यौन संचारित रोग

यौन क्रिया से संचारित होने वाले रोग अर्थात दो व्यक्तियों के मध्य लैंगिक सम्बन्ध बनने से यदि कोई रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के शरीर में पहुंच जाता है, तो ऐसे रोग को यौन संचारित रोग कहा जाता है।

कुछ ऐसे रोग है जो जीवाणुओं के रूप में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में पहुँच जाते हैं, कुछ ऐसे रोग हैं जो विषाणुओं के द्वारा फैलते हैं तथा कुछ अन्य कारणों या जीवों के माध्यम से भी संक्रमित कर देते हैं।

विषाणु जनित रोग-

जेनाइटल वार्ट- यह “ह्यूमन पैपिलोमा वायरस” HPV के कारण होता है। इसमें जननांगों व गुदा मार्ग में मस्से बन जाते हैं। ये मस्से पहले छोटे होते है तथा धीरे-धीरे बड़े होते जाते है। ये दर्दनाक मस्से होते हैं।

जेनाइटल हर्पीज़- इसे जननांग दाद भी कहते हैं। यह “हर्पीज़ सिंप्लेक्स वायरस” के कारण होता है। इसमें जननांगों में दर्द व खाज के साथ छोटे छाले हो जाते है।

एड्स- HIV “ह्यूमन इम्यूनो डेफिशिएंसी वायरस” के कारण एड्स होता है। इस रोग में मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता का ह्रास होता है। प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होता जाता है, जिस वजह से मनुष्य को बहुत से छोटे बड़े रोग घेर लेते है तथा स्वास्थ्य में गिरावट अति जाती है। एड्स में इलाज करवाकर केवल कुछ सहायता हो सकती है, परन्तु यह रोग लाइलाज है।

हैपेटाइटिस बी- “द्विरज्जुकी डी.एन.ए. वायरस” के कारण होता है। रक्त या यौन सम्बन्धों के दौरान यदि यह वायरस शरीर में चला जाता है तो लगभग 25-35 दिन के भीतर यह रोग पैदा हो जाता है।

जीवाणु जनित-

क्लेमाइडियोसिस- “क्लेमाइडिया ट्रैकोमेसिस” नामक बैक्टीरिया से एक सप्ताह में यह रोग उत्पन्न होता है। इसमें पस्स (मवाद) जैसा तरल पदार्थ निकलता है तथा मूत्र मार्ग में पीड़ा उत्पन्न करता है।

गोनोरिया-  सुजाक रोग “नाइसेरिया गोनोरिया” नामक बैक्टीरिया से होता है। एक रोग प्रभावित व्यक्ति से यौन सम्बन्ध बनाने से यह बैक्टीरिया  दूसरे में पहुँच जाता है। इसमें जननांग पर अत्यधिक खाज व सूजन आ जाती है तथा मूत्र त्याग पीड़ादायक हो जाता है व बाधित होता है।

सिफलिस- सिफलिस अर्थात् उपदंश; यह “ट्रेपेनेमा पेलेडम” नामक बैक्टीरिया से फैलता है। इस बैक्टीरिया की आकृति सर्प के समान होती है। इस रोग में शिश्न के शीर्ष भाग पर अल्सर जैसे लाल या भूरे रंग के घाव हो जाते है और कई बार पुरे शरीर पर भी दाने उभर आते हैं। इस रोग से लकवा, गठिया, दिल का दौरा जैसी गम्भीर समस्याएं पैदा होने का भी ख़तरा रहता है।

अन्य कारणों से उत्पन्न होने वाले रोग-

योनि यीस्ट इन्फेक्शन- यह एक संक्रामक रोग है। “कैन्डिडा एल्बीकेन्स” नामक यीस्ट से यह संक्रमण होता है। इसमें जननांगों से यीस्ट जैसा मोटा व कठोर पदार्थ निकलता है।

वेजाइनीटिस- इसे ट्राइकोसोम्यासिस भी कहा जाता है। “ट्राइकोमोनेस वेजिनेलिस” के कारण होता है। इस रोग से जननांगों के भीतर व् आसपास जलन महसूस होती है तथा खुजली भी होती है। मूत्र मार्ग से झागदार तरल पदार्थ निकलता है।

प्यूबिक लाइस- इसमें जननांगों के बालों में जूँ पड़ जाती हैं। जूँ छोटे-छोटे परजीवी होते हैं। ये बालों के पोषण को खत्म कर देती हैं। इनसे प्रभावित हिस्से में अत्यधिक खुजली होती है।

स्कैबीज़-  इसका अर्थ है- खाज या खुजली। यह रोग एक जीव (कीड़े) के कारण होता है। यह शरीर के किसी भी भाग पर हो सकता है, परन्तु यदि स्कैबीज़ रोगग्रस्त व्यक्ति से साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाएं तो यह यौन अंगो में भी फैल जाता है। इसीलिए इसे यौन संचारित रोग कहते हैं।

शेनक्रोयड- यह भी यौन संक्रमित रोग है, जो सहवास के माध्यम से अंतरित होता है। इसमें जननांगों में दर्दयुक्त गिल्टी पड़ जाती है।

मोल्लस्कम कॉन्टागिओसम- त्वचा की बाहरी सतह पर इस रोग का वायरस होता है, जिससे यह रोग होता है। इसमें त्वचा पर गुलाबी रंग के दाने या चकते उभर आते है। रोगी व्यक्ति के साथ यौन सम्बन्ध बनाने से इस रोग की चपेट में आते हैं।

भ्रूणीय विकास  

नर व मादा युग्मक मिलकर युग्मनजों का निर्माण करते हैं। युग्मनज समसूत्री विभाजन द्वारा विभाजित होकर विकास करते हुए एक संरचना का रूप लेते हैं, इस संरचना को ही भ्रूण कहते हैं।

गर्भ धारण करने के लगभग 2 महीने या 8-9 हफ्ते तक गर्भाशय में शिशु जिस रूप में होता है, वह रूप ही भ्रूण कहलाता है।

युग्मनज में समय के साथ-साथ परिवर्तन आते-आते विकास होता रहता हैं तथा विकासशील अवस्था जारी रहती है, इसे ही भ्रूणीय विकास कहते हैं।

मादा शरीर के गर्भाशय में भ्रूण विकास होता है। भ्रूण रोपित होने से लेकर एक शिशु के रूप में गर्भ से बाहर आने तक का पूरा काल लगभग 280 दिन का होता है। जैसे-जैसे भ्रूण विकसित होता है; वैसे-वैसे गर्भाशय का आकार बड़ा होता जाता है।

गर्भधारण करने के शुरुआती दिनों में भ्रूण एक थैली जैसी आकृति में रहता है। इसमें एक खास तरह का तरल पदार्थ होता है।

प्रथम माह- इसमें शिशु के हाथ-पैर व पीठ के हल्के आकार उभरते हैं। आँख, नाक, कान की भी छोटी-छोटी संरचनाएं बननी शुरु हो जाती है। चौथे हफ्ते में भ्रूण में बन रहे शिशु द्वारा ऑक्सीजन ग्रहण की जाती है।

दूसरा माह- इसके प्रारम्भ में ही शिशु के मस्तिष्क  का निर्माण होना आरम्भ होता है। इसी के साथ गर्भनाल भी विकसित होती रहती है। पाँचवे हफ्ते तक भ्रूण में एंडोडर्म, मिसोडर्म व एक्टोडर्म का निर्माण होता है। छठे हफ्ते में हृदय व धड़कन बनती है व भिन्न-भिन्न शारीरिक अंगों के निर्माण की प्रक्रिया का प्रारम्भ होता है।

तीसरा माह- इसमें भ्रूणीय विकास में शिशु का मुख व आँखे स्पष्ट रूप में बन जाती हैं। आंतरिक अंगो का निर्माण व विकास होता है
तथा भ्रूण विकास क्रिया निरन्तर चलती है। बाहरवें हफ्ते में हाथ-पैर की उंगलियों व अंगूठों का निर्माण शुरू होता है।

चौथा व पांचवा माह- इसमें शिशु के सिर व पलकों के हल्के-हल्के बाल आने लगते हैं। चौदहवें हफ्ते में जनन अंगो का निर्माण हो जाता है व लम्बाई बढ़ती है। गर्भाशय का आकार बढ़ता है। मसूड़े व दाँत बनने लगते है। पांचवे माह में शिशु क्रिया करने लगता है तथा स्त्री को भी गर्भ में हो रही क्रियाओं का अनुभव होता है।

छठा व सातवां माह- इसमें शिशु और  विकसित हो जाता है। इसमें शिशु हाथ-पैर चलाना शुरू कर देता है। इस दौरान गर्भस्थ शिशु को हिचकियां आना भी सामान्य बात है। सातवें हफ्ते के मध्य तक शिशु की थोड़ी-थोड़ी पलकें खुलना प्रारम्भ होती हैं।

आठवां माह- इसमें शिशु के शरीर में ओर विकास होने लगता है, बड़ा होने लगता है तथा वजन बढ़ता है। सभी बाह्य व आंतरिक अंग पूर्ण रूप से निर्मित हो चुके होते हैं। शिशु के ऊपरी हिस्से में स्थिरता आती है।

नौवां माह-  इसमें यह पूर्ण रूप से विकसित हो चुका होता है तथा एक निश्चित अवधि के बाद प्रसव द्वारा गर्भाशय से बाहर आता है।

भ्रूण के विकास के भी भिन्न-भिन्न चरण होते है। नर व मादा (शुक्राणु व अण्डाणु) युग्मकों के निर्माण से साथ यह प्रारंभ होती है।

यौन सम्बन्ध बनाने के दौरान जब नर द्वारा अपने वीर्य का स्रवण मादा की योनि मार्ग में कर दिया जाता है, तब इनके मिलने से युग्मनजों का निर्माण होता है अर्थात् निषेचन हो जाता है।

इसके बाद मादा में गोल संरचनाओं का निर्माण होता है, जिन्हें कोरकपुटिका कहा जाता है। यह संम्पूर्ण क्रिया विदलन कहलाती है।

ये संरचनाएं मादा के भीतर गर्भाशय की सतह पर स्थित हो जाती है, इसी से भ्रूण रोपित होता है।

भ्रूण के बनने के साथ ही गर्भाशय में अपरा (आंवल) का निर्माण होता है। अपरा के द्वारा ही भ्रूण के विकास हेतु रुधिरवाहिनियों से रुधिर गमन होता है।

शिशु के बाहर आते ही मादा के शरीर की दूध देने वाली ग्रन्थियों से दूध वाहित होना भी आरम्भ हो जाता है।

प्रजनन स्वास्थ्य

प्रजनन एक क्रिया है और इस क्रिया का परिणाम है हम अर्थात् मनुष्य का जन्म। साधारण रूप में यौन सम्बन्ध बनाना व सन्तान को जन्म देना ही प्रजनन है।
यौन क्रिया के दौरान आवश्यक साधनों का प्रयोग करना; जो गर्भ निरोधक व यौन संचारित रोगों से सुरक्षा प्रदान करने में सहायक हो आदि प्रजनन स्वास्थ्य के पहलू हैं।

जननांगों का स्वस्थ व स्वच्छ होना, यौन क्रियाएँ बेहतर होना, पूर्ण यौन-सुख की प्राप्ति करना, गर्भ धारण करने में समस्याएँ न होना, स्वस्थ व नीरोगी शिशु को पैदा करना आदि बातें प्रजनन स्वास्थ्य में सम्मिलित हैं।

लोगो द्वारा यौन सम्बन्ध बनाते समय पर्याप्त सावधानियां बरतना, स्वच्छता रखना, खुले विचारों के साथ यौन सम्बन्धी जानकारी प्राप्त करना व दूसरों को भी इस जानकारी से अवगत करवाना तथा अपने यौन जीवन की स्वतंत्रता कायम रखना आदि प्रजनन स्वास्थ्य के अन्तर्गत आते हैं।

आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं (खासकर ग्रामीण इलाकों में) जो प्रजनन स्वास्थ्य के प्रति अचेत हैं व यौन शिक्षा से वंचित है जिससे प्रतिदिन लाखों की संख्या में लोग यौन संचारित रोगोँ से ग्रस्त हो रहे हैं। वे इस तथ्य से अनजान है कि इस एक क्रिया से वे स्वयं या साथी या शिशु गंभीर समस्या में पड़ सकते हैं तथा कुछ ऐसे भी रोग हैं जो लाइलाज है। परिणामस्वरूप रोगग्रस्त लोग मृत्यु के मुख में जा रहे हैं। मुख्य पहलू ये है कि तुलनात्मक रूप में पुरुषों से अधिक महिलाओं पर अधिक दुष्प्रभाव पड़ता है।

