर्य से आने वाली किरणें काफी खतरनाक होती है एवं ओजोन परत इसके प्रभाव को कम करके उतना ही पृथ्वी तक भेजती है|

ओजोन परत पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने में भी सहायता करती है एवं पराबैंगनी किरणों से होने वाले नुकसान को रोकती है|

यह विभिन्न जीव-जन्तुओ को रोगों से बचाती है एवं कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी से भी बचाव करती है|

ओजोन परत के बिना पृथ्वी का कोई अस्तित्व नहीं रहेगा क्योकि यदि UV rays धरती तक पहुच गई तो आप सोच भी नही सकते कि इसका क्या परिणाम होगा|

कैसे बचाए ओजोन परत को?

पर्यावरण प्रदूषण के कारण दिन-प्रतिदिन ओजोन परत पतली होती जा रही है| यह पृथ्वी से करींब 15 से 35 किमी. की ऊंचाई पर उपस्थ्ति रहती है ठीक समताप मंडल के नीचे|

पृथ्वी के इस सुरक्षा कवच को बचाने के लिए वायुमंडल को साफ़ रखना अनिवार्य है| CFC गैसेस एवं वृक्षों की लगातार कटाई, एवं वायु प्रदूषण से ओजोन के ऊपर खतरा बढ़ता जा रहा है जिसका एकमात्र जिम्मेवार इन्सान खुद है|

यदि ओजोन परत को हानि से नही रोका गया तो धरती पर कोई भी मनुष्य या आने वाला शिशु तक निरोगी पैदा नहीं होगा| सब फसलें नष्ट हो जायगी, पानी जहरीला हो जायगा एवं जीवन का कोई आधार शेष नही बचेगा|