जनता को अपने प्रजनन अधिकारों का ज्ञान होना चाहिए। इसी के साथ इन अधिकारों का उचित प्रयोग करने व सुरक्षा का भी दायित्व भी है। प्रजनन सम्बन्धी अधिकार ये हैं-
1- प्रजनन स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधायें प्राप्त करे, व
2- स्वयं द्वारा निर्धारित प्रजनन।

फ़िनलैंड के पूर्व राष्ट्रपति हैलोनेन ने भी प्रजनन स्वास्थ्य के सम्बन्ध में ये वाक्य कहे थे कि, “हमारी पहली व दूरगामी सिफारिश ये होनी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति के प्रजनन स्वास्थ्य सम्बन्धी अधिकारों का सम्मान होने के साथ-साथ उन्हें प्रोत्साहित भी किया जाना चाहिए और जब हम सब लोगों के स्वास्थ्य व अधिकार जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं तब इन शब्दों का अर्थ बिल्कुल इसी सही रूप में समझा जाये।”

प्रजनन स्वास्थ्य को कायम रखने के लिए आवश्यक है कि किशोरावस्था के दौरान लड़के-लड़कियों को यौन शिक्षा दी जानी चाहिए तथा प्रजनन स्वास्थ्य सम्बन्धी आवश्यक जानकारी से अवगत करवाया जाना चाहिए ताकि किशोरावस्था में होने वाली भूलों से बचाव हो सके तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी अच्छी आदतें अपनायी जाये।

यदि लोग प्रजनन स्वास्थ्य को लेकर विचारशील और सचेत रहे तो इससे वे-
# यौन जीवन सुचारू रूप से कायम रख सकते हैं,
# महिलायें सफल तरीके से गर्भ धारण कर सकती हैं,
# यौन समस्याओं व यौन संचारित जानलेवा रोगों से बचा जा सकता है तथा इनके अनुपात में कमी लायी जा सकती है, 4- स्वस्थ सम्बन्ध बनाकर स्वस्थ सन्तान पैदा की जा सकती है,
# प्रजनन स्वास्थ्य की अनदेखी से प्रसव के दौरान होने वाली समस्याओं से माँ व बच्चे को अछूता रखा जा सकता है,
# रोगमुक्त व अवसादरहित दाम्पत्य जीवन यापन किया जा सकता है,
# देश की जनसंख्या वृद्धि की समस्या को कम किया जा सकता है,
# बाल-मृत्यु दर को घटाया जा सकता है।

उपरोक्त वर्णित के अलावा भी अनेक बहुत सी परेशानियों व समस्याओं को दूर किया जा सकता है।

लोगों को यौन सम्बन्धी समस्याओं से बचाव के लिए व प्रजनन स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान को आमजन तक पहुंचाने के लिए सरकार द्वारा प्रतिवर्ष 12 फरवरी को “यौन व प्रजनन स्वास्थ्य  जागरूकता दिवस” मनाया जाता है।
परिवार नियोजन व अन्य कई कार्यक्रम संचालित किये जाते हैं, जिनमें लोगों से व्यक्तिगत रूप से बात की जाती है व सुनी जाती है तथा प्रजनन स्वास्थ्य के सभी आवश्यक तथ्य व सूचनाएँ प्रदान की जाती हैं।

प्रजनन तन्त्र के रोग

प्रजनन तन्त्र के अन्तर्गत शरीर के वे अँग आते हैं, जिनसे नया जीवन अस्तित्व में आता है। शुक्राशय, शिश्न, मूत्राशय, मूत्रनलिका, प्रोस्टेट ग्रन्थि आदि पुरुष प्रजनन तन्त्र में होते हैं तथा अण्डाशय, योनिमार्ग, गर्भाशय, डिम्बग्रन्थि आदि स्त्रिओं के प्रजनन तन्त्र के अंग हैं। संतानोत्पत्ति ही प्रजनन तन्त्र का मुख्य कार्य है।
प्रजनन तन्त्र के किसी भी हिस्से में यदि कोई विकार या रोग या समस्या पैदा हो जाए तो इसके नकारात्मक परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं।
प्रजनन तन्त्र को प्रभावित करने वाले रोग ही प्रजनन तन्त्र के रोग कहलाते हैं। कुछ रोग इस प्रकार हैं-

योनि स्त्राव- योनि से हल्का स्त्राव होना व गीलापन रहना कोई समस्या नही है, यह आम बात है। परन्तु जब यह स्त्राव असामान्य रूप में हो तो यह समस्या हो सकती है। जब गाढा दुर्गंधयुक्त तरल पदार्थ योनि से निकलता है और कई बार यह दर्दनाक व जलन पैदा करने वाला भी हो सकता है तो यह प्रजनन तन्त्र में संक्रमण का संकेत हो सकता है।

पेल्विक संक्रमण- जननांगों में होने वाले संक्रमण को पेल्विक संक्रमण या पेल्विक इंफ्लेमेंट्री डिसीज़ (P.I.D.) कहा जाता है। इससे दर्द, खुजली, बुखार, सिरदर्द जैसी समस्याएँ भी पैदा हो सकती है। यह संक्रमण फैलते हुए मूत्र मार्ग से गर्भाशय व अंडाशय तक पहुँच जाता है, जो प्रजनन तंत्र में समस्या पैदा करता है।

जननांगों के जख़्म- प्रजनन तंत्र में विकार पैदा होने पर योनि या गुदा मार्ग में घाव हो जाते हैं जिससे मूत्र व मल त्याग में तकलीफ पैदा होती है। ये अंग अत्यंत नाजुक होते हैं, जिससे अत्यधिक दर्द का अनुभव होता है। इससे प्रजनन तंत्र कमजोर होता है।

निःसन्तानता- आम भाषा में इसे बांझपन कहा जाता है। कई बार प्राकृतिक रूप से कुछ स्त्रियों के शरीर में गर्भ ग्रहण करने की क्षमता नही पाई जाती है और कई बार प्रजनन तंत्र के किसी भी हिस्से में रोग पैदा होने पर यदि समय रहते उसका इलाज न करवाया जाए तो यह निःसन्तानता का कारण बन सकता है।

गर्भाशय कैंसर- प्रजनन तन्त्र का एक भाग है गर्भाशय, जिसमें भ्रूण विकसित होता है तथा प्रसव पूर्व शिशु के रूप में इसी में रहता है। इसे बच्चेदानी भी कहते हैं।
गर्भाशय के कोशिकाओं में जरूरत से ज्यादा वृद्धि हो जाने पर कैंसर का कारण बनता है।
असामान्य रूप से रक्तस्त्राव होना गर्भाशय कैंसर का संकेत हो सकता है।

अनियमित माहवारी- महिलाओं के प्रजनन तन्त्र में गर्भाशय व अंडाशय पाये जाते है। मासिक धर्म के दौरान बहुत अधिक रक्त स्त्राव या बहुत कम रक्तस्त्राव से समस्या पैदा हो सकती है। निश्चित काल में मासिक धर्म ना आने या मासिक चक्र से पहले ही रक्तस्त्राव शुरू हो जाना आदि प्रजनन तंत्र पर बुरा प्रभाव डालती हैं। पेट व निचले हिस्से में दर्द, रक्त संचालन में रुकावट व कमजोरी आदि महसूस होती है।

स्तम्भन विकार- शिश्न की नसों में क्रियाशीलता न होने के कारण यौन क्रिया के दौरान उत्तेजना नही बन पाती है, इसे ही स्तम्भन दोष या विकार कहते हैं। इससे यौन जीवन बिगड़ जाता है तथा प्रजनन क्षमता में कमी आती है।

प्रोस्टेट कैंसर- कर्क रोग(कैंसर) एक गंभीर रोग है। यह शरीर के बाह्य या आंतरिक किसी भी हिस्से में हो सकता है।
मूत्र नली के ऊपर के हिस्से में चारों ओर जो ग्रन्थि पाई जाती है, उसे प्रोस्टेट ग्रन्थि कहते हैं। मूत्र त्याग में कठिनाई, बार-बार मूत्र त्याग की इच्छा होना, मूत्र या वीर्य में रक्त आना, दर्द होना आदि कई प्रोस्टेट कैंसर के लक्षण होते हैं।

जननांग में सूजन या गाँठ- कई बार लिंग में गाँठ बन जाती है या सूजन भी आ जाती है।  यह प्रजनन अंगो में कमजोरी पैदा कर के इस पर विपरीत प्रभाव डालता है। इससे यौन जीवन प्रभावित होता है। यौन क्षमता को क्षीण करती है ।

पारिस्थितकी एवं पारितंत्र:

पारिस्थितिकी या इकोलॉजी से अर्थ हमारे चारों तरफ उपस्थित जीवों, प्राणियों, पौधे, एवं सूक्ष्म जीवों से है, जो पर्यावरण एवं वातावरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है| ये सभी जीव-जन्तु एवं पादप मिलकर जैविक इकाई के रूप में कार्य करते है एवं खाद्य श्रंखला का निर्माण करते है|

पारिस्थितिकी के अंतर्गत आने वाले अधिकांश जीव भोजन हेतु दूसरे जीवों पर आश्रित होते है, ये आपस में निवास स्थान बांटते है एवं अन्य क्रिया-कलापों हेतु दूसरे जीवों की सहायता लेते है|

पारिस्थितिकी या पारिस्थितिकी तन्त्र जीव विज्ञान के लिए अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसके अंतर्गत जीव जगत के आपसी सम्बन्धों एवं व्यवहार का गहनतापूर्वक अध्ययन किया जाता है|

इकोलॉजी जर्मन भाषा का शब्द है, जिसका सबसे पहले प्रयोग अर्नेस्ट हैकल ने अपनी बुक में किया, जो की स्वयं एक जर्मन वैज्ञानिक थे| इसमें उन्होंने जीवों के अध्ययन के साथ मानव पारिस्थितिकी की अवधारणा का भी प्रतिपादन किया, जिसमे मानव के पर्यावरण एवं इसमें रहने वाले जीवो एवं पादपो के साथ पारस्परिक सम्बन्ध को दर्शाया गया है|

मानव पारिस्थितिकी के अंतर्गत इस बात के तथ्य भी सामने आये कि मानव अन्य जीवों से कही अधिक पारिस्थितिकी तन्त्र को नुकसान पहुचाने की क्षमता रखता है, और उसने जाने-अनजाने ऐसा किया भी है| किन्तु कई बार उसने पारिस्थितिकी को बचाने हेतू उचित प्रयास भी किये है|

पारिस्थितिकी का अध्ययन केवल स्थल तक सीमित न रहकर सागर की गहराई तक भी जाता है, जहाँ जलीय जीवों का अध्ययन किया जाता है, खोजो के दौरान कई ऐसे जीवों का पता लगा जो बहुत कम ऑक्सीजन एवं समुंद्र की काफी गहराई में भी जिन्दा रहते है, किन्तु यह क्षेत्र अभी इतना विस्तृत नहीं हो पाया है|

पारिस्थितिकी तन्त्र या पारितंत्र:

पारिस्थितिकी तन्त्र या पारितंत्र एक ही शब्द के दो रूप है एवं दोनों का समान अर्थ है अर्थात पर्यावरण में विद्यमान सभी जीव-जंतुओं, पादपो, जलीय जीवों आदि का सामूहिक योगदान एवं उनके आपसी संबंधो को पारिस्थितिकी तन्त्र कहा जाता है|

इसके अंतर्गत पर्यावरण में उपस्थित प्रत्येक प्राणी वातावरण के अनुकूल बनने के लिए एक खास प्रणाली या तन्त्र का निर्माण करता है, जिससे वो अपने अस्तित्व को बनाये रख सके, और यह तन्त्र सदियों तक चलता रहता है|

इसी तन्त्र में जीव खाद्य जाल या खाद्य श्रृंखला का निर्माण करते है, जिसमे बड़े मांसाहारी जीव द्वारा छोटे जीवों को मारकर खाना एवं अन्य जीवों का अपने भरण-पोषण हेतू दूसरे साधनों या दूसरे जीवों पर निर्भर रहना आदि सम्मिलित है|

पारिस्थितिकी तन्त्र के घटक:

पारिस्थितिकी तन्त्र के प्रमुख रूप से दो घटक होते है:-

जैविक घटक:

जैविक घटकों में मनुष्य, सूक्ष्म जीव, वनस्पति समुदाय एवं सम्पूर्ण जन्तु समुदाय सम्मिलित है|

अजैविक घटक:

अजैविक घटकों में प्रकाश, ताप, आर्द्रता, मृदा, हवा, स्थलाकृति आदि सम्मिलित है|

पारिस्थितिकी तन्त्र की कुछ विशेषताएं:

# पारिस्थितिकी तन्त्र की सरंचना के लिए तीन महत्वपूर्ण संघटक जिम्मेवार होते है, प्रथम है, ऊर्जा संघटक, दूसरा है, बायोम एवं तीसरे स्थान पर है, अजैविक संघटक|

# पारिस्थितिकी तन्त्र सर्वदा गतिशील एवं कार्यशील इकाई है, जिसमे सभी जीवो के उनके वातावरण के साथ आपसी समन्वय एवं सामंजस्य का योगदान रहता है|

# पारिस्थितिकी तन्त्र धरातल पर एक विशेष क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हुआ नजर आता है|

#  पारिस्थितिकी तन्त्र के तीनो महत्वपूर्ण घटकों के मध्य विभिन्न क्रियाए एवं प्रतिक्रियाए सम्पन्न होती है, और ऐसा ही इसमें मौजूद जीवों के मध्य घटता है|

# पारिस्थितिकी तन्त्र को साधारण भाषा में खुला तन्त्र भी कहा जाता है, क्योकि यहाँ जीवों एवं पदार्थो का आवागमन लगा रहता है|

# पारिस्थितिकी तन्त्र स्थिर स्थिति में रहता हैं जब तक इसके आपसी कारको में अव्यवस्था प्रकट नहीं होती|

# पारिस्थितिकी तन्त्र एक व्यवस्थित एवं सुसंघठित सरंचना है, यदि इसके किसी एक घटक में अव्यवस्था उत्पन्न हो जाए तो दूसरा घटक उसकी भरपाई हेतू तत्पर रहता है, किन्तु यदि मानवीय क्रियाकलापों द्वारा अधिक नुकसान पहुचाया जाये तो भरपाई सम्भव नहीं होती जिससे पर्यावरण प्रदुषण जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती है|

पारिस्थितिकी तन्त्र के प्रकार:

आवासीय क्षेत्र के आधार पर पारिस्थितिकी तन्त्र का वर्गीकरण:

इस वर्गीकरण के अंतर्गत जीवो के निवास स्थान एवं वहा की विशेषताओं एवं समुदायों का निर्धारण किया जाता है| भौतिक क्षेत्रो में काफी विभिन्नताएं पाई जाती है, जो जैविक समुदाय को भी प्रभावित करती है| इसलिए इसे मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:-

पार्थिव या स्थलीय पारिस्थितिकी तन्त्र:

पार्थिव पारिस्थितिकी तन्त्र या स्थलीय पारिस्थितिकी तन्त्र में कई प्रकार की विभिन्नताए पाई जाती है, अत: इसके भी कई उपभाग किये गये है, जैसे- पर्वत पारिस्थितिकी तन्त्र, रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तन्त्र, निम्न स्थलीय पारिस्थितिकी तन्त्र, आदि|

जलीय पारिस्थितिकी तन्त्र:

जलीय पारिस्थितिकी तन्त्र को भी कई उपभागों में विभाजित किया गया है, जिससे उनके अध्ययन में आसानी हो सके| इसके अंतर्गत सर्वप्रथम ताजे जल का पारिस्थितिकी तन्त्र आता है, जिसमे नदी, झील, जलाशय, दलदल आदि का पारिस्थितिकी तन्त्र शामिल किया गया है| दूसरा जलीय पारिस्थितिकी तन्त्र सागरीय पारिस्थितिकी तन्त्र है, जिसमे समुंद्र में रहने वाले सभी प्राणियों का अध्ययन सम्मिलित किया गया है|

क्षेत्रीय माप के आधार पर पारिस्थितिकी तन्त्र का वर्गीकरण:

यदि सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तन्त्र का व्यापक रूप से आकलन किया जाए तो यह अति-व्यापक एवं वृहत क्षेत्र माना जायेगा| इसलिए क्षेत्रीय माप के द्वारा पारिस्थितिकी तन्त्र को दो भागों में विभक्त किया जाता है, जिसमे प्रथम है- महाद्वीपीय पारिस्थितिकी एवंम दूसरा है महासागरीय पारिस्थितिकी| अध्ययन की सुविधा हेतु एवं आवश्यकता के अनुसार क्षेत्रीय माप को और छोटा किया जा सकता है, जैसे- पर्वतीय पारिस्थितिकी, जलीय पारिस्थितिकी, मैदान पारिस्थितिकी, जीव पारिस्थितिकी आदि|

उपयोग के आधार पर पारिस्थितिकी तन्त्र का वर्गीकरण:

पारिस्थितिकी तन्त्र को अपने उपयोग के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है| जैसे ई.पी. ओडम ने, कृषि क्षेत्र में विभिन्न विधियों के आधार पर पारिस्थितिकी तन्त्र का दो भागों में विभाजन किया| जिनके नाम कृषित एवं अकृषित पारिस्थितिकी तन्त्र दिए|

कृषित के अंतर्गत फसलो के विभिन्न प्रकारों को अलग-अलग भागों में बांटा गया| जैसे गेहू पारिस्थितिकी तन्त्र, चारा पारिस्थितिकी तन्त्र| अकृषित पारिस्थितिकी तन्त्र में दलदल, क्षेत्र, घास एवं वन पारिस्थितिकी एवं बंजर जमीन पारिस्थितिकी तन्त्र को सम्मिलित किया गया है|

पारिस्थितिकी पिरामिड:

पारिस्थितिकी पिरामिड से अर्थ है, पारिस्थितिकी के अंतर्गत आने वाले समस्त जीवधारियो एवं पादपो के आपसी संबंधों एवं पौष्टिकता के आधार पर उनका अध्ययन करना| इसी प्रक्रिया को पारिस्थितिकी शंकु या पारिस्थितिकी पिरामिड भी कहा जाता है, इसका उद्देश्य जीव-विज्ञान के लिए पारिस्थितिकी तन्त्र के गहन खोजो को सरल बनाना एवं अधिक से अधिक जानकारी इकठा करना है|

इस प्रक्रिया में प्राणियों के पारिस्थितिकी सम्बन्धित आकड़ो को संख्या पिरामिड, बायोमास पिरामिड एवं ऊर्जा के पिरामिड के रूप में व्यक्त किया जाता है, जिससे यह ज्ञात किया जाता है, कि प्राणियों की जनसँख्या में कितनी बढ़ोतरी या घटत हुई है, इसके साथ ही ऊर्जा का कितनी मात्रा में व्यय हुआ है|

पारिस्थितिकी पिरामिड के प्रमुख प्रकार:-

पारिस्थितिकी पिरामिड को वैज्ञानिको ने मुख्य रूप से तीन भागों में विभक्त किया है, जो इस प्रकार है:-

जीव गणना या संख्या पिरामिड

पारिस्थितिकी या बायोमास पिरामिड

पारिस्थितिकी ऊर्जा कोण पिरामिड

पारिस्थितिकी तन्त्र के निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है, कि पारिस्थितिकी एवं पारितंत्र का हमारे जीवन एवं पर्यावरण में महत्वपूर्ण योगदान रहता है| इन जीवों का अध्ययन करना एवं समस्त सूचनाओं को एकत्र करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना की ये जीव-जन्तु एवं पौधे|

प्रकृति के प्रत्येक कार्य में एक लयबद्धता है, जिसमे सभी क्रियाकलाप निर्धारित होते है| सभी प्राणधारी जीव अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए अथक प्रयास करते है, किन्तु जीवित रहने हेतू दूसरे जीवों को मरना भी इसी पारिस्थितिकी तन्त्र का हिस्सा है| अत: मानव को अपने हानिकारक क्रियाओ से इसे हानि नहीं पहुचानी चाहिए|

जन्तुओं में जनन 

butterfly life cycle

जनन ईश्वर द्वारा प्रदत्त ऐसा उपहार है, जिससे धरती पर सजीवों का अस्तित्व कायम रह सके। जन्तुओं द्वारा अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए व अपनी प्रजाति का विकास करने के लिए जनन क्रिया अपनाई जाती है।
जन्तुओं की उत्पत्ति जन्तुओं से ही होती है। जन्तुओं द्वारा संतानोत्पत्ति के लिए जनन के दो तरीके होते हैं- (1)अलैंगिक जनन (2) लैंगिक जनन।

अलैंगिक जनन

जब एक जनक की कोशिका के द्वारा या जन्तु शरीर के किसी  हिस्से से नए जीव की उत्पत्ति होती है, तो ऐसा जनन अलैंगिक जनन कहलाता है। विशिष्ट कायिक संरचना से जन्तु की उत्पत्ति होती है। इसमें नर व मादा युग्मक का योगदान नही होता है।

जन्तुओं में अलैंगिक जनन चार तरह से हो सकता है-

मुकुलन- कुछ जीवों की कोशिकाओं में ऐसी क्षमता पाई जाती है, जिससे उनके शरीर पर नई जीवोत्पत्ति होती है। जनक जीव के शरीर के बाह्य भाग पर कलिका समान संरचना पैदा होने लगती है। इस संरचना को मुकुल कहते है| यह विकास करते हुए नए जीव का रूप लेती है| उचित समय पर यह जनक जीव से अलग हो जाती है। इस प्रकार मुकुल से नए जीव के जन्म की पूरी क्रिया को मुकुलन कहते हैं। “हाइड्रा” में मुकुलन होता है।

बहुखण्डन- इसमें सर्वप्रथम जीव में कोशिका के केन्द्रक में विभाजन होता है, जिससे कई पुत्री कोशिकाओं का निर्माण होता है। इसके पश्चात् कोशिकाद्रव्य में विभाजन होता है तथा केन्द्रक के चारों ओर कोशिकाद्रव्य एकत्रित होता है, जिससे जीव में नये जीव का निर्माण प्रारम्भ होता है। विभाजन एक से अधिक बार होता है, इसलिए इसे बहुखण्डन कहते हैं। प्लाज्मोडियम में बहुखण्डन से जनन द्वारा संतानोत्पत्ति होती है।

द्विखंडन- जैसा कि नाम से स्पष्ट है- “द्वि” अर्थात् दो और “खण्डन” अर्थात् विभक्त होना। इसमें कोशिका दो भागों में बंट जाती है। एकल कोशिका वाले जन्तुओं में कोशिका का विभाजन हो जाता है। द्विखण्डन में जीव दो समान आकृतियों में बंट जाता है। द्विखण्डन की प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है, जैसे अमीबा में अनियमित द्विखण्डन, युग्लीना में लम्बवत् व पैरामिशियम में पाश्र्विय द्विखण्डन होता है।

पुनरुद्भवन- जीवों द्वारा पुनर्निर्माण की क्रिया करते हुए नए जीव की उत्पत्ति करना पुनरुद्भवन कहलाता है। प्रकृति में कुछ ऐसे जीव-जन्तु पाये जाते है, जिनमे स्वयं कायिक विभाजन करके नए जीवों का निर्माण करने की अद्भुत सामर्थ्य होती है। इस प्रक्रिया में जीव कुछ भागों में खण्डित हो जाता है तथा प्रत्येक विभाजित हुआ खण्ड धीरे-धीरे विकास कर नए जीव का रूप ले लेता है। प्लेनेरिया व तारामछली में पुनरुद्भवन द्वारा नए जीवों की उत्पत्ति की जाती है।

लैंगिक जनन

नई सन्तान की उत्पत्ति के लिए दो जीवों का योगदान आवश्यक होता है, क्योंकि इसमें नर व मादा युग्मकों के मिलने से नया जीव अस्तित्व में आता है। नर व मादा जननांगों से जनन क्रिया के माध्यम से नर युग्मक(शुक्राणु) का मेल मादा युग्मक(अण्डाणु) से होता है। यह अलैंगिक जनन से विपरित है। लैंगिक जनन कशेरुकी व उच्च अकशेरुकी जन्तुओं में होता है।

लैंगिक जनन के आधार पर जीवोत्पत्ति करने वाले जन्तुओं में भी भिन्नता पाई जाती है। वे हैं- 1.एकलिंगी जन्तु 2.उभयलिंगी जन्तु।

एकलिंगी– ऐसे जन्तुओं में युग्मक निर्माण हेतु केवल एक जनन अंग पाया जाता है।
शुक्राणु(नर युग्मक) निर्माण नर में तथा अण्डाणु(मादा युग्मक) निर्माण मादा में होता है। इनमें स्वनिषेचन नहीं हो सकता क्योंकि शुक्राणु व अण्डाणु का निर्माण अलग-अलग शरीर में होता है। शुक्राणु के अण्डाणु से मेल होने पर मादा में अंडे निषेचित होते है तथा भ्रूण निर्माण होता है। यह भ्रूण विकसित होते होते पूर्णतः नए जन्तु का रूप में जन्म लेता है।

उभयलिंगी– जब नर युग्मक व मादा युग्मक का निर्माण एक ही जीव में होता है, तो ऐसे जीव उभयलिंगी या द्विलिंगी कहलाते हैं। ऐसे जन्तुओं में पाये जाने वाले जननांगों से एक ही शरीर में दोनों युग्मक (शुक्राणु व अण्डाणु) उत्पन्न होते हैं। इनमें स्वनिषेचन पाया जाता है। निषेचन से नई जीवोत्पत्ति होती है।

वंशागति एवं विकास (Heredity and Evolution)

ancient people

किसी भी जीव विशेष के जन्म एवं विकास हेतु उसके जनकों के गुणों का महत्वपूर्ण योगदान रहता है| पृथ्वी पर पाए जाने वाले अनगणित जीवों में अनेक प्रकार की विविधता पाई जाती है, जीवो के आपसी अन्तर एवं डी.एन.ए. में उपस्थित मूल अन्तर को विभिन्नता कहा जाता है, जबकि एक ही वंश में उत्पन्न हुए समान जीवों के गति करने के क्रम को वंशागति कहा जाता है|

वंशागत लक्ष्ण एवं वंशागत नियम:

इसके अंतर्गत माता-पिता या जनको से प्राप्त हुए कुछ विशेष लक्षणों का समावेश होता है जो आने वालो पीढियों या संतानों को अपने पूर्वजो से उपहारस्वरूप प्राप्त होते है| कई बार ये लक्ष्ण अच्छे या कई बार कोई विकार भी हो सकते है|

मेंडल, जिन्हें आनुवंशिकी विज्ञानं का पिता कहा जाता है, उन्होंने वंशागति के अंतर्गत कुछ महत्वपूर्ण नियमो का प्रतिपादन किया जिसमे उन्होंने मटर के पौधे को अपने प्रयोग के लिए चुना|

मेंडल के वंशागति के नियम इस प्रकार है:

1# मेंडल के अनुसार वंशागत नियम को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक इसके जनक होते है अत: यह इस बात पर निर्भर करता है कि माता-पिता या जनक अपनी सन्तति में समान रूप से अपने आनुवंशिक गुणों का स्थानान्तरण करते है या नहीं|

2# वंशागत लक्षणों का दूसरा आधार जनक से प्राप्त डी.एन.ए होता है जिससे ये लक्ष्ण काफी हद तक प्रभावित होते है|

3# वंशागत लक्षणों के लिए हरेक सन्तान में दो विकल्प मौजूद रहते है|

वंशागत लक्षणों के प्रकार:

ये मुख्य रूप से दो प्रकार के होते है;

प्रभावी लक्ष्ण:

जनको से प्राप्त जो लक्ष्ण सन्तान में प्रभावी एवं स्पष्ट रूप से दिखाई देते है उन्हें प्रभावी वंशागत लक्ष्ण कहा जाता है| जैसे:- मेंडल के प्रयोग के अनुसार F1 पीढ़ी में लम्बे पौधे T का स्पष्ट रूप से दिखाई देना प्रभावी लक्ष्ण माना जायेगा|

अप्रभावी लक्ष्ण:

जनको से उतराधिकार में मिले जो वंशागत लक्ष्ण छुपे हुए रहते है एवं स्पष्ट दिखाई नहीं देते उन्हें अप्रभावी लक्ष्ण कहा जाता है|

जीनोटाईप लक्ष्ण:

इसके अंतर्गत इसे लक्षणों या सूचनाओं का समूह आता है एक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थान्तरित होता है एवं जिसे बाह्य रूप से देखा नहीं जा सकता किन्तु परीक्षण के द्वारा इसका पता लगाया जा सकता है|

उदाहरण के लिए:

आँखों के रंग एवं बालो की लम्बाई एवं रंग, कद-काठी, एवं विभिन्न प्रकार के आनुवंशिक रोगों हेतु ये लक्ष्ण या गुणसूत्र जिम्मेवार होते है| यदि किसी जीव में इन गुणों का बदलाव करना हो तो जीन्स में परिवर्तन या गुनसुत्रो का पुन; विकास करके यह परिवर्तन किया जा सकता है|

फिनोटाईप लक्ष्ण:

इन लक्षणों के अंतर्गत इसे लक्ष्ण आते है जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते है एवं बिना किसी परीक्षण के इन लक्षणों का पता लगाया जा सकता है| जैसे: आँखों का रंग, एक जैसी आवाज एवं कुछ रोग आदि इसके उदाहरण है|

मेंडल के वंशागति के नियम:

आनुवंशिकता के नियमो का प्रतिपादन करने के साथ-साथ मेंडल ने वंशागति के भी महत्वपूर्ण नियमो का उल्लेख किया है, जो इस प्रकार है:-

.एकल क्रॉस वंशागति एवं विसंयोजन नियम:

इस नियम के अनुसार जीवों के लक्षणों के निर्धारित करने का कार्य उसमे उपस्थित आन्तरिक कारको का होता है जो जोड़ी के रूप में विद्यमान रहते है| आन्तरिक कारक एक युग्मक में एक हे जोड़े के रूप में मौजूद रहते है|

.स्वतंत्र वंशागति का नियम:

इस नियम के अनुसार आन्तरिक कारको की एक से अधिक जोड़ी उपस्थित रह सकती है एवं ये युग्मको में स्वतंत्र रूप से उपस्थित रह सकते है|

विकास या Evolution:

पृथ्वी पर पाए जाने वाले अधिकांश जीव-जन्तु यहाँ तक कि मनुष्य भी विकास के क्रम से गुजर कर आये हुए प्राणियों में से एक है| वर्तमान युग मे दिखाई देने वाले प्राणी किसी समय में जटिल एवं परिस्थति के अनुसार विभिन्न परिवर्तनों द्वारा निर्मित एवं विकसित हुए है, इनमे बदलाव के इसी क्रम को जीवो का विकास या जैव विकास कहा जाता है|

जैव विकास की प्रक्रिया अत्यधिक प्राचीन है, यह जीव विज्ञानं का एक अग्रिम अध्ययन का विषय है, जिसके अंतर्गत जीवों के क्रमिक विकास, उनमे हुए बदलाव एवं उनके पूर्वजो के बारे में जानकारी प्राप्त करना एवं उनका अध्ययन करना सम्मिलित है|

विकास की प्रक्रिया से सम्बन्धित सिदान्त:

जैव विकास से सम्बन्धित प्रक्रिया के उपलक्ष्य में जे.बी. लैमार्क ने सर्वप्रथम अपनी बुक “फिलासोफिक जूलोजीक” में 1809 ई. में प्रस्तुत किया, जिसे आधुनिक समय में उपार्जित लक्षणों का वंशागति सिदान्त या लैमार्कवाद भी कहा जाता है| लैमार्क के समान ही डार्विन ने भी जैव विकास के सम्बन्ध में कई जानकारियों को उजागर किया जिसे डार्विनवाद या प्राक्रतिक जीवों का विकास भी कहा जाता है|

लैमार्कवाद:

फ्रांसिसी वैज्ञानिक लैमार्क ने अपने जैव विकास की जानकारी के सम्बन्ध में यह माना कि जीवो की शारीरिक सरंचना एवं उनके व्यवहार पर वातावरण का काफी योगदान रहता है| वातावरण के अच्छे एवं बुरे प्रभाव के कारण जीवों के देहिक अंगो का प्रयोग कम या ज्यादा हो सकता है, जिससे जिन अंगो का जीव द्वारा ज्यादा उपयोग किया जाता है, वे अंग अधिक प्रभावी, विकसित एवं मजबूत हो जाते है जबकि अन्य अंगो का योगदान कम होने के कारण उनका विकास इतना नहीं हो पाता है| जीवों में अपने अंगों में होने वाले इन्ही बदलावों को लैमार्क ने उपार्जित लक्ष्ण या गुण कहा| उनके अनुसार ये लक्ष्ण वंशागत होते है एवं एक जनको से संतानों में स्थानातरित हो सकते है|

लैमार्क के इन विचारो का कई वैज्ञानिको ने खंडन किया है, उनका मानना है कि कायिक लक्षण जनन कोशिका में परिवर्तन नहीं कर सकते अत: इनका वंशागत स्थानान्तरण सम्भव नहीं हो सकता| उदाहरण के लिए:

जैसे किसी लौहार का हाथ एवं उसकी मांसपेशियों की मजबूती होना स्वाभाविक है किन्तु उसके पुत्र में ये गुण पहले से होंगे यह सम्भव नही हो सकता अत: ये गुण वंशागत नहीं कहे जा सकते|

डार्विनवाद:

डार्विनवाद के नाम से प्रसिद्ध इस सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाले मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक थे, जिन्होंने अलग-२ कार्य करके समान निष्कर्ष निकला, जिसमे से एक का नाम चार्ल्स रोबर्ट डार्विन एवं दूसरे का नाम अल्फ्रेड रस्सेल वेल्स था|

डार्विन ने अपने जैव विकास के सन्दर्भ में अपने विचारों एवं सिद्धांत को अपनी बुक The Origin of Species में प्रकाशित किया है| डार्विन के अनुसार प्रत्येक जीव अपनी संख्या को अधिक से अधिक बढ़ाना चाहता है एवं करीब-२ सभी जीवों में प्रजनन की क्षमता विद्यमान होती है| हर जीव अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने एवं आने वाली पीढियों के विकास के लिए संघर्ष करता हुआ नजर आता है, इसमें से कुछ जीव दूसरे जीवों से कमजोर एवं अप्रभावी होते है, जो संघर्ष की इस दौड़ में हार जाते है|

जिन जीवों में अधिक प्रभावी गुण विद्यमान होते है वही विजेता कहलाते है अत: प्रकृति अपने लिए योग्य एवं प्रभावी जीवों का स्वयं चयन करती है जिससे की विकास का क्रम सतत बना रहे एवं वह कमजोर जीवो को नष्ट कर देती है| इस प्रकार गुनी जीव अपनी संख्या को बढाते हुए प्रक्रति के विकास एवं जैव विकास में अहम भूमिका निभाते है| डार्विन एवं वेल्स दोनों वैज्ञानिको ने इस सम्बन्ध में समान मत प्रस्तुत किये|

डार्विनवाद के पश्चात् नवडार्विनवाद के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया जो डार्विनवाद से सर्वथा भिन्न था|

उत्परिवर्तनवाद:

इस सिद्धांत के अनुसार जीवों के लक्षणों एवं उनमे होने वाले विभिन्न परिवर्तन आकस्मिक एवं स्थायी होते है| इस विचार को देने वाले वैज्ञानिक का नाम ह्यूगोडीब्रिज है, जिसने 1901 ई. में इसे प्रतिपादित किया एवं इसी को नव-डार्विनवाद के नाम से जाना जाता है|

पुनरावर्तन:

इसके अनुसार प्रत्येक जीव अपने पूर्वजो के इतिहास की पुनरावृति करता है, इस सिद्धांत को प्रस्तुत करने वाले वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैकल थे, जो की एक जर्मन वैज्ञानिक थे|

मानव स्वास्थ्य एवं रोग (Human Health and Diseases)

“पहला सुख निरोगी काया” अर्थात शरीर के स्वास्थ्य से बढकर और कोई सुख नहीं होता, किन्तु स्वास्थ्य के साथ कई प्रकार के रोग मनुष्य के शरीर के घेर लेते है| रोग, व्याधि या बीमारी आदि का एक ही अर्थ है- अस्वस्थता या शरीर में किसी प्रकार की पीड़ा अथवा विकार का उत्पन्न होना, इसी को मानव रोग कहा जाता है|

मानव रोगों के प्रकार:

मुख्य रूप से मानव रोगों को दो भागों में विभाजित किया गया है:-

#1 जन्मजात रोग:

इसके अंतर्गत ऐसे रोग आते है, जो जन्म के साथ ही मनुष्य के जीवन में प्रवेश कर जाते है| इनमे से अधिकांश की शुरुआत गर्भावस्था के दौरान ही हो जाती है| होंठ या तालू का कटाहोना, पाँव मुडा होना आदि इसके उदाहरण है|

#2 उपार्जित रोग:

उपार्जित रोग ऐसे रोग है जो जन्म के बाद विभिन्न कारणों के कारण मनुष्य के शरीर को रोगी बना देते है| इसे भी दो भागों में बांटा गया है:-

संक्रामक रोग:

इस रोग के प्रमुख कारक रोगाणु, बैक्टीरिया, कवक, विषाणु, एवं अन्य सूक्ष्म प्राणियों को माना गया है, ये जल, वायु, भोजन के द्वारा या एक व्यक्ति से दूसरे में आसानी से फ़ैल सकते है इसलिए इन्हें संक्रामक रोग कहा जाता है|

असंक्रामक रोग:

इसके अंतर्गत ऐसे रोग सम्मिलित किये गये है जो एक व्यक्ति के साथ बैठने या सम्पर्क में आने से नहीं फैलते जैसे- हदयरोग, कैंसर, शुगर, दर्द आदि| इसके अलावा हीनताजन्य रोग, एलर्जी, आनुवंशिक रोग आदि इस श्रेणी में आते है|

विभिन्न मानव रोग एवं उसके निदान:

बैक्टीरिया या जीवाणु जनित रोग:-

टायफाइड या आंत्र ज्वर:

इस रोग का प्रमुख कारक सालमोनेला टाईफोसा नामक बैक्टीरिया होता है, जिसका निशाना रोगी की आंत होती है, इसलिए इसे आंत बुखार भी कहा जाता है| इसमें रोगी का शरीर ज्वरग्रस्त रहता है एवं शरीर में तेज दर्द होता है व् प्लीहा एवं आंते बढ़ जाती है|

उपचार:

इसमें क्लोरोमाईसिटीन दवाई का प्रयोग इलाज हेतु किया जाता है, चिकित्सीय परामर्श अनिवार्य है| साफ़-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाये व् भोजन को मक्खियों से दूर रखा जाये|

तपेदिक या टीबी:

इस रोग का मुख्य कारक माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस नामक बैक्टीरिया होता है| यह एक संक्रामक रोग है, इसमें रोगी को तेज बुखार, वजन में कमी, भूख न लगना, पाचन तन्त्र खराब होना जैसी समस्याए हो जाती है| स्वस्थ व्यक्ति को इनके सम्पर्क में कम आना चाहिए| इसे काक रोग या यक्ष्मा रोग भी कहा जाता है|

उपचार:

इसमें स्ट्रेपटोमाइसिन का टीका लगाया जाता है, आधुनिक युग में विभिन्न नई दवाइया उपलब्ध है, जिससे कारगर इलाज सम्भव है|

प्लेग:

इस रोग के मुख्य कारक चूहे होते है क्योकि ये चूहों में उपस्थित पिस्सुओं द्वारा होता है| सबसे खतरनाक पिस्सू  का नाम जेनोप्सला केओपिस है जो मनुष्य के शरीर को आसानी एवं तीव्रता से अपना निशाना बनाता है| प्लेग के भी कई प्रकार होते है, जिसमे गिल्टी वाले में व्यक्ति की गर्दन, जांघ आदि में सुजन आ जाती है| इसके अलावा न्यूमोनिक प्लेग एवं सेप्टिसिमिक प्लेग जानलेवा हो सकते है|

उपचार:

चूहों को निवास स्थान से दूर रखा जाये| स्ट्रेपटोमाइसिन व् सल्फाड्रग्स आदि इसके लिए कारगर दवाइयां है|

cholera या हैजा:

इसका कारक विब्रियो कॉलेरा नामक बैक्टीरिया होता है, जो मक्खियों में उपस्थित होता है| इसमें रोगी को अत्यधिक दस्त, उलटी आदि लग जाते है एवं शरीर में जल की अत्यधिक कमी हो जाती है, जिससे शरीर काफी कमजोर पड़ जाता है|

उपचार:

पानी को शुद्ध करके या उबालकर पीये एवं डाक्टर के परामर्श अनुसार इंजेक्शन लगवाए|

डीपथिरिया:

यह एक संक्रमित रोग है जिसका कारक कोरोनीबैक्टीरियम डिपथेरी होता है, जो अधिकांशत संक्रमित दूध में उपस्थित रहता है| इसमें व्यक्ति के गले में श्वास नली में एक झिल्ली बन जाती है जिससे सांस लेने में तकलीफ होती है एवं मृत्यु भी हो जाती है|

उपचार:

साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए| रोगी के कपड़ो को एंटी-बैक्टीरियल तरल से धोना चाहिए एवं डी.पी.टी. का इंजेक्शन लगवाना चाहिए|

टिटनेस:

इसका कारक बैसीलस टेटनी होता है, इसे लॉक जॉ (lock jaw) भी कहा जाता है| इसके बैक्टीरिया किसी घाव के द्वारा व्यक्ति के शरीर में दाखिल होते है| इसमें शरीर में अकडन व् दर्द पैदा होने लगता है|

उपचार:

टिटनेस का टीका लगवाना चाहिए|

कोढ़, कुष्ट या leprosy:

यह रोग माइकोबैक्टीरियम लेप्री नामक बैक्टीरिया के कारण फैलता है| इसमें उत्तक नष्ट होने लगते है एवं शरीर पर चकते उभरने लगते है|

उपचार:

इसमें एम्.डी.टी. दवाइयों का प्रयोग किया जाता है|

निमोनिया:

यह डिप्लोकोकस न्युमोनी नामक बैक्टीरिया से होता है| इसमें तेज बुखार व् फेफड़ो में सूजन आ जाती है| एंटीबायोटिक दवाई से इलाज सम्भव है|

काली खांसी:

यह हिमोफिलिस परफुसिस नामक बैक्टीरिया द्वारा होता है, परन्तु इसका टीका उपलब्ध है|

गोनोरिया:

यह नाइसेरिया गोनोरियाई नामक बैक्टीरिया के कारण होता है| इसमें रोगी को दर्द एवं स्त्री को बांझपन हो सकता है| संक्रमित रोगी से दूर रहे|

वायरस जनित रोग:

AIDS (एकवायर्ड इम्यूनो डिफीशियनसी सिंड्रोम) एड्स:

यह रोग HIV नामक वायरस द्वारा होता है| यह संक्रमित व्यक्ति के साथ सेक्स करने, संक्रमित व्यक्ति के प्रयोग किये टीके लगाने या नशीले पदार्थो के अधिक सेवन द्वारा फैलता है| इसमें व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है एवं शरीर में सूजन एवं दर्द रहता है अतं में रोगी मर जाता है|

चेचक:

यह संक्रमित रोग भी वायरस द्वारा होता है| इसमें रोगी को पूरे शरीर में दर्द के साथ दाने निकल आते है जो बाद में भयंकर रूप धारण कर लेते है| रोग से पहले टीकाकरण करवा लेना चाहिए|

इन्फ्लूएंजा:

इसे फ्लू भी कहते है यह इन्फ्लूएंजी नामक वायरस द्वारा होता है| इसमें तेज ज्वर, शरीर में दर्द, खांसी आदि लक्ष्ण उत्पन्न होते है|

उपचार:

एंटीबायोटिक दवाइया एवं डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए|

पोलियो:

यह अधिकतर बच्चो में होता है, इसमें रीढ़ की कोशिकाए नष्ट हो जाती है| समय-२ पर पोलियो ड्रॉप्स एवं टीकाकरण करवाना अनिवार्य है|

डेंगू:

इसे हड्डी तोड़ ज्वर कहा जाता है जो रो वायरस द्वारा फैलता है| इसमें तेज बुखार एवं जोड़ो में भयंकर दर्द होता है|

पीलिया या हेपेटाइटिस:

इसमें यकृत में पीले वर्ण का निर्माण तेजी से होता है जबकि शरीर उस तेजी से उसका उत्सर्जन नही कर पाता| इसमें रोगी को आराम के साथ पौष्टिक आहार लेना चाहिए|

रेबीज या हाइड्रोफोबिया:

यह रोग किसी पागल कुत्ते या लोमड़ी के काटने से होता है जिससे वायरस शरीर में प्रवेश कर जाते है| इसमें रोगी को जल से डर लगता है एव कईयों में पक्षाघात जैसे लक्ष्ण नजर आते है| रेबीज रोधक टीका लगवाना चाहिए|

इन रोगों के साथ-साथ मनिनजाईटस, ट्रेकोमा, खसरा, छोटी माता, मम्प्स या गलसुआ आदि रोग आते है जो वायरस द्वारा फैलते है, किन्तु सभी के निदान सम्भव है|

फफूंद जनित रोग:

दमा या अस्थमा, गंजापन, दाद, खुजली, एथलीट फूट आदि रोग फफूंद या कवक द्वारा फैलते है|

प्रोटोजोआ जनित रोग:

निद्रा रोग:

यह ट्रिपेनोसिमा नामक प्रोटोजोआ द्वारा होता है, इसमें व्यक्ति में थकान, दर्द एवं मानसिक तनाव रहता है| इसका परजीवी सी-सी मक्खियों में उपस्थित रहता है अत: इनसे दूर रहना चाहिए|

मलेरिया:

यह प्लाजमोडियम नामक प्रोटोजोआ के कारण होता है जो मादा एनाफिलिज मच्छर में विद्यमान होते है| विभिन्न दवाइयों द्वारा इसका इलाज सम्भव है|

इसके साथ-२ पेचिश, कालाजार, पायरिया आदि सभी प्रोटोजोआ जनित रोग है|

आनुवंशिक रोग:

इसके अंतर्गत वर्णान्धता, हिमोफिलिया, टर्नर सिंड्रोम, मंगोलीजम या डाउन सिंड्रोम आदि रोग सम्मिलित है| ये रोग गुनसुत्रो की असमान्यता एवं अर्धसूत्री विभाजन की अनियमितता के कारण पैदा होते है|

अन्य रोग:

अन्य रोगों में बेरी-बेरी, स्कर्वी, फाइलेरिया, रिकेट्स, मधुमेह, हार्ट-अटैक, कैंसर, पीत ज्वर, एसकेरिएसिस, गाउट, जोड़ो का दर्द, हाइपरटेंशन, न्युरोसिस, लकवा, मिर्गी, एलर्जी, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू आदि अन्य रोगों के अंतर्गत आते है|

मानव में जनन (Human Reproduction)

male reproductive system

जनन एक प्राकृतिक क्रिया है, जो कि सृष्टि को चलाने के लिए आवश्यक भी है। धरती पर सजीवों का अस्तित्व जनन के द्वारा ही बनाकर रखा जा सकता है। इसी प्रकार मनुष्यों में जनन के द्वारा ही नया मनुष्य पैदा किया जाता है, इसी से मनुष्य जाति का विकास होता है। धरती पर केवल मानव व डॉल्फिन ही ऐसे जीव हैं जो शारीरिक सन्तुष्टि, आनन्द व चरम सुख के लिए शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं व लैंगिक जनन करते हैं।

मनुष्य में प्रजनन के लिए स्त्री एवम् पुरूष के मध्य सम्बन्धों का बनना आवश्यक है। पुरूष द्वारा यौन क्रिया के दौरान जब वीर्य का स्राव स्त्री की योनि में कर दिया जाता है, इसे वीर्यसेचन कहते है, इस स्थिति में स्त्री के गर्भ ग्रहण करने के आसार होते हैं।

पुरूष में प्राथमिक जनन अँगों के रूप में दो वृषण पाये जाते हैं, जो अण्डाकार आकृति के साथ गुलाबी रंगत लिए हुए होते हैं। ये दोनो वृषण उदरगुहा के बाहर एक थैली समान आवरण में स्थित होते हैं, जिसे वृषणकोष कहते हैं। वृषण में ही शुक्राणुओं का जन्म व विकास होता रहता है तथा टेस्टोस्टेरॉन हॉर्मोन बनता है।

शुक्राणु पुरुषों में पाई जाने वाली एक जनन कोशिका है तथा यह मानव शरीर की सबसे छोटी कोशिका है। टेस्टोस्टेरॉन हॉर्मोन के कारण ही लड़कों में यौवनावस्था के दौरान कई प्रकार के लक्षण पैदा होते हैं तथा यौवनारम्भ होता है।
शुक्राशय, अधिवृषण, शुक्रवाहिनी, शिश्न भी पुरुषों के द्वितीयक सहायक जनन अंग हैं

स्त्री के शरीर में प्राथमिक जनन अंगो के रूप में एक जोड़ी अण्डाशय पाये जाते हैं, जिनमें अंडों का निर्माण व विकास होता है तथा एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन बनते हैं। इन दोनों हॉर्मोन्स की सहायता से ही स्त्रियों में लैंगिक परिवर्तन आते हैं।

उदरगुहा में गर्भाश्य के दोनोँ तरफ श्रोणि भाग में ये अण्डाशय स्थित होते हैं। अण्डाशय में अनगिनत विशिष्ट संरचनाएँ पाई जाती है, जिन्हें अंडाशयी पुटिकाएँ कहा जाता है। इन पुटिकाओं से ही अण्डाणु बनते हैं तथा जब ये अण्डाणु परिपक्व हो जाते हैं तब ये अण्डाशय से निकालकर अंडवाहिनी में पहुंच जाते हैं तथा फिर गर्भाशय तक पहुँचते हैं।

स्त्री शरीर में अंडवाहिनी, गर्भाशय व योनि द्वितीयक जनन अंगो के रूप में पाई जाती है। ये सभी कुछ नलिकाओं के माध्यम से एक-दूसरे से मिली हुई होती हैं तथा हर एक नलिका की लंबाई 10-12 सेंटीमीटर होती है। ये नलिकाएँ अण्डाशय की बाहरी तरफ से घूमते हुए गर्भाशय तक पहुँचती है।

लैंगिक जनन के दौरान पुरुषों में जो युग्मक बनते हैं, वे नर युग्मक होते हैं व स्त्री में जो युग्मक बनते हैं, वे मादा युग्मक होते हैं। युग्मक निर्माण निषेचन से पूर्व होता है। नर युग्मकों का अंतरण मादा युग्मक में होता है। नर युग्मकों के मादा युग्मकों से मेल होने से मादा के अण्डाणु निषेचित हो जाने से युग्मनज का निर्माण होता है, जिससे भ्रूण बनता है तथा यह भ्रूण विकास करते हुए शिशु का रूप ले लेता है। गर्भ ग्रहण करने के 9 महीने बाद शिशु पूर्णतः विकसित हो जाता है तथा स्त्री प्रसव काल में होती है।

नर व मादा दोनोँ में 46-46 गुणसूत्र होते है। जब जनन कोशिका में युग्मक निर्माण होता है तब कोशिकाओं में अर्द्धसूत्री विभाजन होता है। इस विभाजन में गुणसूत्र आधे रह जाते हैं अर्थात् 23-23 हो जाते हैं (23 नर के व 23 पुरूष के)। अर्द्धसूत्री विभाजन केवल जनन कोशिका में ही होता है। शरीर की अन्य सभी कोशिकाओं में समसूत्री विभाजन ही होता है।
मनुष्य के शरीर में कोशिका का विभाजन दो तरह से होता है-

समसूत्री विभाजन– कोशिका के केन्द्रक का विभाजन व कोशिका के द्रव्य के विभाजन को समसूत्री विभाजन कहलाता है।

अर्द्धसूत्री विभाजन–  कोशिका में गुणसूत्रों की संख्या घटकर आधी रह जाती है। यह केवल जनन कोशिका में होता है।

इस प्रकार मानव जनन की प्रक्रिया सम्पन्न होती है व निषेचन होने के बाद संतान का जन्म होता है तथा नया मानव जीवन अस्तित्व में आता है।

निषेचन

प्रजनन की एक महत्वपूर्ण क्रिया है- निषेचन, जिसके द्वारा नये प्राणियों का जन्म होता है। ईश्वर द्वारा प्रदत्त यह सबसे अनमोल तोहफ़ा है, जिससे नया जीवन संभव हो पाता है व संसार आगे बढ़ रहा है।

सजीवों में नर युग्मक व मादा युग्मक का एकाकार; जिससे एक नव जीव की उत्पत्ति होती है, यही निषेचन कहलाता है अर्थात् शुक्राणु व अण्डाणु के संलयन की क्रिया को निषेचन कहते हैं। युग्मकों के परस्पर मिलन से युग्मनजों का निर्माण होता है व युग्मनज द्विगुणित होते हैं। निषेचन के दौरान ही जीवों में लिंग निर्धारण हो जाता है अथवा नया उत्पन्न होने वाला जीव नर होगा या मादा, इसका निर्धारण निषेचन प्रक्रिया होते ही हो जाता है।

निषेचन के दो प्रकार होते हैं-

आंतरिक निषेचन व बाह्य निषेचन

जब नर व मादा के युग्मकों का संलयन मादा के शरीर के भीतर होता है, तो इसे आंतरिक निषेचन कहा जाता है और यह स्तनधारियों, सरीसृपों व नभचरों में होता है।

जब युग्मकों का संलयन मादा के शरीर के बाहर होता है, तो यह बाह्य संलयन कहलाता है। यह निषेचन क्रिया जल के माध्यम से ही पूर्ण होती है, निश्चिततः जलीय जीवों मछलियों, शैवालों व जलचर आदि में ही बाह्य निषेचन संभव है|

मनुष्यों के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि प्रत्येक आदमी अपनी संतान चाहता है व प्रत्येक नारी माँ बनने का सुख प्राप्त करना चाहती है। नारी के शरीर के भीतर अंडाशय में अंडो के निर्माण की क्रिया चलती रहती है तथा इन अंडों की संख्या नारी के जन्म के साथ ही प्राकृतिक रूप से निर्धारित हो जाती है।

पुरुष व नारी के मध्य संभोग के समय यदि पुरुष के शुक्राणु; नारी की गर्भ नलिकाओं से होते हुए उस के अण्डाणु से  मिल जाते हैं तो अंडाशय में भ्रूण के निर्माण की क्रिया प्रारम्भ होती है तथा समय के साथ धीरे-धीरे यह शिशु के रूप में विकसित होता रहता है।
यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि मासिक चक्र की अवधि सभी महिलाओं में असमान होती है तथा इसमें होने वाले रक्तस्त्राव के दिनों की संख्या भी अलग-अलग होती है। मासिक धर्म के उपरान्त एक निश्चित समय तक महिला के शरीर के भीतर गर्भाशय में अंडो का निर्माण व विसर्जन होता है तथा उस दौरान यदि पुरुष  द्वारा शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाये व योनि में ही वीर्य स्राव कर दिया जाये तो शुक्राणु का मेल अण्डाणु से हो जाने पर अंडे निषेचित होते हैं अर्थात् निषेचन हो जाता है। निषेचित अंडा ही युग्मनज कहलाता है। इस प्रकार नारी द्वारा गर्भधारण किया जाता है तथा अपनी सन्तान को जन्म देकर सन्तति सुख को प्राप्त करती है।

आनुवंशिकी (Genetics)

genetics DNA picture

पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवों में उनके गुण, रूप आदि के आधार पर विभिन्नता पाई जाती है, और यही गुण या विशेषता पीढ़ी दर पीढ़ी आने वाली संतानो को स्थानांतरित होते रहते है, इसी विशेषता या गुणों को पैतृक गुण या आनुवंशिक गुण कहते है एवं इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को आनुवांशिकता कहा जाता है|

साधारण शब्दों में कहा जा सकता है कि जीन्स का एक से दूसरे जीव में जाना आनुवंशिकता कहलाता है, जो सदियों से एवं निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है| आनुवंशिकी या Genetics शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है, जेन का अर्थ होता है- होना या बढना| यह जीव विज्ञानं की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जिसमे जीवों के विकास के क्रम के अंतर्गत उनके गुणों का अध्ययन किया जाता है|

ग्रेगर जॉन मेंडल को आनुवांशिकी विज्ञानं का पिता माना जाता है, जो ऑस्ट्रिया नामक जगह के एक पादरी थे| इन्होने आनुवंशिकी विज्ञानं से सम्बन्धित कई महत्वपूर्ण खोजे की एवं आधुनिक एवं नये सिद्धांतों का परिचय करवाया|

आनुवंशिकता के नियम या सिद्धान्त

मेंडल के नियम के अनुसार पृथ्वी पर उपस्थित सभी जीवो का निर्माण या जन्म कोशिका के द्वारा सम्भव हो पाता है, इन कोशिकाओं में एक निश्चित मात्रा में गुणसूत्र पाए जाते है, जो प्रत्येक जाति के अलग-अलग होते है, इन गुणसूत्र या क्रोमोसोम्स के अंदर जीन्स पाए जाते है, जो एक प्रकार की रासायनिक सरंचना होती है| कोशिका में उपस्थित ये जीन्स किसी प्राणी के अपने पूर्वजो से मिलते-जुलते होने, कार्य एवं आकार को निश्चित करने आदि के लिए जिम्मेवार माने जाते है एवं आने वाले जीव किस प्रकार अपने पूर्वजो से यह गुण ग्रहण करते है इन सबका अध्ययन करना ही आनुवंशिकी विज्ञानं का मूल आधार एवं सार है|

ग्रेगर जॉन मेंडल ने मटर के पौधे से अपनी खोज की शुरुआत की, जिसमे उन्होंने मटर के बीजो के 7 गुणों को चुना, जिसमे बीजो के आकार, गुण, रंग, आकृति, लम्बाई आदि के आधार पर उनका निरिक्षण किया| उनके अनुसार मटर के जोड़े में दूसरे जोड़े के गुण को दबाने या अप्रभावी करने की क्षमता होती है एवं इसके लिए उन्होंने अंग्रेजी भाषा के T को प्रभावी लक्ष्ण के रूप में तथा छोटे t को अप्रभावी लक्ष्ण के रूप में स्पष्ट किया, जिससे इन्हें समझने में आसानी हो सके| जैसे पौधे के प्रभावी गुण जैसे लम्बाई के लिए बड़ा T एवं उसके बौनेपन के लिए छोटा t का प्रयोग किया गया|

मेंडल ने अपने प्रयोगों से सम्बन्धित जानकारी को १८६६ ई. में पत्रिका में भी प्रकाशित करवाया जिसका नाम था Annual proceedings of the natural history of Brunn, किन्तु उस समय इस विषय पर खास ध्यान नहीं दिया गया, फिर ३४ वर्षो के बाद अर्थात उनकी मृत्यु के बाद उनके प्रयोगों की महत्ता को समझा गया एवं उसे वैज्ञानिक मान्यता प्रदान की गयी|

मेंडल के आनुवंशिकता के नियम के अनुसार प्रत्येक जीव में उपस्थित जनन कोशिका में समान गुण के लिए मुख्य रूप से दो कारक जिम्मेवार होते है, जिसके अनुसार जब दोनों कारक एक जैसे हो तो ये समयुग्मजी (TT) कहलाते है, किन्तु जब ये कारक असमान हो तो ये विषमयुग्मजी (Tt) कहलाते है|

मेंडल के आनुवंशिकता के नियम के अनुसार एकसंकरीय क्रॉस प्रणाली एवं द्विसंकरीय क्रॉस प्रणाली का जन्म हुआ जिसमे उन्होंने विपरीत गुणों वाली एक जोड़ी व् दो जोड़ी का अध्ययन किया जिसके प्रमाणित परिणाम सामने आये, जिसका विवरण इस प्रकार है:-

एकसंकरीय क्रॉस प्रणाली

इस प्रणाली के अंतर्गत मेंडल ने दो बिलकुल गुणों वाले मटर के पौधो को चुना जिसमे से एक लम्बा व् दूसरा बौना था| इन दोनों पौधो के बीच समान इकाई के आधार पर संकरण करवाया गया इसलिए इसे एक संकरण क्रॉस प्रणाली कहा जाता है| इसमें प्रथम पीढ़ी यानी लम्बे पौधे को F1 का नाम दिया गया एवं द्वितीय पीढ़ी यानि बौने पौधे को F2 का नाम दिया गया|

दोनों पीढियों का आपस में जब संकरण करवाया गया तो F1 से उत्पन्न हुए पौधे लम्बे थे एवं सभी पौधो को F1 या प्रथम पीढ़ी के पौधे कहा जाने लगा, F1 पीढ़ी का F2 से सीधा क्रॉस करवाने पर प्राप्त होने वाला अनुपात 3:1 था जिसे एक संकरीय अनुपात भी कहा जाता है, इसके अंतर्गत 3 पौधो में १ पौधा पूर्णत लम्बा या TT, दूसरा समान्य या मिश्रित लम्बाई वाला या Tt एवं तीसरा पूर्णत: बौना या tt था|

इस प्रणाली के अंतर्गत यह तथ्य भी सामने आया कि लम्बे पौधे सर्वदा लम्बे पौधो का निर्माण करेंगे इसी प्रकार बौने पौधे संकरण के द्वारा हमेशा बौने पौधो का निर्माण करेंगे| यदि F2 का F3 पीढ़ी के साथ संकरण करवाया जाए तो पूर्णत: बौने पौधो का निर्माण होगा, उदाहारण स्वरूप:

tt*tt = tt

यदि मिश्रित लम्बाई वाले पौधे को मिश्रित बौने पौधे के साथ क्रॉस करवाया जाये तो भी अनुपात 3:1 रहेगा जिसके अंतर्गत ३ लम्बे पौधे एवं एक बौना पौधा प्राप्त होगा|

TT – शुद्ध या पूर्णत: लम्बा पौधा

Tt – मिश्रित लम्बा

tt – शुद्ध या पूर्णत: बौना पौधा

द्विसंकरीय क्रॉस प्रणाली

इस प्रणाली के अंतर्गत मेंडल ने दो विपरीत गुणों वाले जोड़ो का आपस में क्रॉस करवाया जिसमे उन्होंने गोल एवं पीले बीज एवं हरे झुर्रीदार बीजो को चुना| उन्होंने दोनों बीजो को RRYY एवं rryy के चिन्ह से प्रकट किया| इसमें गोल व् पीले बीज अधिक प्रभावी थे एवं हरे झुर्रीदार बीज कम प्रभावी या अप्रभावी होते है| इस क्रॉस प्रणाली में मेंडल के आनुवंशिकता का पृथक्करण का नियम लागू किया गया जिससे 4 प्रकार के बीजो का निर्माण हुआ|

जब RY बीज का ry के साथ संकरण करवाया गया तो प्राप्त होने वाले बीज अधिकांशत: गोल एव पीले थे जो इनके प्रभावी गुण के कारण सम्भव हो पाया|

मेंडल के आनुवंशिकता के नियम या Mendal’s Law

मेंडल ने एक संकरीय क्रॉस एवं द्विसंकरीय क्रॉस प्रणाली के आधार पर तीन नियमों को महत्व दिया जिसे मेंडल के आनुवंशिकता के नियम कहा जाता है| इसमें प्रथम दो नियम का आधार एक संकरीय क्रॉस प्रणाली एवं अंतिम नियम का आधार द्विसंकरीय क्रॉस प्रणाली को माना जाता है| मेंडल के आनुवंशिकता के नियम इस प्रकार है:-

१.प्रभाविकता का नियम:

इस नियम के अंतर्गत जब मेंडल ने एक जोड़े का दूसरे जोड़े के साथ संकरण करवाया तो प्रथम गुण अधिक प्रभावी रहा, जैसे मटर के पौधे के क्रॉस के दौरान लम्बा पौधा बौने पौधे से अधिक प्रभावी रहा एवं अधिकतर लम्बे पौधे का निर्माण हुआ|

२.पृथक्करण का नियम:

पृथक्करण के नियम के अनुसार प्रत्येक जोड़े में कारक विद्यमान होते है, जिनका युग्मको तक पहुचना अनिवार्य होता है, किन्तु एक समय में केवल एक ही कारक जा सकता है, इसलिए इस नियम को “युग्मको के शुद्धता के नियम” के नाम से भी जाना जाता है| इसके अंतर्गत F1 पीढ़ी का F2 पीढ़ी से क्रॉस करवाने पर लम्बे पौधे प्राप्त होते है किन्तु जब स्व-परागण द्वारा पुन: संकरण करवाया गया तो बौना पौधा भी प्राप्त हुआ जिनका अनुपात 3:1 रहा|

३.स्वतंत्र अप्व्युह का नियम:

इस नियम के अनुसार कई प्रकार के जोड़े इसे होते है, जो अपने आप में स्वतंत्र होते है, ये जीव निर्माण या अपनी संख्या को बढ़ाने हेतु मिश्रित रूप से स्वतंत्र होकर अलग प्रकार के जीवों का निर्माण भी कर सकते है|

आनुवंशिक विभिन्नता

सभी जीवों में आनुवंशिक विभिन्नता का स्त्रोत उत्परिवर्तन को माना जाता है, जिससे नई प्रजाति के निर्माण में सहायता मिलती है| किसी जीव में उपस्थित गुन्सुत्रो की स्थिति एवं रचना में बदलाव उत्परिवर्तन को जन्म देता है| आनुवंशिक पुनर्योग को भी आनुवंशिक विभिनता के लिए जिम्मेवार माना जा सकता है, इसके अंतर्गत संतानों के गुण परिस्थिति एवं वातावरण के अनुसार पैत्रको के गुणों से अलग हो सकते है|

मोनेरा जगत (Kingdom Monera)

Different types of bacteria

मोनेरा जगत जीव जगत के एक वर्गीकरण का महत्वपूर्ण अंग है, जिसके अंतर्गत सभी प्रकार के जीवाणु, बैक्टीरिया आदि आते है| इस जगत में सभी प्रकार में प्रोकेरियोटिक, आर्की बैक्टीरिया एवं सायनो बैक्टीरिया को सम्मिलित किया गया है| जीवाणु एवं बैक्टीरिया प्रकृति का अनिवार्य अंग है एवं इसमें से अधिकांश स्वत: उत्पन्न हो जाते है क्योकि इन्हें उत्पन्न होने के लिए किसी विशेष व्यवस्था की आवश्यकता नहीं होती एवं ये प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रह सकते है|

मोनेरा जगत में आने वाले ये सभी जीवाणु उस प्रत्येक स्थान पर उत्पन्न हो जाते है जहाँ जीवन पैदा होने की बहुत कम सम्भावना होती है| ये पानी में, झरनों में, मिटटी में, रेगिस्तान में, बर्फ की तली में एव वायु में भी अपना अस्तित्व बनाये रख सकते है| इन जीवों के कुछ विशेष प्रकार के लक्ष्ण होते है, जिनसे उनकी पहचान की जा सकती है, जो इस प्रकार है:-

मोनेरा जगत के जीवों के प्रमुख लक्ष्ण

इस जगत के जीवों की कोशिका का संगठन प्रोकेरियोटिक होता है, जिसका सीधा सा अर्थ यह है कि इनकी कोशिका अनुवांशिकी का पदार्थ जीवद्रव्य के इधर उधर बिखरा रहता है, यह किसी कोशिका झिल्ली से चिपका नहीं होता न ही बंधा होता है|

इन जीवधारियो की कोशिका भित्ति में अमीनो एसिड के साथ पोलिसेकेराईडस भी पाया जाता है, जो इनकी भित्ति को मजबूती प्रदान करता है एवं सुरक्षित रखता है| इन जीवों में केन्द्रक झिल्ली नहीं होती| केन्द्रक झिल्ली के साथ-साथ गाल्जिकाय, माइटोकानड्र्रीया, एवं रिक्तिका भी विद्यमान नहीं होती|

ये जीवाणु एवं बैक्टीरिया परपोषी होते है, एवं कई बार रसायन संश्लेषी व् प्रकाश संश्लेषी भी होते है, किन्तु अधिकतर ये दूसरे के ऊपर आश्रित रहने वाले होते है| मोनेरा जगत के कुछ जीवो में स्थिरीकरण की क्षमता भी पाई जाती है जिसका सम्बन्ध वायुमंडल की नाइट्रोजन से होता है|

मोनेरा जगत का विभाजन या वर्गीकरण

मोनेरा जगत को मुख्य रूप से 4 भागो में बांटा गया है, जिससे खोजकर्ता को एवं अध्ययन करने वालो को सुविधा हो सके एवं मोनेरा जगत को जीवों को समझने में सहायता प्राप्त हो सके, मोनेरा जगत के ये 4 भाग इस प्रकार है:-

जीवाणु या बैक्टीरिया

जीवाणु को सूक्ष्म जीव भी कहा जाता है क्योकि ये काफी छोटे होते है एवं नंगी आँखो से नहीं दिखते| जीवाणु की कोशिका भित्ति की रासायनिक सरंचना पादप कोशिका से बिलकुल अलग होती है| जो जीवाणु प्रकाश संश्लेष्ण की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते है उनका बैक्टीरियल क्लोरोफिल पादपो में विद्यमान क्लोरोफिल से बिलकुल भिन्न होता है तथा इनका आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है|

एक कोशिकीय बैक्टीरिया में पाई जाने वाली कोशिका भित्ति पेपटाईडोग्लाईकान नामक यौगिक की बनी होती है जो कोशिका झिल्ली को ढककर उसे बाहरी रूप से सुरक्षा प्रदान करती है और ये अनिवार्य भी है और यह केवल जीवाणु में पाई जाती है| कोशिका में राइबोसोम पाए जाते है एवं इनमे एकल गुणसूत्र प्रधान होता है व् इनकी अंगक झिल्ली नहीं होती|

जीवाणु के कशाभो का आकार व् बनावट यूकेरियोटिक जीवो के कशाभो से अलग होता है एवं कुछ जीवाणु में ये एक होते है एवं कई में दो कशाभ भी हो सकते है| बैक्टीरिया की प्लाज्मा झिल्ली प्रोटीन एवं लिपिड से मिलकर बनी होती है एवं ये कोशिका भित्ति के ठीक नीचे स्थित रहती है तथा कोशिका द्रव्य को घेरे रहती है|

बैक्टीरिया अच्छे व् बुरे दोनों प्रकार के होते है जो अन्य जीवो को लाभ एवं नुकसान पंहुचा सकते है| बैक्टीरिया में DNA से निर्मित एक अणु पाया जाता है जो केन्द्रभ में उपस्थित रहता है| इनके क्रोमोसोम केन्द्रक के ठीक भीतर स्थित नहीं होते इसी कारण इन्हें प्रोकेरियोट जीवाणु कहा जाता है|

जीवाणु में श्वसन की प्रक्रिया दो प्रकार से होती है, एक आक्सीजन की उपस्थिति में, जिसे वायवीय कहते है, तथा दूसरी आक्सीजन की अनुपस्थिति में जिसे अवायवीय कहा जाता है| जीवाणु अलेंगिक रूप से जनन की प्रक्रिया करते है जिसमे वे द्विविभाजन प्रणाली का इस्तेमाल करके अपनी संख्या को बढाते है| परन्तु कुछ जीवाणु लेंगिक प्रक्रिया द्वारा भी जनन करते है, ये आपसी सम्पर्क द्वारा अपने गुणसूत्र दूसरे जीवाणु में डाल देते है|

एक्टिनोमाईसिटिज

पहले इस जाति को कवक माना जाता था, किन्तु इसकी कोशकीय सरंचना के कारण इसे जीवाणु माना जाने लगा| इसलिए कई बार इसे कवकसम बैक्टीरिया कहकर भी पुकारा जाता है| इनकी कुछ प्रजातियों ऐसी है जिनसे प्रतिजैविक भी प्राप्त किये जा सकते है|

आर्की बैक्टीरिया

इस प्रकार के जीवाणु प्रतिकूल एवं जटिल वातावरण में रहने के लिए प्रसिद्ध होते है, मिथेनोजैनिक जीवाणु, थर्मोएसिडोफिलिक एवं हेमोफिलिक आदि इस प्रकार के बैक्टीरिया के उदहारण है, ये बैक्टीरिया गर्म जगहों, आक्सीजन की कमी वाले क्षेत्रो, मल आदि स्थानों पर पाए जाते है|

साइनो बैक्टीरिया

अधिकांशतः साइनो बैक्टीरिया प्रकाश संश्लेषी क्रिया में माहिर होते है, एवं उसी से अपना पालन-पोषण करते है, इन्हें नील हरित शैवाल भी कहा जाता है| किन्तु ये शैवाल की अपेक्षा जीवाणुसम ज्यादा उचित मालूम पड़ते है| ये कई प्रकार के जीव् जैसे कवक आदि के साथ अपना सहजीवन बिता सकते है|

प्रोटिस्टा जगत (Kingdom Protista)

paramecium Diagram

प्रोटिस्टा जगत में मुख्य रूप से एक कोशिकीय जीव एवं यूकेरियोटिक जीव शामिल किये गये है| इस श्रेणी के जीव अनेको प्रकार के जीवन की अलग छवि को प्रदर्शित करते हुए नजर आते है| जन्तु एवं पौधे के मध्य आने वाला युग्लिना भी इसी जगत का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है| इस जगत के अंतर्गत प्रोटोजोआ भी आते है, जिसके अंतर्गत २ प्रकार की जीवन प्रणाली के बारे में जानकारी मिलती है, एक तो उन जीवों की जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भरण पोषण करते है एवं दूसरे वे जो प्रकाश के बिना इतरपोषक बन जाते है|

इस जगत में विभिन्न प्रकार के शैवाल, मोल्स, स्लाइम एवं प्रोटोजोआ आदि आते है| इन जीवों की सरंचना विशेष प्रकार की होती है, जिनसे इनकी पहचान एवं इनका अध्ययन करना आसान हो जाता है, प्रोटिस्टा जगत के जीवो की सरंचना इस प्रकार है:-

सरंचना

प्रोटिस्टा जगत के अंतर्गत आने वाले जीव जैसे की शैवाल, डायटम आदि प्राय: एककोशिकीय होते है| इनमे श्वसन अंग के रूप में माइटोकांड्रिया कार्यरत रहता हैं एवं इनमे केन्द्रक झिल्ली, गाल्जिकाय, कोशिका झिल्ली के भीतर गुणसूत्र, अन्त: प्रद्व्य जालिका आदि सभी अंग पाए जाते है|

प्रोटिस्टा जगत के प्राणी मृतोपजीवी या परजीवी अथवा प्रकाश संश्लेषण क्रिया के द्वारा अपना भरण पोषण करते है| प्रोटिस्टा जीव गमन करने के लिए कशाभिका (flagellum) , पादाभ एवं रोमाभ का प्रयोग करते है| कुछ प्रोटिस्ट जीव मानव के लिए हानिकारक हो सकते है जबकि कई लाभकारी भी होते है|

प्रोटिस्टा में जनन दो प्रकार की क्रियाओ द्वारा होता है जिसे लैंगिक जनन एवं अलेंगिक जनन कहा जाता है| लेंगिक प्रजनन के अंतर्गत नर एवं मादा जाइगोट का निर्माण करते है, जो युग्मक संयोजन द्वारा किया जाता है, जिससे अर्धसूत्री विभाजन फलित होता है एवं जीव का विकास सम्भव हो पाता है, जबकि अलेंगिक जनन प्रक्रिया द्विविभाजन प्रणाली द्वारा पूरी होती है, जिसमे पुटी निर्मित करके जीव का जन्म होता है|

प्रोटिस्टा का वर्गीकरण

प्रोटिस्टा जगत के अंतर्गत आने वाले जीवो का वर्गीकरण विभिन्न भागों में किया जाता है जो इस प्रकार है:-

फाइलम:

इसके अंतर्गत राइजोपोडा, फ्लेजलेटा, अपोरोजोया आदि आते हैं जिसके मुख्य उदाहरण अमीबा, युग्लिना आदि जीव होते है|

फाइलम के साथ-साथ फाइलम बैसीलेरियो फाईटा(Phylum Bacillariophyta), फाइलम फियोफाईटा, फाइलम क्लोरोफाईटा एवं फाइलम रोड़ाफाईटा आदि प्रोटिस्टा के वर्गीकरण के अंदर सम्मिलित है|

उदहारण के द्वारा प्रोटिस्टा जगत को समझना और भी आसान हो सकता है, जो इस प्रकार है:-

अमीबा

अमीबा प्रोटिस्टा जगत का महत्वपूर्ण प्राणी माना जाता है, जो ताल्राबो, झीलों आदि में पाया जाता है| अमीबा के भीतर संचरण के लिए पादाभ उपस्थित रहते है, जिससे ये अपना भोजन प्राप्त करता है| अमीबा के पादाभ इसे भोजन ग्रहण करने में सहायक होते है|

अमीबा के अंदर परासरण के लिए एक धानी विद्यमान होती है, जो साधारणतया संकुचनशील होती है| अमीबा में जनन के लिए द्विविभाजन प्रणाली का उपयोग किया जाता है, अत: इसमें लेंगिक जनन का गुण नहीं पाया जाता|

एंटअमीबा

अमीबा की यह प्रजाति मनुष्य के लिए हानिकारण साबित हो सकती है, जिससे मानवो में कई बार अमीबिय पेचिश रोग पैदा हो जाता है| इसकी एक साधरण प्रजाति को हिस्टोलिका कहा जाता है| इसका आकार व् बनावट अमीबा के समान ही होता है, अधिकांशत: ये प्रदूषित जल में पाए जाते है, यदि मनुष्य इस जल का सेवन करता है तो वह संक्रमित हो सकता है|

नर एंटअमीबा का आक्रमण सिस्ट के द्वारा फलित होता है, और यदि यह गाँठ मनुष्य के शरीर में पैदा होकर फट जाए एवं पेट एवं आंतड़ियो में फ़ैल जाए तो यह गम्भीर रोग उत्पन्न कर सकते है, इसलिए समय पर चिकित्सक परामर्श शनिवारी हो जाता है| इस रोग के प्रमुख लक्ष्ण है, पेट में दर्द एवं एंठन, उलटी आना, जी मिचलाना, शौच के साथ रक्त आना आदि|

प्लाजमोडियम

प्रोटिस्टा जगत के इस परजीवी को मलेरिया परजीवी भी कहा जाता है| इसका जीवन चक्र २ मुख्य प्रवस्थाओ में सम्पन्न होता है, जिसमे से लेंगिक जनन प्रावस्था मादा एनाफिलिज मच्छर द्वारा की जाती है, जो मलेरिया वाहक कहलाती है, एवं अलेंगिक जनन प्रावस्था मानव के रक्त द्वारा सम्पन्न की जाती है|

युग्लिना

यह जीव गंदे स्थानों, जैसे नाले, गड्ढे, गंदे पानी के जलाशयों आदि में उपस्थित रहता है| इस जीव का बाहरी आवरण बेहद लचीला होता है, जिसे पेलिकल कहा जाता है और यह प्रोटीन से निर्मित होता है| परासरण नियमन के लिए इसमें धानी मौजूद रहती है, जो प्राय: संकुचनशील होती है|

जनन के लिए द्विविभाजन प्रणाली का प्रयोग किया जाता है, एवं जल में संचरण कशाभ द्वारा किया जाता है|

डायटम

यह जीव नाम मिटटी, जल एवं गीली जगहों पर पाया जाता है| इसकी हजारो की संख्या में प्रजातिया जल में स्थित रहती हैं जो जलीय प्राणियों का भोजन करती है| डायटम तन्तु के रूप में विद्यामान हो सकते है, ये एक कोशिकीय भी हो सकते है तथा आकृतियों में भेद हो सकता है|

डायटम कोशिका भित्ति निर्मित करते हैं जिसके अंदर सिलिका उपस्थित रहती है| इनमे केन्द्रक पाया जाता है, एवं ये कई प्रकार के मिनरल्स का अच्छा स्त्रोत है|

जन्तुओ में पोषण (Nutrition in Animals)

cute cute animals

शरीर को पर्याप्त ऊर्जा देने एव् जीवित रहने के लिए सभी प्राणियों के लिए भोजन आवश्यक होता है एवं इसी से सभी जीवों को पोषण प्राप्त होता है और जिन पदार्थो से भोजन प्राप्त होता है उम्हे पोषक पदार्थ कहते है| जीव-जन्तु अपना भोजन स्वय नहीं बना सकते इसलिए उन्हें निर्मित भोजन की आवश्यकता होती है| जैसे एक जीव दूसरे जीव को खाकर पोषण प्राप्त करता है, और यह प्रक्रिया सतत चलती रहती है|

जन्तुओ में पोषण के प्रकार

जन्तुओ द्वारा भोजन ग्रहण करने के आधार पर जंतुओं में पोषण को तीन भागों में विभाजित किया गया है, जो इस प्रकार है:-

पूर्णभोजी पोषण

इस श्रेणी के अतर्गत ऐसे जीव आते है, जो अपना भोजन ठोस या द्रव के रूप में ग्रहण करते है, मनुष्य भी उनमे से एक प्राणी है| इन जीवों को प्राणी सम्भोजी भी कहा जाता है| इस प्रक्रिया में प्राणी कार्बनिक पदार्थो को ग्रहण करता है एवं उसके शरीर की कोशिकाओं द्वारा उसका अवशोषण किया जाता है| भोजन प्रणाली के विभिन्न चरणों द्वारा शरीर में इसका अवशोषण करके मल के रूप में बाहर त्याग कर दिया जाता है| इसके अंतर्गत मेढक, मनुष्य एवं अमीबा आदि जीव आते है| इसके 4 प्रकार होते है:

शाकाहारी:

इसमें आने वाले जीव – जन्तु, पादप या उनके भागों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हुए उनसे पोषण प्राप्त करते है, जैसे गाय, हाथी, घोडा, बकरी, भैंस आदि|

माँसाहारी:

इसमें शामिल जीव पोषण प्राप्त करने हेतु दूसरे जीवों को मारकर उनका मॉस खाते है| जैसे शेर, चीता, बाघ आदि|

सर्वाहरी:

इसमें आने वाले जीव शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों प्रकार के हो सकते है, इसलिए उन्हें सर्वाहरी कहा जाता है| जैसे कि, मनुष्य|

अपमार्जक:

इसके अंदर शामिल जीव मृत जीवों को खाकर अपना भरण-पोषण करते है एवं पर्यावरण को साफ़ रखने में सहायता करते है| गिद्ध, सियार आदि इसके उदहारण है|

परजीवी पोषण

जैसा कि शब्द से स्पष्ट हो रहा है, पर का अर्थ होता है, दूसरा एवं जीवी अर्थात जीव, ऐसे जीव जो दूसरे जीवो के द्वारा पोषण प्राप्त करते है या दूसरे प्राणी के शरीर के सम्पर्क में रहकर कार्बनिक पदार्थो द्वारा भोजन प्राप्त करते है, उसे परजीवी पोषण कहा जाता है| जो जीव इन परजीवियों का लक्ष्य होता है या जिनसे ये परजीवी पोषण या अपना भोजन प्राप्त करते है, उसे पोषी जीव कहा जाता है| परजीवी पोषी जीव को मार तो नहीं सकते किन्तु काफी हद तक उन्हें बाहरी एवं भीतरी रूप से नुकसान पंहुचा सकते है| बैक्टीरिया, कवक, कृमि जैसे फिताकृमी आदि इसके विशेष उदहारण है|

मृतोपजीवी पोषण

इस श्रेणी के अंतर्गत ऐसे जीव आते है जो मृत पादपों एवं जीवो के मृत शरीर एवं सड़े-गले पदार्थो का अपघटन करके उनसे पोषण प्राप्त करते है एवं उन्हें नष्ट कर देते है अर्थात ये पर्यावरण के लिए अपघटन का महत्वपूर्ण कार्य करते है जिससे वायु दूषित न हो एवं सक्रमण न फ़ैल सके| ये मृतजीवी जीव कठोर पदार्थो का अपघटन करके उन्हें सरल पदार्थो में परिवर्तित कर देते है एवं यह प्रकृति की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है| साधारण शब्दों में कहा जा सकता है कि ये जीव अकार्बनिक पदार्थो को कार्बनिक में बदल देते है| अधिकांशत: ये गीली लकड़ी, सड़े हुए पत्ते एवं मृत एवं सड़े हुए जीवो की लाश आदि को निशाना बनाते है|

जन्तुओ में पोषण प्रणाली के महत्वपूर्ण चरण

प्रत्येक प्राणी में भोजन एवं पोषण के कई चरण सम्मिलित होते है| एककोशिकीय जीवों में भोजन प्रणाली के चरण उनकी एक कोशिका के द्वारा ही सम्पन्न किये जाते है| सभी जन्तुओ में मुख्य रूप से ये चरण ५ की संख्या में खत्म होते है, जिनका विवरण इस प्रकार है:-

अंतग्रहण:

जन्तुओ में भोजन प्रणाली का यह पहला चरण माना जाता है, इसके अंतर्गत भोजन आहार नाल तक जाता है, इसे अंत:ग्रहण अर्थात अंदर ग्रहण करना कहा जाता है|

पाचन:

भोजन प्रणाली के दूसरे चरण के अंतर्गत भोजन ग्रहण करने के पश्चात पाचन का कार्य शुरू होता है| इसमें जिस स्वरूप में भोजन ग्रहण किया जाता है, जैसे तरल, ठोस आदि भोजन के कठोर एवं अघुलनशील स्वरूप  सरल एवं छोटे व् घुलनशील स्वरूप में बदला जाता है, जिसके अंतर्गत शरीर के भीतर मौजूद विभिन्न प्रकार के एन्ज्याम्स एवं पाचक रस रासायनिक प्रक्रिया द्वारा भोजन को पचाने का कार्य करते है|

अवशोषण:

भोजन प्रणाली के तीसरे चरण के अंतर्गत भोजन को पचाने के पश्चात रक्त द्वारा उसका सारा रस अवशोषित कर लिया जाता है, जिसके अंतर्गत शरीर को पर्याप्त ऊर्जा एवं शक्ति मिलती है|

स्न्वांगीकरण:

भोजन प्रणाली के चोथे चरण के फलस्वरूप भोजन को शरीर के सभी हिस्सों तक पहुचाया जाता है, जिससे सभी हिस्सों को पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त  मिल सके|

बहिष्करण:

इस चरण के अंतर्गत भोजन का बहिष्कार या उसे मल के रूप में शरीर से बाहर निकालना बहिष्करण कहलाता है, यह भोजन प्रणाली का सबसे अंतिम चरण है| इसके पश्चात जीव पुन: भोजन प्रणाली के चरण दोहराने की तैयारी में जुट जाता है एवं यह प्रक्रिया मृत्यु तक लगातार चलती रहती है|